27 दिसंबर: जब धर्मनिरपेक्ष पर्सिया इस्लामिक ईरान बना—तब शरणार्थियों को मिला हिंदू राजाओं का सहारा

27 दिसंबर की तारीख पश्चिम एशिया के इतिहास में अक्सर एक जटिल बहस के साथ जोड़ी जाती है—पर्सिया से ईरान तक के सफ़र की। सोशल मीडिया और जन-चर्चा में यह दावा बार-बार सामने आता है कि 27 दिसंबर 1934 को धर्मनिरपेक्ष पर्सिया को “इस्लामिक ईरान” में बदल दिया गया। लेकिन ऐतिहासिक रिकॉर्ड इस कहानी को कहीं अधिक परतदार और तथ्यात्मक रूप से अलग तस्वीर दिखाते हैं। इसी बहस के केंद्र में वे शरणार्थी भी हैं, जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न से भागकर भारत आना पड़ा—और जिन्हें शरण मिली हिंदू राजाओं से।

यह लेख तथ्यों के साथ उस इतिहास को समझने की कोशिश है—बिना भावनात्मक अतिशयोक्ति के, लेकिन पूरे संदर्भ के साथ।

पर्सिया से ईरान: नाम बदला, व्यवस्था नहीं

सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि 1934–35 में पर्सिया “इस्लामिक” देश नहीं बना था। 21 मार्च 1935 को तत्कालीन शासक रेज़ा शाह पहलवी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अनुरोध किया कि उनके देश को “पर्सिया” की जगह ईरान कहा जाए।

यह बदलाव नाम और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा था, न कि शासन प्रणाली से। उस समय ईरान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी राजशाही था, जहाँ राज्य का संचालन इस्लामी कानून (शरीया) पर आधारित नहीं था। महिलाओं की शिक्षा, पश्चिमी ड्रेस कोड, आधुनिक न्याय व्यवस्था और सेना का पुनर्गठन—ये सब रेज़ा शाह के सेक्युलर एजेंडे का हिस्सा थे।

असल में ईरान का इस्लामीकरण 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हुआ, जब अयातुल्ला खोमैनी के नेतृत्व में राजशाही का अंत हुआ और “इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान” अस्तित्व में आया।

फिर 27 दिसंबर क्यों चर्चा में आता है?

27 दिसंबर की तारीख ऐतिहासिक रूप से ईरान के नाम परिवर्तन से सीधे जुड़ी नहीं है, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह दिन अक्सर पर्सिया, आर्य पहचान और भारत से ऐतिहासिक रिश्तों की बहस में उभरता है। “ईरान” शब्द स्वयं “आर्यन” (Aryan) से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ है—आर्यों की भूमि।

यहीं से चर्चा मुड़ती है उन समुदायों की ओर, जिन्हें इस्लामी विस्तार के शुरुआती दौर में धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

इस्लामी आक्रमण और शरणार्थियों का पलायन

7वीं–8वीं सदी में अरब इस्लामी सेनाओं के पर्सिया में प्रवेश के बाद वहाँ की ज़रथुश्ती (Zoroastrian) आबादी पर धार्मिक दबाव बढ़ा। कर, सामाजिक भेदभाव और जबरन धर्मांतरण जैसी स्थितियों ने कई परिवारों को देश छोड़ने पर मजबूर किया।

इन्हीं शरणार्थियों का एक समूह समुद्री रास्ते भारत पहुँचा। इतिहास में उन्हें पारसी कहा गया—पर्सिया से आए लोग।


भारत में शरण: हिंदू राजाओं की भूमिका

पारसी शरणार्थियों को भारत में जिस तरह स्वीकार किया गया, वह उस दौर के लिए असाधारण था। गुजरात के तटीय क्षेत्रों में स्थानीय हिंदू शासकों ने उन्हें न केवल बसने की अनुमति दी, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, व्यापार और सामाजिक सुरक्षा भी दी।

सबसे प्रसिद्ध कथा गुजरात के एक राजा (अक्सर जाड़ी राणा के नाम से जोड़ी जाती है) की है, जिन्होंने दूध से भरे कटोरे के प्रतीक के ज़रिये यह समझाया कि भूमि पहले से भरी है—और पारसियों ने चीनी घोलकर यह भरोसा दिलाया कि वे समाज में घुल-मिलकर उसकी मिठास बढ़ाएँगे, न कि टकराव।

यह केवल लोककथा नहीं, बल्कि भारत की शरण परंपरा का प्रतीक बन चुकी है।

व्यापार, उद्योग और राष्ट्र निर्माण में योगदान

भारत में बसने के बाद पारसी समुदाय ने खुद को सिर्फ सुरक्षित नहीं रखा, बल्कि देश के विकास में अहम भूमिका निभाई। औपनिवेशिक दौर से लेकर आज़ादी के बाद तक, उद्योग, विज्ञान, सेना और परोपकार में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा।

मुंबई और गुजरात जैसे क्षेत्रों में पारसियों ने शिपिंग, स्टील, टेक्सटाइल और शिक्षा संस्थानों की नींव रखी। यह संभव हुआ क्योंकि उन्हें भारत में वह सुरक्षा और सम्मान मिला, जो उनके मूल देश में छिन चुका था।

इतिहास को सरल नारों में बाँधने का ख़तरा

आज के डिजिटल दौर में इतिहास को अक्सर एक लाइन या एक तारीख में समेट दिया जाता है—“1934 में पर्सिया इस्लामिक बन गया”—जबकि सच कहीं अधिक जटिल है।

हकीकत यह है कि:

  • पर्सिया से ईरान बना नाम परिवर्तन के कारण

  • इस्लामी शासन 1979 में आया

  • शरणार्थियों का भारत आना कई सदियों पहले हुआ

  • और उन्हें शरण मिली हिंदू शासकों की सहिष्णु नीति से

इन तथ्यों को अलग-अलग समयरेखाओं में समझना ज़रूरी है, वरना इतिहास भावनात्मक बहस का औज़ार बन जाता है।

27 दिसंबर का अर्थ आज

27 दिसंबर हमें यह याद दिलाने का अवसर देता है कि सभ्यताओं का मूल्यांकन सिर्फ सत्ता परिवर्तन से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि संकट के समय वे दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करती हैं।

भारत का इतिहास—खासतौर पर हिंदू राजाओं की शरण नीति—दिखाता है कि धर्मनिरपेक्षता केवल संविधान का शब्द नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा भी रही है।

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