'Freebies' कल्चर- मुफ्तखोरी की लत में देश का भविष्य गिरवी, सत्ता की कुर्सी के लिए देश का दिवालिया निकाल रही सरकारें

‘Freebies’ कल्चर- मुफ्तखोरी की लत में देश का भविष्य गिरवी, सत्ता की कुर्सी के लिए देश का दिवालिया निकाल रही सरकारें

सच कहूं तो आजकल सुबह-सुबह अख़बार उठाने का मन ही नहीं करता। वही रोज़ की घिसी-पिटी खबरें। एक तरफ़ चीन बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है, नए नए कारखाने खोल रहा है.. और दूसरी तरफ हमारे देश के नेता इस होड़ में लगे हैं की जनता के बैंक खाते में ‘फ्री-फ्री’ के नाम पर कितने हज़ार रुपये डाले जाएं। हॉस्पिटल गए भाड़ में, स्कूल गए भाड़ में.. बस लोगों को मुफ्त की रेवड़ी बांटो! 

जब आप और हम जैसे मिडिल क्लास टैक्सपेयर ये सब देखते हैं, तो समझ में नहीं आता की ये हो क्या रहा है!  मतलब, दिन-रात मेहनत हम करें, इनकम टैक्स, जीएसटी, यहाँ तक की टोल टैक्स भी हम भरें, और हमारी उस खून-पसीने की कमाई को ये नेता अपना वोट बैंक बनाने के लिए खटाखट खैरात (Freebies) के रूप में बांट दें? 

अरे भाई, कोई पूछता ही नहीं की जिस देश को हम ‘विश्वगुरु’ बनाने का सपना देख रहे थे, जहाँ राम मंदिर से लेकर ब्रह्मोस मिसाइल तक की बातें होती थीं, वो देश अचानक से मुफ्तखोरी के इस दलदल में कैसे फंस गया? 

हमारा लोकतंत्र अब कोई सिद्धांतों वाली जगह नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा बाज़ार बन चुका है जहाँ खुलेआम बोलियां लगती हैं। राजनीतिक दलों के बीच बस इस बात की होड़ मची है की सरकारी खजाने से कितना पैसा या मुफ़्त की सुख-सुविधाएं बांटकर जनता का वोट खरीदा जा सके।

और सबसे बड़ी विडंबना तो ये है की वामपंथियों और तुष्टिकरण वालों की इस बीमारी को अब हमारे ‘राष्ट्रवादी’ BJP नेताओं ने भी सीने से लगा लिया है। ये कोई छोटा-मोटा मुद्दा नहीं है, ये एक ऐसा दीमक है जो हमारे राष्ट्रवाद, हमारे हिंदुत्व और हमारे पूरे भविष्य को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। 

जो देश कभी दुनिया की एक बड़ी आर्थिक ताकत बनने का सपना देख रहा था, उसकी राजनीति अब आम आदमी को मेहनत के दम पर आगे बढ़ाने के बजाय, उसे सिर्फ सरकारी मदद पर टिका रहने वाला मोहताज और ‘भिखारी’ बनाने पर तुली हुई है।

चलिए आज इस ‘Freebies’ के ज़हर पर खुलकर बात करते हैं।

सनातन, कर्मयोग और चाणक्य के अनुसार- ‘Freebies’ जैसी बिना पसीने की कमाई है ‘पाप’

हमारे यहाँ बचपन से ही एक बात घर-घर में सिखाई जाती है- मुफ्त की रोटी पचती नहीं। हमारा जो मूल सनातन धर्म है, जिसकी हम दिन-रात कसमें खाते हैं, वो कर्म पर टिका है। 

गीता में भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन से क्या कहा था? “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” मतलब साफ़ है, तेरा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है। फल की चिंता मत कर और बिना कर्म किए फल की उम्मीद तो बिल्कुल मत कर! 

हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसमें ‘अर्थ’ यानी पैसा कमाने की बात की गई है, लेकिन कैसे? धर्म और मेहनत के रास्ते पर चलकर। 

बिना पसीना बहाए, बिना कोई काम-धाम किए अगर राज्य आपको मुफ्त में पैसे दे रहा है, तो सनातन परंपरा के हिसाब से वो एक पाप है, वो आपके स्वाभिमान की मौत है।

ज़रा आचार्य चाणक्य को याद कर लीजिए। चाणक्य नीति कोई हवा-हवाई बात नहीं थी। उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ में साफ-साफ लिखा है की “कोशमूलं दण्डः”। यानी किसी भी देश की ताक़त, उसकी सेना, उसकी सत्ता सब कुछ उसके ‘राजकोष’ (खज़ाने) पर टिकी होती है। 

चाणक्य का मानना था की जो पैसा प्रजा से टैक्स के रूप में लिया जाता है, वो राजा के बाप का पैसा नहीं है जिसे वो अपनी कुर्सी बचाने के लिए लुटा दे! उस पैसे से सड़कें बननी चाहिए, किले बनने चाहिए, सेना को मज़बूत किया जाना चाहिए। अगर कोई शासक राजकोष को मुफ्तखोरी में उड़ा रहा है, तो चाणक्य की नज़र में वो सीधा-सीधा ‘राष्ट्रद्रोह’ है। 

लेकिन आज क्या हो रहा है? ये जो Freebies संस्कृति है न, ये एक बहुत बड़ी साज़िश है। ये एक स्वाभिमानी और मेहनती हिंदू समाज को भिखारी बनाने का वामपंथी एजेंडा है। ताकि आप कभी सरकार से नौकरी मत मांगो, अच्छे स्कूल मत मांगो, तगड़े अस्पताल मत मांगो। 

बस महीने की पहली तारीख को हज़ार-दो-हज़ार रुपये आपके अकाउंट में आ जाएं, और आप उसी में खुश होकर इनके चरणों में पड़े रहो। 

‘गरीबी हटाओ’ के वामपंथी पाखंड से जन्मा Freebies का वो ज़हरीला मॉडल जिसने देश को भिखारी बना दिया

अब ज़रा पीछे मुड़कर देखते हैं की ये पूरी बीमारी शुरू कहाँ से हुई। आज जो कुछ भी हम देख रहे हैं, इसकी जड़ें कांग्रेस की उसी पुरानी वामपंथी राजनीति में दबी हैं। आज़ादी के बाद दशकों तक देश में ऐसी नीतियां थोपी गईं जिन्होंने पैसा कमाने को तो जैसे कोई बहुत बड़ा गुनाह ही बना दिया हो। 

इंदिरा गांधी का वो नारा याद है? “गरीबी हटाओ!” अरे भाई, गरीबी तो हटी नहीं, उलटा लोगों को और गरीब बनाकर सरकारी राशन पर आश्रित ज़रूर कर दिया। ’20-सूत्री कार्यक्रम’ के नाम पर एक ऐसा लोकलुभावन एजेंडा चलाया गया जहाँ गरीबों को फ्री ज़मीन के पट्टे और सब्सिडी वाला राशन बांटकर परमानेंट वोट बैंक बनाने की साज़िश रची गई।

और वो 80 के दशक वाले ‘लोन मेले’ याद हैं? इंदिरा गांधी की सरकार ने चुनाव जीतने के लिए बैंकों का ऐसा चीरहरण किया की पूछो मत! जनार्दन पुजारी जैसे नेताओं ने खुलेआम सरकारी बैंकों पर दबाव डाला और बिना किसी सिक्योरिटी या गारंटी के लोगों को धड़ल्ले से कैश बांटा।

ये कोई बिज़नेस खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि सीधे-सीधे वोटरों को दी जाने वाली राजनीतिक रिश्वत थी, जिसे बाद में ‘कर्ज़ माफ़ी’  के नाम पर राइट-ऑफ कर दिया गया।

अब अगर आपको लगता है की कांग्रेस ने अपनी पुरानी गलतियों से कुछ सीखा है, तो आप मुगालते में हैं! इन्होंने तो अब इस मुफ्तखोरी को पूरा ‘गारंटी मॉडल’ ही बना दिया है। कर्नाटक और तेलंगाना का हाल देखिए। कर्नाटक चुनाव में जीतने के लिए कांग्रेस ने ‘5 गारंटी’ का ऐसा लॉलीपॉप थमाया की आज पूरे राज्य का दिवाला निकल चुका है।

ज़रा इनके नाम और काम सुनिए- ‘गृह ज्योति’ के नाम पर 200 यूनिट फ्री बिजली, ‘गृह लक्ष्मी’ के तहत घर की महिला मुखिया को हर महीने 2000 रुपये, ‘शक्ति’ योजना में महिलाओं को फ्री बस सफर, ‘अन्न भाग्य’ में 10 किलो फ्री चावल और ‘युवा निधि’ के नाम पर ग्रेजुएट्स को 3000 रुपये का बेरोज़गारी भत्ता! 

अरे पैसा-वैसा आसमान से बरसेगा क्या? खुद कर्नाटक सरकार के आंकड़े बता रहे हैं की सिर्फ इन 5 गारंटियों को पूरा करने के लिए हर साल 50,000 से 60,000 करोड़ रुपये फूंके जा रहे हैं! राज्य के पास नया इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने या गड्ढे भरने तक के लिए पैसा नहीं बचा है।

फिर जैसे-जैसे राजनीति का स्तर गिरा, क्षेत्रीय पार्टियों ने इस मुफ्तखोरी को एक तगड़ा हथियार बना लिया। इस बीमारी का सबसे वीभत्स रूप देखने को मिला साउथ में, ख़ासकर तमिलनाडु में। वहां डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) के बीच जो कलर टीवी, मिक्सी, पंखे बांटने की होड़ मची, उसने पूरे देश की राजनीति का कचरा कर दिया। 

इन पार्टियों को समझ में आ गया था की लोगों को जातियों में तो हम बांट ही रहे हैं, अगर साथ में थोड़ा मुफ्त का लालच दे दें, तो वोट बैंक एकदम पक्का हो जाएगा।

पर इस पूरी वामपंथी विषबेल को सबसे तगड़ा पानी अगर किसी ने दिया, तो वो थे हमारे ‘क्रांतिकारी’ अरविंद केजरीवाल। अरविंद आंदोलन से निकले और सीधे दिल्ली-पंजाब में ‘मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली’, महिलाओं के लिए फ्री बस यात्रा का ऐसा ज़हरीला मॉडल सेट कर दिया की आज पूरा देश भुगत रहा है। 

दिल्ली वालों को फ्री का ऐसा चस्का लगा की उन्हें इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता की शहर का पॉल्यूशन जान ले रहा है, या यमुना नाला बन चुकी है। उन्हें बस अपने ज़ीरो के बिजली बिल से मतलब है। इसी राह पर बंगाल में ममता दीदी चल पड़ीं। ‘लक्ष्मी भंडार’ के नाम पर महिलाओं को हर महीने हज़ार-बारह सौ रुपये थमा दिए। 

आज बंगाल का क्या हाल है? इंडस्ट्री के नाम पर वहां सिर्फ बम बनाने की फैक्ट्रियां बची हैं! युवा रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों में धक्के खा रहे हैं, घुसपैठियों ने डेमोग्राफी की धज्जियां उड़ा दी हैं, पर लोगों को क्या मतलब? उनके बैंक अकाउंट में तो पैसे आ रहे हैं ना! इस वामपंथी मॉडल ने देश के हर असली मुद्दे का ही गला घोंट दिया।

सत्ता के लालच में जब हमारे अपने ही राष्ट्रवादी नेताओं ने Freebies का वामपंथी चोला ओढ़ लिया

खैर, कांग्रेस, आप या टीएमसी से तो हमें कभी कोई खास उम्मीद थी भी नहीं। कड़वा है, पर सच यही है की सबसे ज़्यादा तकलीफ तब होती है जब अपने ही धोखा देते हैं। हम जैसे करोड़ों राष्ट्रवादी लोगों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को वोट क्यों दिया था? इसलिए दिया था न की वो इस वामपंथी और तुष्टिकरण के कचरे को साफ करेंगे। 

प्रधानमंत्री मोदी जी ने खुद एक-दो साल पहले ही ‘रेवड़ी कल्चर’ की जमकर बखिया उधेड़ी थी। हम सबने ताली बजाई थी की चलो, कोई तो है जो कड़वा सच बोलने की हिम्मत रखता है।

लेकिन हकीकत क्या है आज? चुनाव दर चुनाव हारने का जो डर है न, उसने हमारे इन राष्ट्रवादी नेताओं को भी उसी वामपंथी दलदल में घसीट लिया। अब बीजेपी खुद वही कर रही है जो केजरीवाल या ममता कर रहे हैं! 

मध्य प्रदेश का ही किस्सा ले लो। 

2023 के चुनाव में जब लगा की यार सत्ता तो हाथ से निकल रही है, तो रातों-रात ‘लाडली बहना योजना’ ले आए। हर महीने सवा हज़ार रुपये बांटने शुरू कर दिए। चुनाव तो भारी बहुमत से जीत गए, पर एमपी का खज़ाना आज पूरी तरह से खाली पड़ा है। 

अब ये बीमारी महाराष्ट्र पहुँच गई। वहां बीजेपी ने चुनाव से ऐन पहले ‘माझी लड़की बहिन योजना’ लागू कर दी और 1500 रुपये बांटने लग गए। हद तो तब हो गई जब 2025-2026 के चुनावों (दिल्ली और बंगाल) के लिए तो जैसे मंडियों वाली बोली लगनी शुरू हो गई। 

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के फ्री बिजली, पानी और महिलाओं को 2100 रूपए प्रति माह को चुनौती देकर भाजपा ने 2500 रूपए प्रति माह देने का वादा कर दिया, ऊपर से बिजली-पानी भी मुफ्त।

टीएमसी के लक्ष्मी भंडार को मात देने के लिए बीजेपी ने बोल दिया की हम महिलाओं को 3000 रुपये देंगे और बेरोज़गारों को भी भत्ता देंगे! मतलब, तुम भी उसी लाइन में लग गए? 

ज़रा यूपी का ही हाल देख लीजिए। वहां भी ‘रानी लक्ष्मीबाई योजना’ के नाम पर कॉलेज जाने वाली छात्राओं को फ्री स्कूटी बांटी जा रही है। 

युवाओं को लाखों फ्री लैपटॉप और स्मार्टफोन/टैबलेट बांटे जा रहे हैं, और तो और 60 साल से ऊपर की महिलाओं के लिए बसों में फ्री सफर की गारंटी भी दे दी गई। 

मतलब चल क्या रहा है? अरे स्कूटी और लैपटॉप बांटने का काम सरकार का कब से हो गया? क्या सरकार अब मोबाइल और गाड़ियों का शोरूम खोलेगी?

वो मिडिल क्लास, जो महीने के 30 दिन कोल्हू के बैल की तरह पिसता है ताकि अपने बच्चे की फीस भर सके, आज वो ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जो पैसा एम्स (AIIMS) बनाने में या आईआईटी (IIT) खोलने में लगना चाहिए था, वो पैसा आप चुनाव जीतने के लिए लोगों के बैंक अकाउंट में ‘रिश्वत’ की तरह डाल रहे हो।

Freebies की इस अंधी दौड़ से हमारी अर्थव्यवस्था का निकल रहा है दिवाला

अगर आपको लगता है की मैं कुछ ज़्यादा ही बोल रहा हूँ, तो ज़रा आंकड़े उठाकर देख लीजिए। दिमाग सुन्न हो जाएगा आपका! जनवरी 2026 में जो ‘इकॉनोमिक सर्वे’ आया, और रिज़र्व बैंक (RBI) ने जो रिपोर्ट दी है, वो चीख-चीख कर कह रही है की हम बर्बादी की तरफ बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं। 

सर्वे के हिसाब से, ये जो बिना किसी शर्त के नकद पैसा बांटा जा रहा है (Unconditional Cash Transfers), इसका बोझ जानलेवा हो चुका है। 

पता है राज्य सरकारें इस साल इन फ्री-फ्री वाली योजनाओं पर कितना पैसा फूंक रही हैं? लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये! समझ रहे हो इसका मतलब? इतने पैसे में भारत में दर्जनों नए अस्पताल बन सकते थे, हज़ारों किलोमीटर के शानदार एक्सप्रेसवे बन सकते थे। 

राज्यों के कर्ज़ का हाल तो और भी बुरा है। फ्री बिजली और नकदी के चक्कर में पंजाब का कर्ज़ उसके जीडीपी (GSDP) का लगभग 46% हो गया है! हिमाचल 44% पर लटका है। बंगाल तो वैसे भी कटोरा लेकर खड़ा है। 

अर्थशास्त्र का एक बड़ा सीधा सा उसूल है, जो किसी भी किराने की दुकान वाले को भी पता होता है- अगर आपकी कमाई 100 रुपये है, और आप 120 रुपये सिर्फ खैरात और पेंशन में लुटा रहे हो, तो आप अपनी दुकान (यानी देश) का विकास कैसे करोगे? 

जब सरकार अपना सारा पैसा इन रेवड़ियों में उड़ा देती है, तो उसके पास पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) के लिए कुछ बचता ही नहीं है। 

अब ये पूंजीगत व्यय क्या बला है? अरे भाई, इसी से तो नए हाईवे बनते हैं, नए स्कूल-अस्पताल बनते हैं, नई फैक्ट्रियां लगती हैं जिससे युवाओं को नौकरी मिलती है। 

जब एक राज्य सरकार 10,000 करोड़ रुपये सिर्फ लोगों के अकाउंट में डाल देती है, तो इसका सीधा सा मतलब ये है की उस राज्य के बच्चों को 10,000 करोड़ के नए स्कूल या कॉलेज कभी नहीं मिलेंगे। 

हम आज के वोटरों को रिश्वत देने के चक्कर में अपने ही बच्चों का भविष्य बेच रहे हैं। कल को जब विदेशी इन्वेस्टर देखेंगे की भारत के राज्य तो अंदर से खोखले हो चुके हैं, तो वो यहाँ फैक्ट्री क्यों लगाएंगे? पूरा सिस्टम कोलैप्स हो जाएगा!

देश के युवाओं को निकम्मा बनाते Freebies कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट की वो कड़क फटकार

इस Freebies कल्चर का एक और साइड-इफ़ेक्ट है जो सीधा हमारी रगों में ज़हर घोल रहा है। हम दिन-रात सीना ठोकते हैं न की “भारत दुनिया का सबसे युवा देश है… हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंड (Demographic Dividend) बहुत तगड़ा है।” 

अरे खाक तगड़ा है! युवाओं को तो हमने काम-चोर बना दिया है। जब एक जवान लड़के को पता हो की घर में मुफ्त का चावल आ ही रहा है, माँ-बहन के अकाउंट में खटाखट पैसे आ ही रहे हैं, बस का किराया देना नहीं है और बिजली-पानी फ्री है… तो वो लड़का धूप में निकलकर 10 घंटे की दिहाड़ी या मेहनत क्यों करेगा? 

ये फ्री की आदत हमारे युवाओं को नकारा, आलसी और बिना एम्बिशन का बना रही है।

अभी हाल ही में, 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट तक को इस पर बोलना पड़ गया। तमिलनाडु वाले तो खैर अलग ही लेवल पर खेल रहे थे, बिना आय देखे सबको फ्री बिजली बांटने चले थे। तब चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की बेंच ने जो कड़क फटकार लगाई, वो सुनने लायक थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने सीधे-सीधे पूछ लिया, “अगर राज्य सरकारें सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, मुफ्त साइकिल और मुफ्त बिजली बांटेगी, तो फिर काम कौन करेगा भाई? हमारे देश की कार्य संस्कृति (Work Culture) का क्या होगा?” 

सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल सही नस पकड़ी। उन्होंने साफ़ कह दिया की ये कोई गरीबों का उत्थान नहीं है, ये सिर्फ और सिर्फ तुष्टिकरण है। इतिहास गवाह है, जिस भी देश ने मेहनत की जगह खैरात को अपना भगवान मान लिया, वो देश सड़क पर आ गया। 

वेनेजुएला का हाल देखा है? 2000 के दशक में तेल बेच-बेच कर खूब रईस बन रहे थे। वहां के वामपंथी नेताओं ने भी यही नाटक किया- मुफ्त घर, मुफ्त खाना, मुफ्त पेट्रोल। 

आज क्या हालत है? इकॉनमी पूरी तरह से तबाह है, महंगाई इतने लाख प्रतिशत बढ़ गई है की वहां के लोग आज कचरे के डिब्बे में रोटी ढूंढ रहे हैं। श्रीलंका का हाल तो हमने अभी परसों ही अपनी आँखों के सामने देखा है। अगर हम नहीं सुधरे, तो वो दिन दूर नहीं जब इंडिया का हाल भी वही होगा।

क्या सरकार मदद ना करे? असली कल्याणकारी राज्य और मुफ्तखोरी के बीच का फर्क

अब यहाँ कुछ लेफ्टिस्ट और सोशलिज़्म का ज्ञान झाड़ने वाले लोग एक कुतर्क लेकर आएंगे। कहेंगे की “तो क्या सरकार गरीबों की मदद ना करे? हमारा देश एक वेलफेयर स्टेट (Welfare State) है, ये हमारा फर्ज़ है।” 

अरे भाई, किसने कहा की मदद मत करो? एक कट्टर देशभक्त भी यही चाहता है की समाज के सबसे निचले तबके का इंसान ऊपर उठे। लेकिन मदद करने और खैरात बांटने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। एक ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) आपको सशक्त बनाता है, जबकि ये ‘Freebies संस्कृति’ आपको अपाहिज और मोहताज बनाती है। 

अगर सरकार किसी गरीब बच्चे को शानदार स्कूलों में वर्ल्ड-क्लास एजुकेशन फ्री में दे रही है, तो वो बहुत बढ़िया बात है! अगर सरकार गरीब के इलाज के लिए ‘आयुष्मान भारत’ जैसी योजना चला रही है, तो हम उसका स्वागत करते हैं। 

अगर सूखा पड़ने पर या बाढ़ आने पर किसानों को राहत पैकेज मिलता है, तो वो सरकार का फर्ज़ है। लेकिन इसे कहते हैं ‘इम्पावरमेंट’ (Empowerment)। 

अरे वो पुरानी कहावत सुनी है न- किसी भूखे को रोज़ पकी-पकाई मछली खिलाने से अच्छा है की उसे मछली पकड़ना सिखा दो। मुफ्तखोरी आपको बस पकी हुई मछली देती है ताकि आप रोज़ उस नेता के दरवाज़े पर कटोरा लेकर खड़े रहो। 

टैक्सपेयर्स अब जाग जाओ वरना Freebies का ये दीमक कल रोने के लिए आंसू भी नहीं छोड़ेगा

तो अब सवाल ये है की इस पूरी बर्बादी का हल क्या है? सबसे पहले तो हमारे चुनाव आयोग (ECI) और न्यायपालिका को नींद से जागना होगा। 

ये जो राजनीतिक पार्टियां चुनाव से ठीक पहले अपने मैनिफेस्टो (घोषणापत्र) में ये जो चाँद-तारे तोड़ कर लाने और खजाना लुटाने के वादे करती हैं न, इस पर सख्त लीगल बैन लगना चाहिए। 

अगर कोई नेता कहता है की वो हर घर को 3000 रुपये देगा, तो चुनाव आयोग को उसका कॉलर पकड़ कर पूछना चाहिए- “पैसे तेरे बाप के घर से आएंगे क्या? ये बता की इसके लिए बजट कहाँ से काटेगा? एजुकेशन का बजट कम करेगा या मिडिल क्लास पर नया सेस (Cess) लगाएगा?” 

लेकिन असली ज़िम्मेदारी तो हमारे राइट विंग और राष्ट्रवादी नेतृत्व की बनती है। बीजेपी और पूरे संघ परिवार को आज बैठकर तगड़ा आत्ममंथन करने की ज़रूरत है। चुनाव जीतने की इस अंधी रेस में क्या आप भी उसी वामपंथी अर्थशास्त्र के गुलाम बनते जा रहे हैं, जिसे खत्म करने का सपना लेकर आप सत्ता में आए थे? 

राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ स्टेज पर खड़े हो कर ‘जय श्री राम’ बोलना ही नहीं होता। एक तगड़ी इकॉनमी, एक कड़क और अनुशासित वर्क-कल्चर, और राजकोष का सम्मान करना भी राष्ट्रवाद के ही अहम खंभे हैं। 

हमारे देश का असली उत्थान खैरात पर पलने से नहीं होगा। स्वामी विवेकानंद से लेकर आचार्य चाणक्य तक, सबने एक ऐसे शक्तिशाली और आत्मनिर्भर भारत का सपना देखा था, जहाँ लोग अपनी मेहनत और पसीने से अपना नसीब खुद लिखते हों, ना कि फ्री की रेवड़ियों के लालच में किसी सरकारी दफ्तर के बाहर लाइन में खड़े हों।

आज वक़्त आ गया है की देश का करदाता, युवा और हर एक सच्चा राष्ट्रभक्त अपनी आवाज़ उठाए। हमें नेताओं से उनके मुफ्त के भत्ते, मुफ्त की बस यात्रा और फ्री की बिजली नहीं चाहिए। हमें चाहिए तो बस वर्ल्ड-क्लास रोड, धाकड़ यूनिवर्सिटीज़, साफ-सुथरे अस्पताल, और इज़्ज़त की नौकरियाँ। 

जिस दिन इस देश की मेजॉरिटी जनता इन नेताओं की ‘फ्री-फ्री’ वाली रिश्वत को उनके मुंह पर दे मारेगी और कहेगी की “हमें खैरात नहीं, विकास चाहिए”, बस उसी दिन हमारे भारत का असली ‘परम-वैभव’ शुरू होगा। 

अगर आज भी नहीं जागे, तो कल रोने के लिए आंसू भी नहीं बचेंगे। 

भारत माता की जय! वन्दे मातरम्!

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