देश में बढ़ते सुरक्षा और सामाजिक संतुलन से जुड़े मुद्दों के बीच धर्म, राष्ट्र और आंतरिक सुरक्षा को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इसी क्रम में जगद्गुरु शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “धर्म की रक्षा से ही राष्ट्र सुरक्षित रह सकता है” और जिहादी मानसिकता के खिलाफ सख्त तथा ताबड़तोड़ कार्रवाई समय की मांग है। उनका यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब देश में आतंकी नेटवर्क, कट्टरपंथी विचारधाराओं और सामाजिक ध्रुवीकरण को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लगातार अलर्ट मोड में हैं।
शंकराचार्य का कहना है कि किसी भी राष्ट्र की स्थिरता केवल सैन्य या प्रशासनिक ताकत से नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों से तय होती है। उनके अनुसार, जब समाज अपनी परंपराओं और धार्मिक मूल्यों को लेकर सजग रहता है, तभी राष्ट्र की सुरक्षा मजबूत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जिहादी मानसिकता किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि एक वैश्विक चुनौती है, जिससे निपटने के लिए निर्णायक और कानून के दायरे में सख्त कदम जरूरी हैं।
जिहादी मानसिकता पर कार्रवाई क्यों जरूरी?
शंकराचार्य ने अपने वक्तव्य में इस बात पर जोर दिया कि जिहादी सोच केवल हिंसा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह समाज में डर, अविश्वास और विभाजन पैदा करती है। हाल के वर्षों में भारत समेत कई देशों ने देखा है कि कैसे कट्टरपंथी नेटवर्क सोशल मीडिया, फंडिंग चैनलों और लोकल स्लीपर सेल्स के जरिए युवाओं को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा त्वरित कार्रवाई न केवल आतंक की साजिशों को नाकाम करती है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देती है कि कानून के खिलाफ कोई रियायत नहीं दी जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि कार्रवाई का मतलब किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं होना चाहिए। उनका तर्क था कि समस्या किसी धर्म से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से है जो हिंसा और नफरत को बढ़ावा देती है। इसलिए, कार्रवाई का केंद्र विचारधारा और अपराध होना चाहिए, न कि पहचान।
धर्म और राष्ट्र के रिश्ते पर शंकराचार्य की दृष्टि
जगद्गुरु शंकराचार्य के अनुसार, भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में धर्म का अर्थ संकीर्णता नहीं, बल्कि नैतिक अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में धर्म को हमेशा ‘कर्तव्य’ से जोड़ा गया है—चाहे वह व्यक्ति का हो, समाज का या शासन का। जब शासन और समाज दोनों अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं, तभी राष्ट्र सुरक्षित और समृद्ध बनता है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि धर्म की रक्षा का मतलब किसी पर विचार थोपना नहीं है, बल्कि अपनी परंपराओं, आस्थाओं और सांस्कृतिक पहचान को आत्मविश्वास के साथ सुरक्षित रखना है। उनके मुताबिक, कमजोर सांस्कृतिक चेतना वाले समाज बाहरी या कट्टरपंथी विचारों के लिए आसान निशाना बन जाते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका और मौजूदा हालात
भारत में बीते कुछ वर्षों में आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन सामने आए हैं। चाहे वह फंडिंग नेटवर्क पर कार्रवाई हो, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी या ग्राउंड लेवल पर स्लीपर सेल्स की पहचान—सुरक्षा एजेंसियां लगातार सक्रिय रही हैं। शंकराचार्य ने ऐसी कार्रवाइयों को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया और कहा कि इनसे देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूती मिलती है।
उनका मानना है कि जब सरकार स्पष्ट नीति और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ती है, तो समाज में भी भरोसा पैदा होता है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेताया कि सुरक्षा के नाम पर कानून और मानवाधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। संतुलन बनाए रखना ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली परीक्षा है।
समाज और युवाओं के लिए संदेश
अपने बयान में शंकराचार्य ने युवाओं से विशेष अपील की। उन्होंने कहा कि युवा वर्ग को सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों, भड़काऊ कंटेंट और कट्टरपंथी प्रचार से सावधान रहना चाहिए। शिक्षा, संवाद और तर्क ही ऐसे हथियार हैं, जो किसी भी चरमपंथी सोच को कमजोर कर सकते हैं।
उन्होंने परिवारों और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, यदि बचपन से ही बच्चों में संवैधानिक मूल्य, सहिष्णुता और सांस्कृतिक समझ विकसित की जाए, तो कट्टरपंथी विचारधाराओं के लिए जगह अपने आप कम हो जाती है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
शंकराचार्य के इस बयान पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली है। समर्थकों का कहना है कि यह बयान देश की सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के पक्ष में एक स्पष्ट संदेश देता है। वहीं, आलोचकों ने चिंता जताई कि ऐसे बयान सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं। हालांकि, शंकराचार्य ने खुद यह स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि हिंसक और राष्ट्रविरोधी मानसिकता के खिलाफ चेतावनी देना है।
जगद्गुरु शंकराचार्य का यह बयान ऐसे समय आया है, जब भारत सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। धर्म की रक्षा और जिहादी मानसिकता पर सख्त कार्रवाई को लेकर उनकी राय इस बहस को एक नया आयाम देती है। यह बयान न केवल सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर रोशनी डालता है, बल्कि समाज और युवाओं के लिए भी एक स्पष्ट संदेश देता है—कि राष्ट्र की सुरक्षा केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार समाज से भी तय होती है।
