19 जनवरी 1990 को कश्मीर घाटी में जो हुआ, वह केवल एक घटना नहीं थी — वह भारत के संवैधानिक लोकतंत्र, बहुलता और नागरिक सुरक्षा की संस्थागत परीक्षा थी। उस रात नहीं केवल घाटी के हिंदू-सिख अल्पसंख्यक समुदाय के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए यह यादगार काला अध्याय बन गया। यह लेख उसी रात के प्रति संवेदनशील, तथ्यों पर आधारित, और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, ताकि इतिहास का दायित्व केवल याद रखना नहीं, समझना भी बने।
वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जिसमें अलगाववाद ने हिंसा की राह अपनाई
1980 के दशक के अंत तक कश्मीर घाटी में राजनीतिक असंतोष सामाजिक आंदोलन से ज़्यादा खोखली हो रहा था। सीमापार प्रायोजित हथियारबंद समूह, स्थानीय असंतोष और सामरिक उद्देश्यों ने मिलकर धार्मिक पहचान को हिंसा का आधार बना दिया। जिहादी रुझान और स्थानीय अलगाववाद का संगम उस परिस्थिति को जन्म दे रहा था, जहाँ धार्मिक पहचान के आधार पर सिख, पंडित और हिंदू समुदायों को भय, अनिश्चितता और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
हिंसा की शुरुआत 1989 से पहले ही हो चुकी थी, जब उच्च-प्रोफ़ाइल कश्मीरी पंडित नेता टीका लाल टपलू की हत्या सार्वजनिक रूप से हुई — यह संकेत था कि अब पारंपरिक सामाजिक संरचनाएँ ही निशाना बनतीं। इसके बाद उर्दू अखबारों और अलगाववादी वक्तव्यों में खुले तौर पर हिंदुओं से घाटी छोड़ने की मांग भी सामने आई थी।
19 जनवरी 1990 की रात: एक सुनियोजित संदेश से पलायन की शुरुआत
1990 की सर्द सुबह से पहले ही घाटी भर में अजान के साथ साम्प्रदायिक नारे गूंजने लगे थे — जैसे “यहाँ क्या चलेगा, निजाम-ए-मुसलमान?”, “कश्मीर में अगर रहना है, अल्लाहू अकबर कहना है”, और पाकिस्तान का समर्थन करने वाले घोषणा-नारे। इन नारेबाज़ियों का सीधा संदेश था कि घाटी में रहना अब अल्पसंख्यकों के लिए मुश्किल हो गया है।
रात गहरी हुई तो पंडितों के घरों से सामान बांधने की तस्वीरें आम हो गईं। लोग अपने ही घरों में डर के आलम में बैठे थे, यह सोचते हुए कि अगला दिन शायद न आए। उस रात से ही कश्मीरी पंडितों का पहला पलायन जत्था घाटी से बाहर निकला और मार्च–अप्रैल के महीनों में हजारों परिवार भारत के अन्य हिस्सों में शरण लेने को मजबूर हुए।
विस्थापन का सामाजिक और सांस्कृतिक असर
1990 और 1992 के बीच घाटी में अनुमानित 70,000 से अधिक कश्मीरी पंडित परिवारों ने अपनी पहचान, घर और रोज़गार छोड़ दिया। पिछले तीन दशकों में ऐसी स्थितियाँ रहीं कि घाटी में अब बमुश्किल 800 हिंदू परिवार ही रहते हैं, जबकि पहले जनवरी 1990 में पंडित परिवारों की संख्या लगभग 75,343 थी।
पलायन केवल शारीरिक रूप से घरों को छोड़ना नहीं था — यह सांस्कृतिक अस्तित्व का संकट भी था। उपेक्षित स्मृति, बर्बाद घर, और समुदाय के प्रतीकात्मक विनाश ने घाटी के बहुल समाज में एक गहरा विषाक्त प्रभाव छोड़ा। कई घरों को भौतिक रूप से नष्ट कर दिया गया और कुछ स्थानों पर तो यह कहा जाता है कि बचे-खुचे दस्तावेज़ और संपत्ति को भी मिटा दिया गया।
संघर्ष और हत्या की क्रूरता
उसी दौर में घाटी में कई हिंदू नागरिकों की जानें भी गईं। 1990 से लेकर 2011 तक अनुमानित 399 कश्मीरी पंडितों की हत्या आतंकवादियों द्वारा की गई — यह केवल संख्या नहीं बल्कि एक समुदाय के अस्तित्व के प्रति हिंसा की लगातार मांग थी।
घाटी में यह विपरीत परिस्थितियाँ तब पैदा हुईं जब सामुदायिक विभाजन और डर ने मानवीय सहअस्तित्व को चुनौती दी। यह वह दौर था जब कश्मीर की पहचान बदलने की कोशिश की जा रही थी — एक ऐसी पहचान जिसमें अल्पसंख्यकों की भूमिका नज़रअंदाज़ की जा रही थी।
राज्य की भूमिका और प्रशासनिक विफलता
सबसे गंभीर सवाल यह है कि राज्य की भूमिका क्या थी? जनवरी 1990 की रात को कश्मीर में पर्याप्त सुरक्षा बल नहीं तैनात थे; प्रशासन या केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ पर्याप्त सक्रिय नहीं दिखीं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि अगर राज्य ने उस रात प्रभावी कदम उठाया होता—जैसे सशस्त्र बलों की तैनाती या तत्काल सुरक्षा कवरेज—तो आम नागरिकों को भय के कारण पलायन नहीं करना पड़ता।
यह विफलता केवल प्रशासनिक चूक नहीं थी, बल्कि संवैधानिक दायित्व का विघटन थी, क्योंकि नागरिकों को सुरक्षा और जीवन के मौलिक अधिकार की गारंटी देने की ज़िम्मेदारी राज्य की प्राथमिक भूमिका होती है।
नैरेटिव, विस्मृति और ऐतिहासिक विमर्श
समय के साथ यह विषय सिर्फ़ “राजनीतिक जटिलता” या “संघर्ष” जैसा विश्लेषण बनकर रह गया। कई विमर्शों में यह त्रासदी भिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों के रंग में रंगी गई, जिससे पीड़ितों की आवाज़ और स्मृति दबकर रह गई। मुख्यधारा के मुद्दों में कई बार आतंकवाद के “कारणों” पर ज़्यादा ध्यान दिया गया, न कि पीड़ित-केंद्रित मानवीय अनुभवों पर।
ऐसे दृष्टिकोण ने कश्मीरी पंडितों और सिखों की पीड़ा को कमतर दिखाने की कोशिश की है, जबकि वास्तविकता यह है कि उस रात से आज तक यह समुदाय विस्थापन, सामाजिक दुःख और पहचान संकट जैसे गहन अनुभवों से जूझ रहा है।
जहाँ तक बचा है—स्मृति और न्याय की पुकार
थोड़ी बहुत वापसी और संवैधानिक बदलाव हुए हैं—2019 में विशेष दर्जा हटने से प्रशासनिक ढाँचा बदला—लेकिन आज भी कश्मीरी पंडितों के सम्मानजनक वापसी और न्याय की माँग अधूरी है। न्याय का अर्थ केवल मुआवज़ा नहीं; यह सत्य, स्वीकार्यता और भविष्य की सुरक्षा भी है।
सार
19 जनवरी 1990 की रात कोई अचानक विपत्ति नहीं थी—यह लंबे समय से पनपती वैचारिक हिंसा, सांप्रदायिक विभाजन और बदले की भाषा के परिणामस्वरूप उतरी काली रात थी। घाटी से पंडितों और सिखों का पलायन केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं था; वह असल में सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक विनाश की कहानी थी, जिसकी गूँज आज भी संदर्भित होती है। इतिहास तभी सच्चा बनता है जब हम केवल याद रखें नहीं, बल्कि समझें—ताकि ऐसे अध्याय पुनरावृत्ति न हों।
