भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल संघर्षों की कहानी नहीं था, बल्कि वह ऐसे व्यक्तित्वों की गाथा था जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र को समर्पित कर दिया। ऐसे ही तेजस्वी, निर्भीक और वैचारिक क्रांतिकारी थे विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें इतिहास स्वातंत्र्यवीर सावरकर के नाम से जानता है।
26 फरवरी उनकी पुण्यतिथि है। यह दिन केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि उस राष्ट्रचेतना को स्मरण करने का क्षण है जिसने एक युवक को क्रांति का प्रतीक बना दिया। सावरकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम शब्दों में नहीं, बल्कि साहस, अनुशासन और समर्पण में दिखाई देता है।
बाल्यकाल से ही प्रखर राष्ट्रभाव
28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गाँव में जन्मे सावरकर बचपन से ही असाधारण साहस और नेतृत्व के गुणों से संपन्न थे। परिवार में धार्मिक वातावरण था, पर उनके भीतर केवल आस्था ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की ज्वाला भी प्रज्ज्वलित हो चुकी थी।
1897 में चापेकर बंधुओं के बलिदान ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। किशोर अवस्था में ही उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। उस समय यह केवल विरोध का कार्य नहीं था, बल्कि दासता के विरुद्ध खुली घोषणा थी कि वे स्वतंत्र भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए जीवन समर्पित करेंगे।
अभिनव भारत और संगठित क्रांति की शुरुआत
पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में अध्ययन के दौरान उनका व्यक्तित्व और अधिक परिपक्व हुआ। 1904 में उन्होंने “अभिनव भारत” नामक संगठन की स्थापना की। इसका उद्देश्य युवाओं को संगठित करना, उनमें स्वाभिमान जगाना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध वैचारिक तथा क्रांतिकारी तैयारी करना था।
सावरकर मानते थे कि स्वतंत्रता केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि संगठन, अनुशासन और साहस से प्राप्त होती है। उनकी लेखनी में ओज था और वाणी में प्रेरणा। वे कविताओं, भाषणों और लेखों के माध्यम से युवाओं के मन में राष्ट्रप्रेम की लौ प्रज्वलित करते थे।
लंदन प्रवास और वैचारिक युद्ध
1906 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। वहीं से उनके संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय आयाम मिला। उन्होंने 1857 के संग्राम पर गहन शोध कर उसे “स्वतंत्रता संग्राम” के रूप में स्थापित किया। उस समय अंग्रेजी सत्ता इसे केवल “विद्रोह” कहती थी, पर सावरकर ने उसे राष्ट्र के प्रथम संगठित स्वतंत्रता प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया।
यह कार्य केवल पुस्तक लेखन नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन की मानसिकता को चुनौती देने वाला वैचारिक युद्ध था। उनकी यह पहल भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।
समुद्री छलांग: अदम्य साहस का प्रतीक
1910 में गिरफ्तारी के बाद जब उन्हें भारत लाया जा रहा था, तब फ्रांस के मार्से बंदरगाह पर उन्होंने जहाज से समुद्र में छलांग लगा दी। यह घटना उनके अटूट आत्मविश्वास और निर्भीक स्वभाव का प्रमाण थी।
भले ही उन्हें पुनः पकड़ लिया गया, पर यह छलांग भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में साहस के अद्वितीय उदाहरण के रूप में दर्ज हो गई।
सेल्युलर जेल की यातनाएँ और अटूट मनोबल
1911 में उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल में आजीवन कारावास की सजा दी गई। यह स्थान केवल जेल नहीं, बल्कि अमानवीय यातनाओं का केंद्र था। कैदियों को तेल कोल्हू में जोता जाता था, कठोर श्रम कराया जाता था और छोटी-सी गलती पर कठोर दंड दिया जाता था।
इन कठिन परिस्थितियों में भी सावरकर का मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कविताएँ लिखीं। साथी कैदी उन्हें याद कर बाहर पहुँचाते रहे। यह केवल धैर्य नहीं, बल्कि आत्मबल और अडिग विश्वास की चरम सीमा थी।
हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा
सावरकर ने “हिंदुत्व” की अवधारणा को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार राष्ट्र की पहचान उसकी साझा संस्कृति, इतिहास और परंपराओं में निहित है।
वे सामाजिक समरसता के समर्थक थे। उन्होंने अस्पृश्यता के विरोध में आवाज उठाई और समाज को भीतर से संगठित करने पर बल दिया। उनका मानना था कि जब समाज एकजुट होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा।
स्वतंत्रता के बाद का चिंतन
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाई, पर राष्ट्रहित के विषयों पर उनका चिंतन निरंतर जारी रहा। वे राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक आत्मगौरव पर बल देते रहे।
उनका जीवन प्रशंसा और आलोचना दोनों से जुड़ा रहा, पर उनके समर्थकों के लिए वे एक अडिग राष्ट्रनायक रहे — जिन्होंने अपने विचारों के लिए कठिन से कठिन मार्ग चुना।
आत्मार्पण: संकल्पपूर्ण विदाई
1966 में उन्होंने “आत्मार्पण” का निर्णय लिया और भोजन-जल त्याग दिया। उनका विश्वास था कि जब जीवन का ध्येय पूर्ण हो जाए, तब शांतिपूर्वक विदा लेना भी एक तपस्या है।
26 फरवरी 1966 को उन्होंने देह त्याग किया। उनका यह निर्णय भी उनके जीवन की तरह दृढ़ और आत्मसंयम से भरा हुआ था।
निष्कर्ष: राष्ट्रचेतना की अमर ज्योति
स्वातंत्र्यवीर सावरकर का जीवन त्याग, साहस और वैचारिक तपस्या की अमर गाथा है। उन्होंने कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने विश्वास से समझौता नहीं किया।
उनकी स्मृति केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि राष्ट्रगौरव का प्रेरक स्रोत है।
26 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। 🇮🇳
