राज्यसभा में कटा पैर दिखाकर भाजपा सदस्य ने माकपा को दिखाया आईना

राज्यसभा में कटा पैर दिखाकर भाजपा सदस्य ने माकपा को दिखाया आईना

राज्यसभा में बीते सोमवार को एक ऐसा भावनात्मक और असाधारण दृश्य देखने को मिला, जिसने लोकतंत्र के सर्वोच्च मंच पर व्यक्तिगत पीड़ा और राजनीतिक संदेश के बीच एक गहरी रेखा खींच दी।

केरल से भारतीय जनता पार्टी के मनोनीत सदस्य सी. सदानंदन मास्टर ने अपने पहले ही भाषण में ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे सदन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। उन्होंने अपने संबोधन के दौरान मेज पर अपने कृत्रिम पैर रख दिए, जो न केवल उनके जीवन के दर्दनाक अध्याय की झलक थी, बल्कि उस राजनीतिक हिंसा के खिलाफ एक सशक्त प्रतीकात्मक विरोध भी था, जिसका वे वर्षों पहले शिकार बने थे।

व्यक्तिगत पीड़ा से राजनीतिक संकल्प तक

सदानंदन मास्टर ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट किया कि उनका यह प्रदर्शन किसी सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास नहीं था, बल्कि लोकतंत्र के वास्तविक अर्थ और उसकी चुनौतियों को उजागर करने का प्रयास था। उन्होंने कहा कि तीन दशक पहले उनके साथ जो घटना घटी, उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। एक साधारण शिक्षक के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे मास्टर को उस भयावह हमले ने राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने बताया कि लोकतंत्र केवल बहस और विरोध का मंच नहीं, बल्कि सहिष्णुता, संवेदनशीलता और विचारों के सम्मान का आधार भी होना चाहिए। उनके अनुसार, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तभी संभव है, जब राजनीतिक मतभेदों को हिंसा के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाया जाए।

‘लोकतंत्र और मानवता के नाम पर हिंसा को नहीं मिलना चाहिए संरक्षण’

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए सदानंदन मास्टर भावुक हो गए। उन्होंने 31 वर्ष पहले हुए उस हमले को याद किया, जिसका आरोप उन्होंने माकपा कार्यकर्ताओं पर लगाया। उन्होंने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि वे देश और जनता को यह दिखाना चाहते हैं कि लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप क्या होता है और किस प्रकार राजनीतिक विचारधाराओं के नाम पर हिंसा को अंजाम दिया जाता है।

अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब वे घर लौट रहे थे, तभी कुछ लोगों ने उन्हें पीछे से पकड़ लिया। उन्हें सड़क पर गिरा दिया गया और कथित तौर पर ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए उनके पैरों को काट दिया गया। उन्होंने कहा कि यह घटना केवल शारीरिक पीड़ा तक सीमित नहीं थी, बल्कि मानसिक और सामाजिक संघर्ष का भी कारण बनी। इस हमले के बाद उन्हें लंबे समय तक इलाज और पुनर्वास की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी बनने नहीं दिया।

राज्यसभा में अपने कृत्रिम पैरों को मेज पर रखकर संबोधन देते हुए मास्टर ने कहा कि लोकतंत्र की बात करने वाले कुछ राजनीतिक समूहों की प्रतिबद्धता व्यवहार में अक्सर हिंसा से जुड़ी दिखाई देती है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, तो हिंसा की राजनीति को पूरी तरह समाप्त करना होगा।

विपक्ष से रचनात्मक सहयोग की अपील

अपने भाषण के दौरान सदानंदन मास्टर ने विपक्षी दलों से अपील की कि वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र वही होता है, जहां सरकार और विपक्ष दोनों मिलकर राष्ट्र के विकास और जनता के कल्याण के लिए कार्य करें। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इसे व्यक्तिगत द्वेष और हिंसा से दूर रखना आवश्यक है।

शारीरिक अक्षमता के कारण बैठकर भाषण दे रहे मास्टर ने अपने कृत्रिम पैर को मेज पर रखकर अपनी बात को और अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनका यह कदम सदन के भीतर एक गहरा संदेश छोड़ गया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, सहिष्णुता और मानवता जैसे मूल्यों की बात करने वाले लोगों को अपने आचरण में भी इन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।

उन्होंने राजनीतिक हिंसा को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि इस प्रकार की घटनाएं लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं। मास्टर का यह भाषण लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा और उनके शब्दों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल विचारों से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सहिष्णुता और जिम्मेदारी से भी होती है।

लोकतांत्रिक मूल्यों पर व्यापक बहस को मिली नई दिशा

सदानंदन मास्टर के इस भाषण और प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने केवल सदन के भीतर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक गलियारों और सामाजिक मंचों पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया। उनके इस कदम को कई लोगों ने राजनीतिक हिंसा के खिलाफ एक साहसिक संदेश के रूप में देखा, जबकि कुछ ने इसे लोकतांत्रिक विमर्श में भावनात्मक अपील के रूप में भी व्याख्यायित किया। हालांकि, इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक मतभेदों की जड़ें जब हिंसा में बदल जाती हैं, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी पड़ता है।

मास्टर ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में विचारों की विविधता स्वाभाविक है और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विचारों के मतभेद लोकतांत्रिक बहस का आधार होते हैं, लेकिन जब इन मतभेदों को हिंसा का रूप दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को आहत करता है। उनके अनुसार, लोकतंत्र में सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

संघर्ष से प्रेरणा तक का सफर

अपने जीवन संघर्ष का उल्लेख करते हुए सदानंदन मास्टर ने बताया कि गंभीर शारीरिक अक्षमता के बावजूद उन्होंने शिक्षा और सामाजिक कार्यों से अपने जीवन को जोड़े रखा। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक के रूप में उनका उद्देश्य समाज में सकारात्मक बदलाव लाना था, लेकिन राजनीतिक हिंसा की घटना ने उन्हें यह समझाया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सक्रिय राजनीतिक भागीदारी भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि उनके जीवन की यह कठिन यात्रा उन्हें निराश करने के बजाय और अधिक मजबूत बनाने का कारण बनी। उन्होंने समाज के युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि किसी भी चुनौती या विपरीत परिस्थिति को जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि नए संकल्प की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर नागरिक की जिम्मेदारी होती है।

राजनीतिक संस्कृति में सुधार की आवश्यकता

सदानंदन मास्टर ने अपने भाषण में राजनीतिक दलों से आत्ममंथन करने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को किस प्रकार की राजनीतिक संस्कृति प्रदान करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को हिंसा से दूर रहने और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करने की शिक्षा देंगे, तो समाज में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब जनता को यह विश्वास हो कि राजनीतिक प्रक्रिया न्यायपूर्ण, पारदर्शी और शांतिपूर्ण है। उनके अनुसार, लोकतंत्र की असली ताकत जनता का विश्वास होता है, जिसे बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है।

संवेदनशील लोकतंत्र की आवश्यकता पर जोर

अपने संबोधन के अंत में सदानंदन मास्टर ने कहा कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक व्यवस्था भी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए संवेदनशीलता, सहिष्णुता और आपसी सम्मान जैसे मूल्यों को बढ़ावा देना आवश्यक है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए सहयोग और संवाद की भावना को आगे बढ़ाएं।

उनका यह भाषण और प्रतीकात्मक प्रदर्शन न केवल उनके व्यक्तिगत संघर्ष की कहानी को सामने लाया, बल्कि यह भी दर्शाया कि लोकतंत्र में व्यक्तिगत अनुभव भी सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। सदन में उनके इस संबोधन ने यह संदेश दिया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल कानून और नीतियों से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और जिम्मेदार आचरण से भी होती है।

सदानंदन मास्टर के इस वक्तव्य ने राजनीतिक हिंसा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर बहस को नई दिशा दी है। उनके शब्दों और अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र की सफलता केवल सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में निहित होती है।

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