राजमाता जीजाबाई: जिनके संस्कारों ने गढ़ा हिंदवा सूर्य शिवाजी

मातृशक्ति, संस्कार और स्वराज की नींव

भारत का इतिहास केवल युद्धों, राजाओं और साम्राज्यों का क्रम नहीं है। यह उन घरों की भी कहानी है जहाँ संस्कारों की लौ जलती रही, और उन माताओं की गाथा है जिनकी शिक्षा ने आने वाली पीढ़ियों का चरित्र गढ़ा। ऐसी ही एक महान नारी थीं राजमाता जीजाबाई। 12 जनवरी को मनाई जाने वाली उनकी जन्मजयंती महज़ एक तिथि नहीं, बल्कि उस मातृचेतना का स्मरण है, जिसने भारत के इतिहास को नई दिशा दी।

जीजाबाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। चारों ओर राजनीतिक अस्थिरता थी, आक्रमणों का भय था और समाज निरंतर दबाव में था। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों ने जीजाबाई को कमजोर नहीं किया। उन्होंने पीड़ा को धैर्य में, और संकट को संकल्प में बदला। उनके लिए मातृत्व केवल वात्सल्य नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी थी—अपने पुत्र को ऐसा मनुष्य बनाना, जो अन्याय के सामने झुके नहीं और धर्म के पक्ष में खड़ा हो सके

बाल शिवाजी के मन में उन्होंने कहानियों के माध्यम से विचार बोए। रामायण और महाभारत की कथाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं थीं, बल्कि जीवन के मूल्य समझाने का माध्यम थीं। जीजाबाई ने उन्हें बताया कि शक्ति का उद्देश्य दमन नहीं, बल्कि रक्षा है; और विजय का अर्थ केवल शत्रु को हराना नहीं, बल्कि प्रजा का विश्वास जीतना है। यही कारण है कि शिवाजी के भीतर साहस के साथ करुणा भी दिखाई देती है।

संस्कारों से बना व्यक्तित्व

जीजाबाई का अनुशासन कठोर था, पर उसमें स्नेह की गहराई थी। उन्होंने शिवाजी को विलासिता से दूर रखा और सादगी का महत्व समझाया। नियमित अभ्यास, आत्मसंयम और स्पष्ट लक्ष्य—यही उनके संस्कारों की आधारशिला थी। वे बार-बार यह दोहराती थीं कि राजा होना विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सेवा का दायित्व है। यही शिक्षा शिवाजी के जीवन की दिशा बन गई।

जीजाबाई ने शिवाजी को यह भी सिखाया कि तलवार तभी उठानी चाहिए जब अन्य सभी मार्ग बंद हो जाएँ। उन्होंने न्याय और मर्यादा को शासन की पहली शर्त बताया। यही कारण है कि शिवाजी के निर्णयों में आवेश नहीं, बल्कि विवेक दिखाई देता है। वे जानते थे कि डर पर विजय पाना ही वास्तविक वीरता है, और यह शिक्षा उन्हें अपनी माँ से मिली थी।

जीजाबाई का प्रभाव केवल बचपन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने हर मोड़ पर शिवाजी का मार्गदर्शन किया—कभी साहस बढ़ाया, कभी संयम की याद दिलाई। माँ और पुत्र का यह संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक भी था। इसी वैचारिक संबंध ने आगे चलकर हिंदवी स्वराज की नींव रखी।

स्वराज का उदय, शासन की मर्यादा और अमर विरासत

जब छत्रपति शिवाजी महाराज इतिहास के मंच पर उभरे, तो वे केवल एक वीर योद्धा नहीं थे। वे एक विचार के प्रतीक थे—स्वराज के विचार के। इस विचार की जड़ें राजमाता जीजाबाई के संस्कारों में थीं। उन्होंने शिवाजी को समझाया था कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना का प्रश्न है।

शिवाजी के शासन में जो न्यायप्रियता, अनुशासन और संवेदनशीलता दिखाई देती है, वह संयोग नहीं थी। जीजाबाई ने उन्हें बचपन से यह सिखाया था कि राजा का पहला कर्तव्य प्रजा की सुरक्षा और सम्मान है। यही कारण है कि शिवाजी के राज्य में सामान्य व्यक्ति भी स्वयं को सुरक्षित महसूस करता था। शासन उनके लिए अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी था।

युद्ध में भी मर्यादा, शासन में भी करुणा

युद्ध के समय भी शिवाजी की नीति में जीजाबाई के संस्कार झलकते हैं। उन्होंने कभी अनावश्यक हिंसा को स्वीकार नहीं किया। महिलाओं, बच्चों और धार्मिक स्थलों के प्रति सम्मान उनके शासन की पहचान बना। यह नीति केवल रणनीति नहीं थी, बल्कि नैतिक शिक्षा का परिणाम थी। वे जानते थे कि शक्ति तभी सार्थक है, जब वह न्याय से जुड़ी हो।

जीजाबाई ने शिवाजी को यह भी सिखाया कि विजय के बाद अहंकार सबसे बड़ा शत्रु बन सकता है। इसलिए शिवाजी की सबसे बड़ी पहचान केवल उनकी जीत नहीं, बल्कि उनकी विनम्रता भी रही। वे विजयी थे, पर घमंडी नहीं। यह संतुलन उन्हें अपनी माँ के संस्कारों से मिला था।

स्वराज की अवधारणा शिवाजी के लिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं थी। यह सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भी प्रतीक थी। जीजाबाई ने उन्हें यह समझाया था कि जब तक समाज अपने मूल्यों पर गर्व नहीं करेगा, तब तक वह सशक्त नहीं बन सकता। इसी सोच के कारण शिवाजी ने स्थानीय संस्कृति, परंपराओं और धर्मस्थलों की रक्षा को अपने शासन का अभिन्न अंग बनाया।

आज के भारत के लिए संदेश

आज जब हम शिवाजी को “हिंदवा सूर्य” कहते हैं, तो यह केवल उनकी वीरता का सम्मान नहीं है। यह उस प्रकाश का भी प्रतीक है, जो जीजाबाई के संस्कारों से उनके जीवन में आया। यदि जीजाबाई न होतीं, तो संभव है शिवाजी एक साहसी योद्धा तो बनते, लेकिन वह राष्ट्रनायक न बन पाते।

राजमाता जीजाबाई की विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। वे हमें यह सिखाती हैं कि राष्ट्रनिर्माण केवल युद्धभूमि में नहीं होता, बल्कि घर के संस्कारों से शुरू होता है। एक माँ द्वारा दिया गया सही संस्कार इतिहास की दिशा बदल सकता है।

12 जनवरी को राजमाता जीजाबाई की जन्मजयंती हमें यह याद दिलाती है कि भारत की शक्ति केवल तलवार में नहीं, बल्कि संस्कारों में भी निहित है। वे केवल शिवाजी महाराज की माता नहीं थीं—वे एक विचार थीं, एक चेतना थीं, जिसने हिंदवी स्वराज को आकार दिया।

राजमाता जीजाबाई अमर हैं—अपने संस्कारों में, अपने विचारों में और उस हिंदवा सूर्य में, जिसे उन्होंने गढ़ा।

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