सच कहूं तो, मुंबई में बैठे बॉलीवुड के इस इस्लामिक वामपंथी इकोसिस्टम से अब किसी को कोई खास उम्मीद बची नहीं है। दशकों से एक ही पैटर्न चल रहा है। जब भी बात हमारे हिन्दू धर्म या हिंदू नायकों या सेना के शूरवीरों की आती है, तो ये दरबारी फिल्ममेकर्स अपनी ‘अमन की आशा’ वाली बांसुरी लेकर हाज़िर हो जाते हैं।
उन्हें ऐसा लगता है की बिना सेकुलरिज्म का तड़का लगाए, भारत के वीर जवानों की कहानी दिखाना कोई बहुत बड़ा गुनाह है। ये एक ऐसी बीमारी है जो इनके खून में रच-बस गई है।
यही सब एक बार फिर देखने को मिला है डायरेक्टर श्रीराम राघवन की फिल्म ‘इक्कीस’ में। अगस्त्य नंदा और धर्मेंद्र स्टारर इस फिल्म का जमकर PR किया गया। टीवी और सोशल मीडिया पर इसे परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल की ज़िंदगी को सलाम करने वाली एक महान देशभक्ति फिल्म बताकर बेचा गया।
लेकिन जब आप थिएटर में बैठते हैं और पर्दे पर कहानी खुलनी शुरू होती है, तो बहुत जल्दी समझ आ जाता है की इन बॉलीवुडियों ने कितना बड़ा रायता फैला रखा है।
ज़रा सोचिए, जब ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ (Uri: The Surgical Strike) और धुरंधर (Dhurandhar) जैसी कोई पक्की राष्ट्रवादी फिल्म बनती है, तो दुश्मन को बिल्कुल वैसा ही दिखाया जाता है जैसा वो असल में है- खूंखार, हिन्दुओं के खिलाफ नफरत से भरा और भारत की तबाही का सपना देखने वाला। वहाँ हीरो अपनी मातृभूमि और सनातन जड़ों से ताकत खींचता है।
लेकिन जब राघवन जैसे डायरेक्टर, जो अपनी वामपंथी विचारधारा के लिए जाने जाते हैं, और भारत-पाक युद्ध से जुड़ी बनाने उतरते हैं, तो एक ही घिसा-पिटा एजेंडा सामने आता है। ये लोग किसी भी तरह से भारतीय हीरो को सेक्युलर दिखाने की ज़िद पकड़ लेते हैं, पाकिस्तानी हमलावरों को इंसानियत का पुतला बनाकर पेश करते हैं, और हमारी सदियों पुरानी क्षत्रिय परंपराओं का ऐसा मज़ाक उड़ाते हैं की खून खौल जाए।
‘इक्कीस’ कोई देशभक्ति की मिसाल नहीं है, ये सीधे-सीधे एक वामपंथी एजेंडा है। फिल्म के नाम पर ये वो मीठा ज़हर है, जो बड़ी चालाकी से दर्शकों के दिमाग में इंजेक्ट किया जा रहा है।
कभी हिंदू क्षत्रिय धर्म के नाम पर बलि प्रथा का मज़ाक उड़ाना, तो कभी एक कट्टर राजपूत जनरल के मुंह से अरबी-फारसी के शब्द निकलवाना- ये सब अनजाने में नहीं हुआ है। ये पूरी तरह से सोची-समझी साज़िश है। आइए तफ़्सील से बात करते हैं की कैसे इस फिल्म ने अरुण खेतरपाल और उनके साथियों की वीरगाथा को हाईजैक करके उसे एक भद्दे प्रोपेगेंडा में बदल दिया।
वामपंथी एजेंडे वाली फिल्म ने छिपाया उस हिंदू शेर को- 21 साल के अरुण खेतरपाल, जिन्होंने क्षत्रिय लहू से लिखा था बसंतर का इतिहास
बॉलीवुड के इस झूठ को पकड़ने के लिए सबसे पहले ये जानना बहुत ज़रूरी है की असल ज़िंदगी में सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल आखिर चीज़ क्या थे। वो आज के ज़माने के ‘वोक’ या लिबरल लौंडे नहीं थे जो हर छोटी बात पर हिन्दू धर्म के खिलाफ अपनी मोरल पुलिसिंग शुरू कर दे। वो एक ऐसे खूंखार और कर्तव्यनिष्ठ योद्धा थे, जिनकी रगों में पीढ़ियों का क्षत्रिय खून खौल रहा था।
14 अक्टूबर 1950 को पुणे के एक पंजाबी हिंदू खत्री परिवार में पैदा हुए अरुण का पूरा खानदान ही फौजी था। उनके परदादा सिख खालसा आर्मी में लड़े थे, और दादा ने पहले विश्व युद्ध (WWI) के मोर्चों पर दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेतरपाल भी इंडियन आर्मी के कोर ऑफ इंजीनियर्स में एक धाकड़ अफसर थे।
ऐसे माहौल में पला-बढ़ा लड़का ज़ाहिर सी बात है की देश और धर्म से ऊपर किसी चीज़ को नहीं मानेगा। ‘लॉरेंस स्कूल, सनावर’ से पढ़ाई करने वाले अरुण ने बचपन से ही अपने स्कूल का मोटो “Never Give In” (कभी हार मत मानो) अपने ज़ेहन में उतार लिया था। और सच कहूं तो, यही मोटो आगे चलकर उन्होंने अपने खून से रणभूमि में लिख भी दिया।
NDA और IMA की कड़ी ट्रेनिंग के बाद 13 जून 1971 को अरुण को 17 पूना हॉर्स रेजिमेंट में कमीशन मिला। ये इंडियन आर्मी की सबसे एलीट और खतरनाक आर्मर्ड रेजिमेंट्स में से एक मानी जाती है। अभी इस 21 साल के लड़के की सर्विस को छह महीने ही हुए थे की 1971 की भारत-पाक जंग छिड़ गई।
वेस्टर्न फ्रंट पर शकरगढ़ सेक्टर में माहौल बेहद तनावपूर्ण था। 15 और 16 दिसंबर 1971 के दिन इंडियन आर्मी के इंजीनियर्स बसंतर नदी के पास बिछी लैंडमाइंस (बारूदी सुरंगें) साफ कर रहे थे ताकि भारतीय टैंकों का काफिला आगे बढ़ सके और पाकिस्तानियों की सप्लाई लाइन काट सके।
उधर पाकिस्तानियों को इस बात की भनक लग गई और उन्होंने अपने खतरनाक ‘पैटन टैंकों’ के साथ ज़बरदस्त जवाबी हमला बोल दिया। यहाँ एक बात और साफ कर दूं- टेक्नोलॉजी के मामले में पाकिस्तानी पैटन टैंक हमारे पुराने और भारी-भरकम ‘सेंचुरियन टैंकों’ से कहीं ज़्यादा एडवांस थे। लेकिन जंग मशीनों से नहीं, जज़्बे से जीती जाती है, और ये बात अरुण खेतरपाल साबित करने वाले थे।
16 दिसंबर की सुबह पाकिस्तानी टैंकों ने ‘B’ स्क्वाड्रन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। हमारी तरफ से फौज गिनती में कम थी। ‘B’ स्क्वाड्रन के कमांडर ने तुरंत बैकअप मांगा।
पास ही ‘A’ स्क्वाड्रन में तैनात अरुण खेतरपाल ने जैसे ही रेडियो पर ये कॉल सुनी, उनसे रुका नहीं गया। बिना किसी दूसरे ऑर्डर का इंतज़ार किए, अपनी सदियों पुरानी मार्शल परंपरा को निभाते हुए अरुण ने अपने ‘फमागुस्ता’ नाम के टैंक को सीधा मौत के मुंह में धकेल दिया।
बसंतर के उस मैदान में जो कुछ भी हुआ, वो आज भी दुनिया के मिलिट्री इतिहास में एक अजूबे की तरह पढ़ाया जाता है। अरुण का टैंक सीधा दुश्मनों की लाइन में जा घुसा। अपने भारी-भरकम सेंचुरियन टैंक को उन्होंने किसी शिकारी चीते की तरह दौड़ाया और एक-एक करके पाकिस्तानी पैटन टैंकों को फाड़ना शुरू कर दिया।
21 साल के उस लड़के का खौफ इतना भयानक था की पाकिस्तानी फॉर्मेशन पूरी तरह से बौखला गई और उन्होंने अपनी सारी तोपों का मुंह सिर्फ ‘फमागुस्ता’ की तरफ मोड़ दिया।
चारों तरफ से गोलियां बरस रही थीं। इसी बीच एक गोला अरुण के टैंक पर लगा। टैंक की लोहे की चादर फट गई और अंदर आग लग गई। उनका गनर वहीं शहीद हो गया। अरुण खुद भी बुरी तरह घायल हो गए थे, खून से लथपथ। हालात की गंभीरता को देखते हुए उनके सीनियर अफसर ने रेडियो पर तुरंत चिल्लाकर ऑर्डर दिया- “टैंक छोड़ो और पीछे हटो!”
लेकिन शायद उस लड़के को कुछ और ही मंज़ूर था। जलते हुए टैंक के बीच बैठकर, अपनी मौत को सामने देखकर अरुण ने रेडियो पर जो आखिरी शब्द कहे, वो सुनकर आज भी हर भारतीय के रोंगटे खड़े हो जाते हैं: “नहीं सर, मैं अपना टैंक छोड़कर नहीं जाऊंगा। मेरी मेन गन अभी काम कर रही है, और मैं इन हरामजादों को मार गिराऊंगा!”
अरुण पीछे नहीं हटे। वो लगातार अपनी गन से गोले दागते रहे और दुश्मनों के टैंक उड़ाते रहे। उन्होंने अकेले 4 पाकिस्तानी पैटन टैंकों की धज्जियां उड़ा दीं (उनकी पूरी टुकड़ी ने मिलकर 10 टैंक गिराए)। आख़िरकार दुश्मनों का एक आखिरी गोला उनके टैंक के बुर्ज (Turret) पर आ लगा और 21 साल की उम्र में भारत माँ का ये सच्चा सपूत वीरगति को प्राप्त हो गया।
लेकिन उनके इस पागलपन और शौर्य ने पाकिस्तानी फौज की रीढ़ तोड़ दी थी। खुद पाकिस्तानी कमांडर ने जंग के बाद माना था की उस एक अकेले टैंक की दहशत ने उनके जवानों का हौसला पस्त कर दिया था।
इसी अदम्य साहस के लिए उन्हें उनकी मृत्यु के बाद देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परमवीर चक्र दिया गया। ये है असल अरुण खेतरपाल। वो कोई घबराया हुआ बच्चा नहीं था, बल्कि सनातन धर्म और क्षत्रिय परंपरा का एक जीता-जागता स्वरूप था। ऐसे महान योद्धा की कहानी को ‘इक्कीस’ फिल्म में जिस तरह से तोड़ा-मरोड़ा गया है, वो सिर्फ एक भूल नहीं, बल्कि भारत के इतिहास के साथ एक भद्दा मज़ाक है।
हिंदू सन्यासी के मुंह में इस्लामी शब्द- बॉलीवुड ने कैसे किया क्षत्रिय ‘महावीर’ हनूत सिंह का सेक्युलर चीरहरण
अगर आपको लग रहा है की फिल्म ने सिर्फ अरुण खेतरपाल के किरदार के साथ ही नाइंसाफी की है, तो ज़रा ठहरिए। बॉलीवुड वालों का असली हिंदू-विरोधी एजेंडा तो अरुण खेतरपाल के कमांडिंग अफसर, लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) हनूत सिंह राठौड़ के किरदार में झलकता है। ये देखकर तो सच में खून खौलता है की कैसे एक सच्चे राजपूत सन्यासी को सेक्युलरिज्म के नाम पर एक मज़ाक बना दिया गया।
ज़रा जान लीजिए की हनूत सिंह राठौड़ आखिर थे कौन। 1971 की जंग में हनूत सिंह 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग अफसर थे। बसंतर नदी पार करने की जो पूरी स्ट्रैटेजी थी, वो इसी जीनियस दिमाग की उपज थी, जिसके लिए उन्हें महावीर चक्र से नवाज़ा गया था। लेकिन फौज में उनकी पहचान सिर्फ एक अफसर की नहीं थी। पूरी इंडियन आर्मी उन्हें ‘सैनिक संत’ या ‘सन्यासी योद्धा’ के नाम से जानती थी।
वो एक पक्के, धर्मनिष्ठ राजपूत थे। उन्होंने पूरी ज़िंदगी ब्रह्मचर्य का पालन किया। न शराब को कभी हाथ लगाया, न फौज की टिपिकल पार्टियों में कभी हिस्सा लिया। खाली समय में वो सिर्फ ध्यान करते थे और श्रीमद्भगवद्गीता का गहराई से अध्ययन करते थे।
हनूत सिंह असल मायने में प्राचीन भारत के उस ‘स्थितप्रज्ञ’ क्षत्रिय का अवतार थे, जिसका ज़िक्र भगवान कृष्ण गीता में करते हैं- जो मौत के डर से परे हो, जो बिना किसी नफरत या लालच के सिर्फ अपना ‘धर्म युद्ध’ लड़े। रिटायर होने के बाद भी इस महान राजपूत जनरल ने दुनियादारी छोड़कर देहरादून में अपना एक आश्रम बना लिया और पूरी ज़िंदगी भगवान की भक्ति में गुज़ार दी।
अब आप खुद सोचिए, बॉलीवुड के इस ‘वोक’ इकोसिस्टम को ऐसा कट्टर हिंदू शूरवीर कैसे हज़म हो सकता है? उनकी तो पूरी दुकान ही इस बात पर चलती है की हिंदू धर्म से जुड़ी कोई भी चीज़ महान नहीं हो सकती। इसीलिए डायरेक्टर श्रीराम राघवन ने ‘इक्कीस’ में हनूत सिंह के किरदार के साथ वो पाप किया है, जिसे कोई भी स्वाभिमानी हिंदू माफ नहीं कर सकता।
फिल्म के एक सीन में इस पक्के राजपूत सन्यासी को अपने जवानों में जोश भरने के लिए इस्लामी जुमले बोलते हुए दिखाया गया है! पर्दे पर हनूत सिंह का किरदार कहता है- “अल्लाह का हाथ हम पर है और परवरदिगार हमारी रक्षा करेगा।”
मतलब, कुछ भी? ऐतिहासिक तौर पर इसका कोई सुबूत तो छोड़िए, रत्ती भर भी लॉजिक नहीं है। जो आदमी दिन-रात गीता पढ़ता हो, जो ब्रह्मचारी सन्यासी हो, और जो एक राजपूत रेजिमेंट को पाकिस्तान (जो की एक इस्लामिक देश है) के खिलाफ जंग में उतार रहा हो… वो भला ‘अल्लाह और परवरदिगार’ के नाम पर अपनी फौज को क्यों ललकारेगा?
ये कोई सिनेमैटिक लिबर्टी (छूट) नहीं है। ये एक सोची-समझी साज़िश है। बॉलीवुड का वामपंथी धड़ा ये बर्दाश्त ही नहीं कर सकता की भारत की जीत का क्रेडिट किसी ‘भगवाधारी’ या हिंदू सन्यासी को मिले। इसीलिए वो जानबूझकर ऐसे किरदारों के मुंह में ज़बरदस्ती “गंगा-जमुनी तहज़ीब” ठूंस देते हैं।
उन्हें इस बात से चिढ़ है की एक हिंदू योद्धा सिर्फ अपने धर्म के सहारे इतना ताकतवर कैसे हो सकता है, बिना सेक्युलरिज्म की चादर ओढ़े? हनूत सिंह के किरदार के साथ की गई ये छेड़छाड़ राजपूत समाज और भारत के पूरे सैन्य इतिहास के मुँह पर एक तमाचा है।
माँ भवानी और क्षत्रिय परंपराओं का अपमान- हिंदू धर्म को ‘पिछड़ा’ साबित करने के लिए गढ़ा गया बलि प्रथा का झूठ
खैर, बॉलीवुड का ज्ञान-व्यान और एजेंडा यहीं खत्म नहीं होता। ‘इक्कीस’ का सबसे घिनौना और भद्दा हिस्सा वो है, जहाँ ये लोग हमारी सदियों पुरानी क्षत्रिय परंपराओं का मज़ाक उड़ाने पर उतर आते हैं। खुद को बड़ा प्रोग्रेसिव और मॉडर्न साबित करने की होड़ में इन फिल्ममेकर्स ने हिंदू सैन्य रिवाज़ों को एक अंधविश्वास की तरह पेश किया है।
फिल्म में एक बिल्कुल मनगढ़ंत सीन डाला गया है। दिखाया गया है की जब अरुण खेतरपाल (अगस्त्य नंदा) अपनी टैंक रेजिमेंट की ट्रेनिंग पूरी कर लेते हैं, तो कमांडिंग अफसर हनूत सिंह उनसे एक ‘क्षत्रिय अनुष्ठान’ पूरा करने को कहते हैं। लॉजिक ये दिया जाता है की चूंकि 17वीं पूना हॉर्स में राजपूत सैनिकों की तादाद बहुत ज़्यादा थी, इसलिए उनकी इज़्ज़त कमाने के लिए अरुण को माँ भवानी (चंडी) के चरणों में एक बकरे की बलि देनी होगी।
कैमरा जानबूझकर अगस्त्य नंदा के चेहरे पर फोकस करता है। उनके चेहरे पर घिन, उलझन और एक अजीब सी नैतिक दुविधा दिखाई गई है। फिल्म पूरी तरह से ये साबित करने पर तुली हुई है की बलि प्रथा कितनी पिछड़ी हुई, रूढ़िवादी और जंगली हरकत है।
अरुण को एक मॉडर्न और प्रोग्रेसिव सोच वाले युवा के तौर पर दिखाया गया है, जिसे अपनी इन “दकियानूसी” परंपराओं से सख्त नफरत है। आख़िरकार दिखाया जाता है की अरुण बलि देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, और उनकी जगह एक दूसरे अफसर (सगत सिंह) को आगे आकर ये काम करना पड़ता है।
अब ज़रा सच्चाई सुन लीजिए- ये घटना कभी हुई ही नहीं! इंडियन आर्मी के किसी रिकॉर्ड में, किसी किताब में या किसी भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ में ऐसा दूर-दूर तक ज़िक्र नहीं है की अरुण खेतरपाल को अपनी रेजिमेंट का चार्ज लेने के लिए ज़बरदस्ती किसी जानवर की बलि देने के लिए मजबूर किया गया हो। ये पूरा का पूरा सीन सिर्फ और सिर्फ हिंदू धर्म और क्षत्रिय परंपराओं को नीचा दिखाने के लिए मुंबई के AC कमरों में बैठकर गढ़ा गया है।
ये लोग असल क्षत्रिय धर्म का ‘क्ष’ भी नहीं जानते। हज़ारों सालों से हमारे शूरवीर युद्ध में जाने से पहले माँ दुर्गा, भवानी और चंडी की उपासना करते आए हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज का माँ भवानी से तलवार लेना हो, या गुरु गोबिंद सिंह जी का रणभूमि में चंडी का आह्वान करना… ‘शस्त्र पूजा’ और ‘बलि’ हमारी मार्शल हिस्ट्री का अटूट हिस्सा रहे हैं।
बलि का मतलब कोई बेवजह की क्रूरता नहीं है, जैसा की ये PETA-छाप लिबरल बॉलीवुड वाले दिखाना चाहते हैं। बलि असल में अपने अहंकार को मारने, मौत के डर को खत्म करने और रणभूमि में राक्षसों (शत्रुओं) का संहार करने के लिए उस प्रचंड, उग्र ऊर्जा को जगाने का प्रतीक है। युद्ध कोई बच्चों का खेल नहीं है। एक सैनिक को एक खूंखार योद्धा बनने के लिए अपने भीतर की आक्रामकता को जगाना पड़ता है।
लेकिन श्रीराम राघवन और उनके इकोसिस्टम ने बड़ी चालाकी से इस सीन के ज़रिए दो शिकार किए हैं। पहला, उन्होंने हिंदू परंपराओं को आज के युवा दर्शकों के सामने एक “खराब और पिछड़ी” सोच के तौर पर पेश किया। दूसरा, उन्होंने अरुण खेतरपाल जैसे शहीद के नाम का इस्तेमाल करके उसी की सैन्य जड़ों पर नैतिक जजमेंट पास कर दिया।
आज के 21वीं सदी के पश्चिमी लिबरल ज्ञान को 1971 के एक वीर जवान पर थोपना… इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है? ये उन लाखों राजपूत, मराठा, गोरखा और सिख सैनिकों का अपमान है, जिनकी आस्था इन्हीं जड़ों से जुड़ी है।
हिंदू खून के प्यासे पाकिस्तान पर वामपंथी प्यार- क्षत्रिय बलिदानों को भुलाकर ISI को ‘मासूम’ बनाने की घिनौनी साज़िश
जैसे-जैसे आप फिल्म में आगे बढ़ते हैं, बॉलीवुड की वो पुरानी बीमारी उभर कर सामने आ जाती है। हम बात कर रहे हैं ‘अमन की आशा’ सिंड्रोम की। ये एक ऐसी लाइलाज बीमारी है जहाँ भारतीय डायरेक्टर पाकिस्तान का नाम आते ही अचानक से शांति और अमन के राजदूत बन जाते हैं।
1971 की जंग पाकिस्तान ने शुरू की थी, उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में लाखों बंगाली हिंदुओं का कत्लेआम किया, औरतों के साथ जो किया वो सुनकर रूह कांप जाती है। लेकिन फिल्म ‘इक्कीस’ में इस खूंखार दुश्मन के साथ कैसा सलूक किया गया है?
एक निहायत ही बकवास और जज़्बाती सीन में दिखाया गया है की अरुण खेतरपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेतरपाल (धर्मेंद्र का किरदार) एक घायल पाकिस्तानी सैनिक के पास जाते हैं और उसे गले लगाकर उसका दुख बांटते हैं।
क्या सच में? एक तरफ आपका देश जल रहा है, आपके बेटे के सिर पर मौत मंडरा रही है, और यहाँ एक भारतीय ब्रिगेडियर दुश्मन फौज के सिपाही को गले लगाकर आंसू बहा रहा है! ये सिर्फ बॉलीवुड की फिल्मों में ही हो सकता है, असल ज़िंदगी में नहीं।
ये सीन जानबूझकर इसलिए डाला गया ताकि पाकिस्तान आर्मी की क्रूरता को धो-पोंछकर साफ किया जा सके और दर्शकों के दिमाग में ये भर दिया जाए की “सरहद के उस पार भी तो इंसान ही हैं।” ये उन लाखों शहीदों और नरसंहार का शिकार हुए लोगों की चिताओं पर बैठकर रोटी सेंकने जैसा है।
अब वक़्त आ गया है की हिंदू समाज और राष्ट्रवादी सोच रखने वाले लोग इस तरह के मीठे ज़हर को पहचानें। हमारे फौजी इतिहास और सनातन परंपराओं की कहानी कहने का ठेका हम इन दरबारी फिल्ममेकर्स के भरोसे नहीं छोड़ सकते, जिन्हें हमारी सभ्यता और संस्कृति से ही नफरत है।
