भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कहानी केवल 1857 से शुरू नहीं होती। उससे बहुत पहले भी इस धरती पर ऐसे साहसी योद्धा और वीरांगनाएँ हुईं जिन्होंने विदेशी सत्ता के सामने झुकने से इंकार कर दिया था। दक्षिण भारत की धरती पर जन्मी रानी चेन्नम्मा ऐसी ही एक महान वीरांगना थीं। उन्होंने उस समय अंग्रेजों को चुनौती दी, जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी धीरे-धीरे भारत के छोटे-छोटे राज्यों को अपने अधीन कर रही थी।
रानी चेन्नम्मा का नाम आज भी साहस, स्वाभिमान और नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। वे केवल कित्तूर की रानी नहीं थीं, बल्कि वे स्वतंत्रता की पहली मशाल जलाने वाली महिलाओं में से एक थीं। उनका जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन हर संघर्ष ने उन्हें और मजबूत बनाया। उन्होंने दिखाया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो छोटा सा राज्य भी बड़ी साम्राज्यवादी ताकत को चुनौती दे सकता है।
बचपन से ही वीरता की झलक
रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1778 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे असाधारण साहस और आत्मविश्वास से भरी हुई थीं। उस समय लड़कियों को घर तक सीमित रखने की परंपरा थी, लेकिन चेन्नम्मा ने इन सीमाओं को तोड़ा।
उन्होंने घुड़सवारी सीखी, तलवारबाजी का अभ्यास किया और धनुर्विद्या में भी दक्षता हासिल की। उनके परिवार ने उनके साहस को पहचाना और उन्हें वह शिक्षा दी, जो आमतौर पर राजकुमारों को दी जाती थी। यही प्रशिक्षण आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा आधार बना।
बचपन में ही उन्होंने अन्याय के खिलाफ खड़े होने की आदत डाल ली थी। वे स्वाभिमानी थीं और किसी भी प्रकार के अपमान को सहन नहीं करती थीं। यही गुण आगे चलकर उनके संघर्ष की नींव बना।
विवाह और कित्तूर की रानी बनना
चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसरजा से हुआ। विवाह के बाद वे कित्तूर की रानी बनीं। कित्तूर उस समय एक छोटा लेकिन समृद्ध राज्य था। यहाँ की जनता मेहनती और सरल स्वभाव की थी।
रानी ने केवल महल तक खुद को सीमित नहीं रखा। वे जनता के बीच जातीं, उनकी समस्याएँ सुनतीं और समाधान निकालने का प्रयास करतीं। उनकी यही संवेदनशीलता उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाती थी।
राजा मल्लसरजा के निधन के बाद राज्य की जिम्मेदारी रानी के कंधों पर आ गई। यह समय उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था, क्योंकि अंग्रेजों की नजर छोटे राज्यों पर थी और वे किसी भी बहाने से उन्हें अपने अधीन करना चाहते थे।
‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ और अंग्रेजों की चाल
अंग्रेजों ने एक नीति बनाई थी जिसे ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ कहा जाता था। इस नीति के अनुसार यदि किसी राजा की मृत्यु बिना जैविक उत्तराधिकारी के हो जाती थी, तो उसका राज्य अंग्रेजों के अधीन कर लिया जाता था।
रानी चेन्नम्मा ने एक पुत्र को गोद लिया था, ताकि राज्य का उत्तराधिकारी तय हो सके। लेकिन अंग्रेजों ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि गोद लिया गया पुत्र मान्य नहीं है और कित्तूर को कंपनी शासन के अधीन आना होगा।
रानी ने इसे अन्यायपूर्ण बताया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह उनके राज्य के सम्मान और स्वतंत्रता के खिलाफ है। उन्होंने अंग्रेजों के सामने झुकने से इंकार कर दिया। यही निर्णय आगे चलकर युद्ध का कारण बना।
1824 का ऐतिहासिक युद्ध
1824 में अंग्रेजों ने कित्तूर पर हमला कर दिया। यह युद्ध केवल भूमि के लिए नहीं था, बल्कि स्वाभिमान के लिए था। रानी चेन्नम्मा ने अपनी सेना को संगठित किया और स्वयं युद्धभूमि में उतरीं।
उन्होंने घोड़े पर सवार होकर तलवार उठाई और सैनिकों का नेतृत्व किया। उनके साहस ने सेना का मनोबल बढ़ा दिया। अंग्रेजों को उम्मीद नहीं थी कि एक महिला इस तरह युद्ध का नेतृत्व करेगी।
इस युद्ध में अंग्रेज अधिकारी सेंट जॉन थैकरे मारा गया। यह अंग्रेजों के लिए बड़ा झटका था। इस विजय ने पूरे क्षेत्र में यह संदेश दिया कि अंग्रेज अजेय नहीं हैं।
विश्वासघात और दूसरा संघर्ष
पहले युद्ध में मिली हार के बाद अंग्रेजों ने बड़ी सेना के साथ दोबारा हमला किया। इस बार उन्होंने रणनीति और संख्या दोनों में बढ़त बनाई। दुर्भाग्य से कुछ स्थानीय लोगों ने अंग्रेजों का साथ दिया।
विश्वासघात ने स्थिति को कठिन बना दिया। रानी की सेना ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन संसाधनों की कमी और आंतरिक धोखे के कारण अंततः अंग्रेजों ने कित्तूर पर कब्जा कर लिया।
रानी चेन्नम्मा को बंदी बना लिया गया। लेकिन उन्होंने अपने आत्मसम्मान को कभी नहीं खोया।
कैद का जीवन और अंतिम बलिदान
रानी को बेलहोंगल किले में कैद रखा गया। कैद के दौरान भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपने राज्य और जनता के लिए संघर्ष की भावना को जीवित रखा।
21 फरवरी 1829 को उन्होंने अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी शहादत ने स्वतंत्रता की लौ को और प्रज्वलित कर दिया।
वे भले ही शारीरिक रूप से हार गईं, लेकिन उनके साहस और संघर्ष की कहानी ने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।
1857 से पहले की स्वतंत्रता की चिंगारी
रानी चेन्नम्मा का विद्रोह 1824 में हुआ था, जो 1857 की क्रांति से कई वर्ष पहले था। इसलिए उन्हें भारत की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी भी कहा जाता है।
उनका संघर्ष यह दिखाता है कि भारत में स्वतंत्रता की चेतना बहुत पहले से मौजूद थी। वे केवल अपने राज्य के लिए नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ लड़ीं।
नारी शक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक
रानी चेन्नम्मा भारतीय नारी शक्ति का अद्भुत उदाहरण हैं। उन्होंने उस समय समाज की सीमाओं को तोड़ा, जब महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी।
उन्होंने यह साबित किया कि साहस और नेतृत्व लिंग पर निर्भर नहीं होते। उनका जीवन हर महिला के लिए प्रेरणा है।
आज का सम्मान और स्मृति
आज कर्नाटक में रानी चेन्नम्मा का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। कित्तूर में उनका स्मारक है और उनकी प्रतिमा लोगों को उनके साहस की याद दिलाती है।
हर वर्ष उनकी जयंती पर कार्यक्रम आयोजित होते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
अमर रहेगी उनकी गाथा
रानी चेन्नम्मा का जीवन संघर्ष, साहस और बलिदान की अद्भुत कहानी है। उन्होंने अंग्रेजों के सामने झुकने से इंकार कर दिया और अपने राज्य के सम्मान के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
उनकी गाथा हमें यह सिखाती है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना आवश्यक है। स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए संघर्ष ही सच्ची वीरता है।
