‘नई मुस्लिम लीग’ बनने की राह पर कांग्रेस! असम, केरल, बंगाल समेत 5 राज्यों में ज्यादातर मुस्लिम उम्मीदवार ही जीते

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में ध्रुवीकरण की राजनीति का असर साफ दिखाई दिया। कई राज्यों में कांग्रेस और उसके सहयोगियों के मुस्लिम उम्मीदवारों ने अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में उल्लेखनीय जीत दर्ज की, लेकिन इसके साथ ही पार्टी के सामने व्यापक सामाजिक आधार बनाए रखने की चुनौती भी और गहरी होती नजर आई। यही वजह है कि इन चुनाव परिणामों को कांग्रेस के लिए “धूप-छांव” जैसी स्थिति माना जा रहा है।

केरल में UDF की ताकत बने मुस्लिम उम्मीदवार

केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ गठबंधन ने मजबूत प्रदर्शन किया। राज्य की 140 सदस्यीय विधानसभा में कुल 35 मुस्लिम उम्मीदवार विजयी हुए, जिनमें 30 उम्मीदवार यूडीएफ गठबंधन से थे। इनमें आठ कांग्रेस के टिकट पर जीतकर आए, जबकि 22 उम्मीदवार सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के थे।

इन नतीजों ने एक बार फिर यह साबित किया कि केरल में मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस गठबंधन की पकड़ अभी भी बेहद मजबूत बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि IUML के साथ पुराना गठबंधन कांग्रेस के लिए राज्य में सबसे बड़ी चुनावी ताकत बन चुका है।

तमिलनाडु में छोटा दांव, लेकिन बड़ा संदेश

तमिलनाडु में कांग्रेस ने सीमित लेकिन प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण दांव खेला। पार्टी ने दो मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से एक उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल रहा।

हालांकि राज्य में कांग्रेस की भूमिका गठबंधन राजनीति तक सीमित रही, लेकिन यह परिणाम दक्षिण भारत में अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच पार्टी की मौजूदगी और स्वीकार्यता को दर्शाता है। भाजपा समर्थकों ने इसे भी कांग्रेस की “अल्पसंख्यक केंद्रित राजनीति” के उदाहरण के रूप में पेश किया।

बंगाल में बड़ा प्रयोग, लेकिन सीमित सफलता

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर बड़ा दांव लगाया। पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के 47 उम्मीदवारों के मुकाबले 63 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में टिकट देने के बावजूद कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों पर सफलता मिली और दोनों ही सीटें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से थीं।

दोनों विजेता उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से रहे। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि मुस्लिम मतों में समर्थन मिलने के बावजूद कांग्रेस राज्य में व्यापक सामाजिक और राजनीतिक आधार खड़ा करने में संघर्ष कर रही है। यही वजह है कि बंगाल में कांग्रेस की राजनीति अब सीमित इलाकों तक सिमटती दिखाई दे रही है।

असम में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले आंकड़े

असम के चुनाव नतीजों ने इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में बदल दिया। कांग्रेस ने 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 18 जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके उलट पार्टी के 79 गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों में से सिर्फ एक ही उम्मीदवार जीत सका।

इन आंकड़ों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का बड़ा मौका दे दिया। भाजपा नेताओं ने दावा किया कि कांग्रेस अब सिर्फ मुस्लिम बहुल सीटों पर केंद्रित पार्टी बनती जा रही है। वहीं कांग्रेस का कहना है कि उसने उन्हीं उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनकी अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ थी।

80% स्ट्राइक रेट ने बढ़ाई भाजपा की आक्रामकता

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन पांच राज्यों में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट करीब 80 प्रतिशत के आसपास रहा। यही कारण है कि भाजपा और उसके समर्थक कांग्रेस पर “तुष्टिकरण” की राजनीति का आरोप लगातार तेज कर रहे हैं।

भाजपा इस पूरे मुद्दे को “हिंदुत्व बनाम वोट बैंक” की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी का हिस्सा बता रही है।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?

इन चुनाव नतीजों ने कांग्रेस के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या पार्टी अल्पसंख्यक समर्थन के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन बचा पाएगी, या फिर व्यापक सामाजिक संतुलन के बिना उसका जनाधार और सीमित होता जाएगा?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कांग्रेस सिर्फ कुछ खास क्षेत्रों और समुदायों तक सीमित होती गई, तो भाजपा का “तुष्टिकरण” वाला नैरेटिव और मजबूत होगा। आने वाले लोकसभा चुनावों में यही मुद्दा भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बहस बनने वाला है।

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