भारत के इतिहास में कुछ योद्धा ऐसे हुए हैं, जिनके नाम से ही दुश्मन कांपने लगते थे। ऐसा ही एक नाम है बाजीराव पेशवा का। मराठा साम्राज्य के इस महान सेनानायक को उनके अद्भुत युद्ध कौशल और रणनीति के लिए जाना जाता है। कहा जाता है, “चीते की चाल, बाज की नज़र और बाजीराव की तलवार पर कभी संदेह नहीं करते।” बाजीराव ने अपनी तेज़ी, साहस और अचूक रणनीति से मराठा साम्राज्य को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी और 20 सालों में 41 युद्ध लड़े, जिनमें से हर एक में जीत हासिल की। आइए, जानते हैं इस हिंदू योद्धा की वीरता और बलिदान की कहानी, जो आज भी हर भारतीय को प्रेरणा देती है।
एक योद्धा का जन्म और शुरुआती जीवन
बाजीराव पेशवा का जन्म 18 अगस्त 1700 को हुआ था। वे मराठा साम्राज्य के पेशवा बालाजी विश्वनाथ के बेटे थे। बाजीराव का पूरा नाम बाजीराव बल्लाल भट था। उनके पिता ने मराठा साम्राज्य को मुग़लों के चंगुल से आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाई थी। बाजीराव को बचपन से ही युद्ध कला, घुड़सवारी, और रणनीति की शिक्षा दी गई। उनके छोटे भाई चिमाजी अप्पा भी एक कुशल योद्धा थे। 1720 में, जब बाजीराव की उम्र महज़ 20 साल थी, उन्हें मराठा साम्राज्य का पेशवा बनाया गया। उस समय कई लोगों ने उनकी उम्र को लेकर सवाल उठाए, लेकिन बाजीराव ने अपनी वीरता से सबको चुप कर दिया।
मराठा साम्राज्य का विस्तार
बाजीराव पेशवा ने अपने शासनकाल में मराठा साम्राज्य को उत्तर भारत तक फैलाया। उनकी रणनीति थी कि दुश्मन को उसके घर में घुसकर हराया जाए। उन्होंने मुग़लों, निज़ाम, और पुर्तगालियों को कई बार मात दी। बाजीराव की सबसे बड़ी खासियत उनकी तेज़ी थी। वे अपनी घुड़सवार सेना के साथ बिजली की गति से हमला करते थे, जिससे दुश्मन को संभलने का मौका ही नहीं मिलता था। उनकी सेना में 40,000 से ज़्यादा घुड़सवार सैनिक थे, जो पहाड़ी इलाकों में भी तेज़ी से हमला कर सकते थे।
बाजीराव की सबसे मशहूर लड़ाई 1737 में दिल्ली की लड़ाई थी। उस समय मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला था। बाजीराव ने अपनी सेना के साथ दिल्ली पर हमला कर दिया और मुग़ल सेना को धूल चटा दी। इस जीत ने मराठा साम्राज्य की ताकत को पूरे भारत में मशहूर कर दिया। इसके अलावा, 1739 में बाजीराव ने पुर्तगालियों को वसई की लड़ाई में हराया और उनके कब्ज़े से कई इलाकों को आज़ाद कराया।
बाजीराव की रणनीति: चीते की चाल, बाज की नज़र
बाजीराव की युद्ध रणनीति इतनी अचूक थी कि दुश्मन उनकी चाल को समझ ही नहीं पाता था। वे अपनी सेना को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर हमला करते थे, जिसे गुरिल्ला युद्ध कहा जाता है। उनकी तेज़ी को देखकर ही कहा गया, “चीते की चाल, बाज की नज़र और बाजीराव की तलवार पर कभी संदेह नहीं करते।” बाजीराव हमेशा युद्ध के मैदान में सबसे आगे रहते थे और अपनी सेना का हौसला बढ़ाते थे। उनकी नज़र बाज की तरह तेज़ थी, जो दुश्मन की हर हरकत को भाँप लेती थी। उनकी तलवार की मार इतनी सटीक थी कि कोई भी योद्धा उनके सामने टिक नहीं पाता था।
बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी
बाजीराव की जिंदगी में युद्ध के अलावा एक और पहलू था, जो बहुत मशहूर हुआ—उनकी प्रेम कहानी। बाजीराव की पहली पत्नी काशीबाई थीं, लेकिन उनकी मुलाकात मस्तानी से हुई, जो बुंदेलखंड की राजकुमारी थीं। मस्तानी न केवल खूबसूरत थीं, बल्कि एक कुशल योद्धा भी थीं। बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी ने उस समय बहुत विवाद खड़ा किया। मस्तानी मुस्लिम थीं, और इस वजह से कई मराठा सरदारों ने इसका विरोध किया। लेकिन बाजीराव ने मस्तानी का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने मस्तानी से शादी की और उन्हें अपने साथ रखा। यह प्रेम कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
बाजीराव की मृत्यु और उनकी विरासत
बाजीराव का जीवन बहुत छोटा रहा। 1740 में, जब वे नर्मदा नदी के किनारे रावेरखेड़ी में डेरा डाले हुए थे, उन्हें तेज़ बुखार हुआ। उस समय उनकी उम्र महज़ 40 साल थी। 28 अप्रैल 1740 को बाजीराव की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय मस्तानी उनके साथ थीं। कहा जाता है कि मस्तानी ने भी उनके बाद सती प्रथा का पालन किया, हालांकि इस बात के पुख्ता सबूत नहीं हैं।
बाजीराव की मृत्यु के बाद उनके बेटे बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) ने पेशवा का पद संभाला। बाजीराव ने अपने 20 साल के शासन में मराठा साम्राज्य को इतना मज़बूत कर दिया कि वह पूरे भारत में सबसे ताकतवर शक्ति बन गया। उनकी रणनीति और साहस आज भी सैन्य इतिहास में पढ़ाए जाते हैं।
