सच कहूं तो हमारे देश का ‘सेक्युलरिज्म’ हमेशा से हिंदुओं की लाशों पर ही फला-फूला है। यूपी की सियासत का एक वो भी काला दौर था, जब सत्ता के गलियारों में नमाज़ें पढ़ी जाती थीं और सड़कों पर राम-नाम जपने वालों के खून से होली खेली जाती थी।
हम बात कर रहे हैं उसी दौर की, जब समाजवादी पार्टी (S.P.) ने ‘मुस्लिम वोटबैंक’ की अंधी हवस में माफियाओं को अपना दामाद बना कर रखा था। इसी ‘सेक्युलर’ सिस्टम ने पूर्वांचल में एक ऐसे मज़हबी गुंडे को पैदा किया, जिसका नाम था- मुख्तार अंसारी। एक ऐसा माफिया जो सिर्फ गोलियां नहीं चलाता था, बल्कि सिस्टम की छाती पर पैर रखकर हिंदू आत्म-सम्मान को जूतों तले रौंदता था।
सोचिए… सत्ता का नंगा नाच कैसा होता है? गाजीपुर का एक कद्दावर हिंदू नेता, जो अपनी माटी और धर्म के लिए इस माफिया के खिलाफ सीना तान कर खड़ा हो गया, उसे दिन-दहाड़े 500 गोलियों से भून दिया जाता है। लेकिन बात सिर्फ हत्या तक नहीं रुकी। जेल में बिरयानी खा रहे मुख्तार अंसारी के इशारे पर, गोलियों से छलनी हो चुके उस ब्राह्मण नेता के सिर से उसकी ‘चोटी’ (शिखा) काट ली गई!
हाँ, चोटी… जो एक हिंदू के लिए उसके धर्म, उसके स्वाभिमान और उसके संस्कारों का सबसे पवित्र प्रतीक है। मुख़्तार अंसारी के कहने पे उसके गुर्गे मुन्ना ने विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद उनकी शिखा काटकर अपने आका को ये संदेश दिया की देखो, हमने सिर्फ एक राजनीतिक दुश्मन को नहीं मारा, बल्कि हिंदुओं के गुरूर को काट कर फेंक दिया है।
और इस पूरी गुंडागर्दी के दौरान सपा की सरकार क्या कर रही थी? वो इन हत्यारों को बचाने के लिए अपने ही ईमानदार पुलिस अफसरों के हाथ-पैर बांध रही थी। ये लेख सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, ये उस घिनौनी और हिंदू-विरोधी सियासत का कच्चा चिट्ठा है, जिसे पढ़कर आज भी हर सच्चे हिंदू का खून खौल जाना चाहिए।
कैसे मुस्लिम वोटबैंक के लिए सपा द्वारा मुख्तार को बनाया गया हिंदुओं का ‘काल’
नब्बे और दो हज़ार के दशक का वो वक्त याद कीजिए। पूर्वांचल की आबोहवा में बारूद की गंध घुली रहती थी। आज़मगढ़, मऊ, गाजीपुर- ये वो बेल्ट थी जहां कानून संविधान से नहीं, बल्कि मुख्तार अंसारी के फरमान से चलता था। ये वो दौर था जब समाजवादी पार्टी सत्ता में थी और ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण अपने चरम पर था।
सरकार को सिर्फ एक चीज़ से मतलब था- मुस्लिम वोटबैंक। और इस वोटबैंक को मुट्ठी में रखने के लिए सपा के शीर्ष नेतृत्व ने मुख्तार अंसारी जैसे खूंखार अपराधियों को खुला सांड बनाकर छोड़ दिया था।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी (DGP) और मौजूदा बीजेपी सांसद बृजलाल जी ने जो खुलासे किए हैं, वो किसी भी सभ्य इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी हैं। बृजलाल जी उस वक्त खुद पुलिस महकमे के बड़े पदों पर तैनात थे। उन्होंने साफ-साफ बताया की कैसे सपा के राज में पुलिस पूरी तरह से लाचार और बेबस कर दी गई थी।
कोई भी ईमानदार आईपीएस (IPS) अफसर अगर मुख्तार अंसारी पर हाथ डालने की जुर्रत करता, तो उसे 24 घंटे के अंदर वहां से उठाकर किसी लूप-लाइन में फेंक दिया जाता था। पूर्व डीजीपी के मुताबिक, जो सीधे तौर पर आईपीएस अफसर आते थे, वो एक दिन से लेकर मुश्किल से पांच महीने ही टिक पाते थे।
ज़रा इस बात की गहराई को समझिए। एक अपराधी इतना ताकतवर हो चुका था की वो तय करता था कि जिले का कप्तान (SP) कौन होगा। बृजलाल जी ने एक बेहद चौंकाने वाला वाकया साझा किया। एक बार पुलिस के कुछ जांबाज अफसरों ने मुख्तार के ठिकाने पर रेड डालने की पूरी प्लानिंग कर ली थी। टीम तैयार थी, हथियार लोड थे।
लेकिन पुलिस महकमे का एक नियम होता है की ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों में डीआईजी (DIG) और आईजी (IG) को ऊपर से परमिशन लेनी पड़ती है। जैसे ही ये बात शासन तक पहुंची, तो क्या हुआ?
सपा परिवार के एक सबसे बड़े नेता (जिसका नाम लेना भी पूर्व डीजीपी ने मुनासिब नहीं समझा, लेकिन इशारा साफ था) ने तुरंत फोन घुमाया और पुलिस के टॉप अफसरों को सख्त हिदायत दे दी की रेड तुरंत रोक दी जाए। “ऊपर से” आए उस एक फोन कॉल ने पूरी पुलिस फोर्स के मुंह पर कालिख पोत दी थी।
ये सिर्फ मुख्तार अंसारी का खौफ नहीं था, ये समाजवादी पार्टी का वो ‘माफिया प्रेम’ था जिसने एक मज़हबी गुंडे को कानून से भी बड़ा बना दिया था। उन्हें हिंदुओं की सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं था; उन्हें तो बस अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना था, चाहे इसके लिए पूरे पूर्वांचल को आग में क्यों न झोंकना पड़े।
हिंदू शेर कृष्णानंद राय- जिसने SP समर्थित मुस्लिम माफिया मुख्तार के जबड़े में हाथ डाल दिया
जब सिस्टम अपराधियों के सामने घुटने टेक देता है, तब समाज के बीच से ही कोई योद्धा खड़ा होता है। पूर्वांचल के उस खौफनाक माहौल में जब हर कोई अंसारी बंधुओं (मुख्तार और अफजाल अंसारी) के नाम से थर-थर कांपता था, तब गाजीपुर की धरती से एक आवाज़ उठी- कृष्णानंद राय।
कृष्णानंद राय कोई पैदाइशी बाहुबली या गुंडे-मवाली नहीं थे। वो एक पढ़े-लिखे इंसान थे, जिनका समाज में, खासकर भूमिहार और ब्राह्मण समाज के साथ-साथ आम हिंदुओं में गहरा सम्मान था। वो ज़मीन से जुड़े नेता थे। उन्होंने देखा की कैसे उनके इलाके के हिंदुओं को डराया जा रहा है, उनकी ज़मीनें कब्ज़ाई जा रही हैं और प्रशासन आंखें मूंद कर बैठा है।
कृष्णानंद राय ने तय किया की वो इस मज़हबी माफियाराज के आगे सिर नहीं झुकाएंगे। उन्होंने लोगों को एकजुट करना शुरू किया। देखते ही देखते वो पूरे इलाके में हिंदू स्वाभिमान और राष्ट्रवाद का एक बड़ा चेहरा बन गए।
2002 के विधानसभा चुनाव ने पूर्वांचल की राजनीति में भूचाल ला दिया। गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट अंसारी परिवार की जागीर मानी जाती थी। दशकों से वहां उन्हीं का सिक्का चलता था। किसी की हिम्मत नहीं थी की उनके खिलाफ पर्चा भी भर दे।
लेकिन कृष्णानंद राय ने न सिर्फ अफजाल अंसारी के खिलाफ चुनाव लड़ा, बल्कि हिंदू वोटों को ऐसा गोलबंद किया की अंसारी परिवार का वो अजेय होने का गुरूर टूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। कृष्णानंद राय विधायक बन गए और अफजाल अंसारी चुनाव हार गया।
यह सिर्फ एक चुनावी हार नहीं थी। यह मुख्तार अंसारी और उसके इस्लामिक सिंडिकेट के मुंह पर एक करारा तमाचा था। एक ‘काफिर’ ने, एक कट्टर हिंदू नेता ने उनके ही गढ़ में उन्हें धूल चटा दी थी। यह बात मुख्तार अंसारी के गले के नीचे नहीं उतर रही थी। उसे लग रहा था की अगर कृष्णानंद राय को अभी नहीं रोका गया, तो पूर्वांचल से उनका वो खौफ और दबदबा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा, जिसके दम पर वो सपा सरकार में ‘किंगमेकर’ बने बैठे थे।
यहीं से शुरू हुई उस खौफनाक साज़िश की पटकथा, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया। कृष्णानंद राय अब सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिद्वंदी नहीं थे, वो मुख्तार की आंखों में खटकने वाले वो हिंदू शेर थे जिन्हें रास्ते से हटाना उसने अपना मज़हबी और सियासी मकसद बना लिया था।
500 गोलियों की गूंज- मुख्तार के मुस्लिम गुंडों ने जब दिन-दहाड़े किया एक हिंदू नेता का कत्लेआम
सर्दियों की वो शुरुआत थी। तारीख थी 29 नवंबर 2005। पूर्वांचल की सियासत के लिए ये दिन एक ऐसा काला अध्याय बनने वाला था, जिसे याद करके आज भी वहां के लोगों की रूह कांप जाती है। विधायक कृष्णानंद राय गाजीपुर के सियाड़ी गांव में एक स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्घाटन करने गए थे। ये उनका रोज़मर्रा का काम था। वो जनता के बीच रहने वाले आदमी थे, इसलिए अक्सर बिना किसी तामझाम के निकल जाया करते थे।
उस मनहूस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ। वो अपनी बुलेटप्रूफ टाटा सफारी गाड़ी छोड़कर एक सामान्य सिल्वर रंग की क्वालिस गाड़ी में बैठकर निकले थे। ये उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी गलती साबित हुई। मुख्तार अंसारी के गुर्गों को पल-पल की खबर मिल रही थी। उन्हें पता था की आज ‘शिकार’ बिना ढाल के बाहर निकला है।
जैसे ही कृष्णानंद राय की गाड़ी भांवरकोल इलाके के बसनिया चट्टी के पास पहुंची, मौत उनका इंतज़ार कर रही थी। आगे से एक सूमो गाड़ी ने उनकी क्वालिस का रास्ता रोक लिया। इससे पहले की कृष्णानंद राय या उनके साथ बैठे लोग कुछ समझ पाते, चारों तरफ से मौत बरसने लगी। मुन्ना, अताउर रहमान उर्फ बाबू, और फिरदौस जैसे खूंखार शूटरों ने गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया।
ज़रा उस मंज़र की कल्पना कीजिए। ये कोई आम गैंगवार या देसी कट्टों की लड़ाई नहीं थी। ये एक मिलिट्री-ग्रेड आतंकवादी हमला था। शूटरों के हाथों में एके-47 और जी-3 जैसी ऑटोमैटिक राइफलें थीं। जी-3 राइफल वो हथियार है जो सीधे सेना के पास होता है, जिससे निकली गोली इंसान के चीथड़े उड़ा देती है।
पूर्व डीजीपी बृजलाल के मुताबिक, उन शूटरों ने महज़ कुछ मिनटों के अंदर लगभग 500 राउंड गोलियां बरसाईं। पूरी की पूरी गाड़ी छलनी हो गई थी। गाड़ी का कोई ऐसा कोना नहीं बचा था जहां से गोली आर-पार न हुई हो।
फायरिंग इतनी अंधाधुंध और खौफनाक थी की आसपास के गांवों के लोग गोलियों की तड़तड़ाहट सुनकर अपने घरों में दुबक गए। किसी की हिम्मत नहीं हुई की बाहर आकर देखे।
जब धुआं छंटा और शूटर अपनी गाड़ियां लेकर फरार हो गए, तब पुलिस वहां पहुंची। अंदर का नज़ारा किसी कसाईखाने से कम नहीं था। गाड़ी के अंदर खून का तालाब बन चुका था। कृष्णानंद राय के शरीर को इस कदर भूना गया था की पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों के भी पसीने छूट गए। उनके शरीर से अकेले 67 गोलियां निकाली गई थीं।
उनके साथ गाड़ी में बैठे 6 अन्य निर्दोष लोग भी मारे गए थे। किसी का चेहरा गायब था, तो किसी का सीना गोलियों से फट चुका था। ये सिर्फ एक मर्डर नहीं था। 500 गोलियां किसी एक आदमी को मारने के लिए नहीं चलाई जातीं। ये गोलियां इसलिए चलाई गई थीं ताकि पूरे पूर्वांचल के हिंदुओं के दिलों में दहशत बैठ जाए।
मुख्तार अंसारी ये संदेश देना चाहता था की जो भी हिंदू नेता मेरे खिलाफ सिर उठाएगा, उसका अंजाम इतना खौफनाक होगा की उसकी लाश पहचानने लायक नहीं बचेगी। और हैरानी की बात तो ये है की जब ये कत्लेआम हो रहा था, तब मुख्तार अंसारी फैज़ाबाद जेल में बैठकर मजे से इस पूरी साज़िश को मॉनिटर कर रहा था।
मुख्तार का ‘चोटी कांड’- हिंदू आस्था पर वो इस्लामिक वार, जिस पर SP सरकार बजा रही थी ताली
अब आते हैं उस सच पर, जो इस पूरे हत्याकांड का सबसे घिनौना, सबसे स्याह और सबसे क्रूर हिस्सा है। वो हिस्सा जो साबित करता है की मुख्तार अंसारी सिर्फ एक राजनीतिक बाहुबली नहीं, बल्कि एक कट्टर हिंदू-विरोधी मानसिकता का जीता-जागता राक्षस था।
जिस वक्त बसनिया चट्टी पर कृष्णानंद राय की लाश खून से लथपथ पड़ी थी, उसी वक्त फैज़ाबाद जेल में बैठे मुख्तार अंसारी का फोन बजता है। ये वो वक्त था जब यूपी पुलिस की एसटीएफ (STF) ने मुख्तार का फोन सर्विलांस पर लगा रखा था। एसटीएफ के रिकॉर्ड में वो खौफनाक बातचीत आज भी दर्ज है।
जेल में बैठे मुख्तार अंसारी को उधर से एक शूटर (शायद मुन्ना बजरंगी या उसका कोई खास गुर्गा) फोन करता है और काम तमाम होने की खुशखबरी देता है। उस बातचीत में मुख्तार अंसारी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। वो ठेठ भोजपुरी में अपने गुर्गे से पूछता है- “अरे मुन्नवा ने मार दिया? ओकर चुटैया काट लिया?” (क्या मुन्ना बजरंगी ने उसे मार दिया? क्या उसकी चोटी काट ली?)
ये सुनकर उस पार से जवाब आता है- “हां, चुटैया काट लिया है।”
सच कहूं तो इस एक लाइन को सुनकर ही किसी भी सनातनी का खून खौलना लाज़मी है। कृष्णानंद राय एक कट्टर सनातनी थे और वो अपने सिर पर एक ‘चोटी’ (शिखा) रखते थे। हिंदू धर्म में शिखा का क्या महत्व है, ये किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है।
ये सिर्फ बालों का गुच्छा नहीं है। ये हमारे ज्ञान, हमारे संस्कार, हमारी आस्था और हमारे ब्राह्मण/सनातनी होने का सबसे पवित्र प्रतीक है। आचार्य चाणक्य ने इसी शिखा को खोलकर नंद वंश के विनाश की कसम खाई थी। शिखा एक हिंदू के स्वाभिमान का मुकुट होती है।
मुन्ना बजरंगी ने सिर्फ कृष्णानंद राय को 67 गोलियां नहीं मारीं, बल्कि मौत के बाद उनके शरीर के पास जाकर, चाकू से उनके सिर की वो पवित्र शिखा काट ली!
ज़रा ठहर कर सोचिए। ऐसा कौन करता है? राजनीतिक हत्याएं इस देश में बहुत हुई हैं। वर्चस्व की जंग में गोलियां बहुत चली हैं। लेकिन किसी मृत हिंदू नेता की लाश को इस तरह बेइज्जत करना, उसकी धार्मिक आस्था पर इस तरह वार करना- ये कोई आम अपराधी की सोच नहीं हो सकती। ये वही मुगलिया मानसिकता है, जो औरंगजेब और बाबर के दौर में हिंदुओं के जनेऊ तोड़ने और उनकी चोटियां काटने का काम करती थी।
मुख्तार अंसारी उसी इस्लामिक कट्टरपंथ का मॉडर्न चेहरा था। वो ‘चोटी’ काटकर सिर्फ कृष्णानंद राय को जलील नहीं कर रहा था, वो पूरे हिंदू समाज को, पूरे पूर्वांचल के सनातनी लोगों को ये बता रहा था की देखो, तुम्हारे धर्म के सबसे बड़े प्रतीक को मैंने अपने शूटरों के हाथों कटवा दिया और तुम्हारी सरकार, तुम्हारा सिस्टम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाया।
वो एसटीएफ के टेप में गूंजती मुख्तार की वो दरिंदगी भरी हंसी, दरअसल हिंदुओं की उस बेबसी पर हंस रही थी जो ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर उन्हें थोपी गई थी। ये ‘चोटी कांड’ हिंदू इतिहास के उन काले पन्नों में दर्ज़ हो चुका है, जो हमें बार-बार याद दिलाता है की जब सत्ता तुष्टिकरण की चादर ओढ़ लेती है, तो काफिरों (हिंदुओं) की चोटियां सरेआम काटी जाती हैं।
सपा का मुस्लिम-माफिया गठजोड़- कातिल मुख्तार को बचाने के लिए कैसे कुचला गया हिंदुओं का इंसाफ
विधायक की हत्या हो गई। 500 गोलियां चल गईं। चोटी काट ली गई। पूरे यूपी में हाहाकार मच गया। गाजीपुर से लेकर बनारस तक लोग सड़कों पर उतर आए। हर तरफ आगज़नी और प्रदर्शन होने लगे। सबको पता था की कातिल कौन है। एसटीएफ के पास बाकायदा मुख्तार अंसारी की वो ‘चुटैया काट लिया’ वाली ऑडियो रिकॉर्डिंग भी थी।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो समाजवादी पार्टी सरकार के ‘माफिया प्रेम’ का सबसे नंगा सच है। सपा सरकार ने मुख्तार अंसारी पर कार्रवाई करने के बजाय, उसे बचाने के लिए पूरा सरकारी अमला झोंक दिया। पुलिस को साफ निर्देश थे की मुख्तार और उसके परिवार पर आंच नहीं आनी चाहिए।
कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय खून के आंसू रोते हुए इंसाफ की गुहार लगा रही थीं। उन्होंने सीबीआई (CBI) जांच की मांग की, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार (मुलायम सिंह यादव उस वक्त मुख्यमंत्री थे) ने सीबीआई जांच की सिफारिश करने से साफ इनकार कर दिया।
उन्हें डर था की अगर सीबीआई आई, तो मुख्तार अंसारी के साथ-साथ सत्ता में बैठे उनके कई बड़े ‘सेक्युलर’ नेताओं के चेहरे से नकाब उतर जाएगा। मजबूरन अलका राय को सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।
इस बीच, पूर्वांचल में खौफ का नंगा नाच जारी रहा। मुख्तार को पता था की अगर कोई भी गवाह कोर्ट में खड़ा हो गया, तो उसे फांसी से कोई नहीं बचा सकता। इसलिए गवाहों को एक-एक करके रास्ते से हटाना शुरू किया गया।
बृजलाल जी ने साफ तौर पर बताया है की इस केस में गवाहों का क्या हश्र हुआ। कोई गवाह सड़क पर संदिग्ध हालत में मरा हुआ मिला। किसी को सांसद/विधायक की कोठियों के अंदर मार डाला गया। खौफ इतना भयानक था की कोई पुलिस वाला गवाहों को सुरक्षा तक नहीं दे पाया।
दहशत का आलम ये था की खुद कृष्णानंद राय के अपने भतीजों तक को कोर्ट में गवाही देने से मुकरना पड़ गया। जिस परिवार ने अपना मुखिया खोया हो, जब वो ही गवाही देने से पीछे हट जाए, तो समझ लीजिए की सिस्टम किस हद तक माफिया का गुलाम बन चुका था। हर गवाह को खरीदा गया, डराया गया या मार दिया गया।
और ये सब कुछ राज्य सरकार की नाक के नीचे, बल्कि यूं कहें कि राज्य सरकार के पूरे संरक्षण में हो रहा था। सपा की लीडरशिप के लिए मुख्तार अंसारी एक ऐसा मोहरा था जो उन्हें मुस्लिम वोट लाकर देता था, और उस वोट के बदले उन्होंने मुख्तार को हिंदुओं के खून से नहाने का खुला लाइसेंस दे रखा था।
LMG कांड- जब मुस्लिम माफिया मुख्तार के लिए सपा सरकार ने ईमानदार हिंदू अफसर को प्रताड़ित किया
सपा सरकार ने अपने इस लाडले मुस्लिम माफिया को बचाने के लिए किस हद तक बेशर्मी की थी, इसका सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है 2004 का कुख्यात ‘LMG कांड’।
कृष्णानंद राय की हत्या से ठीक एक साल पहले मुख्तार को ये समझ आ गया था की राय की बुलेटप्रूफ गाड़ी को आम राइफलों से नहीं भेदा जा सकता। इसलिए, इस मुस्लिम माफिया ने भारतीय सेना के एक भगोड़े जवान से एक लाइट मशीन गन (LMG) एक करोड़ रुपये में खरीदने की डील की।
लेकिन यूपी एसटीएफ (STF) के एक जांबाज और ईमानदार हिंदू अफसर, डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने अपनी जान पर खेलकर वो LMG बरामद कर ली। शैलेंद्र सिंह ने वही किया जो खाकी वर्दी का धर्म होता है- उन्होंने तुरंत बिना किसी खौफ के मुख्तार अंसारी पर पोटा (POTA – आतंकवाद निरोधक कानून) ठोक दिया।
अब सोचिए, सेक्युलर सिस्टम का नंगा नाच किसे कहते हैं! जैसे ही मुख्तार पर पोटा लगा, लखनऊ में बैठी सपा सरकार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उनके सबसे बड़े ‘मुस्लिम वोटबैंक’ वाले मोहरे पर देशद्रोह का मुकदमा लग चुका था। मुख्यमंत्री दफ्तर से सीधे आदेश आए की किसी भी कीमत पर मुख्तार से पोटा हटाया जाए।
जब शैलेंद्र सिंह ने अपने ईमान का सौदा करने से साफ मना कर दिया, तो SP सरकार ने अपने ही अफसर को जलील करना शुरू कर दिया। उन पर बेबुनियाद केस लादे गए, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और धमकाया गया। और आखिर में उस जांबाज हिंदू अफसर को परेशान होकर इस्तीफा देना पड़ा।
अगर उस वक्त सपा सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की खातिर एक ईमानदार अफसर की बलि न चढ़ाई होती, अगर मुख्तार को उसी वक्त POTA के तहत जेल में सड़ा दिया गया होता, तो शायद 2005 में कृष्णानंद राय की वो 500 गोलियों से हत्या नहीं होती। न ही किसी हिंदू शेर की चोटी काटी जाती। सच तो ये है की SP के उसी नंगे माफिया-प्रेम ने ही कृष्णानंद राय के डेथ वारंट पर मोहर लगाई थी।
याद रखे हिंदू समाज, SP जैसी पार्टियां और मुख्तार जैसे मुस्लिम माफिया फिर आएंगे, अगर हम बंटे रहे
कृष्णानंद राय का वो बलिदान कोई मामूली घटना नहीं थी। उस दिन कटी हुई वो ‘चोटी’ आज भी हर उस हिंदू से सवाल करती है जो चुनाव के दिन जातियों में बंटकर अपना वोट उन पार्टियों को दे देता है जिनके हाथ मुख्तार जैसे माफियाओं के खून से सने हैं।
अलका राय ने दशकों तक अदालतों के चक्कर काटे। गवाहों के मुकरने की वजह से ट्रायल कोर्ट से अंसारी बंधुओं को बरी भी कर दिया गया। लेकिन कहते हैं न की भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। वक्त का पहिया घूमा। यूपी में सत्ता बदली। वो ‘सेक्युलर’ राज खत्म हुआ और एक भगवाधारी सन्यासी (योगी आदित्यनाथ) ने प्रदेश की कमान संभाली।
जिस मुख्तार अंसारी के नाम से कभी पूर्वांचल कांपता था, जिसने कृष्णानंद राय की 67 गोलियां मारकर हत्या करवाई थी, हमने उसी मुख्तार अंसारी को पंजाब की जेल से यूपी लाते वक्त व्हीलचेयर पर गिड़गिड़ाते और खौफ से कांपते देखा। और आखिरकार, उसी यूपी की जेल में वो माफिया हमेशा के लिए मिट्टी में मिल गया। मुन्ना बजरंगी, जिसने वो ‘चोटी’ काटी थी, वो भी जेल के अंदर ही गैंगवार में कुत्तों की मौत मारा गया।
ये सिर्फ एक माफिया का अंत नहीं था, ये उस ‘सेक्युलर’ इकोसिस्टम का अंत था जो हिंदुओं की चिताओं पर अपनी रोटियां सेंकता था। कृष्णानंद राय की शहादत और उनकी काटी गई वो शिखा हमें आज भी एक कड़ा सबक देती है।
सबक ये है की अगर हिंदू समाज आज भी अपनी जातियों, अपने छोटे-छोटे स्वार्थों में बंटा रहा, तो कल फिर कोई नई ‘सेक्युलर’ पार्टी सत्ता में आएगी। वो फिर किसी नए मुख्तार अंसारी को पैदा करेगी। वो फिर हमारे किसी नेता को सरेआम 500 गोलियों से भूनेंगे और फिर किसी की चोटी काटकर उस पर ठहाके लगाएंगे।
हमारे पास सिर्फ एक ही हथियार है- हमारी एकता और हमारी राजनीतिक समझ। हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए की हमारा असली दुश्मन सिर्फ वो माफिया नहीं है जो गोली चलाता है, बल्कि वो राजनीतिक पार्टियां भी हैं जो उन माफियाओं को ‘सेक्युलरिज्म’ का चोला पहनाकर बचाती हैं।
कृष्णानंद राय जी का बलिदान व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। उनकी वो कटी हुई शिखा हमेशा हमारी स्मृति में एक धधकती हुई आग की तरह ज़िंदा रहनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी मुस्लिम गुंडा किसी हिंदू की तरफ आंख उठाने से पहले हज़ार बार सोचे।
