युद्ध के बाद के लेनिनग्राद की टूटी-फूटी गलियों में एक दुबला-पतला, तेज़ निगाहों वाला लड़का सत्ता का पहला सबक किताबों से नहीं, बल्कि सड़कों से सीख रहा था। दीवारों में दरारें थीं, गलियों में चूहे भागते थे, बच्चे खाने के टुकड़ों के लिए लड़ते थे और जीना मतलब था — पहले वार करो, वरना मिट जाओ।
वह लड़का था व्लादिमीर पुतिन, एक फ़ैक्टरी मज़दूर और युद्ध से बचे परिवार का बेटा। वह अपने साथियों से छोटा था, लेकिन उसकी हिम्मत बड़ी थी। अक्सर उससे दोगुने आकार के लड़के उसे तंग करते, पर वह कभी पीछे नहीं हटता। उसने सीखा — लड़ाई से नहीं भागना, बल्कि उसका सामना करना।
एक सर्द शाम, जब कुछ बड़े लड़के उसका पीछा कर रहे थे, पुतिन ने एक चूहे को सीढ़ियों में घेर लिया। लेकिन जब उसने उसे फँसाने की कोशिश की, चूहा पलटकर उस पर झपटा। सालों बाद पुतिन ने वह पल याद करते हुए कहा — ‘उस दिन मैंने सीखा — कभी किसी को कोने में मत धकेलो। जब कोई घिर जाता है, तो वह पूरी ताकत से पलटवार करता है।’
वह सबक, जो लेनिनग्राद की जर्जर गलियों में मिला था, आगे चलकर उसकी ज़िंदगी का दर्शन बन गया। एक शरारती लड़के से लेकर केजीबी एजेंट और फिर रूस के राष्ट्रपति बनने तक, हर ठोकर उसके लिए एक परीक्षा थी, हर दुश्मन एक सबक। वह ‘घिरे हुए चूहे’ की प्रवृत्ति — अपने साथ क्रेमलिन तक लेकर गया।
व्लादिमीर व्लादिमीरोविच पुतिन (जन्म 7 अक्टूबर 1952) जोसेफ़ स्टालिन के बाद 21वीं सदी के रूस के सबसे प्रभावशाली नेता बने। एक पूर्व खुफिया अधिकारी से राजनीतिक रणनीतिकार बने पुतिन ने दो दशकों से अधिक समय तक रूस पर कड़ी पकड़ बनाए रखी — कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री बनकर। उन्होंने रूस की वैश्विक पहचान को बदला, राष्ट्रवाद को फिर से जगाया, और लगभग पूर्ण सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर ली।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा (1952 – 1975)
व्लादिमीर पुतिन का जन्म लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) में हुआ था। उनके पिता व्लादिमीर स्पिरिडोनोविच पुतिन एक फ़ैक्टरी कर्मचारी और द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिक थे, और माँ मारिया इवानोव्ना गृहिणी थीं। उनके दो बड़े भाई बचपन में ही चल बसे — एक युद्ध के दौरान और दूसरा बीमारी से।
एक तंग साझा अपार्टमेंट में पले-बढ़े पुतिन बचपन में बेहद जिद्दी और शरारती थे। सड़क की लड़ाइयों ने उन्हें सांबो और फिर जूडो सीखने के लिए प्रेरित किया। इन मार्शल आर्ट्स ने उन्हें नियंत्रण, संतुलन और अनुशासन का पाठ सिखाया। किशोरावस्था में वे एक कुशल खिलाड़ी बन गए और ब्लैक बेल्ट हासिल किया।
उन्हें बचपन से ही सोवियत जासूसी कहानियाँ पढ़ने का शौक था। इन कहानियों ने उनके मन में केजीबी में शामिल होने का सपना जगाया। 1975 में उन्होंने लेनिनग्राद स्टेट यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली, और अंतरराष्ट्रीय कानून व व्यापार पर थीसिस लिखी। उसी साल उन्हें केजीबी में भर्ती किया गया — जहाँ से उनकी 16 साल की गुप्तचर यात्रा शुरू हुई।
केजीबी करियर और राजनीति की शुरुआत (1975 – 1999)
पुतिन ने अपने करियर की शुरुआत केजीबी की काउंटर-इंटेलिजेंस शाखा से की। कई वर्षों की ट्रेनिंग और जमीनी काम के बाद उन्हें 1985 में ड्रेसडन (पूर्वी जर्मनी) में नियुक्त किया गया। वहाँ वे पश्चिमी राजनयिकों पर नज़र रखते, सूचनाएँ जुटाते और स्थानीय एजेंटों का संचालन करते थे।
1989 में बर्लिन की दीवार गिरने पर, पुतिन ने भीड़ से बचाने के लिए केजीबी के संवेदनशील दस्तावेज़ नष्ट कर दिए। यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी।
जब सोवियत संघ टूटने लगा, तो वे 1990 में लेनिनग्राद लौट आए और लेनिनग्राद स्टेट यूनिवर्सिटी में “असिस्टेंट रेक्टर” बने, जहाँ वे विदेशी संबंधों का काम देखते थे — यह भी उनकी गुप्तचर भूमिका का ही विस्तार था।
जल्द ही उन्होंने शहर के मेयर अनातोली सोबचक की प्रशासनिक टीम में प्रवेश किया, जो एक सम्मानित उदारवादी विचारक थे। 1994 तक पुतिन उप-मेयर बन गए, जहाँ वे विदेशी निवेश और आर्थिक नीतियों को संभालते थे। यह दौर रूस की समाजवाद से पूँजीवाद की अराजक यात्रा का था।
1996 में सोबचक चुनाव हार गए, और पुतिन ने इस्तीफ़ा देकर मॉस्को का रुख किया — एक ऐसा फैसला जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी।
मॉस्को में उनकी शांत लेकिन कुशल कार्यशैली ने राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के सहयोगियों को प्रभावित किया। तीन साल में ही उन्होंने कई बड़े पद संभाल लिए — पहले राष्ट्रपति कार्यालय के उप प्रमुख, फिर एफएसबी (केजीबी की उत्तराधिकारी एजेंसी) के निदेशक (1998), और बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव।
9 अगस्त 1999 को, येल्तसिन ने उन्हें रूस का प्रधानमंत्री नियुक्त किया, यह सोचकर कि वह एक वफादार और अनुशासित अधिकारी हैं जो बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता में व्यवस्था ला सकते हैं।
सत्ता का उदय और पहला राष्ट्रपति कार्यकाल (1999 – 2008)
31 दिसंबर 1999 को बोरिस येल्तसिन के अचानक इस्तीफ़े के बाद व्लादिमीर पुतिन रूस के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। चेचन्या में चल रहे संघर्ष ने उन्हें एक सख़्त और राष्ट्रवादी नेता की पहचान दिलाई। उनका यह बयान — “हम आतंकवादियों को कहीं भी ढूंढ निकालेंगे” — युद्ध से थके रूसियों के दिलों में गूंज उठा।
मार्च 2000 में पुतिन ने 53% वोट पाकर राष्ट्रपति पद जीता, और 2004 में 71% बहुमत से दोबारा चुने गए। उनके पहले दो कार्यकाल रूस की अर्थव्यवस्था में तेज़ी के लिए जाने जाते हैं, जिसे ऊँची तेल कीमतों और सत्ता के केंद्रीकरण ने बल दिया। उन्होंने शक्तिशाली धनकुबेरों (ओलिगार्क्स) का प्रभाव तोड़ दिया, विशेष रूप से 2003 में तेल उद्योगपति मिखाइल खोदोरकोव्स्की की गिरफ्तारी से, और राज्य के नियंत्रण को रणनीतिक क्षेत्रों में पुनः स्थापित किया।
धीरे-धीरे पुतिन की सरकार और सख़्त होती गई। स्वतंत्र मीडिया पर नियंत्रण बढ़ाया गया, राज्यों के गवर्नरों की स्वायत्तता घटाई गई, और सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों — जैसे अन्ना पोलितकोव्स्काया — को धमकियों, यहाँ तक कि मौत का सामना करना पड़ा। 2004 में बेसलान स्कूल हमले जैसी त्रासदियों ने सुरक्षा तंत्र की कमजोरियाँ उजागर कीं, पर साथ ही पुतिन की “संकट में मज़बूत नेतृत्व” की छवि को और मजबूत किया।
प्रधानमंत्री और ‘मे़दवेदेव दौर’ (2008 – 2012)
संविधान के अनुसार लगातार तीसरा कार्यकाल न मिल पाने के कारण, पुतिन ने एक राजनीतिक व्यवस्था बनाई जिसे उन्होंने “टैंडेमोक्रेसी” कहा। उन्होंने अपने करीबी सहयोगी दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनाया और खुद प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई। लेकिन असली नियंत्रण पुतिन के ही पास रहा।
इस अवधि में 2008 का रूस–जॉर्जिया युद्ध हुआ, जिसमें रूस ने अबख़ाज़िया और दक्षिण ओसेशिया को स्वतंत्र घोषित कर दिया — यह सोवियत पश्चात क्षेत्र में रूस की सैन्य ताकत का प्रदर्शन था। वैश्विक आर्थिक मंदी का असर रूस पर भी पड़ा, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र पर पुतिन के नियंत्रण ने अर्थव्यवस्था को संभाले रखा।
फिर वापसी क्रेमलिन में (2012 – वर्तमान)
2012 में पुतिन फिर से राष्ट्रपति बने, हालांकि चुनावों में धांधली के आरोपों के चलते देशभर में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बाद संविधान में संशोधन कर राष्ट्रपति कार्यकाल 6 वर्ष का कर दिया गया, जिससे उन्हें 2018 और फिर 2024 में दोबारा जीतने का रास्ता मिला।
इस दौर में रूस की विदेश नीति पहले से अधिक आक्रामक हो गई। 2014 में क्रीमिया का अधिग्रहण — यूक्रेन के यूरोमैदान आंदोलन के बाद — पुतिन की सबसे बड़ी कूटनीतिक कार्रवाई मानी गई। इस कदम ने उन्हें देश के भीतर जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई, पर पश्चिमी देशों की कड़ी निंदा और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। फिर भी, पुतिन ने इसे “रूस के पुनरुत्थान” का प्रतीक बताया।
2022 में, रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने का सैन्य आक्रमण किया — जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा संघर्ष बन गया। पुतिन ने इसे “विशेष सैन्य अभियान” बताया, जिसका मकसद था “नाटो के विस्तार को रोकना” और “यूक्रेन का नाज़ीकरण खत्म करना।” हालाँकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इन दावों को झूठा और आक्रामक ठहराया। इसके परिणामस्वरूप रूस पर भारी प्रतिबंध, वैश्विक अलगाव, और 2023 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा “युद्ध अपराधों” के आरोपों पर गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया।
घरेलू स्तर पर भी असहमति को कुचल दिया गया। विपक्षी नेता अलेक्सी नवालनी को जेल भेजा गया, जहाँ 2024 में उनकी मृत्यु हो गई। स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग समाप्त हो चुकी है, और देश की सूचना प्रणाली अब पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में है।
निजी जीवन और सार्वजनिक छवि
पुतिन ने 1983 में ल्युडमिला श्क्रेबनेवा से विवाह किया, पर 2014 में दोनों का तलाक हो गया। उनकी दो बेटियाँ हैं — मारिया और कैटरीना, जो आमतौर पर सार्वजनिक जीवन से दूर रहती हैं। पुतिन के निजी जीवन, गुप्त संपत्ति और भव्य महलों को लेकर कई अफवाहें फैली हैं — जिनमें प्रसिद्ध “पुतिन पैलेस” भी शामिल है — हालाँकि आधिकारिक रूप से इन सबका खंडन किया गया है।
पुतिन अपनी छवि को एक सक्रिय, कठोर और पुरुषत्वपूर्ण नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वह हवाई जहाज़ उड़ाते हैं, गोताखोरी करते हैं, घोड़े पर नंगे सीने सवारी करते हैं, और जूडो में 8वीं डैन ब्लैक बेल्ट रखते हैं। उनकी यह छवि — अनुशासन, शक्ति और नियंत्रण — उनकी राजनीति का केंद्र बन चुकी है।
विरासत और मूल्यांकन
व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व ने रूस को 1990 के दशक की अराजक लोकतंत्र से निकालकर एक सुरक्षा-केंद्रित, केंद्रीकृत राज्य में बदल दिया। उनके समर्थक कहते हैं कि उन्होंने रूस को गर्व, स्थिरता और विश्व मंच पर फिर से सम्मान दिलाया। वहीं आलोचकों का मानना है कि उन्होंने एक तानाशाही व्यवस्था बनाई, जहाँ भ्रष्टाचार, सेंसरशिप और दमन हावी हैं।
पुतिन का शासन आधुनिक रूस के विरोधाभासों का प्रतीक है — एक ऐसा राष्ट्र जो राष्ट्रवादी भी है और साम्राज्यवादी अतीत का भी दीवाना, पूँजीवादी भी है और फिर भी राज्य के नियंत्रण में बंधा हुआ। उनकी विरासत अब भी बन रही है — कुछ लोगों के लिए वे “रूस के उद्धारकर्ता” हैं, तो दूसरों के लिए “उसकी लोकतांत्रिक गिरावट के निर्माता।”
व्लादिमीर पुतिन का 2022 का यूक्रेन आक्रमण: आधुनिक इतिहास का निर्णायक मोड़
24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ यूक्रेन पर पूर्ण आक्रमण, पुतिन के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा और निर्णायक कदम माना जाता है। उन्होंने इसे “विशेष सैन्य अभियान” कहकर यूक्रेन को “नाज़ी मुक्त” और “निरस्त्र” करने का लक्ष्य बताया। असल में, यह अभियान पुतिन की उस सोच से उपजा था कि रूस अपने “ऐतिहासिक प्रभाव क्षेत्र” पर फिर से नियंत्रण पा सकता है।
लेकिन तीन साल बाद, यानी 2025 तक, यह युद्ध रूस की अर्थव्यवस्था, समाज और प्रतिष्ठा तीनों को गहराई से हिला चुका है। जो शुरुआत में एक “तेज़ विजय” का सपना था, वह अब लंबे, महंगे और अनिश्चित संघर्ष में बदल गया है।
यह युद्ध अब रूस के भविष्य की दिशा तय कर रहा है — एक ऐसे देश की कहानी के रूप में जो “साम्राज्य पुनर्जीवन” के भ्रम में आर्थिक दबाव, रणनीतिक गलती और वैश्विक अलगाव की ओर बढ़ गया।
I. युद्ध की ओर ले जाने वाली गलतियाँ
पुतिन के इस बड़े कदम की जड़ में कई गलत फैसले थे — कुछ विचारधारात्मक अंधेपन के कारण और कुछ खुफिया असफलताओं की वजह से।
1. तेज़ और आसान जीत की उम्मीद:
क्रेमलिन को विश्वास था कि यूक्रेन की सरकार कुछ ही दिनों में गिर जाएगी और उसकी सेना बिना लड़ाई के आत्मसमर्पण कर देगी। यह सोच 2014 में क्रीमिया पर बिना किसी बड़े संघर्ष के कब्जे और उस समय पश्चिम की कमजोर प्रतिक्रिया से बनी थी। लेकिन हुआ इसका उल्टा — यूक्रेन ने अप्रत्याशित रूप से कड़ा प्रतिरोध किया। सरकार और आम नागरिक दोनों मोर्चे पर डटे रहे, जिससे उसे पूरी दुनिया की सहानुभूति मिली।
2. पश्चिमी एकता को कम आँकना:
रूसी रणनीतिकारों ने सोचा था कि नाटो और यूरोपीय संघ के देश आपस में बँट जाएंगे और किसी बड़े कदम पर एकमत नहीं होंगे, खासकर जब मामला प्रतिबंधों या ऊर्जा आपूर्ति का होगा। लेकिन पुतिन की यह गणना गलत निकली। युद्ध ने पश्चिमी देशों को पहले से कहीं अधिक एकजुट कर दिया। उन्होंने यूक्रेन को हथियार, धन और खुफिया जानकारी के रूप में अभूतपूर्व सहायता दी।
3. अपनी सैन्य ताकत पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा:
पुतिन को अपनी सेना की क्षमता पर पूरा विश्वास था, लेकिन युद्ध शुरू होते ही कमजोरियाँ सामने आ गईं। भ्रष्टाचार, पुरानी सैन्य व्यवस्था और योजनाओं की कमी ने रूसी अभियान को कमजोर कर दिया। मार्च 2022 में कीव के बाहर फँसा हुआ रूसी सैन्य काफिला पूरी दुनिया में रूस की विफलता का प्रतीक बन गया।
4. यूक्रेन की पहचान को न समझना:
सबसे बड़ी गलती यह थी कि पुतिन ने यूक्रेन को एक स्वतंत्र देश के रूप में कभी स्वीकार ही नहीं किया। वह यूक्रेनियों को रूसियों का ही हिस्सा मानते रहे। उन्होंने यह नहीं समझा कि 2014 की मैदान क्रांति ने यूक्रेन के लोगों में आज़ादी और लोकतंत्र के लिए गहरी भावना पैदा कर दी थी। इस आक्रमण ने रूस का प्रभाव बढ़ाने के बजाय यूक्रेन में स्थायी रूस-विरोधी भावना को जन्म दिया।
इन सभी गलत आकलनों ने एक लम्बे, थका देने वाले और महंगे युद्ध की नींव रखी — जहाँ रूस, डोनबास और दक्षिण के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण के बावजूद, अपने मूल उद्देश्य हासिल नहीं कर सका।
II. तात्कालिक परिणाम: युद्ध की भारी कीमत
यूक्रेन पर हमले के बाद उसके परिणामों ने रूस की सेना, अर्थव्यवस्था और समाज — तीनों को गहराई से प्रभावित किया।
1. सैन्य नुकसान और थकान:
2025 के अंत तक रूसी हताहतों की संख्या लगभग 5 से 6 लाख (मृत या घायल) बताई जाती है। 3,000 से अधिक टैंक और भारी वाहन नष्ट हो चुके हैं। सैनिकों की कमी ने रूस को जबरन भर्ती, अपराधियों और विदेशी लड़ाकों (जिनमें उत्तर कोरिया से आए सैनिकों की खबरें भी शामिल हैं) पर निर्भर बना दिया है। 2023 में वैगनर ग्रुप का विद्रोह, भले ही जल्दी दबा दिया गया, लेकिन इसने सेना के भीतर असंतोष और शीर्ष नेतृत्व की कमजोरियों को उजागर किया।
2. आर्थिक झटका और नई दिशा:
पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों ने रूस के 300 अरब डॉलर से अधिक विदेशी भंडार को फ्रीज़ कर दिया। कई बैंकिंग लेन-देन रोक दिए गए, और रक्षा, ऊर्जा तथा उड्डयन क्षेत्रों के लिए आवश्यक तकनीक पर रोक लगा दी गई। 2022 में महंगाई 18% तक पहुँच गई, और रूबल की कीमत में तेज़ गिरावट आई, जिसे पूँजी नियंत्रण से स्थिर किया गया। रूस ने भारत, चीन और मध्य-पूर्व की ओर निर्यात मोड़कर और वैकल्पिक आयात व्यवस्था बनाकर खुद को संभाला, लेकिन अब वह पूरी तरह युद्ध अर्थव्यवस्था में बदल चुका है — जहाँ GDP का लगभग 10% रक्षा खर्च में जा रहा है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश घट गया है।
3. सामाजिक और जनसंख्या संबंधी असर:
युद्ध ने रूस की जनसंख्या संकट को और बढ़ा दिया। 2022 से अब तक 10 लाख से अधिक लोग — जिनमें पेशेवर, युवा और उद्यमी शामिल हैं — देश छोड़ चुके हैं। इससे “ब्रेन ड्रेन” की गंभीर स्थिति पैदा हो गई है। देश में सेंसरशिप और दमन इतना बढ़ गया है कि असहमति जताना अब अपराध माना जाता है। 2024 में विपक्षी नेता अलेक्सी नवालनी की जेल में मृत्यु ने सरकार की कठोर नीति को और उजागर कर दिया।
III. दीर्घकालिक प्रभाव: बदलता हुआ रूस
यूक्रेन युद्ध का असर सिर्फ़ मोर्चे पर नहीं बल्कि रूस के पूरे भविष्य पर पड़ा है। इसकी गूँज आने वाले दशकों तक महसूस की जाएगी।
1. आर्थिक ठहराव और चीन पर बढ़ती निर्भरता:
युद्धकालीन खर्च से 2024–25 में भले ही 3% की वृद्धि दर्ज की गई, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि रूस “खोए हुए दशक” में प्रवेश कर चुका है। प्रतिबंधों के कारण रूस को वैश्विक बाज़ारों और उन्नत तकनीक से काट दिया गया है। अब वह चीन पर आर्थिक और राजनीतिक, दोनों रूपों में निर्भर होता जा रहा है। यह रिश्ता धीरे-धीरे रूस को एक स्वतंत्र शक्ति से घटाकर चीन का अधीन सहयोगी बना रहा है।
2. सैन्य कमजोरी और रणनीतिक सीमाएँ:
लंबे युद्ध ने रूस के आधुनिक हथियार भंडार को कमजोर कर दिया। अब उसे पुराने सोवियत युग के उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। 2025 में यूक्रेन द्वारा कुर्स्क और अन्य रूसी क्षेत्रों पर हमलों ने पुतिन की “अजेय छवि” को गहरा झटका दिया।
3. राजनीतिक थकान और बढ़ती तानाशाही:
2024 के चुनावों में पुतिन ने 87% वोट से जीत दर्ज की, पर यह जीत विपक्ष के अभाव को भी उजागर करती है। लगातार होती मौतें, आर्थिक संकट और बढ़ता असंतोष धीरे-धीरे जनता के धैर्य को तोड़ रहे हैं। आने वाले समय में यह असंतोष सत्ता के भीतर दरारें पैदा कर सकता है।
4. वैश्विक गठबंधनों में बदलाव:
इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नक्शा बदल दिया। कभी कमजोर समझे जाने वाले नाटो में अब फिनलैंड और स्वीडन जैसे नए सदस्य जुड़ चुके हैं। रूस ने एशिया, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ की ओर रुख किया है, लेकिन यह साझेदारी सीमित प्रभाव ही दिखा पाई है। रूस अब पश्चिम से अलग-थलग है, पर किसी नए समूह में पूरी तरह शामिल भी नहीं हो पाया — यह उसकी कमज़ोर वैश्विक स्थिति का संकेत है।
IV. निर्णायक मोड़
व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर हमला रूस की “महाशक्ति पुनर्जागरण” की दिशा में कदम समझा था, लेकिन यह उनके राजनीतिक सफ़र की सबसे बड़ी चुनौती बन गया। सीमाएँ बदलने की कोशिश में शायद उन्होंने अपनी विरासत की दिशा बदल दी।
यह युद्ध साबित कर चुका है कि 21वीं सदी में सिर्फ़ ताकत से विजय नहीं मिलती। एक व्यक्ति की सोच पर टिके तंत्र की सीमाएँ अब खुलकर सामने आ चुकी हैं। इतिहास यह तय करेगा कि पुतिन को “राष्ट्र रक्षक” कहा जाएगा या “पतन का निर्माता” — पर एक बात स्पष्ट है: यूक्रेन युद्ध ने रूस की किस्मत बदल दी है।
अब रूस एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि संघर्ष और सख्त नियंत्रण में बँधा देश बन चुका है। पुतिन की वह विरासत — जो कभी अनुशासन, नियंत्रण और पुनर्जागरण के प्रतीक थी — अब अपने सबसे कठिन इम्तिहान का सामना कर रही है: क्या वह व्यक्ति जिसने रूस को अराजकता से उठाया, अब उसे उसी अराजकता से बचा पाएगा, जो उसने खुद पैदा की?
व्लादिमीर पुतिन द्वारा नरेंद्र मोदी की प्रशंसा: भारत-रूस के भरोसे का प्रतीक
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई मौकों पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं। उन्होंने मोदी के नेतृत्व, स्वतंत्र सोच, और भारत के हितों के प्रति उनके दृढ़ रुख की सराहना की है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों — जैसे ब्रिक्स, एससीओ सम्मेलन और द्विपक्षीय बैठकों — में पुतिन के बयान भारत-रूस की “विशेष और मजबूत रणनीतिक साझेदारी” में गहरे विश्वास को दर्शाते हैं।
1. अक्टूबर 2025 – अमेरिका से व्यापारिक तनाव के बीच मोदी के साथ खड़े पुतिन
अक्टूबर 2025 में, जब संभावित डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के तहत अमेरिका द्वारा नए व्यापारिक शुल्क लगाए जाने की चर्चा चल रही थी, व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक स्वायत्तता के रुख का खुलकर समर्थन किया। वैश्विक व्यापार मुद्दों पर हुई बातचीत के दौरान पुतिन के ये बयान न केवल सहयोगी थे, बल्कि प्रतीकात्मक भी — यह भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता की दृष्टि के साथ रूस की समानता को दर्शाते थे।
पुतिन ने कहा —
“प्रधानमंत्री मोदी एक बहुत समझदार नेता हैं, जो हमेशा अपने देश को प्राथमिकता देते हैं। भारत कभी किसी को खुद का अपमान नहीं करने देगा।”
उन्होंने आगे मोदी को “संतुलित, बुद्धिमान और राष्ट्रहित में काम करने वाला नेता” बताते हुए कहा कि उन्हें “ऐसे भरोसेमंद मित्र के साथ काम करके हमेशा सहजता महसूस होती है।” यह बयान ऐसे समय आया जब दुनिया में व्यापारिक तनाव बढ़ रहा था और भारत की स्वतंत्र आर्थिक नीतियाँ पश्चिमी देशों की निगरानी में थीं। पुतिन का यह समर्थन दिखाता है कि रूस भारत के स्वायत्त निर्णयों के साथ खड़ा है, और एक ऐसे बहुध्रुवीय विश्व की कल्पना करता है जहाँ नई दिल्ली एक प्रमुख भूमिका निभाती है।
2. सितंबर 2025 – अस्ताना में एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रशंसा
1 सितंबर 2025 को कज़ाखस्तान की राजधानी अस्ताना में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में पुतिन ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया।
उन्होंने मोदी को “प्रिय मित्र और दूरदर्शी नेता” कहा और उनकी “अथक ऊर्जा” तथा “भारत-रूस सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता” की सराहना की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने 60 अरब डॉलर से अधिक के व्यापार, रक्षा, परमाणु ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं पर चर्चा की। पुतिन ने यूक्रेन संघर्ष के बीच मोदी की संतुलित कूटनीति और शांति की अपील की तारीफ की, जो भारत की तटस्थता और संवाद-प्रधान नीति को दर्शाती है।
इन बयानों ने यह दोहराया कि रूस लंबे समय से भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक संतुलन में उसकी भूमिका की सराहना करता रहा है।
3. जुलाई 2024 – रूस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदी को प्रदान
2024 में मॉस्को में हुए भारत-रूस द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रूस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपॉसल” प्रदान किया।
पुतिन ने मोदी को “रूस के सच्चे मित्र” बताया और कहा कि उन्होंने “दोनों देशों की ऐतिहासिक मित्रता और रणनीतिक साझेदारी को गहराई देने में व्यक्तिगत भूमिका निभाई है।” उन्होंने मेक इन इंडिया पहल, भारत के तेज़ आर्थिक परिवर्तन और वैश्विक शक्ति के रूप में उसके उभार में मोदी के नेतृत्व की सराहना की। यह सम्मान सिर्फ एक औपचारिक कदम नहीं था — यह भारत के बढ़ते कूटनीतिक महत्व और कठिन समय में भी रूस के साथ उसकी स्थायी साझेदारी का प्रतीक था।
4. पूर्व की प्रशंसा और लगातार जारी थीम्स
पुतिन की मोदी के प्रति प्रशंसा नई नहीं है। 2019 में व्लादिवोस्तोक में हुए ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में उन्होंने मोदी को “महान नेता” कहा, जिन्होंने “भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।” उन्होंने मोदी की व्यावहारिक नीतियों और भारत के दीर्घकालिक विकास के दृष्टिकोण की सराहना की।
2022 के बाद से, जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी था, पुतिन ने बार-बार भारत की संतुलित विदेश नीति और पश्चिमी दबाव में न झुकने के रुख की प्रशंसा की।
एक वार्ता में उन्होंने कहा —
“हम प्रधानमंत्री मोदी की स्वतंत्र नीति का सम्मान करते हैं। वे बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने देश के हित में निर्णय लेते हैं।”
5. व्यापक महत्व
पुतिन की मोदी के प्रति लगातार प्रशंसा इस बात को रेखांकित करती है कि भारत-रूस के बीच पारस्परिक सम्मान और रणनीतिक तालमेल कितना गहरा है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस को अलग-थलग करने के प्रयासों के बावजूद, भारत ने संतुलन बनाए रखा — रूस से सस्ता तेल खरीदते हुए, रक्षा और अंतरिक्ष सहयोग को जारी रखते हुए, और ब्रिक्स, एससीओ और यूरेशियन इकोनॉमिक फोरम जैसे मंचों के ज़रिए बहुध्रुवीय कूटनीति को आगे बढ़ाया।
पुतिन के लिए मोदी वह नेता हैं, जिनमें रूस को वह गुण दिखते हैं जिन्हें वह स्वयं महत्व देता है — आत्मविश्वास, राष्ट्रहित पर केंद्रित सोच, और स्वतंत्र निर्णय लेने का साहस। उनके लगातार दिए गए बयान दोनों देशों के बीच भरोसे, एकता और पश्चिमी प्रभुत्व से अलग विश्व व्यवस्था के विचार को मज़बूती देते हैं।
निष्कर्ष
क्रेमलिन के गलियारों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, व्लादिमीर पुतिन के प्रधानमंत्री मोदी के प्रति शब्द सिर्फ़ औपचारिक प्रशंसा नहीं हैं — वे एक गहरे भू-राजनीतिक विश्वास का प्रतीक हैं, जो आपसी सम्मान और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित है। एक विभाजित होती दुनिया में, पुतिन मोदी को ऐसे साथी के रूप में देखते हैं, जो शक्ति, संतुलन और स्वतंत्रता — इन तीनों गुणों का प्रतीक है। यही गुण दोनों नेताओं की पहचान और भारत-रूस साझेदारी की स्थायी मज़बूती का आधार बने हुए हैं।
व्लादिमीर पुतिन से जुड़े गुप्त और कम ज्ञात तथ्य
सीआईए, केजीबी और अमेरिकी राष्ट्रपति अभिलेखागार से जारी गोपनीय दस्तावेज़ों और सरकारी पत्राचार से व्लादिमीर पुतिन की एक गहराई भरी तस्वीर सामने आती है — जो रूस के “लौह पुरुष” की प्रसिद्ध छवि से कहीं अधिक जटिल है। ये पुराने गोपनीय रिकॉर्ड उनके बचपन, केजीबी करियर, राजनीतिक उदय और निजी नेटवर्क पर प्रकाश डालते हैं, और बताते हैं कि उनके सत्तावादी दृष्टिकोण और रणनीतिक सोच की नींव कहाँ से पड़ी।
1. प्रारंभिक जीवन — संघर्ष, अनुशासन और महत्वाकांक्षा
युद्ध के बाद का लेनिनग्राद
1952 में लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) के एक साधारण श्रमिक परिवार में जन्मे व्लादिमीर पुतिन का बचपन कठिनाई और अभावों में बीता। उनके पिता, व्लादिमीर स्पिरिडोनोविच पुतिन, एक फ़ैक्टरी मज़दूर और द्वितीय विश्व युद्ध के सैनिक थे, जबकि उनकी माँ, मारिया इवानोव्ना पुतिना, ने नाज़ी घेराबंदी के दौरान भयंकर संघर्ष झेला। उनके दो बड़े भाई बचपन में ही गुजर गए — एक डिप्थीरिया से, और दूसरा युद्ध के समय। इस तरह पुतिन अपने माता-पिता के एकमात्र जीवित पुत्र रहे।
गोपनीय केजीबी रिकॉर्ड में उनके परिवार को “राजनीतिक रूप से वफादार, श्रमिक वर्ग का और सीमित साधनों वाला” बताया गया। साझा मकान की भीड़भाड़ और कठिन माहौल में पले-बढ़े पुतिन को अक्सर मोहल्ले के बड़े लड़कों की बदमाशी झेलनी पड़ती थी। यहीं से उनमें लड़ने और झुकने से इनकार करने का स्वभाव विकसित हुआ।
‘मजबूत इंसान’ की छवि का निर्माण
1980 के दशक की सीआईए रिपोर्टों के अनुसार, पुतिन में नियंत्रण और अनुशासन के प्रति जुनून किशोरावस्था से ही शुरू हुआ। उन्होंने 12 साल की उम्र में सांबो और फिर जूडो सीखना शुरू किया, और आगे चलकर ब्लैक बेल्ट हासिल की। उनके खेलों में अनुशासन और नियंत्रण का जो प्रभाव था, वही बाद में उनके नेतृत्व शैली का आधार बना — जहाँ हर काम में गोपनीयता, संयम और दबाव में कठोर निर्णय लेने की प्रवृत्ति झलकती है।
2. केजीबी करियर — अनुशासन, निष्ठा और मोहभंग
सोवियत खुफिया तंत्र में सेवा
1975 में लेनिनग्राद विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री लेने के बाद पुतिन ने केजीबी की प्रथम शाखा में काम शुरू किया, जो विदेशी खुफिया कार्यों के लिए जिम्मेदार थी। 2019 में मॉस्को में प्रदर्शित पुराने केजीबी अभिलेखों में पुतिन को “ईमानदार, भरोसेमंद और वैचारिक रूप से दृढ़ अधिकारी” बताया गया है। उन्होंने शुरुआत में काउंटर-इंटेलिजेंस विभाग में काम किया, जहाँ वे असंतुष्टों और विश्वविद्यालय समूहों पर निगरानी रखते थे।
ड्रेसडेन और दीवार का पतन
1985 से 1990 के बीच पुतिन पूर्वी जर्मनी के ड्रेसडेन में तैनात रहे, जहाँ उनका काम निगरानी और औद्योगिक जासूसी से जुड़ा था। 1989 में जब पूर्वी जर्मनी में प्रदर्शनकारियों ने केजीबी के कार्यालय को घेर लिया, तो पुतिन ने हज़ारों गोपनीय फाइलें नष्ट कर दीं ताकि वे भीड़ के हाथ न लगें। उन्होंने बार-बार मॉस्को को आदेश के लिए फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनी — इसने उनमें पश्चिमी संस्थानों के प्रति गहरा अविश्वास और यह धारणा पैदा की कि सोवियत संघ का पतन एक टाली जा सकने वाली बेइज्जती थी।
सोवियत पतन के समय इस्तीफ़ा
अगस्त 1991 में, मिखाइल गोर्बाचेव के खिलाफ असफल तख्तापलट के दौरान, पुतिन ने लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से केजीबी से इस्तीफ़ा दे दिया। अमेरिकी राजनयिक रिकॉर्ड में इसे “राजनीतिक रूप से समझदार कदम” कहा गया — क्योंकि इससे वे सुधारवादी नेताओं के पक्ष में आ गए। इसके बाद उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग के मेयर अनातोली सोबचक की प्रशासनिक टीम में शामिल होकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया।
3. राजनीतिक उदय — स्थानीय सलाहकार से क्रेमलिन की सत्ता तक
येल्तसिन से जुड़ाव
2019 में जारी क्लिंटन राष्ट्रपति पुस्तकालय के दस्तावेज़ों में बताया गया है कि 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जब पुतिन राजनीति में उभर रहे थे, तो अमेरिकी विश्लेषकों ने उन्हें “बोरिस येल्तसिन का अनुशासित और भरोसेमंद उत्तराधिकारी” बताया। येल्तसिन ने उन्हें इसीलिए चुना ताकि भ्रष्टाचार और अस्थिरता के दौर में सत्ता की निरंतरता बनी रहे।
क्लिंटन-पुतिन संवाद
1999 से 2000 के बीच राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और पुतिन के बीच हुई वार्ताओं के प्रतिलेख बताते हैं कि दोनों के बीच बातचीत सम्मानजनक लेकिन सतर्क थी। क्लिंटन ने पुतिन के “ठंडे और सोच-समझकर बोलने वाले” स्वभाव का उल्लेख करते हुए पूछा था कि क्या वह रूस में लोकतंत्र को बनाए रख पाएँगे — एक सवाल जो आज इतिहास में विडंबना बन चुका है।
शासन शैली और केजीबी की छाया
सत्ता में आने के बाद पुतिन ने केजीबी की कार्यशैली को शासन में उतारा। सीआईए और एमआई6 की रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने सत्ता को निष्ठा-आधारित नेटवर्कों के ज़रिए केंद्रीकृत किया, मीडिया पर नियंत्रण बढ़ाया और सुरक्षा संस्थाओं को पुनर्जीवित किया। उनके शुरुआती वर्षों में ही वह रुझान दिखाई देने लगा जो आगे चलकर रूस के सत्तावादी ढाँचे की पहचान बना।
4. जासूसी और चुनाव हस्तक्षेप
2016 का अमेरिकी चुनाव अभियान
अमेरिका की 2017 की एक गोपनीय लेकिन बाद में सार्वजनिक की गई खुफिया रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि व्लादिमीर पुतिन ने स्वयं 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में प्रभाव डालने की कार्रवाई की मंजूरी दी थी।
रूसी राज्य मीडिया और एजेंटों की बातचीत से यह साबित हुआ कि क्रेमलिन की देखरेख में दुष्प्रचार अभियान चलाए गए, जिनमें डेमोक्रेटिक पार्टी के सर्वर की हैकिंग भी शामिल थी।
इस रिपोर्ट की जानकारी एक उच्च-स्तरीय रूसी सूत्र से मिली थी, जिसे 2017 में सीआईए ने रूस से सुरक्षित बाहर निकाल लिया ताकि उसकी पहचान उजागर न हो। 2020 में जारी दस्तावेज़ों के अनुसार, यह सूत्र सीधे पुतिन तक पहुँच रखता था और उसने पुष्टि की थी कि चुनाव हस्तक्षेप पुतिन की व्यक्तिगत स्वीकृति से हुआ था।
‘मिसिंग बाइंडर’ विवाद
2021 में “रूस बाइंडर” नामक एक गोपनीय दस्तावेज़ — जिसमें क्रेमलिन की खुफिया गतिविधियों की जानकारी थी — व्हाइट हाउस से गायब हो गया। इस घटना ने पश्चिमी देशों में रूसी जासूसी नेटवर्क के बने रहने की आशंकाओं को और बढ़ा दिया।
5. आंतरिक सर्कल, संपत्ति और छिपा साम्राज्य
गुप्त परिवार और संपत्ति का साम्राज्य
2025 में रूसी स्वतंत्र मीडिया समूह प्रोजेक्ट की एक जांच, जो लीक सरकारी दस्तावेजों पर आधारित थी, ने पुतिन के निजी जीवन के कई रहस्यों को उजागर किया। रिपोर्टों में उनकी पूर्व ओलंपिक जिमनास्ट अलीना कबायेवा से रिश्ते और कई अनघोषित बच्चों का उल्लेख है। पश्चिमी खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पुतिन की व्यक्तिगत संपत्ति 200 अरब डॉलर से अधिक आँकी गई है, जो ऑफशोर कंपनियों और वफादार उद्योगपतियों — जैसे रोमन अब्रामोविच और गेनादी टिमचेंको — के ज़रिए छिपाई गई है।
ये लोग और कंपनियाँ, जिन्हें अमेरिकी ट्रेज़री विभाग ने प्रतिबंध सूची में शामिल किया है, पुतिन की आर्थिक शक्ति का मुख्य तंत्र बनाते हैं — जहाँ राज्य की ताकत और निजी धन का मेल उन्हें पूर्ण नियंत्रण देता है।
स्वास्थ्य और छवि नियंत्रण
अमेरिकी और नाटो खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पुतिन अपने शारीरिक स्वास्थ्य और ऊर्जा को लेकर अत्यधिक सचेत रहते हैं।
हालाँकि उनकी बीमारी (जैसे पार्किंसन या कैंसर) से जुड़ी अफवाहें कभी-कभी सामने आती हैं, लेकिन क्रेमलिन हमेशा उनका खंडन करता है।
उनकी सार्वजनिक उपस्थिति — घुड़सवारी, डाइविंग, और फिटनेस अभियानों — से यह साफ़ है कि वे अपनी छवि को शक्ति और नियंत्रण के प्रतीक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
यह वही छवि-नियंत्रण की रणनीति है जो उन्होंने अपने केजीबी दिनों में सीखी थी — “धारणा पर नियंत्रण ही शक्ति है।”
6. मनोवैज्ञानिक चित्र: नियंत्रण से गढ़ा व्यक्तित्व
गोपनीय रिपोर्टों के विश्लेषण से एक समान तस्वीर उभरती है — व्लादिमीर पुतिन, एक ऐसा व्यक्ति जिसे अराजकता और नियंत्रण खोने का डर ने आकार दिया है। केजीबी के अनुभव, सोवियत संघ का पतन, और 1989 के ड्रेसडेन की बेइज्जती — इन तीनों ने उसकी सोच को हमेशा के लिए प्रभावित किया।
पुतिन के लिए पश्चिमी उदारवाद अव्यवस्था और कमजोरी का प्रतीक है, और उनका मानना है कि राष्ट्र की स्थिरता बनाए रखने के लिए सत्ता का केंद्रीकरण आवश्यक है। यही सोच उनके घरेलू कठोर शासन और विदेश नीति की आक्रामकता दोनों में झलकती है — क्रीमिया (2014) से लेकर यूक्रेन (2022) तक।
ये दस्तावेज़ बताते हैं कि पुतिन सिर्फ़ एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं, बल्कि ठंडी जंग की मानसिकता से उपजा चरित्र हैं — एक ऐसा नेता जिसकी सोच अब भी बीते युग की सुरक्षा और भय की राजनीति में जमी हुई है। लेनिनग्राद के एक छोटे से अपार्टमेंट से लेकर क्रेमलिन की सत्ता तक की उनकी यात्रा, एक सैनिक के अनुशासन और एक जासूस की गणनात्मक बुद्धि का मेल है।
फिर भी, यही गुण — गोपनीयता, अविश्वास और नियंत्रण की जुनूनी प्रवृत्ति — अब उनके शासन की सीमाएँ भी तय कर रहे हैं।
जो खुफिया फाइलें कभी उनके उदय की कहानी बताती थीं, आज वे ही दस्तावेज़ उनके संभावित पतन की रूपरेखा बनती दिख रही हैं।
निष्कर्ष: वह स्वनिर्मित व्यक्ति जिसने राष्ट्र को पुनर्जीवित किया
व्लादिमीर व्लादिमीरोविच पुतिन का जीवन यह साबित करता है कि अगर दृढ़ इच्छा, अनुशासन और विश्वास हो, तो परिस्थितियाँ कैसी भी हों — व्यक्ति अपनी नियति खुद लिख सकता है। उन्होंने सत्ता विरासत में नहीं पाई, बल्कि उसे मेहनत और धैर्य से अर्जित किया।
वे किस्मत के भरोसे नहीं, बल्कि हर मोड़ पर संघर्ष कर आगे बढ़े।
लेनिनग्राद की टूटी गलियों से लेकर क्रेमलिन के भव्य गलियारों तक की यात्रा, उनकी जिद, सहनशक्ति और एकाग्रता की कहानी है।
उनका बचपन सुख-सुविधा से नहीं, बल्कि कठिनाइयों से भरा था — ठंडी सर्दियाँ, साझा मकान, और भूख से जूझते दिन। इन्हीं मुश्किलों ने उनमें न झुकने वाला स्वभाव और लक्ष्य के प्रति अडिग विश्वास पैदा किया। जो लड़का गलियों में खुद की रक्षा करना सीख रहा था, वही आगे चलकर अपने देश की प्रतिष्ठा की रक्षा करने वाला नेता बना।
उनकी सफलता का आधार चतुराई नहीं, एकाग्रता थी; भाग्य नहीं, लगन थी; बल नहीं, नियंत्रण था। केजीबी ने उन्हें अनुशासन सिखाया, राजनीति ने धैर्य, और नेतृत्व ने गौरव और व्यावहारिकता के बीच संतुलन सिखाया। उनके भीतर यह अटूट विश्वास था कि रूस को कभी फिर झुकना नहीं चाहिए, और उसके लोगों को फिर कभी अपमान या अराजकता में नहीं जीना चाहिए। सोवियत संघ के टूटने के बाद जब दुनिया ने रूस को “खत्म हो चुकी शक्ति” माना, पुतिन ने उसकी राख में नए भविष्य की चिंगारी देखी।
वे उस समय सत्ता में आए जब देश भ्रष्टाचार, मुद्रास्फीति और निराशा में डूबा था। उन्होंने एक बिखरे राष्ट्र को दिशा दी, संस्थाएँ खड़ी कीं, और वह गर्व लौटाया जो दशकों से खो गया था। पश्चिम के लिए वे एक पहेली बने, लेकिन रूसियों के लिए वे उत्तर बन गए।
उनके नेतृत्व में रूस ने दोबारा मजबूती पाई — उधार की नहीं, आत्मनिर्भरता की ताकत से। उन्होंने सेना को पुनर्जीवित किया, अर्थव्यवस्था को स्थिर किया, और दुनिया में रूस की आवाज़ को फिर बुलंद किया। वे किसी विचारधारा या परिवार से नहीं, बल्कि कर्तव्य और जिम्मेदारी से प्रेरित थे — रूस को फिर सीधा खड़ा देखने के कर्तव्य से।
इतिहास ने कई बार उनकी आलोचना की, पर इतिहास यह भी याद रखेगा कि उन्होंने कितना बोझ उठाया। जिस रूस को उन्होंने फिर से खड़ा किया, वह आराम से नहीं, बल्कि धैर्य और कठिनाइयों से बना था — ठीक उनकी अपनी ज़िंदगी की तरह। कई लोगों के लिए वे कठोर हैं, तो कईयों के लिए दृढ़; लेकिन जो गहराई से देखते हैं, उनके लिए वे उस व्यक्ति का प्रतीक हैं जिसने कठिनाइयों को उपलब्धियों में बदला, और एकाकीपन को प्रभाव में।
पुतिन की विरासत, ठीक रूस की तरह, विरोधाभासों से भरी है — शक्तिशाली लेकिन संवेदनशील, गर्वीला पर सतर्क, कठोर पर मातृभूमि के प्रति गहराई से भावनात्मक। वे क्रांतियों से गुज़रे, लेकिन अपनी क्रांति सहनशीलता से गढ़ी।
वह लड़का जो कभी दिखाई देने के लिए लड़ा, आज वह आदमी है जिसने अपने देश को दुनिया में फिर से दिखाया। उसकी कहानी विरासत की नहीं, धैर्य और परिश्रम की है — यह याद दिलाती है कि शक्ति भाग्य से नहीं, संघर्ष से मिलती है।
और जब इतिहास उनके फैसलों पर बहस करता रहेगा, एक सच्चाई अटल रहेगी — व्लादिमीर पुतिन ने रूस की महानता विरासत में नहीं पाई; उन्होंने उसे दोबारा अर्जित किया। उन्होंने उसे उस लोहे की इच्छाशक्ति से फिर खड़ा किया, जिसने कभी उन्हें लेनिनग्राद की गलियों में जिंदा रखा था।
वे कुछ नहीं लेकर आए, मेहनत से आगे बढ़े, विश्वास से शासन किया और इस तरह वे सिर्फ़ रूस के नेता नहीं बने — बल्कि उसकी इच्छाशक्ति, उसका गर्व और उसकी अटूट आत्मा बन गए।
