ज़िंदगी भर की भागदौड़ और तमाम जद्दोजहद के बाद, एक हिन्दू आख़िरकार क्या चाहता है? बस यही न, की जब उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हों, तो उसकी जुबान पे श्री राम का नाम हो, और वो सनातन विधियों और मंत्रों के बीच अपना शरीर त्यागे।
लेकिन क्या हो अगर उसी अंत समय में जिस चिता में वो लेटा हो, उसकी लकड़ियां, और वो पूरा शमशान.. सब कुछ एक जिहादी के हाथों से संचालित हो रहा हो?
ये कोई डरावनी कहानी नहीं, बल्कि हमारी आँखों के सामने ही पनपती सच्चाई है! जिस चिता पर लेटकर एक हिंदू मोक्ष की आस लगाता है, उस चिता को सजाने का ठेका भी आज ऐसे लोगों के हाथों में सौंप दिया गया है जिनके धर्म में मूर्तियों की पूजा और शव को अग्नि के हवाले करना ही सिरे से नकारा गया है। जो लोग चिता को मान्यता ही नहीं देते, वे हिंदू की चिता सजाने का ठेका कैसे ले सकते हैं?
बात हो रही है उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की। वहाँ के सिहानी एक्सटेंशन वाले इलाके में, नूर नगर के पास एक नया शमशान घाट बनकर तैयार हुआ। लगा की चलो, लोगों को अपनों के अंतिम संस्कार के लिए एक अच्छी और सुव्यवस्थित जगह मिल गई। लेकिन फिर पता चला की यहाँ हिन्दू आस्था के साथ कितना बड़ा झोल किया गया है।
गाजियाबाद नगर निगम के हमारे ‘महान’ सरकारी बाबुओं ने इस शमशान घाट के साथ इसके लकड़ी, कफन और पूजा-पाठ के सामान की सप्लाई का ठेका एक मुस्लिम ठेकेदार को दे दिया है, और उस ठेकेदार का नाम है ‘अली’।
अब जालीदार टोपी वाले अली भाई तय करेंगे की गाजियाबाद के हिंदुओं की चिता में कौन सी लकड़ी लगेगी और हमारे मोक्ष के लिए जो आहुति दी जाएगी, उसका सामान कैसा होगा?
यह घटना केवल एक ठेके के छिन जाने की नहीं है, बल्कि यह हिंदू समाज की उस गहरी होती जा रही लाचारी का प्रतीक है, जहाँ सेक्युलरिज्म के नाम पर हमारी सबसे पवित्र और संवेदनशील व्यवस्थाओं को भी धीरे-धीरे जिहादियों के नियंत्रण में दिया जा रहा है।
शमशान घाट, जो वैराग्य और पवित्रता का सबसे पवित्र स्थान है, आज वह भी सेक्युलर राजनीति और प्रशाशन की हिन्दुओ के प्रति घृणा की भेंट चढ़ गया है।
गाजियाबाद के नूर नगर शमशान घाट की घटना- अब हिंदुओं की चिता का ठेका भी मुसलमानों के हाथ
गाजियाबाद के सिहानी एक्सटेंशन स्थित नूर नगर का ये मामला नगर निगम की कार्यप्रणाली की पोल खोल रहा है। शमशान घाट का निर्माण और उसका रखरखाव नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है।
प्रशासनिक नियमों के तहत निगम ने शमशान घाट में लकड़ियों और अन्य सामग्री की व्यवस्था के लिए एक टेंडर निकाला था। लेकिन यहीं पर सरकारी मशीनरी ने अपनी उसी ‘सेक्युलर’ और हिंदू-विरोधी मानसिकता का परिचय दिया, जिसका शिकार हिंदू समाज दशकों से होता आ रहा है।
बिना किसी धार्मिक संवेदनशीलता, बिना किसी परंपरा के ज्ञान और बिना स्थानीय हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखे, यह टेंडर सिर्फ ‘सबसे कम बोली’ लगाने वाले एक गैर-हिंदू व्यक्ति, अली को सौंप दिया गया।
हमारा पूरे समाज और प्रशासन से एक सीधा सा सवाल है की क्या इस पूरे गाजियाबाद शहर में, या पूरे उत्तर प्रदेश में कोई एक भी हिंदू, कोई पंडित, कोई पुजारी या कोई सनातनी व्यापारी नहीं बचा था जो इस शमशान घाट की व्यवस्था संभाल सके? क्या अब हम हिन्दू इतने लाचार हो गए हैं की अपने मृतकों की अंतिम यात्रा का प्रबंध करने के लिए भी हमें जिहादियों पे निर्भर रहना पड़ेगा?
इस ठेके के मायने बहुत गहरे हैं। ठेकेदार अली के हाथों में अब केवल लकड़ियों का डिपार्टमेंट नहीं है- उसके नियंत्रण में वह कफन है जो एक हिंदू के मृत शरीर पर डाला जाएगा। उसके नियंत्रण में वह धूप, कपूर, चंदन और पूजा सामग्री है जिससे हिंदू मंत्रों का उच्चारण करते हुए अंतिम आहुति दी जाएगी।
क्या नगर निगम के अधिकारियों ने एक बार भी यह सोचा कि जिस सामग्री से सनातन धर्म का 16वां मृत्यु का संस्कार पूरा होना है, उस सामग्री के स्रोत का शुद्ध और पवित्र होना कितना जरुरी है?
यह राज्य सरकार के अधीन काम करने वाले नगर निगम द्वारा किया गया एक ऐसा शर्मनाक कृत्य है, जो यह साबित करता है की सरकारी बाबुओं के लिए हिंदू धर्म की मान्यताएं केवल एक व्यापार से अधिक कुछ नहीं हैं।
जो मुस्लिम समाज चिता जलाने को हराम मानता है, क्या वो हिन्दू के मोक्ष और अंतिम संस्कार की पवित्रता बचाएगा?
इस बात की गहराई को समझने के लिए थोड़ा गरुड़ पुराण और अपने शास्त्रों की तरफ मुड़ना पड़ेगा। हमारे यहाँ अंतिम संस्कार सिर्फ किसी ‘डेड बॉडी’ को ठिकाने लगाने का काम नहीं है। ये अग्नि देव को दी जाने वाली आख़िरी आहुति है।
जब चिता सजती है, तो उसमें कोई ऐरी-गैरी लकड़ी नहीं लगती। उसमें आम, पीपल, ढाक और चंदन की लकड़ियां इस्तेमाल होती हैं। शुद्ध देसी घी, काले तिल, जौ, कुशा, गंगाजल और कपूर… ये सब वो चीज़ें हैं जिनसे वातावरण पवित्र होता है और जाने वाली आत्मा को शांति मिलती है।
शास्त्रों में साफ़ लिखा है की पूजा और संस्कार की सामग्री बहुत ही शुद्ध और ‘श्रद्धा भाव’ से इकट्ठी की जानी चाहिए। अब आप खुद दिमाग लगाइए। इस्लाम की मान्यताओं के हिसाब से मौत के बाद शव को दफनाना ही इकलौता सही रास्ता है।
उनके यहाँ तो कयामत के दिन तक कब्र में इंतज़ार करने का कॉन्सेप्ट है। शव को आग लगाना उनके मज़हब में हराम है। तो ऐसे में, जो इंसान वैचारिक और मज़हबी तौर पर आपके अंतिम संस्कार के तरीके से ही नफरत करता है, वो आपकी चिता के लिए लकड़ियां बेचते वक्त क्या खाक ‘श्रद्धा’ और ‘पवित्रता’ रखेगा?
क्या वो ठेकेदार इस बात की गारंटी दे सकता है की जो घी वो चिता के लिए बेच रहा है, वो शुद्ध है? क्या वो उस कफन और चंदन की पवित्रता बनाए रखेगा, जिसका इस्तेमाल हमारे मोक्ष के लिए होना है? बिल्कुल नहीं। उसके लिए तो ये सिर्फ एक धंधा है, जिससे उसे दो पैसे कमाने हैं। हिंदू धर्म में ‘भाव’ का बहुत बड़ा खेल है।
अगर देने वाले के मन में ही खोट हो, या उसकी धार्मिक मान्यताएं हमारी मान्यताओं के एकदम उलट हों, तो उसके हाथ का दिया हुआ सामान हमारे पितरों को कैसे तार सकता है? ये तो हमारे पूर्वजों की आत्माओं को सुकून देने के बजाय उन्हें तड़पाने वाला काम हो गया।
हिंदू इकोसिस्टम पर जिहादियों का कब्ज़ा- हमारे डोम राजा और पुजारियों की रोज़ी छीनकर प्रशासन ने मुस्लिम ठेकेदार को सौंप दिया पूरा हिन्दू इकोसिस्टम
खैर, अगर आपको लग रहा है की ये सिर्फ एक शमशान घाट के टेंडर का मामला है, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। ये एक बहुत बड़े ‘इकोसिस्टम’ पर कब्जे की सोची-समझी साज़िश है। जिसे आजकल ‘आर्थिक जिहाद’ भी कहा जाता है।
सनातन धर्म सिर्फ मंत्रों और मंदिरों तक सीमित नहीं है। इसके आस-पास एक बहुत बड़ी इकॉनमी चलती है, जिससे लाखों-करोड़ों गरीब हिंदुओं का घर चलता है। सदियों से हमारे शमशान घाटों की व्यवस्था कौन देखता आया है?
हमारे डोम राजा, समाज के वो पिछड़े और दलित हिंदू परिवार जो पीढ़ियों से इस सेवा में लगे हैं। लकड़ियों का इंतज़ाम करने वाले हमारे स्थानीय लोग और पूजा-पाठ कराने वाले हमारे पंडित-पुजारी। जब भी हमारे धर्म का कोई काम होता है, तो उसका सीधा फायदा समाज के आखिरी पायदान पर खड़े हिंदू को मिलता है।
लेकिन ज़रा आंखें खोलकर देखिए की पिछले कुछ सालों में हो क्या रहा है! पहले मुसलमानों ने हमारे कुंभ और दिवाली के मेलों में दुकानें लगाना शुरू किया। फिर धीरे-धीरे बड़े मंदिरों के बाहर प्रसाद, फूल-माला और पूजा की दुकानों पर इनका कब्ज़ा होने लगा। कई जगह तो ये मुसलमान नाम बदलकर हिंदुओं के पवित्र स्थानों पर अपना धंधा चला रहे हैं। और अब… अब बात शमशान घाट तक आ पहुंची है!
गाजियाबाद नगर निगम ने शमशान घाट का ठेका एक मुस्लिम को देकर उन तमाम हिंदू परिवारों के पेट पर सीधी लात मारी है, जिनकी पूरी ज़िंदगी इसी काम से चलती थी। ये हमारी रोजी-रोटी छीनकर हमें ही कमज़ोर करने की चाल है।
जब ये लोग अपने किसी भी धार्मिक काम में (चाहे वो मस्जिदों का बाहर का मार्केट हो या अजमेर शरीफ की दरगाह का बाज़ार) किसी हिंदू को फटकने तक नहीं देते, तो हम हिंदुओं को ही क्यों मजबूर किया जा रहा है की हम अपनी पैदाइश से लेकर अपनी मौत तक का पूरा अर्थशास्त्र इनके हाथों में सौंप दें?
शमशान की वो राख उन डोम परिवारों के लिए सिर्फ राख नहीं, उनका मंदिर है, उनकी रोज़ी है। उसे छीनकर किसी अली को दे देना, हमारे अधिकारों का सीधा मर्डर है।
क्या बेशर्म प्रशासन किसी हिन्दू को दे सकता है मुस्लिम कब्रिस्तान का ठेका या सेक्युलरिज्म का सारा बोझ सिर्फ हम पर है
चलिए, इस सेक्युलर पाखंड को एक सीधे से उदाहरण से समझते हैं। मैं गाजियाबाद नगर निगम, यूपी प्रशासन और पूरे देश के ‘सिस्टम’ को खुली चुनौती देता हूँ— क्या हिम्मत है किसी नगर निगम की कि वो किसी वक्फ बोर्ड की ज़मीन, किसी मस्जिद के रखरखाव या किसी मुस्लिम कब्रिस्तान का ठेका किसी हिंदू को दे दे?
छोड़िए ठेका, क्या किसी तिलकधारी ब्राह्मण या किसी कट्टर हिंदू को किसी कब्रिस्तान की बाउंड्री वॉल बनाने, कब्र खोदने या जनाज़े के लिए कफन बेचने का काम दिया जा सकता है?
अरे भाई, बवाल मच जाएगा देश में! रातों-रात “इस्लाम खतरे में है” के नारे लगने लगेंगे। यूएन (UN) से लेकर अल जज़ीरा तक में लेख छप जाएंगे की भारत में मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी हो रही है। कोई भी सरकारी अधिकारी ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेगा।
लेकिन जब बात हिंदुओं की आती है, तो ये सारे नियम-कानून और संवेदनशीलता तेल लेने चले जाते हैं! सारा ‘सेक्युलरिज्म का कीड़ा’ सिर्फ हिंदुओं को ही क्यों काटता है? हमारे ही शमशान घाटों को इनकी सेक्युलर लैबोरेट्री क्यों बनाया जाता है?
सच्चाई तो ये है की जब तक हमारे मंदिर, मठ और शमशान इन सरकारी बाबुओं के कंट्रोल में रहेंगे, तब तक ये लोग हमारी आस्था को ऐसे ही सबसे सस्ती बोली लगाने वालों के हाथ नीलाम करते रहेंगे। इसीलिए आज ये मांग सबसे ज़ोर पकड़ रही है की हिंदू संस्थानों को सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त किया जाए।
मुसलमानों को खुद के लिए सब कुछ हलाल चाहिए लेकिन हिन्दू की पवित्र चिता पर हिन्दुओं का कोई हक़ नहीं ?
जैसे ही हम सनातनी अपने हक़ की बात उठाते हैं, वैसे ही देश का ये वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम अपने बिलों से बाहर आ जाता है।
इनके पास गिने-चुने डायलॉग हैं जो ये हर जगह चिपका देते हैं। कहेंगे- “अरे यार, व्यापार का कोई धर्म थोड़ी होता है!” या “लकड़ी तो आख़िर लकड़ी होती है, उसमें हिंदू-मुस्लिम क्या देखना?” या फिर सबसे वाहियात तर्क- “जलने के बाद तो सब राख ही हो जाना है, फिर ठेकेदार का मज़हब पूछकर क्या करोगे?”
सच कहूं तो, इन लिबरल ज्ञानियों का पाखंड देखकर हंसी आती है। जो लोग दिन-रात “व्यापार का कोई धर्म नहीं होता” का ज्ञान पेलते हैं, ज़रा उनसे ‘हलाल इकॉनमी’ के बारे में पूछकर देखिए, सारी बोलती बंद हो जाएगी। जब बात इनके अपने चहेते समुदाय की आती है, तो भाई साहब, इन्हें गोश्त से लेकर कॉस्मेटिक्स तक, और दवाइयों से लेकर पानी की बोतलों तक… सब कुछ ‘हलाल’ सर्टिफाइड चाहिए!
हलाल का सीधा सा मतलब क्या है? यही न की वो सामान न सिर्फ शरीयत के हिसाब से बना हो, बल्कि उसे बनाने वाला और उसका मुनाफा कमाने वाला भी मुस्लिम समुदाय का हो! एक हिंदू खटीक का काटा हुआ गोश्त इनके लिए हलाल नहीं होता।
हलाल सर्टिफिकेशन सिर्फ और सिर्फ इस्लामिक संस्थाएं ही दे सकती हैं। मतलब, दुनिया भर में खरबों डॉलर की एक ऐसी समानांतर अर्थव्यवस्था (Parallel Economy) चलाई जा रही है जिसमें गैर-मुस्लिमों की ‘नो एंट्री’ है।
अब सवाल ये उठता है की जब ये मुस्लिम अपने धर्म के नाम पर इतना बड़ा हलाल का मार्केट चला सकते हैं, जहाँ हमारी एंट्री बैन है, तो फिर हम हिंदुओं को ये हक़ क्यों नहीं है की हम अपने सबसे पवित्र संस्कार का सामान अपने ही लोगों से खरीदें? जब उन्हें हलाल गोश्त चाहिए, तो हमें हमारी शुद्ध और पवित्र चिता की लकड़ी क्यों नहीं मिल सकती?
ये सेक्युलरिज्म का सारा का सारा ठेका क्या सिर्फ हिंदुओं ने ले रखा है? हमारे लिए वो लकड़ी सिर्फ आग जलाने का साधन नहीं है, वो ‘आहूति’ है, जिसे हम अग्नि देव को सौंपते हैं। और इसकी शुद्धता के साथ कोई समझौता हम किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।
हिन्दू समाज एक होकर इस गाजियाबाद शमशान घाट ठेके का बहिष्कार करे और प्रशासन से इस मुस्लिम तुष्टिकरण का कड़ा हिसाब मांगे
जब सिस्टम बहरा हो जाए और सरकारें अंधी हो जाएं, तो समाज को खुद अपनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। अपने ही शमशान घाट में किसी जिहादी मुस्लिम के हाथों से लकड़ी खरीदना और उसे अपने बाप-दादा की चिता में लगाना, हमारे लिए किसी पाप और ‘अभिशाप’ से कम नहीं है।
अब बहुत हो गया ये तमाशा! वक्त आ गया है की हिंदू समाज अपनी कुंभकर्णी नींद से जागे और इस सिस्टम की ईंट से ईंट बजा दे। सबसे पहला काम तो ये करना है की इस शमशान घाट का पूर्ण बहिष्कार करो।
गाजियाबाद और नूर नगर के सभी हिंदुओं को ये कसम खानी चाहिए की जब तक ये टेंडर कैंसिल होकर किसी हिंदू को नहीं मिलता, तब तक उस शमशान में कोई भी हिन्दू एक कदम भी नहीं रखेगा, चिता जलाना तो दूर की बात।
अगर मज़बूरी में वहाँ अंतिम संस्कार करना भी पड़े, तो अपनी लकड़ी, अपना घी और अपना कफन घर से लेकर जाओ या बाहर किसी हिंदू की दुकान से खरीदो। अली की दुकान से एक रुपये का भी सामान नहीं बिकना चाहिए।
दूसरा बड़ा कदम है सड़कों पर उतरना। स्थानीय लोगों, हिंदू संगठनों, बजरंग दल, और हमारे संतों-महंतों को मिलकर गाजियाबाद नगर निगम का घेराव करना चाहिए। शांति से, लेकिन पूरी ताकत के साथ अधिकारियों की मेज बजाकर पूछना चाहिए की किस आधार पर उन्होंने हिंदुओं की चिता का ठेका ऐसे लोगों को दिया?
और बात सिर्फ धरने-प्रदर्शन तक नहीं रुकनी चाहिए। हमारे जो हिंदू वकील भाई हैं, उन्हें तुरंत कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए। हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) डालो की देश के किसी भी हिंदू शमशान घाट, मंदिर या धार्मिक आयोजन का कोई भी ठेका (चाहे वो टेंट का हो, लकड़ी का हो या प्रसाद का) किसी भी गैर-हिंदू को देने पर तुरंत रोक लगाई जाए।
ये हमारी धार्मिक स्वतंत्रता का मामला है। अगर आज हम चुप बैठ गए, तो याद रखना, कल को ये तुम्हारे घर के अंदर घुसकर तुम्हारे भगवान की मूर्तियों के कपड़े और प्रसाद भी बेचने लगेंगे और तुम कुछ नहीं कर पाओगे।
आज हिन्दू चुप रहा तो कल यही प्रशासन हमारे मंदिरों का सारा काम मुस्लिम ठेकेदारों को बांट देगा
आख़िर में बस इतना ही कहूंगा की ये लड़ाई सिर्फ गाजियाबाद के एक शमशान घाट की नहीं है। ये एक टेस्ट केस है। ये लोग चेक कर रहे हैं की हिंदू समाज के अंदर अभी कितनी जान बाकी है, या ये पूरी तरह से सेक्युलरिज्म का नशा करके मुर्दा हो चुके हैं।
इतिहास गवाह है की जिन समाजों ने अपने धार्मिक संस्थानों, अपनी परंपराओं और अपने इकोसिस्टम की रक्षा नहीं की, वो दुनिया के नक्शे से ऐसे मिट गए जैसे कभी थे ही नहीं।
आज अगर तुमने शमशान घाट पर जिहादियों के इस कब्जे को सिर झुकाकर मान लिया, तो कल ये तुम्हारे मंदिरों के गर्भगृह तक पहुंच जाएंगे। शुरुआत हमेशा ऐसे ही छोटे-छोटे टेंडरों और ‘बिजनेस’ के नाम पर होती है, लेकिन इसका अंजाम बहुत भयानक होता है। ये एक पूरे ‘जिहादी इकोसिस्टम’ का हिस्सा होता है।
गाजियाबाद के अधिकारियों को भी ये बात साफ़-साफ़ समझ लेनी चाहिए की हिंदू अब चुपचाप मार खाने वाला नहीं है। ये ठेका हर हाल में रद्द होना चाहिए और इसे हमारे ही किसी हिंदू भाई- चाहे वो कोई डोम परिवार हो, कोई पुजारी हो या कोई लकड़हारा- उसे ही मिलना चाहिए।
अब पीछे हटने का कोई चांस नहीं है। अपने धर्म के अर्थशास्त्र को बचाओ, अपनी परंपराओं को बचाओ। आइए हम सब एक साथ आवाज़ उठाएं की सनातन धर्म में जिहादियों की घुसपैठ हम बर्दाश्त नहीं करेंगे।
जय श्री राम!
