एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे में मशीन गन — परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की जन्मजयंती पर शत् शत् नमन

एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे में मशीन गन — परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की जन्मजयंती पर राष्ट्र का शत-शत नमन

भारत का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों की कहानी नहीं है, बल्कि वह उन बलिदानों से बना है, जिन्होंने इस राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखा और उसकी आत्मा को अडिग बनाए रखा। ऐसे ही अमर सपूतों में एक नाम है — मेजर सोमनाथ शर्मा। वे केवल भारतीय सेना के अधिकारी नहीं थे, बल्कि स्वतंत्र भारत के पहले युद्धनायक, पहले परमवीर चक्र विजेता और “कर्तव्य पहले” की जीवंत परिभाषा थे।

एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे हाथ में मशीन गन लेकर दुश्मन से भिड़ जाना किसी साधारण साहस की बात नहीं होती। यह उस मानसिक दृढ़ता, राष्ट्रनिष्ठा और आत्मबलिदान का प्रमाण है, जिसे शब्दों में बाँध पाना आसान नहीं। उनकी जन्मजयंती पर उन्हें नमन करना, दरअसल भारत की सैन्य चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान को नमन करना है।

सैन्य संस्कारों में पला एक राष्ट्रभक्त

मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को एक सैन्य परिवार में हुआ। उनके पिता स्वयं सेना में उच्च पद पर कार्यरत थे, जिससे अनुशासन, राष्ट्रप्रेम और कर्तव्यबोध उन्हें विरासत में मिला। उनके घर का वातावरण ऐसा था जहाँ देशसेवा को सर्वोच्च सम्मान माना जाता था।

बचपन से ही उनमें नेतृत्व की स्पष्ट झलक दिखाई देती थी। वे शांत स्वभाव के थे, लेकिन निर्णय लेने के समय अत्यंत दृढ़। विद्यालय और कॉलेज के दिनों में वे न केवल पढ़ाई में आगे थे, बल्कि खेल, अनुशासन और संगठनात्मक गतिविधियों में भी अग्रणी रहते थे। साथी छात्र उन्हें स्वाभाविक नेता के रूप में देखते थे।

भारतीय सैन्य अकादमी से रणभूमि तक

देशसेवा के संकल्प के साथ उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में प्रवेश लिया। यहाँ उनका व्यक्तित्व और निखरा। कठोर प्रशिक्षण, अनुशासन और युद्ध कौशल में वे हमेशा आगे रहे। 1942 में उन्हें सेना में कमीशन प्राप्त हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने विभिन्न सैन्य जिम्मेदारियाँ निभाईं। इन अनुभवों ने उन्हें केवल एक प्रशिक्षित अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक परिपक्व योद्धा बनाया। उनके अधीन कार्य करने वाले सैनिक उन्हें केवल आदेश देने वाला अफसर नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने वाला नेता मानते थे।

आज़ादी के बाद का संकट और कश्मीर की चुनौती

1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसी समय देश के सामने सबसे बड़ी परीक्षा खड़ी हो गई। विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमणकारियों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। उनका लक्ष्य स्पष्ट था — बलपूर्वक कश्मीर को भारत से अलग करना।

भारतीय सेना उस समय सीमित संसाधनों के साथ नवस्वतंत्र देश की रक्षा कर रही थी। हर मोर्चा चुनौतीपूर्ण था, लेकिन कश्मीर की स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील थी। ऐसे समय में मेजर सोमनाथ शर्मा की तैनाती श्रीनगर सेक्टर में की गई।

घायल शरीर, लेकिन अडिग कर्तव्य

कश्मीर भेजे जाने से कुछ समय पहले एक सैन्य अभ्यास के दौरान मेजर सोमनाथ शर्मा का हाथ गंभीर रूप से घायल हो गया। डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से उन्हें युद्ध क्षेत्र में न जाने की सलाह दी। उनका हाथ प्लास्टर में था और किसी भी दृष्टि से वे युद्ध के लिए फिट नहीं माने जा रहे थे।

लेकिन जब उन्होंने सुना कि उनकी यूनिट को कश्मीर भेजा जा रहा है, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे अपने जवानों को अकेला नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने मेडिकल सलाह को दरकिनार करते हुए स्वयं मोर्चे पर जाने का निर्णय लिया। यह निर्णय ही उन्हें साधारण अधिकारी से असाधारण योद्धा बनाता है।

बड़गाम: जहाँ इतिहास ने बलिदान को सलाम किया

27 अक्टूबर 1947 का दिन भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। श्रीनगर के पास बड़गाम क्षेत्र में भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी, भारी संख्या में आए पाकिस्तानी कबायली हमलावरों के सामने डटी हुई थी।

मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी कंपनी के साथ एक रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान की रक्षा कर रहे थे। दुश्मन संख्या में कई गुना अधिक था और आधुनिक हथियारों से लैस था। ऐसे समय में भी वे पीछे नहीं हटे।

एक हाथ प्लास्टर में होने के बावजूद उन्होंने मशीन गन संभाली और लगातार फायर करते रहे। वे स्वयं आगे रहकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे। गोलाबारी के बीच वे स्पष्ट और शांत स्वर में आदेश देते रहे — मानो यह युद्ध नहीं, बल्कि प्रशिक्षण अभ्यास हो।

“पीछे हटना विकल्प नहीं है”

जब गोला-बारूद कम होने लगा और दुश्मन और करीब आ गया, तब भी मेजर सोमनाथ शर्मा ने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने अपने जवानों से कहा कि श्रीनगर की रक्षा उनके हाथों में है और यदि यह मोर्चा गिरा, तो पूरा क्षेत्र खतरे में पड़ सकता है।

उनके शब्दों में भय नहीं, बल्कि आत्मविश्वास था। यही आत्मविश्वास उनके सैनिकों में भी उतर गया। वे जानते थे कि उनका कमांडर उनके साथ खड़ा है — घायल होकर भी, मुस्कान और दृढ़ता के साथ।

सर्वोच्च बलिदान और अमर गाथा

युद्ध के दौरान एक मोर्टार शेल उनके पास आकर फटा। इस विस्फोट में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। लेकिन तब तक वे अपना कर्तव्य निभा चुके थे। उनकी कंपनी ने दुश्मन को रोक दिया और श्रीनगर सुरक्षित रहा।

यदि उस दिन बड़गाम में दुश्मन को रोका न जाता, तो इतिहास की दिशा कुछ और हो सकती थी। इस दृष्टि से मेजर सोमनाथ शर्मा का बलिदान केवल एक सैन्य घटना नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता का आधार बना।

पहला परमवीर चक्र: वीरता की अमिट मुहर

उनके अद्वितीय साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे स्वतंत्र भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता बने।

यह सम्मान केवल एक पदक नहीं, बल्कि उस आदर्श का प्रतीक है, जिसे भारतीय सेना अपने हर सैनिक में देखना चाहती है — निडरता, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने का साहस।

भारतीय सेना की प्रेरणा स्रोत

आज भी भारतीय सेना में मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम आदर और गर्व के साथ लिया जाता है। सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों में उनकी कहानी नए कैडेट्स को सुनाई जाती है, ताकि वे समझ सकें कि वर्दी पहनने का अर्थ क्या होता है।

उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व आदेश देने से नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने से आता है।

राष्ट्रवादी चेतना में अमर नाम

मेजर सोमनाथ शर्मा केवल सैन्य इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना के प्रतीक हैं। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि यह देश किसी समझौते या दया से नहीं, बल्कि रक्त और त्याग से सुरक्षित है।

आज जब भारत अपनी सैन्य शक्ति और आत्मनिर्भरता को नई ऊँचाइयों पर ले जा रहा है, तब ऐसे नायकों की स्मृति और भी प्रासंगिक हो जाती है।

निष्कर्ष: घायल हाथ, अडिग भारत

मेजर सोमनाथ शर्मा का जीवन इस सत्य को सिद्ध करता है कि राष्ट्रभक्ति शब्दों से नहीं, कर्म से प्रमाणित होती है। एक हाथ में प्लास्टर और दूसरे में मशीन गन लेकर उन्होंने दिखा दिया कि जब कर्तव्य सर्वोपरि हो, तो शरीर की सीमाएँ अर्थहीन हो जाती हैं।

उनकी जन्मजयंती पर उन्हें नमन करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह संकल्प है कि भारत कभी झुकेगा नहीं, क्योंकि उसकी रक्षा ऐसे अमर सपूतों की विरासत से होती है।

भारत माता के इस वीर सपूत को शत-शत नमन।

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