भारत रत्न नाना जी देशमुख की जयंती हर देशभक्त के लिए गर्व का दिन है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को अर्पित किया और संघ संस्कार का अमर प्रतीक बने। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कदोली गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। वे एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने सादगी, समर्पण, और हिंदू संस्कृति की रक्षा को अपना जीवन मंत्र बनाया।
यह लेख उनके जीवन की यात्रा, उनके संघर्ष, और राष्ट्र के लिए उनके योगदान को विस्तार से बताएगा, जो हर स्वयंसेवक और देशभक्त के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
नाना जी का पूरा नाम नानाजी देशमुख था, लेकिन उनके कार्यों ने उन्हें राष्ट्रपुत्र बना दिया। बचपन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों से प्रभावित हुए। उनका जीवन संघ के संस्कारों से ओतप्रोत था, जो अनुशासन, सेवा, और राष्ट्रभक्ति पर आधारित था। 2019 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जो उनके योगदान का प्रमाण है। उनकी जयंती पर हम उनके बलिदान को याद करते हैं, जो हिंदू गौरव और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
प्रारंभिक जीवन: संघ संस्कार की नींव
नाना जी का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता अमृतराव देशमुख एक छोटे किसान थे, और माता राजाबाई ने उन्हें नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी। बचपन में ही उन्होंने गरीबी और सामाजिक असमानता देखी, जो उनके जीवन का आधार बनी। 1930 के दशक में वे RSS से जुड़े और पूर्णकालिक प्रचारक बने। डॉ. हेडगेवार ने उन्हें संघ की विचारधारा सिखाई, जो हिंदू एकता और राष्ट्र सेवा पर केंद्रित थी।
उनकी शिक्षा नागपुर में हुई, जहाँ उन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री ली, लेकिन उन्होंने नौकरी को त्यागकर राष्ट्र सेवा को चुना। 1940 में गुरुजी गोलवलकर के साथ काम किया और संघ को मजबूत करने में योगदान दिया। उनका प्रारंभिक जीवन संघ संस्कारों से भरा था, जो अनुशासन और त्याग की मिसाल था। यह नींव उनके बाद के कार्यों का आधार बनी, जो राष्ट्र को अर्पित करने का संकल्प था।
संघ यात्रा: संगठन की मजबूती
नाना जी ने RSS में अपनी यात्रा 1932 से शुरू की और जल्दी ही प्रमुख नेता बने। उन्होंने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में संघ की शाखाएँ स्थापित कीं और स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया। 1947 में स्वतंत्रता के बाद उन्होंने जनसंघ की स्थापना में दीनदयाल उपाध्याय के साथ काम किया। उनका फोकस ग्रामीण विकास और हिंदू एकता पर था।
1948 में RSS पर प्रतिबंध लगा, तो नाना जी ने भूमिगत रहकर संगठन को बचाया। उन्होंने स्वयंसेवकों को एकजुट रखा और संघ की विचारधारा को फैलाया। उनका मानना था कि संघ संस्कार हिंदू समाज को मजबूत करने का माध्यम है। 1951 में जनसंघ के गठन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, जो बाद में BJP बनी। यह यात्रा संघ के अमर प्रतीक को दर्शाती है।
जीवन से देह तक राष्ट्र अर्पण
नाना जी ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को अर्पित किया। उन्होंने कभी व्यक्तिगत सुख नहीं चाहा और सादगी से जिया। 1960 के दशक में उन्होंने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो ग्रामीण विकास का केंद्र बना। उन्होंने “अंत्योदय” सिद्धांत को अपनाया, जो समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान पर केंद्रित था।
1975 के आपातकाल में उन्होंने जेल काटी और लोकसंघर्ष समिति का गठन किया। 1977 में जनता पार्टी की जीत में उनकी भूमिका थी। 1980 में उन्होंने राजनीति छोड़ दी और चित्रकूट में सामाजिक कार्य किए। 2010 में उनकी मृत्यु हुई, लेकिन देह तक राष्ट्र को अर्पित करने का उनका संकल्प अमर रहा। यह अर्पण संघ संस्कार का प्रतीक है।
संघ संस्कार का अमर प्रतीक
नाना जी संघ संस्कार का अमर प्रतीक थे। उन्होंने RSS के मूल्यों—अनुशासन, सेवा, और राष्ट्रभक्ति—को जिया। उन्होंने गौ सेवा, शिक्षा, और स्वास्थ्य पर काम किया, जो हिंदू संस्कृति की रक्षा करता था। उनकी किताबें और भाषण संघ के विचारों को फैलाते थे। उनका जीवन सिखाता है कि संघ संस्कार राष्ट्र को मजबूत करने का आधार है।
चुनौतियाँ और समर्पण
नाना जी के सामने कई चुनौतियाँ थीं। ब्रिटिश शासन, विभाजन की हिंसा, और आपातकाल ने उन्हें परख लिया। 1948 के प्रतिबंध में उन्होंने संघ को बचाया, और 1975 में जेल में रहकर भी संघर्ष किया। उनका समर्पण अडिग रहा, जो संघ संस्कार की ताकत दिखाता है।
प्रभाव और विरासत
नाना जी की विरासत आज भी जीवित है। 2019 में भारत रत्न मिला। उनकी जयंती पर संघ और BJP कार्यक्रम आयोजित करते हैं। उनकी शिक्षाएँ युवाओं को प्रेरित करती हैं। यह विरासत संघ संस्कार और हिंदू गौरव का प्रतीक है।
अमर संकल्प
भारत रत्न नाना जी देशमुख जयंती पर हम उन्हें नमन करते हैं, जिन्होंने जीवन से देह तक राष्ट्र को अर्पित किया और संघ संस्कार का अमर प्रतीक बने। उनका जीवन हिंदू गौरव का आधार है।
