12 फरवरी: महाराष्ट्र के ‘चाणक्य’ नाना फडणवीस की जन्मजयंती — जिनकी कूटनीति से कांपते थे निज़ाम, टीपू और मुगल

भारतीय इतिहास में कई योद्धा तलवार के दम पर अमर हुए, लेकिन कुछ ऐसे भी हुए जिन्होंने अपनी बुद्धि, धैर्य और कूटनीति से इतिहास की दिशा बदल दी। मराठा साम्राज्य के इतिहास में नाना फडणवीस ऐसा ही एक नाम है। उन्हें महाराष्ट्र का ‘चाणक्य’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि जिस समय मराठा साम्राज्य अंदरूनी संकटों, राजनीतिक षड्यंत्रों और बाहरी शक्तियों के दबाव से घिरा हुआ था, उस समय उन्होंने अपनी अद्भुत राजनीतिक समझ से साम्राज्य को संभालकर रखा।

12 फरवरी को उनकी जन्मजयंती हमें केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह बताती है कि राष्ट्र और राज्य केवल तलवार से नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीति, संतुलन और सही समय पर सही निर्णय से भी सुरक्षित रहते हैं। जिस दौर में निज़ाम, टीपू सुल्तान, मुगल और अंग्रेज जैसी शक्तियाँ सक्रिय थीं, उस दौर में मराठा साम्राज्य को टिकाए रखना आसान नहीं था। लेकिन नाना फडणवीस ने यह कर दिखाया।

प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण

नाना फडणवीस का जन्म 12 फरवरी 1742 को एक विद्वान चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम बालाजी जनार्दन भानु था। बचपन से ही वे अत्यंत मेधावी और गंभीर स्वभाव के थे। उनके परिवार में शिक्षा और अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता था, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट दिखाई देता है।

उन्होंने संस्कृत, शास्त्र, प्रशासन और लेखा प्रणाली की शिक्षा प्राप्त की। उस समय प्रशासन में लेखा और वित्त की गहरी समझ बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। नाना ने केवल पुस्तकें ही नहीं पढ़ीं, बल्कि उन्होंने राजनीतिक परिस्थितियों का भी अध्ययन किया। कम उम्र में ही वे समझ चुके थे कि मराठा साम्राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि आंतरिक असंतुलन है। यही समझ आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

उनका व्यक्तित्व संयमित, शांत और गहन सोच वाला था। वे जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय हर पहलू पर विचार करते थे। यही कारण था कि लोग उन पर भरोसा करते थे।

मराठा साम्राज्य की राजनीतिक स्थिति

18वीं शताब्दी का भारत राजनीतिक उथल-पुथल का समय था। मुगल साम्राज्य कमजोर हो चुका था और उसकी पकड़ केवल नाम मात्र रह गई थी। दूसरी ओर मराठा साम्राज्य तेजी से उभर रहा था और उत्तर से दक्षिण तक उसका प्रभाव फैल चुका था।

लेकिन पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) के बाद मराठा शक्ति को गहरा आघात लगा। नेतृत्व संकट, गुटबाजी और बाहरी दबाव ने स्थिति को जटिल बना दिया। ऐसे समय में यदि कोई मजबूत और बुद्धिमान नेतृत्व न मिलता, तो मराठा साम्राज्य टूट सकता था।

यही वह समय था जब नाना फडणवीस ने अपनी भूमिका निभानी शुरू की। उन्होंने समझ लिया था कि यदि साम्राज्य को बचाना है, तो केवल युद्ध नहीं, बल्कि राजनीति और संतुलन की जरूरत है।

पेशवा दरबार में प्रभाव और जिम्मेदारी

नाना फडणवीस पेशवा दरबार में वित्त और प्रशासन के प्रमुख अधिकारी बने। लेकिन उनका प्रभाव केवल वित्त तक सीमित नहीं था। वे धीरे-धीरे मराठा राजनीति के मुख्य रणनीतिकार बन गए।

उन्होंने राज्य की आय-व्यय व्यवस्था को व्यवस्थित किया। कर प्रणाली को मजबूत किया और यह सुनिश्चित किया कि सेना और प्रशासन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रहें। उस समय आर्थिक मजबूती ही सैन्य शक्ति का आधार थी।

वे पर्दे के पीछे रहकर काम करते थे, लेकिन निर्णयों पर उनकी गहरी छाप होती थी। कई बार उन्होंने ऐसे संकटों को शांत किया, जो साम्राज्य को तोड़ सकते थे। उनका धैर्य और संतुलन उन्हें अलग बनाता था।

निज़ाम के साथ संतुलित संबंध

हैदराबाद का निज़ाम मराठों का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। कई बार दोनों के बीच युद्ध की स्थिति बनी। लेकिन नाना फडणवीस ने हर बार यह समझा कि सीधा युद्ध हमेशा समाधान नहीं होता।

उन्होंने ऐसी नीति अपनाई जिसमें मराठा हित सुरक्षित रहें और अनावश्यक संघर्ष से बचा जा सके। जब जरूरी हुआ, तब सैन्य शक्ति का प्रदर्शन भी किया गया, लेकिन अधिकतर मामलों में राजनीतिक समझौते से समाधान निकाला गया।

उनकी रणनीति का उद्देश्य था — मराठा शक्ति को कमजोर किए बिना विरोधियों को नियंत्रित रखना। यही कारण था कि निज़ाम भी उनकी राजनीतिक चालों से सतर्क रहता था।

टीपू सुल्तान के साथ जटिल समीकरण

टीपू सुल्तान उस समय दक्षिण भारत की बड़ी शक्ति थे। अंग्रेजों और अन्य शक्तियों के साथ उनके संबंध बदलते रहते थे। नाना फडणवीस ने इस परिस्थिति को समझते हुए संतुलन की नीति अपनाई।

उन्होंने कभी भावनात्मक निर्णय नहीं लिए। उनका हर कदम मराठा हित को ध्यान में रखकर होता था। यदि किसी समय टीपू के साथ समझौता मराठा हित में था, तो उन्होंने समझौता किया। यदि कठोर रुख जरूरी था, तो वह भी अपनाया।

उनकी यही व्यावहारिक सोच उन्हें महान कूटनीतिज्ञ बनाती है।

मुगल सत्ता के साथ राजनीतिक व्यवहार

मुगल साम्राज्य भले ही कमजोर हो चुका था, लेकिन उसका प्रतीकात्मक महत्व बना हुआ था। नाना फडणवीस ने इस महत्व को समझा। उन्होंने मुगलों के साथ संबंध बनाए रखे ताकि मराठा शक्ति को वैधता और राजनीतिक संतुलन मिलता रहे।

वे जानते थे कि राजनीति केवल वर्तमान शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि प्रतीकों और परंपराओं से भी चलती है। इसलिए उन्होंने मुगलों के साथ खुला टकराव करने के बजाय व्यावहारिक नीति अपनाई।

अंग्रेजों के प्रति दूरदर्शिता

अंग्रेज उस समय धीरे-धीरे व्यापार के माध्यम से राजनीतिक शक्ति हासिल कर रहे थे। नाना फडणवीस ने बहुत पहले ही समझ लिया था कि अंग्रेज भविष्य में सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं।

उन्होंने अंग्रेजों के साथ सावधानीपूर्वक संबंध बनाए। वे जानते थे कि अंग्रेजों पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने संतुलन बनाए रखा और मराठा साम्राज्य को सीधे टकराव से बचाया।

उनकी यह दूरदर्शिता बताती है कि वे केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की भी सोचते थे।

आंतरिक षड्यंत्रों से मुकाबला

मराठा दरबार में कई गुट सक्रिय थे। सत्ता संघर्ष और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ साम्राज्य को कमजोर कर सकती थीं। नाना फडणवीस ने धैर्य और चतुराई से इन परिस्थितियों को संभाला।

उन्होंने गुटों के बीच संतुलन बनाए रखा और किसी को भी इतना शक्तिशाली नहीं होने दिया कि वह साम्राज्य के लिए खतरा बने। उनका उद्देश्य था — सामूहिक शक्ति को बनाए रखना।

प्रशासनिक सुधार और आर्थिक मजबूती

नाना फडणवीस ने वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता दी। उन्होंने भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाने और राजस्व व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का प्रयास किया।

उन्होंने समझा कि बिना मजबूत आर्थिक आधार के कोई भी साम्राज्य लंबे समय तक नहीं टिक सकता। उनकी नीतियों के कारण मराठा साम्राज्य आर्थिक रूप से स्थिर बना रहा।

व्यक्तित्व की विशेषताएँ

नाना फडणवीस शांत, गंभीर और संयमी व्यक्ति थे। वे भावनाओं के बजाय तथ्यों और परिस्थिति के आधार पर निर्णय लेते थे। वे कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो सोच-समझकर बोलते थे।

उनकी यही गंभीरता और धैर्य उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी।

अंतिम वर्ष और ऐतिहासिक महत्व

1800 में उनके निधन के बाद मराठा साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा। यह इस बात का प्रमाण है कि उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी। जब तक वे जीवित रहे, साम्राज्य संतुलित और संगठित बना रहा।

नाना फडणवीस केवल एक मंत्री नहीं थे, बल्कि मराठा साम्राज्य के रणनीतिक स्तंभ थे। उनकी कूटनीति, धैर्य और दूरदर्शिता ने उन्हें महाराष्ट्र का ‘चाणक्य’ बना दिया।

12 फरवरी को उनकी जन्मजयंती पर उन्हें स्मरण करते हुए यह समझना जरूरी है कि राष्ट्र और राज्य केवल युद्ध से नहीं, बल्कि बुद्धि और संतुलन से भी सुरक्षित रहते हैं।

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