नौकरी के बदले ज़मीन हड़पने का खेल: कोर्ट ने लालू-राबड़ी समेत 41 लोगों पर किए आरोप तय

नई दिल्ली की अदालत से आए एक फैसले ने बिहार की राजनीति में फिर से हलचल पैदा कर दी है। बहुचर्चित नौकरी के बदले ज़मीन मामले में कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके परिवार व सहयोगियों से जुड़े कुल 41 लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। इस आदेश के साथ ही यह मामला अब शुरुआती जांच के चरण से निकलकर विधिवत सुनवाई के दौर में प्रवेश कर चुका है।

यह पूरा मामला उस समय से जुड़ा हुआ है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। जांच एजेंसियों का आरोप है कि रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिजनों से ज़मीन लिखवाई गई। ये ज़मीन सौदे कथित तौर पर बाज़ार कीमत से बेहद कम दामों पर किए गए और बाद में लालू परिवार से जुड़ी कंपनियों या रिश्तेदारों के नाम स्थानांतरित कर दिए गए। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों और जांच रिपोर्ट के आधार पर माना कि इन आरोपों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

कोर्ट की टिप्पणी में यह भी कहा गया कि नियुक्तियों की प्रक्रिया सामान्य और पारदर्शी नहीं दिखती। ज़मीन के लेन-देन और नौकरियों के समय-क्रम में जो समानता दिखाई देती है, वह संयोग मात्र नहीं लगती। इसी आधार पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला ट्रायल के योग्य है और आरोपियों को इसका जवाब देना होगा। अदालत ने इस स्तर पर बचाव पक्ष की उन दलीलों को स्वीकार नहीं किया, जिनमें पूरे मामले को राजनीतिक साजिश बताया गया था।

लालू परिवार की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि सभी ज़मीन सौदे कानूनी हैं और नौकरियाँ नियमों के अनुसार दी गई थीं। उनके वकीलों का तर्क है कि चुनावी समय में इस तरह के मामलों को उछालकर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। हालांकि अदालत ने साफ कर दिया कि इन दलीलों की जांच अब मुकदमे के दौरान होगी और अभी के लिए आरोप तय करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

इस फैसले के बाद बिहार की सियासत में बयानबाज़ी तेज़ हो गई है। विपक्षी दलों ने इसे कानून की जीत और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख़्त संदेश बताया है, वहीं राजद समर्थक इसे अपने नेताओं को निशाना बनाने की कार्रवाई बता रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ेगी, यह मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर राजनीतिक गठबंधनों और चुनावी रणनीतियों पर भी दिखाई देगा।

अब इस केस में अगला चरण गवाहों की पेशी और सबूतों की विस्तार से जांच का होगा। अगर आरोप साबित होते हैं, तो सज़ा का प्रावधान काफ़ी गंभीर हो सकता है। फिलहाल कोर्ट के इस आदेश ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब न्यायिक कसौटी पर परखा जाएगा।

नौकरी जैसे संवेदनशील विषय को लेकर उठे ये आरोप एक बार फिर यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या सत्ता और सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया गया। आने वाले समय में इस मामले की हर सुनवाई पर न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश की नज़र टिकी रहने वाली है।

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