5 जनवरी: क्रांतिकारी बारीन्द्र कुमार घोष — यातनाओं से नहीं टूटा साहस, अंडमान की जेल में भी गूंजा ‘वंदे मातरम्’

भारत की आज़ादी की कहानी जितनी गौरवशाली है, उतनी ही अधूरी भी। अधूरी इसलिए, क्योंकि आज़ादी के संघर्ष में जिन असली क्रांतिकारियों ने अपना पूरा जीवन, सुख-चैन और भविष्य दांव पर लगा दिया, वे इतिहास के हाशिए पर चले गए। 5 जनवरी ऐसी ही एक तारीख़ है, जो हमें बारीन्द्र कुमार घोष की याद दिलाती है—एक ऐसा नाम, जिसे अंग्रेज़ सरकार बेहद ख़तरनाक मानती थी, लेकिन आज़ाद भारत में जिसकी चर्चा बेहद सीमित रह गई।

बारीन्द्र कुमार घोष उन क्रांतिकारियों में थे, जिनके लिए आज़ादी कोई नारा नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य थी। अंडमान की कुख्यात जेल में दस वर्षों तक असहनीय यातनाएं झेलने के बावजूद उनका साहस नहीं डगमगाया। हर दर्द, हर अपमान और हर अत्याचार के बाद उनके मुंह से सिर्फ़ एक ही शब्द निकलता था—“वंदे मातरम्”।


एक जागरूक परिवार में जन्म

बारीन्द्र कुमार घोष का जन्म 5 जनवरी 1880 को हुआ। उनके पिता कृष्णनाधन घोष अपने समय के जाने-माने चिकित्सक और ज़िला सर्जन थे। माता स्वर्णलता देवी सामाजिक चेतना से जुड़ी महिला थीं और सुधारवादी विचारधारा रखती थीं। परिवार का माहौल पढ़ा-लिखा, राष्ट्रवादी और विचारशील था।

उनके बड़े भाई अरविन्द घोष पहले क्रांतिकारी राजनीति से जुड़े और बाद में अध्यात्म की ओर मुड़ गए। दूसरे भाई मनमोहन घोष अंग्रेज़ी साहित्य के विद्वान और विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बने। ऐसे परिवार में पले-बढ़े बारीन्द्र के भीतर देश के लिए कुछ बड़ा करने की भावना बचपन से ही गहरी थी।


शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण

बारीन्द्र कुमार घोष की प्रारंभिक शिक्षा देवघर में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने पटना कॉलेज में दाख़िला लिया। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने महसूस किया कि अंग्रेज़ी शासन केवल प्रशासनिक सत्ता नहीं, बल्कि भारत की आत्मा पर कब्ज़ा है।

बड़ौदा में उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया, जहां अनुशासन, शारीरिक क्षमता और रणनीति की समझ विकसित हुई। यह प्रशिक्षण उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना। यहीं से उनका झुकाव पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन की ओर हो गया।


क्रांतिकारी विचारों की ओर झुकाव

उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन चुका था। विदेशी शासन के ख़िलाफ़ युवाओं में गुस्सा और असंतोष तेज़ी से बढ़ रहा था। बारीन्द्र कुमार घोष भी इस माहौल से अछूते नहीं रहे।

अपने बड़े भाई अरविन्द घोष और अन्य राष्ट्रवादी विचारकों से प्रेरित होकर उन्होंने यह मान लिया कि केवल याचिकाओं और सभाओं से आज़ादी नहीं मिलेगी। इसके लिए संगठित, अनुशासित और साहसी संघर्ष की ज़रूरत है।


‘युगान्तर’ और क्रांतिकारी पत्रकारिता

देश में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए बारीन्द्र कुमार घोष ने 1906 में साप्ताहिक अख़बार युगान्तर की शुरुआत की। यह अख़बार सिर्फ़ समाचार नहीं देता था, बल्कि अंग्रेज़ी शासन की नीतियों पर खुलकर प्रहार करता था।

युगान्तर के लेखों ने बंगाल के युवाओं को झकझोर दिया। इसमें स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और सशस्त्र प्रतिरोध की बात साफ़-साफ़ कही जाती थी। अंग्रेज़ सरकार की नज़र में यह अख़बार बेहद ख़तरनाक बन गया।


जुगंतार संगठन और गुप्त गतिविधियां

युगान्तर अख़बार के साथ-साथ बारीन्द्र कुमार घोष ने क्रांतिकारी संगठन जुगंतार को मज़बूत किया। यह संगठन बंगाल में सक्रिय सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी समूहों में से एक था।

कोलकाता के मणिकतल्ला इलाके में एक गुप्त ठिकाना बनाया गया, जहां युवाओं को बम बनाने, हथियार चलाने और गुप्त गतिविधियों की ट्रेनिंग दी जाती थी। साधन सीमित थे, लेकिन हौसले असीम। स्कूल और कॉलेज के छात्र बड़ी संख्या में इस आंदोलन से जुड़ रहे थे।


अंग्रेज़ सरकार की सख़्ती और गिरफ़्तारी

जैसे-जैसे क्रांतिकारी गतिविधियां बढ़ीं, अंग्रेज़ सरकार की चिंता भी बढ़ती गई। 1908 में सरकार ने बड़ा अभियान चलाया। मणिकतल्ला मामले में बारीन्द्र कुमार घोष को गिरफ़्तार कर लिया गया।

उन पर राजद्रोह, हिंसा और अंग्रेज़ अधिकारियों के ख़िलाफ़ साज़िश रचने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। मुक़दमा चला और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। हालांकि बाद में यह सज़ा आजीवन कारावास में बदल दी गई, लेकिन इसके साथ ही उन्हें सबसे कठोर दंड दिया गया—कालापानी।


अंडमान की जेल: यातनाओं का दूसरा नाम

बारीन्द्र कुमार घोष को अंडमान सेल्युलर जेल भेजा गया। यह जेल ब्रिटिश शासन की क्रूरता का प्रतीक थी। यहां कैदियों को इंसान नहीं, अपराधी भी नहीं, बल्कि गुलाम से भी बदतर समझा जाता था।

तेज़ धूप में कोल्हू चलवाना, ज़ंजीरों में जकड़कर कठोर श्रम, एकांत कारावास, कम भोजन और मानसिक यातनाएं—यह सब रोज़मर्रा की ज़िंदगी थी। कई कैदी इन यातनाओं को सहन नहीं कर पाए और टूट गए, लेकिन बारीन्द्र कुमार घोष अडिग रहे।


‘वंदे मातरम्’ बना प्रतिरोध का स्वर

कहा जाता है कि हर यातना के बाद बारीन्द्र कुमार घोष के होंठों से “वंदे मातरम्” निकलता था। यह सिर्फ़ एक नारा नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ी सत्ता के लिए खुली चुनौती थी। जेल अधिकारियों ने उन्हें तोड़ने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वे असफल रहे।

दस वर्षों तक उन्होंने कालापानी की यातनाएं सहीं, लेकिन न तो अपने विचार छोड़े और न ही देशभक्ति की भावना कम होने दी।


रिहाई के बाद का जीवन

लंबे कारावास के बाद रिहा होकर बारीन्द्र कुमार घोष ने हथियारों की जगह कलम को चुना। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को जागरूक करने का काम जारी रखा। उनका मानना था कि आज़ादी की लड़ाई केवल मैदान में नहीं, बल्कि सोच और विचारों में भी लड़ी जाती है।

हालांकि स्वतंत्रता के बाद भी उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हक़दार थे। वे आज़ादी के बाद लगभग आठ वर्षों तक जीवित रहे, लेकिन सत्ता और लोकप्रियता की राजनीति में उनका नाम लगभग भुला दिया गया।


इतिहास से पूछा जाने वाला सवाल

आज सवाल उठता है कि क्या हमने अपने असली नायकों को पहचानने में चूक की? क्यों बारीन्द्र कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारी इतिहास के पन्नों में सीमित कर दिए गए, जबकि सत्ता की राजनीति करने वाले चेहरे आज़ादी के बाद भी केंद्र में रहे?

यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि पूरे क्रांतिकारी आंदोलन के साथ हुआ अन्याय है।


स्मरण, सम्मान और ज़िम्मेदारी

5 जनवरी हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की कीमत कितनी बड़ी थी। बारीन्द्र कुमार घोष जैसे क्रांतिकारियों ने बिना किसी पद, सत्ता या प्रसिद्धि की चाह के देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया।

आज ज़रूरत है कि उनकी कहानियां नई पीढ़ी तक पहुंचें—सरल भाषा में, सच्चे संदर्भ के साथ। ताकि आने वाले समय में भारत की आज़ादी की कहानी केवल कुछ नामों तक सीमित न रहे, बल्कि उन सभी वीरों को उनका हक़ मिले, जिनकी बदौलत यह देश स्वतंत्र हुआ।

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