भारत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल किसी एक कालखंड तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सदियों तक राष्ट्र की चेतना को दिशा देते हैं। ऐसे ही अमर योद्धा थे मेवाड़ के महाराणा सांगा, जिनका जीवन शौर्य, बलिदान, स्वाभिमान और धर्मरक्षा का जीवंत उदाहरण है। शरीर पर 80 से अधिक युद्ध-घाव, एक आँख, एक हाथ और एक पैर का अपंग होना—फिर भी रणभूमि में अडिग खड़े रहना—यह केवल एक राजा की कहानी नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उद्घोष है। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करना, वास्तव में उस विचार को नमन करना है जो कहता है—राष्ट्र और धर्म से बढ़कर कुछ नहीं।
मेवाड़ की भूमि और राणा सांगा का जन्म
राणा सांगा का जन्म 12 अप्रैल 1482 को सिसोदिया वंश में हुआ। उनका वास्तविक नाम संग्राम सिंह था, लेकिन इतिहास उन्हें “राणा सांगा” के नाम से जानता है। वे महाराणा रायमल के पुत्र थे। मेवाड़ उस समय केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की चेतना का केंद्र था। यही कारण था कि यहां जन्म लेने वाला हर शासक स्वयं को केवल राजा नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का प्रहरी मानता था।
बाल्यकाल से ही राणा सांगा में नेतृत्व, साहस और न्यायप्रियता के गुण स्पष्ट दिखने लगे थे। राजमहल के सुख-सुविधाओं से अधिक उन्हें शस्त्र-विद्या, युद्ध-कौशल और नीति-शास्त्र में रुचि थी। उनके गुरु और सेनापति जानते थे कि यह बालक एक दिन केवल मेवाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए ढाल बनेगा।
सत्ता संघर्ष और राणा सांगा का उदय
मेवाड़ की गद्दी तक पहुँचना राणा सांगा के लिए आसान नहीं था। आंतरिक सत्ता संघर्ष, षड्यंत्र और भाई-भतीजावाद के बीच उन्हें कई बार अपने ही लोगों से युद्ध करना पड़ा। इन्हीं संघर्षों में उनकी एक आँख चली गई। लेकिन यह नुकसान उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सका। अंततः 1508 ईस्वी में वे मेवाड़ के महाराणा बने।
सत्ता संभालते ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनका शासन केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा। उनका उद्देश्य था—विदेशी आक्रांताओं को रोकना, राजपूतों को संगठित करना और सनातन संस्कृति की रक्षा करना।
युद्धों से भरा जीवन: 80 घावों की गाथा
राणा सांगा का जीवन युद्धभूमि में ही तपकर निखरा। इतिहासकारों के अनुसार उनके शरीर पर 80 से अधिक गहरे घाव थे। किसी युद्ध में उनका हाथ कट गया, किसी में पैर बेकार हो गया, तो किसी में आँख चली गई। लेकिन हर घाव उनके लिए पदक जैसा था।
उन्होंने दिल्ली सल्तनत के शासकों, मालवा के सुल्तानों और आसपास के आक्रांताओं से लगातार युद्ध किए। इब्राहिम लोदी के विरुद्ध उनके युद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राणा सांगा ने केवल अपनी तलवार से नहीं, बल्कि रणनीति और संगठन से भी शत्रुओं को परास्त किया।
राजपूत एकता का स्वप्न
राणा सांगा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी—राजपूत एकता। उस समय राजपूत छोटे-छोटे राज्यों में बंटे हुए थे और आपसी संघर्षों में उलझे रहते थे। राणा सांगा ने यह समझा कि यदि आक्रांताओं का सामना करना है, तो राजपूतों को एक ध्वज के नीचे लाना होगा।
मेवाड़ के नेतृत्व में उन्होंने आमेर, मारवाड़, हाड़ौती, बुंदी और अन्य राजपूत रियासतों को एकजुट किया। यह भारत के मध्यकालीन इतिहास में एक दुर्लभ उदाहरण था, जब राजपूतों ने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रधर्म को प्राथमिकता दी।
खानवा का युद्ध: स्वाभिमान की अमर गाथा
1527 ईस्वी में लड़ा गया खानवा का युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। एक ओर बाबर था—तोपों और विदेशी सैन्य तकनीक से लैस—और दूसरी ओर राणा सांगा—राजपूत परंपरा, साहस और आत्मबल का प्रतीक।
युद्ध के प्रारंभिक चरण में राजपूत सेना ने बाबर की सेना को कड़ी टक्कर दी। बाबर स्वयं अपनी आत्मकथा में स्वीकार करता है कि वह इस युद्ध से भयभीत था। हालांकि अंततः तकनीकी और संगठनात्मक कारणों से युद्ध का परिणाम राणा सांगा के पक्ष में नहीं रहा, लेकिन यह युद्ध उनकी हार नहीं, बल्कि उनके अदम्य साहस की गवाही बन गया।
खानवा में घायल अवस्था में भी राणा सांगा मैदान छोड़ने को तैयार नहीं थे। उन्हें अचेत अवस्था में रणभूमि से हटाया गया। यह दृश्य ही उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए पर्याप्त है।
बाबर के विरुद्ध राष्ट्रधर्म का स्वर
राणा सांगा का संघर्ष किसी व्यक्तिगत सत्ता के लिए नहीं था। उनका उद्देश्य था—भारत को विदेशी इस्लामी आक्रांताओं के अधीन होने से बचाना। उन्होंने बाबर को एक विदेशी आक्रांता के रूप में देखा और उसके विरुद्ध राष्ट्रधर्म का बिगुल फूंका।
आज जब इतिहास को नए नजरिए से देखा जा रहा है, तब राणा सांगा का यह दृष्टिकोण और भी प्रासंगिक लगता है। वे उन शासकों में थे, जिन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की भूमि, संस्कृति और परंपरा किसी बाहरी ताकत की जागीर नहीं है।
अंतिम समय और रहस्यमयी मृत्यु
खानवा के बाद राणा सांगा पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो पाए, लेकिन उनका मन अभी भी युद्ध के लिए तैयार था। वे पुनः सेना संगठित कर बाबर से निर्णायक युद्ध की योजना बना रहे थे। लेकिन दुर्भाग्यवश 1528 ईस्वी में उनका देहांत हो गया।
कुछ इतिहासकार इसे स्वाभाविक मृत्यु मानते हैं, तो कुछ इसे षड्यंत्र का परिणाम बताते हैं। जो भी हो, उनका जाना मेवाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए एक अपूरणीय क्षति थी।
राणा सांगा और सनातन धर्म की रक्षा
राणा सांगा केवल एक योद्धा नहीं थे, वे सनातन धर्म के रक्षक थे। मंदिरों की रक्षा, हिंदू प्रजा का संरक्षण और धार्मिक स्वतंत्रता उनके शासन की प्राथमिकताएँ थीं। उन्होंने कभी धर्म के नाम पर समझौता नहीं किया।
आज जब इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास होते हैं, तब राणा सांगा जैसे नायकों को याद करना और उनके वास्तविक योगदान को सामने लाना अत्यंत आवश्यक है। वे उन शासकों में थे, जिन्होंने स्पष्ट रूप से कहा—धर्म और स्वाभिमान से बड़ा कोई समझौता नहीं।
आधुनिक भारत में राणा सांगा की प्रासंगिकता
आज के भारत में राणा सांगा केवल इतिहास की किताबों का विषय नहीं हैं। वे प्रेरणा हैं—उन युवाओं के लिए, जो अपने राष्ट्र और संस्कृति के लिए कुछ करना चाहते हैं। उनका जीवन सिखाता है कि संसाधनों की कमी, शारीरिक अक्षमता या विपरीत परिस्थितियाँ कभी भी संकल्प को कमजोर नहीं कर सकतीं।
जब राष्ट्रहित की बात आती है, तब व्यक्तिगत लाभ, सत्ता या सुविधा गौण हो जाती है—यह संदेश राणा सांगा के जीवन से स्पष्ट रूप से निकलता है।
इतिहास लेखन और राणा सांगा का अपमान
दुर्भाग्य से, लंबे समय तक इतिहास लेखन में राणा सांगा जैसे वीरों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। विदेशी आक्रांताओं को “महान” बताने वाली सोच ने हमारे असली नायकों को हाशिए पर डाल दिया।
लेकिन आज का भारत जाग रहा है। राणा सांगा, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज जैसे योद्धाओं को उनका सही सम्मान मिल रहा है। यह केवल इतिहास सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है।
80 घावों वाला अमर संकल्प
राणा सांगा का जीवन हमें सिखाता है कि शरीर पर लगे घाव मायने नहीं रखते, मायने रखता है मन का साहस। 80 घावों के बावजूद उनका स्वाभिमान अडिग रहा, उनकी तलवार झुकी नहीं और उनका संकल्प टूटा नहीं।
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह संकल्प लेना है कि हम भी अपने-अपने स्तर पर राष्ट्र, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए खड़े रहेंगे।
धर्मरक्षक, राष्ट्रनायक, राजपूत गौरव—राणा सांगा अमर हैं, और रहेंगे।
