जय जवान–जय किसान: राष्ट्रभक्ति की अमर मिसाल — लाल बहादुर शास्त्री जी

भारत के राजनीतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो भाषणों से नहीं, बल्कि अपने आचरण से पहचान बनाते हैं। लाल बहादुर शास्त्री जी उसी परंपरा के नेता थे। वे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता से ऊपर दिखाई देते थे। न उनका व्यक्तित्व दिखावे से भरा था, न उनकी राजनीति अवसरवाद से संचालित थी। उनकी पुण्यतिथि केवल एक औपचारिक स्मरण नहीं, बल्कि उस विचारधारा को याद करने का अवसर है जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि होता है और नेता स्वयं को माध्यम मानता है।

शास्त्री जी का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षों से घिरा रहा। कम उम्र में पिता का निधन, सीमित संसाधन और कठिन परिस्थितियाँ—इन सबने उनके भीतर किसी प्रकार की कड़वाहट नहीं भरी, बल्कि अनुशासन और आत्मसंयम को जन्म दिया। उन्होंने बहुत जल्दी यह समझ लिया था कि जीवन में सम्मान पद से नहीं, बल्कि चरित्र से मिलता है। काशी विद्यापीठ से मिली शिक्षा ने उनके भीतर भारतीयता, स्वदेशी चेतना और आत्मनिर्भर सोच को और गहरा किया।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय शास्त्री जी ने कभी खुद को किसी बड़े चेहरे के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। वे नारे लगाने से ज़्यादा काम करने में विश्वास रखते थे। जेल गए, यातनाएँ सहीं, लेकिन उनके संकल्प में कोई कमी नहीं आई। उनका राष्ट्रवाद भावुक नहीं, बल्कि जिम्मेदार था। वे जानते थे कि आज़ादी केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया है।

सादगी, सेवा और सत्ता का असली अर्थ

आज जब राजनीति अक्सर वैभव और विशेषाधिकार का पर्याय बन चुकी है, शास्त्री जी का जीवन एक मौन प्रश्न की तरह खड़ा होता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके रहन-सहन में कोई आडंबर नहीं आया। वही साधारण कपड़े, वही सीमित ज़रूरतें और वही अनुशासित दिनचर्या। सत्ता उनके लिए सुविधा नहीं, बल्कि सेवा का विस्तार थी।

जब देश में बिजली संकट गहराया, उन्होंने जनता से सप्ताह में एक दिन बिजली न जलाने की अपील की और स्वयं उस नियम का पालन किया। यह केवल प्रतीकात्मक कदम नहीं था, बल्कि नेतृत्व की नैतिकता का उदाहरण था। वे मानते थे कि जनता से वही अपेक्षा की जानी चाहिए, जिसे नेता स्वयं निभाने को तैयार हो।

उनका प्रसिद्ध उद्घोष “जय जवान–जय किसान” कोई भावनात्मक नारा भर नहीं था। यह भारत की सामरिक और आर्थिक सोच का सार था। शास्त्री जी ने स्पष्ट कर दिया था कि देश की सुरक्षा सैनिक के शौर्य से और देश की स्थिरता किसान के श्रम से आती है। यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उस दौर में था।

1965 का युद्ध और राष्ट्र का आत्मसम्मान

1965 में जब पाकिस्तान ने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी, तब दुनिया की नज़र भारत के नेतृत्व पर थी। कई लोगों को शास्त्री जी से कठोर निर्णय की उम्मीद नहीं थी, लेकिन उन्होंने यह भ्रम जल्दी तोड़ दिया। उन्होंने सेना को पूरा विश्वास दिया और स्पष्ट कर दिया कि भारत दबाव में आकर समझौता नहीं करेगा।

यह युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा गया, बल्कि भारत के आत्मसम्मान के लिए लड़ा गया। शास्त्री जी का नेतृत्व उस समय सामने आया जब उन्होंने शांति की बात करते हुए भी ताकत से पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने साबित किया कि शांत स्वभाव कमजोरी नहीं होता, बल्कि आत्मविश्वास का प्रमाण होता है।

सेना के प्रति उनका विश्वास केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। वे सैनिकों को राजनीतिक बहसों से दूर रखना चाहते थे और उन्हें स्पष्ट दिशा देना जानते थे। यही कारण था कि 1965 के युद्ध ने भारत के भीतर आत्मविश्वास की एक नई लहर पैदा की।

कृषि के क्षेत्र में भी शास्त्री जी की सोच गहरी और दूरदर्शी थी। वे समझते थे कि खाद्य आत्मनिर्भरता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है। किसानों को उन्होंने केवल सहायता पाने वाला वर्ग नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की रीढ़ माना। हरित क्रांति की दिशा में उठाए गए कदम उसी सोच का परिणाम थे।

ताशकंद समझौते के बाद उनका अचानक निधन आज भी कई सवाल छोड़ जाता है। परिस्थितियाँ असामान्य थीं और समय भी। लेकिन इन सबके बीच एक तथ्य निर्विवाद है—लाल बहादुर शास्त्री जी ने भारत को झुकना नहीं सिखाया। उन्होंने सिखाया कि संवाद हो, लेकिन आत्मसम्मान के साथ।

आज के भारत में, जब राजनीति में परिवारवाद, तुष्टिकरण और दिखावा हावी दिखाई देता है, शास्त्री जी की विरासत और भी प्रासंगिक हो जाती है। वे याद दिलाते हैं कि ईमानदारी राजनीति की कमजोरी नहीं होती और सादगी नेतृत्व की बाधा नहीं, बल्कि उसकी ताकत होती है।

राइट-विंग दृष्टिकोण से देखा जाए तो शास्त्री जी बिना किसी आक्रामक भाषा के पूर्ण राष्ट्रवादी थे। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना से जुड़े थे, सैन्य शक्ति के समर्थक थे और तुष्टिकरण की राजनीति से दूर रहते थे। उनका राष्ट्रवाद भाषणों में नहीं, निर्णयों में दिखाई देता था

लाल बहादुर शास्त्री जी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे उस भारत का प्रतिनिधित्व करते थे जो कम बोलता है, ज़्यादा सहता है, लेकिन जब खड़ा होता है तो दुनिया को झुकने पर मजबूर कर देता है।

जय जवान।
जय किसान।
जय भारत।

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