भारत के इतिहास में यदि किसी व्यक्तित्व ने पराधीनता के अंधकार में स्वाभिमान की ज्योति प्रज्वलित की, तो वे थे छत्रपति शिवाजी महाराज। उन्हें “हिंदवा सूर्य” कहा गया — वह सूर्य जिसने विदेशी सत्ता के दबाव में कराह रहे समाज को आत्मगौरव और स्वतंत्रता का संदेश दिया। 19 फरवरी को मनाई जाने वाली उनकी जयंती केवल एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, साहस और आत्मनिर्भरता का जीवंत पर्व है।
शिवाजी महाराज का जीवन केवल युद्धों की श्रृंखला नहीं है। यह एक विचार है — स्वराज का विचार। यह एक संकल्प है — अन्याय के सामने न झुकने का। यह एक व्यवस्था है — न्यायपूर्ण, उत्तरदायी और जनकल्याणकारी शासन की। और यह एक प्रेरणा है — कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि नेतृत्व सशक्त हो, तो इतिहास बदला जा सकता है।
1. जन्म और बाल्यकाल: शिवनेरी से उठती स्वराज की लौ
शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को महाराष्ट्र के शिवनेरी दुर्ग में हुआ। यह समय राजनीतिक अस्थिरता का था। दक्षिण भारत में आदिलशाही, कुतुबशाही और मुगल सत्ता के बीच संघर्ष चल रहा था। ऐसे वातावरण में जन्मे बालक शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध और राजनीति का माहौल देखा।
उनकी माता राजमाता जिजाबाई ने उन्हें धर्म, नीति और पराक्रम के संस्कार दिए। वे रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनातीं, जिसमें धर्म की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश होता। जिजाबाई के व्यक्तित्व का शिवाजी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपने पुत्र में केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय शासक के गुण विकसित किए।
उनके पिता शहाजी भोसले बीजापुर के दरबार में एक प्रभावशाली सरदार थे। उन्होंने शिवाजी को सैन्य प्रशिक्षण और प्रशासनिक समझ दी। लेकिन शिवाजी का मन केवल किसी दरबार की सेवा में नहीं था; वे स्वतंत्र स्वराज्य की कल्पना कर रहे थे।
2. किशोरावस्था और पहला अभियान: तोरणा की विजय
लगभग 16 वर्ष की आयु में शिवाजी ने पहला बड़ा कदम उठाया — तोरणा किले पर अधिकार। यह केवल एक किले की जीत नहीं थी, बल्कि स्वराज्य के अभियान की शुरुआत थी।
उन्होंने धीरे-धीरे राजगढ़, पुरंदर और कोंडाणा जैसे किलों पर अधिकार किया। उनकी नीति स्पष्ट थी — पहले दुर्गों को मजबूत करो, फिर प्रशासन स्थापित करो। वे जानते थे कि पहाड़ी किले ही मराठा शक्ति की रीढ़ बनेंगे।
उनकी रणनीति में संगठन और गोपनीयता का विशेष महत्व था। वे छोटे-छोटे दलों में सेना भेजते, स्थानीय लोगों का सहयोग लेते और दुश्मन को चौंका देते। यही “गनिमी कावा” आगे चलकर उनकी पहचान बना।
3. गनिमी कावा: युद्धनीति की क्रांति
शिवाजी महाराज की सबसे बड़ी विशेषता उनकी गुरिल्ला युद्धनीति थी। उन्होंने समझ लिया था कि विशाल मुगल सेना से सीधे टकराना आत्मघाती होगा। इसलिए उन्होंने पहाड़ों, जंगलों और संकरे दर्रों का उपयोग किया।
उनकी सेना तेज गति से हमला करती और तुरंत लौट जाती। दुश्मन को समझ ही नहीं आता कि हमला कहाँ से हुआ। यह रणनीति उस समय क्रांतिकारी थी और आज भी सैन्य अध्ययन का विषय है।
4. अफजल खान वध: साहस और चतुराई
बीजापुर के सरदार अफजल खान को शिवाजी को समाप्त करने के लिए भेजा गया। उसने कई मंदिर तोड़े और आतंक फैलाया। शिवाजी ने प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय रणनीतिक मुलाकात का मार्ग चुना।
प्रतापगढ़ किले के नीचे हुई उस ऐतिहासिक भेंट में अफजल खान ने विश्वासघात का प्रयास किया, लेकिन शिवाजी तैयार थे। उन्होंने अपने वाघनख (लोहे के पंजे) से वार कर उसे परास्त किया। यह घटना मराठा शक्ति के आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई।
5. मुगल संघर्ष और आगरा की घटना
मुगल सम्राट औरंगज़ेब शिवाजी की बढ़ती शक्ति से चिंतित था। उसने उन्हें आगरा दरबार में बुलाया। वहाँ शिवाजी को अपमानित कर नजरबंद कर दिया गया।
लेकिन शिवाजी ने अद्भुत बुद्धिमत्ता दिखाई। उन्होंने बीमारी का बहाना बनाकर मिठाइयों के टोकरों में छिपकर आगरा से पलायन किया। यह घटना उनकी रणनीतिक सोच और साहस का अद्वितीय उदाहरण है।
6. राज्याभिषेक: स्वराज की स्थापना
6 जून 1674 को रायगढ़ किले पर शिवाजी महाराज का भव्य राज्याभिषेक हुआ। उन्हें “छत्रपति” की उपाधि दी गई। यह केवल एक राजकीय अनुष्ठान नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि अब मराठा शक्ति स्वतंत्र और संगठित है।
इस समारोह में विद्वानों, संतों और सरदारों की उपस्थिति ने स्वराज की वैधता को स्थापित किया। यह भारतीय आत्मगौरव का क्षण था।
7. अष्टप्रधान मंडल और प्रशासन
शिवाजी महाराज ने प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए अष्टप्रधान मंडल बनाया। इसमें पेशवा, अमात्य, सुमंत, सेनापति, न्यायाधीश आदि पद थे। यह शासन प्रणाली संतुलित और उत्तरदायी थी।
उन्होंने किसानों पर अत्याचार रोकने के लिए नियम बनाए। महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यदि कोई सैनिक महिला का अपमान करता, तो उसे कठोर दंड मिलता।
8. नौसेना और समुद्री शक्ति
शिवाजी महाराज ने समुद्री शक्ति का महत्व समझा। उन्होंने सिंधुदुर्ग और विजयदुर्ग जैसे किलों को मजबूत किया और नौसेना की स्थापना की। यह कदम उस समय अत्यंत दूरदर्शी था, क्योंकि समुद्री मार्ग व्यापार और सुरक्षा दोनों के लिए महत्वपूर्ण था।
9. धार्मिक नीति: सहिष्णुता और सम्मान
शिवाजी महाराज को अक्सर केवल एक हिंदू शासक के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनकी धार्मिक नीति व्यापक और सहिष्णु थी। उन्होंने मस्जिदों और सूफी दरगाहों को संरक्षण दिया। उनकी सेना में मुस्लिम सैनिक भी थे।
उनका संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध था।
10. अंतिम समय और विरासत
1680 में शिवाजी महाराज का निधन हुआ। लेकिन उनके द्वारा स्थापित स्वराज की नींव इतनी मजबूत थी कि मराठा साम्राज्य आगे चलकर उत्तर भारत तक फैल गया।
उनकी विरासत केवल मराठा इतिहास तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए प्रेरणा है।
11. आज के भारत में प्रासंगिकता
आज जब आत्मनिर्भरता, सुशासन और सांस्कृतिक गौरव की बात होती है, तो शिवाजी महाराज का उदाहरण सामने आता है। उनका जीवन बताता है कि मजबूत नेतृत्व, संगठन और जनसमर्थन से राष्ट्र सशक्त बनता है।
12.अमर रहेगा हिंदवा सूर्य
हिंदवा सूर्य छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्वराज, शौर्य और स्वाभिमान का अमर महापर्व है।
उनकी गाथा हमें सिखाती है कि अन्याय के सामने झुकना नहीं, बल्कि साहस से सामना करना चाहिए।
छत्रपति शिवाजी महाराज को कोटि-कोटि नमन।
