केरल की राजनीति हमेशा से देश के बाकी हिस्सों से अलग और अनोखी रही है। यहां सत्ता का मुख्य मुकाबला वामपंथी गठबंधन एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के बीच चला आ रहा है। लेकिन अब एक गंभीर सवाल पूरे जोर से उठ रहा है — क्या कम्युनिस्टों का यह आखिरी मजबूत गढ़ हिंदू वोटों की दया पर टिका हुआ है? और क्या यही हिंदू वोट भविष्य में उनके इस अंतिम दुर्ग को बचा पाएगा या इसे पूरी तरह ढहा देगा?
केरल में हिंदू अभी भी सबसे बड़ी आबादी वाले समुदाय हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदू लगभग 54.7 प्रतिशत हैं, जबकि मुस्लिम करीब 26.6 प्रतिशत और ईसाई 18.4 प्रतिशत। लेकिन पिछले सालों में जनसांख्यिकीय बदलाव साफ नजर आ रहे हैं। मुस्लिम समुदाय की जन्म दर ज्यादा होने के कारण उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि हिंदू आबादी का अनुपात धीरे-धीरे घट रहा है।
कुछ अनुमानों के मुताबिक मुस्लिम अब नए जन्मों में 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ले रहे हैं, जबकि हिंदू जन्म कम और मौतें ज्यादा होने से सिकुड़ रहे हैं। इस बदलाव ने हिंदू समाज में गहरी चिंता पैदा कर दी है। कम्युनिस्ट सरकारें इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहती हैं क्योंकि उन्हें अल्पसंख्यक वोट बैंक की जरूरत पड़ती है। वे खुद को प्रगतिशील बताते हैं, लेकिन हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद अपनी सत्ता हिंदू वोटों के सहारे ही चलाते हैं।
कम्युनिस्टों की हिंदू-विरोधी हाइपोक्रिसी
वामपंथी दल लंबे समय से खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों का मसीहा बताते आए हैं। उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कुछ काम किया भी है, लेकिन असल में उनका शासन हिंदू समाज के शोषण पर टिका हुआ है। अल्पसंख्यक समुदाय ज्यादातर यूडीएफ के साथ खड़े रहते हैं। यानी कम्युनिस्टों का सेकुलर चेहरा सिर्फ दिखावा है। वे हिंदुओं को बांटकर, उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाकर और अल्पसंख्यकों को तुष्ट करके अपनी कुर्सी बचाते हैं।
सबरीमाला मंदिर विवाद इस हाइपोक्रिसी का सबसे बड़ा प्रमाण है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पिनरयी विजयन की सरकार ने महिलाओं के मंदिर प्रवेश का पूरा समर्थन किया। लाखों हिंदू श्रद्धालु सड़कों पर उतरे और अपनी आस्था की रक्षा की मांग की, लेकिन सरकार ने उन्हें अंधविश्वासी और पितृसत्तात्मक बताकर खुलेआम अपमानित किया। कम्युनिस्टों ने इसे लैंगिक समानता का मुद्दा बताया, लेकिन जब मुस्लिम या ईसाई समुदाय की धार्मिक परंपराओं पर सवाल उठता है तो वे चुप रह जाते हैं। शरिया कानून, लव जिहाद या चर्च की संपत्ति पर वे कभी बोलते नहीं दिखते। अब 2026 के चुनाव नजदीक आने पर वे सबरीमाला पर अपना रुख नरम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो साफ तौर पर वोट की मजबूरी है।
केरल में हिंदू मंदिरों की स्थिति और भी दयनीय है। राज्य में देवस्वोम बोर्ड हिंदू मंदिरों का प्रबंधन करते हैं। इन बोर्डों के जरिए मंदिरों की संपत्ति और आय पर सरकार का कब्जा है। सबरीमाला जैसे मंदिरों से जो करोड़ों रुपये की चढ़ावा राशि और आय आती है, उसका बड़ा हिस्सा हिंदू-विरोधी गतिविधियों या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण में खर्च होता है। वहीं चर्च और मस्जिदों की संपत्ति पूरी तरह उनके अपने नियंत्रण में रहती है।
देवस्वोम बोर्डों में भ्रष्टाचार की घटनाएं आम हैं। सबरीमाला में सोने की प्लेटों की चोरी, पूजा स्लॉट्स का ब्लैक मार्केट में बिकना और पूजा सामग्री में घटिया माल का इस्तेमाल जैसे आरोप लगते रहते हैं। मंदिरों की कमाई हिंदू समाज की भलाई में नहीं लगती, बल्कि कम्युनिस्टों की राजनीतिक जरूरतों को पूरा करती है। यह खुला और शर्मनाक शोषण है।
लव जिहाद और जनसांख्यिकीय खतरा
लव जिहाद की समस्या केरल में गंभीर रूप ले चुकी है। कई हिंदू और ईसाई परिवारों की बेटियां प्रेम के जाल में फंसकर इस्लाम कबूल करने और फिर परिवार से कट जाने के मामले बार-बार सामने आए हैं। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और उसके राजनीतिक चेहरा एसडीपीआई से जुड़े संगठनों की भूमिका इन मामलों में बार-बार उजागर हुई है। कम्युनिस्ट सरकार इन संगठनों पर सख्ती करने की बजाय नरम रवैया अपनाती रही है। कुछ मामलों में जांच एजेंसियों को भी बाधा पहुंचाई गई। हिंदू लड़कियों की जबरन या धोखे से धर्मांतरण की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन सरकार इसे साम्प्रदायिक प्रचार बताकर खारिज कर देती है। इस चुप्पी से हिंदू समाज की सुरक्षा और पहचान दोनों खतरे में हैं।
जनसांख्यिकीय बदलाव इस खतरे को और गहरा बना रहा है। मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि हिंदू सिकुड़ रहे हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो आने वाले दशकों में केरल की सांस्कृतिक और राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। कम्युनिस्ट इस बदलाव को रोकने की बजाय इसे नजरअंदाज करते हैं क्योंकि उनका वोट बैंक इससे मजबूत होता है।
आर्थिक नाकामी और राजनीतिक हिंसा
केरल की अर्थव्यवस्था भी कम्युनिस्ट शासन की नाकामी को उजागर करती है। राज्य को केरल मॉडल का नाम देकर खूब प्रचार किया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से विदेशी रेमिटेंस पर टिकी हुई है। लाखों युवा नौकरी की तलाश में खाड़ी देशों में पलायन कर रहे हैं। केरल में युवा बेरोजगारी दर बहुत ऊंची है, खासकर शिक्षित युवाओं और महिलाओं में। उद्योगों का विकास नहीं हुआ क्योंकि कम्युनिस्टों की मिलिटेंट यूनियनें और बार-बार हड़तालें निवेशकों को भगा देती हैं। राज्य का कर्ज बढ़ रहा है और विकास सिर्फ भाषणों तक सीमित है।
राजनीतिक हिंसा केरल की एक और काली सच्चाई है। खासकर कन्नूर जैसे इलाकों में सीपीएम और आरएसएस-बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की घटनाएं लगातार होती रही हैं। कई आरएसएस-बीजेपी कार्यकर्ता राजनीतिक हिंसा का शिकार हो चुके हैं। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि लाल आतंक का माहौल है। कम्युनिस्ट विरोधियों को दबाने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन खुद को प्रगतिशील बताते हैं।
हिंदू जागरण और बीजेपी का उदय
इन सबके बीच भारतीय जनता पार्टी ने केरल में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की कोशिश की है। सबरीमाला आंदोलन ने हिंदू समाज में एक नया जागरण पैदा किया। बीजेपी ने हिंदू पहचान, मंदिर सुरक्षा और सांस्कृतिक मुद्दों को आगे बढ़ाया। हाल के स्थानीय चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा है और थिरुवनंतपुरम जैसे इलाकों में उसने अच्छी पहचान बनाई है। नायर, ईझवा, दलित और अन्य पिछड़ी जातियों के कुछ हिस्से अब बीजेपी की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अगर हिंदू वोटों में यह एकीकरण और मजबूत हुआ तो एलडीएफ और यूडीएफ दोनों की पारंपरिक गणित बिगड़ सकती है।
कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी हिंदू-विरोधी मानसिकता है। वे हिंदू त्योहारों, परंपराओं और मंदिरों पर लगातार प्रहार करते हैं। स्कूलों में मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार होता है और हिंदू इतिहास को विकृत रूप में पेश किया जाता है। वहीं अल्पसंख्यक समुदायों को तुष्ट करने के लिए वे कई बार हिंदू भावनाओं को कुचल चुके हैं। पीएफआई-एसडीपीआई जैसे कट्टरपंथी संगठनों पर भी उनकी नजर नरम रही है।
भविष्य की चुनौती और हिंदू वोट की भूमिका
केरल में कम्युनिस्टों का गढ़ अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा। यह गढ़ हिंदू वोटों पर टिका है, लेकिन उसी हिंदू समाज को कमजोर करने की कोशिश भी वही कर रहे हैं। यह विरोधाभास लंबे समय तक नहीं चल सकता। हिंदू समाज अब इन सच्चाइयों को समझ रहा है। पहचान की राजनीति धीरे-धीरे विकास के मुद्दों के साथ जुड़ रही है। अगर हिंदू वोट एकजुट हुआ तो केरल की राजनीति में बड़ा उलटफेर हो सकता है।
बीजेपी लगातार हिंदू एकता पर जोर दे रही है। कांग्रेस अपनी पारंपरिक अल्पसंख्यक जमीन बचाने में लगी है, जबकि कम्युनिस्ट पुराने नारों और वोट बैंक की राजनीति पर अटके हुए हैं। विकास और कल्याण की बात करने वाले कम्युनिस्ट असल में हिंदू वोटों का शोषण कर अपनी सत्ता बचा रहे हैं।
समय आ गया है कि हिंदू इस शोषण को पहचाने। मंदिरों की आजादी, लव जिहाद पर रोक, राजनीतिक हिंसा का अंत और असली विकास — ये मुद्दे अब हिंदू वोटों को एकजुट कर सकते हैं। केरल का भविष्य हिंदू वोटों के हाथ में है। अगर हिंदू अपनी आस्था, संस्कृति, मंदिरों और आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा के लिए जाग गए और अपना वोट सोच-समझकर इस्तेमाल किया तो कम्युनिस्टों का यह अंतिम दुर्ग ढह सकता है।
यह सिर्फ चुनावी लड़ाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सभ्यतागत लड़ाई है। हिंदू समाज को अब फैसला करना है कि वह अपनी विरासत को बचाना चाहता है या फिर कम्युनिस्टों के शोषण को और सहना चाहता है। आने वाले 2026 के चुनाव इस दिशा को तय करेंगे।
