2004: जब कांग्रेस जीती, लेकिन प्रणब दा को कुर्सी नहीं मिली

जब 2004 में कांग्रेस सत्ता में लौटी, तो कमरे में मौजूद सबसे अनुभवी नेता से चुपचाप एक कदम पीछे रहने को कहा गया। यह किसी अपमान का संकेत नहीं था, बल्कि इस बात का उदाहरण था कि दिल्ली में वास्तविक सत्ता कैसे बिना किसी पद पर बैठे भी इस्तेमाल की जाती है। इसके बाद जो हुआ, वह औपचारिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रभाव और समझ से चलने वाली राजनीति का पाठ था।

परचिय

प्रणब कुमार मुखर्जी (11 दिसंबर 1935 – 31 अगस्त 2020) स्वतंत्र भारत के बाद की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक नेताओं में गिने जाते हैं। आजीवन सांसद, प्रशासक और संवैधानिक चिंतक के रूप में उन्होंने लगभग पाँच दशकों तक देश की सेवा की। उनके सार्वजनिक जीवन का शिखर 2012 से 2017 के बीच भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में देखने को मिला।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से गहराई से जुड़े रहे प्रणब मुखर्जी को शासन की गहरी समझ, संस्थागत स्मृति और गठबंधन राजनीति को शांत लेकिन प्रभावी ढंग से संभालने की क्षमता के लिए व्यापक सम्मान मिला। वर्ष 2019 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उनकी विरासत गहरी, बहुस्तरीय और कई बार बहस के केंद्र में रही है।

शुरुआती जीवन और विचारों की नींव

प्रणब मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले के मिराती गांव में हुआ। वे ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहाँ सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रसेवा को महत्व दिया जाता था। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कांग्रेस नेता थे, जिन्हें औपनिवेशिक दौर में जेल भी जाना पड़ा। इस वातावरण ने प्रणब मुखर्जी के भीतर राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि सार्वजनिक कर्तव्य के रूप में देखने की सोच विकसित की।

उन्होंने इतिहास, राजनीति विज्ञान और कानून में उच्च शिक्षा प्राप्त की। राजनीति में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक सिविल सेवा में और फिर कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। उनके व्यक्तित्व का एक कम जाना गया पहलू यह था कि वे जीवन भर नियमित रूप से निजी डायरी लिखते रहे। यही आदत आगे चलकर उनके संस्मरणों का आधार बनी और उन्हें भारतीय राजनीति का एक अत्यंत सूक्ष्म और भरोसेमंद इतिहासकार बना गई।

राष्ट्रीय मंच पर पहला क़दम

1969 में प्रणब मुखर्जी ने संसद में प्रवेश किया। शुरुआत में वे बांग्ला कांग्रेस से जुड़े, लेकिन कांग्रेस पार्टी के भीतर उथल-पुथल के दौर में उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ चुना। उनकी प्रशासनिक क्षमता और नीतिगत मामलों पर गहरी पकड़ ने उन्हें जल्द ही अलग पहचान दिला दी।

1970 के दशक में उन्होंने औद्योगिक विकास, शिपिंग और परिवहन जैसे अहम विभागों में काम किया और वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रहे। आपातकाल (1975–77) के दौरान वे राजस्व और बैंकिंग से जुड़े दायित्व संभाल रहे थे। यह दौर उनके पूरे राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित अध्याय माना जाता है। भारतीय लोकतंत्र के उस सख्त और केंद्रीकृत चरण से उनका जुड़ाव एक ऐसी छाया बना, जो बाद के वर्षों में उनके संवैधानिक दृष्टिकोण के बावजूद उनसे जुड़ी रही।

नीति, कूटनीति और सत्ता की समझ

1982 से 1984 के बीच वित्त मंत्री के रूप में प्रणब मुखर्जी ने वित्तीय अनुशासन और बाहरी वित्तीय संबंधों पर ज़ोर दिया। उनके इस संतुलित दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, जब 1984 में यूरोमनी पत्रिका ने उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री घोषित किया।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर जाना पड़ा और कुछ समय के लिए उन्होंने एक अलग पार्टी भी बनाई, लेकिन अंततः वे कांग्रेस में लौट आए। पी. वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में वे फिर से केंद्रीय भूमिका में आए। योजना आयोग के उपाध्यक्ष और बाद में विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने उदारीकरण के शुरुआती दौर में भारत की बदलती विदेश नीति को आकार देने में योगदान दिया।

यूपीए दौर में सरकार को संभालने की जिम्मेदारी (2004–2012)

यूपीए शासनकाल में प्रणब मुखर्जी सरकार के सबसे भरोसेमंद समस्या-समाधानकर्ता बनकर उभरे। उन्होंने रक्षा, विदेश, वित्त और वाणिज्य एवं उद्योग जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले और कई अंतर-मंत्रालयी समूहों की अध्यक्षता की। वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान वित्त मंत्री के रूप में उनका फोकस आर्थिक स्थिरता, सामाजिक खर्च और संस्थागत सुधारों पर रहा, जिसमें जीएसटी की शुरुआती रूपरेखा भी शामिल थी। विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई, जिससे भारत की वैश्विक स्थिति में बड़ा बदलाव आया।

राष्ट्रपति पद: संयम, मर्यादा और संवैधानिक संतुलन का कार्यकाल

2012 में व्यापक राजनीतिक समर्थन के साथ राष्ट्रपति चुने जाने के बाद प्रणब मुखर्जी ने इस पद को गंभीरता और संयम के साथ निभाया। उनके कार्यकाल में संवैधानिक मर्यादा, संसद की सर्वोच्चता और संस्थागत संतुलन पर विशेष ज़ोर रहा।
उन्होंने कार्यपालिका की शक्तियों का सोच-समझकर इस्तेमाल किया, दया याचिकाओं पर निर्णायक फैसले लिए और राष्ट्रपति पद की नैतिक शक्ति का उपयोग शिक्षा, नवाचार और नागरिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए किया। उनका मानना था कि राष्ट्रपति की असली ताकत खुले हस्तक्षेप में नहीं, बल्कि शांत निगरानी में होती है।

उपलब्धियाँ और आलोचनाएँ

प्रमुख योगदान

  • संवैधानिक परंपराओं और संसदीय मानकों को मज़बूती देना

  • संकट के समय आर्थिक शासन को स्थिर बनाए रखना

  • भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक स्थिति को आगे बढ़ाना

  • बिखरे हुए राजनीतिक माहौल में सहमति बनाने की भूमिका निभाना

प्रमुख आलोचनाएँ

  • आपातकाल से जुड़ाव एक गंभीर नैतिक और लोकतांत्रिक सवाल बना रहा

  • पिछली तारीख से लागू कराधान जैसे फैसलों पर निवेशकों की आलोचना

  • कुछ राजनीतिक कदमों को सिद्धांत की बजाय रणनीति से प्रेरित माना गया

श्रद्धांजलि और लिखित विरासत

अगस्त 2020 में कोविड-19 से जुड़ी जटिलताओं के कारण प्रणब मुखर्जी का निधन हुआ। उनके निधन पर देशभर में शोक व्यक्त किया गया और राजनीतिक सीमाओं से परे उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। उनकी पुस्तकें The Dramatic Decade और The Coalition Years समकालीन भारतीय शासन की महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी विरासत मानी जाती हैं।

एक नेता, कई आयाम

प्रणब मुखर्जी एक अनुभवी राजनेता थे — विद्वान, अनुकूलनशील और संस्थानों को केंद्र में रखने वाले। उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र की ताकतों और विरोधाभासों दोनों को दर्शाता है — सुधार और संयम, अधिकार और समायोजन। विवाद आज भी उनकी छवि पर चर्चा को जन्म देते हैं, लेकिन भारत की राजनीतिक संस्थाओं को स्थिर और सशक्त बनाने में उनका योगदान उन्हें आधुनिक भारतीय इतिहास की एक निर्णायक हस्ती बनाता है।

प्रणब मुखर्जी के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि (1935)

प्रणब मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले के मिराती गांव में हुआ। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी कांग्रेस नेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन के दौरान जेल जाना पड़ा। इस माहौल ने उनके भीतर सार्वजनिक जीवन के प्रति गहरा सम्मान और लोकतांत्रिक संस्थाओं में आस्था पैदा की।

पढ़ाई और करियर की शुरुआत (1950–1960 का दशक)

उन्होंने सूरी विद्यासागर कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास, राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई की। राजनीति में आने से पहले वे कुछ समय तक सरकारी नौकरी में रहे और फिर राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक बने। इसी दौर में उन्होंने नियमित डायरी लिखने की आदत विकसित की, जिसने आगे चलकर उन्हें भारतीय राजनीति का सूक्ष्म इतिहासकार बना दिया।

राष्ट्रीय राजनीति में पहला कदम (1969)

1969 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और बांग्ला कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुँचे। यहीं से उनके राष्ट्रीय राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई।

इंदिरा गांधी से जुड़ाव (1970 का दशक)

कांग्रेस विभाजन के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी का साथ चुना और उनके भरोसेमंद सहयोगी के रूप में उभरे। 1975 और 1981 में वे कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए दोबारा चुने गए।

पहला मंत्री पद (1973)

1973 में उन्हें औद्योगिक विकास का उप-मंत्री बनाया गया। यही से उनके लंबे और प्रभावशाली मंत्री जीवन की शुरुआत हुई।

आपातकाल का दौर (1975–1977)

आपातकाल के दौरान प्रणब मुखर्जी ने राजस्व और बैंकिंग राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। यह चरण उनके करियर का सबसे अधिक बहस वाला हिस्सा रहा। शाह आयोग की टिप्पणियों में उनका नाम आया, हालांकि बाद में रिपोर्ट को अलग रख दिया गया। फिर भी इस दौर से उनका जुड़ाव लगातार आलोचना का विषय बना रहा।


वित्त मंत्री और अंतरराष्ट्रीय पहचान (1982–1984)

वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने तीन बजट पेश किए, जिनमें वित्तीय अनुशासन और विदेशी ऋण पर ज़ोर दिया गया। 1984 में यूरोमनी पत्रिका द्वारा उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री चुना जाना उनकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का संकेत था।

राजनीतिक गिरावट और फिर वापसी (1984–1989)

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया। उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई, लेकिन वह प्रभावी नहीं हो सकी। 1989 में पार्टी विलय के बाद वे फिर कांग्रेस में लौट आए, जिससे उनकी राजनीतिक अनुकूलन क्षमता स्पष्ट हुई।

आर्थिक उदारीकरण में भूमिका (1991–1996)

पी. वी. नरसिंह राव के नेतृत्व में प्रणब मुखर्जी को योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत की शुरुआती आर्थिक सुधार प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह वह दौर था जब देश नियंत्रित अर्थव्यवस्था से बाज़ार-आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था।
इसके बाद वे विदेश मंत्री बने और एक ऐसे संक्रमणकाल में भारत की कूटनीति संभाली, जब देश अपनी वैश्विक पहचान और आर्थिक दिशा दोनों को नए सिरे से गढ़ रहा था।

यूपीए सरकारों में केंद्रीय भूमिका (2004–2012)

यूपीए शासनकाल में प्रणब मुखर्जी सरकार के सबसे स्थिर और भरोसेमंद स्तंभ बनकर उभरे। उन्होंने रक्षा, विदेश, वित्त और वाणिज्य एवं उद्योग जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाली।

वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान वित्त मंत्री के रूप में उनका मुख्य फोकस आर्थिक स्थिरता बनाए रखने, कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार और संस्थागत सुधारों पर रहा। इसी समय उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर (GST) की नींव रखने की दिशा में भी काम किया।
कई मंत्रिसमूहों के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका ने उन्हें सरकार का प्रमुख संकट-प्रबंधक बना दिया।


भारत के राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल (2012–2017)

जुलाई 2012 में व्यापक राजनीतिक समर्थन के साथ भारत के 13वें राष्ट्रपति चुने गए प्रणब मुखर्जी इस पद पर पहुँचने वाले पहले बंगाली बने। उनका राष्ट्रपति कार्यकाल संवैधानिक संयम, संसदीय लोकतंत्र की प्राथमिकता और कार्यपालिका की शक्तियों के संतुलित उपयोग के लिए जाना गया।
दया याचिकाओं जैसे संवेदनशील मामलों में उन्होंने सोच-समझकर निर्णय लिए। वे राष्ट्रपति की भूमिका को सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले पद के रूप में नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक के रूप में देखते थे।

विचार, संवाद और राष्ट्रीय मान्यता (2017–2020)

राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी प्रणब मुखर्जी एक सक्रिय सार्वजनिक विचारक बने रहे। वर्ष 2018 में आरएसएस के मंच से दिया गया उनका भाषण बहुलवाद और संवैधानिक मूल्यों पर केंद्रित था, जिसने देशभर में व्यापक चर्चा को जन्म दिया।
2019 में उन्हें राष्ट्र की आजीवन सेवा के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सम्मान के साथ अंतिम विदाई (31 अगस्त 2020)

31 अगस्त 2020 को कोविड-19 से जुड़ी जटिलताओं और मस्तिष्क में रक्त का थक्का जमने के कारण 84 वर्ष की आयु में प्रणब मुखर्जी का निधन हो गया। उनके निधन पर देशभर में सात दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। राजनीतिक सीमाओं से परे, भारत और दुनिया भर से उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

विरासत का मूल्यांकन

प्रणब मुखर्जी का जीवन आधुनिक भारतीय राजनीति की पूरी यात्रा को दर्शाता है — एकदलीय प्रभुत्व से लेकर गठबंधन शासन तक। उन्हें एक कुशल प्रशासक और संस्थागत संतुलन बनाए रखने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है।

आर्थिक नीति, कूटनीति और संवैधानिक परंपराओं में उनका योगदान गहरा और प्रभावशाली रहा। वहीं, आपातकाल जैसे विवादित दौर से उनका जुड़ाव उनकी विरासत को जटिल और बहस योग्य बनाता है। कुल मिलाकर, उनका करियर लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर सत्ता के धैर्यपूर्ण, अनुकूलनशील और विवेकपूर्ण प्रयोग का अध्ययन प्रस्तुत करता है।


2004 में प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बने?

एक परिष्कृत, संदर्भ-आधारित और मौलिक विश्लेषण

2004 के लोकसभा चुनावों के बाद राजनीतिक हलकों में यह उम्मीद थी कि कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ रणनीतिकार और वार्ताकार प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोनिया गांधी द्वारा स्वयं पद स्वीकार न करने के बाद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री चुना गया।
जिस निर्णय को अक्सर “अचानक” कहा जाता है, वह वास्तव में सोची-समझी राजनीतिक गणना, गठबंधन समीकरणों और नेतृत्व शैली से जुड़े कारणों का परिणाम था — जिन पर मुखर्जी ने बाद में अपने संस्मरणों में भी विचार किया।

2004 का जनादेश और राजनीतिक झटका

कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने भाजपा-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को पराजित कर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का कार्यकाल समाप्त किया। चुनाव अभियान का नेतृत्व सोनिया गांधी ने किया था, इसलिए उनका प्रधानमंत्री बनना स्वाभाविक माना जा रहा था।
लेकिन उनके विदेशी मूल को लेकर लगातार हो रहे राजनीतिक हमलों ने ऐसा माहौल बना दिया, जिससे नवगठित गठबंधन में ध्रुवीकरण का खतरा पैदा हो गया।

सोनिया गांधी का त्याग: रणनीति के रूप में बलिदान

मई 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया। उन्होंने इसे व्यक्तिगत और नैतिक निर्णय बताया, लेकिन राजनीतिक रूप से यह एक रणनीतिक कदम भी था।

इससे नागरिकता को लेकर चल रहा विवाद शांत हुआ, सहयोगी दलों को भरोसा मिला और उनकी छवि एक ऐसे नेता के रूप में उभरी, जो सत्ता से ऊपर स्थिरता को रखता है। इसी बिंदु पर सवाल यह बन गया कि नेतृत्व कौन करेगा नहीं, बल्कि यह कि गठबंधन को सबसे बेहतर तरीके से कौन संभालेगा।


प्रणब मुखर्जी क्यों थे स्वाभाविक दावेदार

अनुभव और कद के लिहाज़ से प्रणब मुखर्जी सबसे आगे थे। उन्होंने गठबंधन वार्ताओं का संचालन किया था, सहयोगी दलों का भरोसा जीता था और लगभग हर प्रमुख मंत्रालय संभाला था।

कांग्रेस के भीतर उन्हें सबसे सक्षम प्रशासक माना जाता था। प्रधानमंत्री पद की उनकी अपेक्षा कभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई, लेकिन उनकी वरिष्ठता और सेवा इसे स्वाभाविक बनाती थी।


मनमोहन सिंह का चयन: सोच-समझकर लिया गया निर्णय

सोनिया गांधी द्वारा मनमोहन सिंह को चुनने के पीछे एक अलग राजनीतिक गणना थी:

  • उनकी तकनीकी और शांत छवि गठबंधन सहयोगियों को भरोसा देती थी

  • उनका कोई स्वतंत्र राजनीतिक आधार नहीं था, जिससे पार्टी अध्यक्ष की केंद्रीय भूमिका बनी रहती थी

  • 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों से जुड़ी उनकी पहचान उस समय स्थिरता का संकेत थी

  • उनका गैर-टकराव वाला स्वभाव सोनिया गांधी की सहमति-आधारित राजनीति से मेल खाता था

बाद में प्रणब मुखर्जी ने भी स्वीकार किया कि इन कारणों ने वरिष्ठता पर प्राथमिकता पाई।

फैसले के बाद मुखर्जी की भूमिका

निजी तौर पर निराश होने के बावजूद सार्वजनिक रूप से अनुशासित रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने निर्णय स्वीकार किया और पहली यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री बने।

अगले आठ वर्षों में उन्होंने वित्त, विदेश और अन्य अहम मंत्रालय संभालते हुए सरकार के सबसे भरोसेमंद संकट-प्रबंधक के रूप में अपनी भूमिका मजबूत की। 2012 में राष्ट्रपति पद पर उनका चयन इसी सेवा की व्यापक मान्यता के रूप में देखा गया।

जिस निर्णय ने राजनीति की दिशा बदली

2004 का यह निर्णय अगले एक दशक तक भारतीय शासन को प्रभावित करता रहा। इसने सोनिया गांधी की गठबंधन नेता के रूप में स्थिति को मजबूत किया, कांग्रेस की केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया को स्थापित किया और मनमोहन सिंह के कार्यकाल को राजनीतिक निगरानी के तहत आर्थिक प्रबंधन के रूप में परिभाषित किया।

प्रणब मुखर्जी के लिए यह क्षण एक मोड़ साबित हुआ — जहाँ वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार से संविधान के संरक्षक की भूमिका की ओर बढ़े।

निष्कर्ष: सत्ता और संतुलन की राजनीति

मनमोहन सिंह का चयन कोई राजनीतिक संयोग नहीं था, बल्कि गठबंधन यथार्थ और नेतृत्व शैली पर आधारित एक सुनियोजित निर्णय था।
हालाँकि प्रणब मुखर्जी सबसे अनुभवी दावेदार थे, लेकिन सोनिया गांधी ने स्थिरता, नियंत्रण और आर्थिक भरोसे को प्राथमिकता दी। यह प्रसंग गठबंधन काल के भारत में सत्ता के प्रयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है — जहाँ वरिष्ठता से अधिक रणनीति निर्णायक होती है, और क्षमता को राजनीतिक संतुलन के साथ चलना पड़ता है।

प्रणब मुखर्जी के कम चर्चित पहलू

प्रणब मुखर्जी (1935–2020), भारत के 13वें राष्ट्रपति और देश के सबसे लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले नेताओं में से एक, आमतौर पर वित्त, विदेश नीति और संसदीय प्रक्रियाओं पर उनकी पकड़ के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इन स्थापित भूमिकाओं से आगे भी उनके जीवन के कई ऐसे पहलू हैं, जो उन्हें केवल एक पेशेवर राजनेता नहीं, बल्कि एक चिंतनशील विद्वान-राजनेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

आत्ममंथन की आदत: डायरी लेखक

युवावस्था से ही प्रणब मुखर्जी ने विस्तृत निजी डायरी लिखने की आदत विकसित की थी, जिसे उन्होंने पूरे राजनीतिक जीवन में बनाए रखा। हजारों पन्नों में फैली ये डायरियाँ बाद में The Dramatic Decade और The Coalition Years जैसी उनकी पुस्तकों का आधार बनीं।
ये केवल आत्मकथात्मक विवरण नहीं थीं, बल्कि सत्ता, निर्णयों, व्यक्तियों और उनके परिणामों पर लगातार सोचने वाले मन का प्रतिबिंब थीं।

पत्रकारिता से जुड़ाव की शुरुआत

सक्रिय राजनीति में आने से पहले प्रणब मुखर्जी ने कुछ समय के लिए बंगाली अख़बार देशेर डाक में काम किया। यद्यपि यह अनुभव अल्पकालिक था, लेकिन इससे उनकी अभिव्यक्ति की स्पष्टता और विश्लेषणात्मक लेखन क्षमता निखरी, जो आगे चलकर संसद में उनके भाषणों और हस्तक्षेपों की पहचान बनी।

एकेडमिक दुनिया छोड़कर राजनीति का चुनाव

उच्च शिक्षा और कानून की डिग्री होने के बावजूद प्रणब मुखर्जी के पास एकेडमिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के स्पष्ट अवसर थे, जिनमें अध्यापन जैसे विकल्प भी शामिल थे। लेकिन उन्होंने सोच-समझकर इन अवसरों को ठुकराया और सार्वजनिक जीवन की अनिश्चित राह को चुना। यह निर्णय इस विश्वास को दर्शाता है कि उनका वास्तविक उद्देश्य शोध या शिक्षण नहीं, बल्कि शासन और जनसेवा में योगदान देना था। इसके बावजूद, उनके स्वभाव में विद्वत्ता हमेशा बनी रही।

ज्ञान और राजनीति का मेल

प्रणब मुखर्जी गहरे अध्ययनशील व्यक्ति थे और पुस्तकों के बड़े संग्राहक भी। उनका निजी पुस्तकालय हज़ारों पुस्तकों से भरा हुआ था। उनके भाषणों में अक्सर संविधान की समझ के साथ भारतीय महाकाव्यों, इतिहास और आर्थिक सिद्धांतों के संदर्भ मिलते थे। यही कारण था कि भारतीय राजनीति में उन्हें बौद्धिक रूप से सबसे मज़बूत नेताओं में गिना जाता था।

आपातकाल पर आत्ममंथन

अपने जीवन के उत्तरार्ध में प्रणब मुखर्जी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि 1975–77 का आपातकाल एक गंभीर भूल थी, जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर किया। अपने ही अतीत का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने की यह ईमानदारी उन्हें अपने कई समकालीन नेताओं से अलग खड़ा करती है और उनकी सार्वजनिक विरासत को गहराई देती है।

वैचारिक सीमाओं के पार संवाद

2018 में प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मंच से संबोधन किया। किसी पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रपति के लिए यह एक असाधारण कदम था। अपने भाषण में उन्होंने संवैधानिक राष्ट्रवाद, सहिष्णुता और संवाद पर ज़ोर दिया। यह उनके उस विश्वास को दर्शाता है कि लोकतंत्र की असली ताकत बहिष्कार में नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता में निहित होती है।

सुर्खियों से परे वैश्विक सम्मान

भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों के अतिरिक्त, प्रणब मुखर्जी को अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों से भी अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। भले ही इन सम्मानों पर ज़्यादा चर्चा नहीं हुई, लेकिन ये भारत के कूटनीतिक संबंधों को मज़बूत करने में उनके शांत और निरंतर योगदान को दर्शाते हैं।

संस्कृति और पारिवारिक जीवन

प्रणब मुखर्जी की पत्नी सुव्रा मुखर्जी रवींद्र संगीत की जानी-मानी गायिका थीं। उनकी कला और सांस्कृतिक रुचियों ने प्रणब मुखर्जी के भीतर बंगाली साहित्य और संगीत के प्रति आजीवन जुड़ाव को और गहरा किया। यह सांस्कृतिक आधार अक्सर उनके सार्वजनिक भाषणों में सूक्ष्म रूप से दिखाई देता था।


पद छोड़ने के बाद भी सक्रिय बौद्धिक जीवन

राष्ट्रपति पद से हटने के बाद भी प्रणब मुखर्जी बौद्धिक रूप से सक्रिय बने रहे। वे एकेडमिक संस्थानों में व्याख्यान देते रहे, लगातार लेखन करते रहे और राष्ट्रीय मुद्दों पर संतुलित व विचारशील टिप्पणी करते रहे। उनके लिए सेवानिवृत्ति सत्ता से दूरी का संकेत थी, न कि चिंतन और संवाद से अलगाव का।

कर्तव्य, संयम और सेवा की पहचान

ये कम चर्चित पहलू प्रणब मुखर्जी को केवल एक कुशल राजनीतिक रणनीतिकार से कहीं आगे दिखाते हैं। वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनका मार्ग अनुशासन, आत्ममंथन और संस्थाओं के प्रति गहरे सम्मान से तय होता था। उनका प्रभाव सिर्फ़ सत्ता से नहीं, बल्कि बौद्धिक समझ और संयम से भी उपजा। यही संतुलन उन्हें अपने समय के अन्य नेताओं से अलग करता है।

2004 में सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री न बनाकर मनमोहन सिंह को यह जिम्मेदारी सौंपी। इसके बावजूद प्रणब मुखर्जी ने व्यक्तिगत निराशा को राष्ट्रीय कर्तव्य से ऊपर नहीं रखा। उन्होंने इस निर्णय को संयम के साथ स्वीकार किया और पूरे समर्पण के साथ देश की सेवा जारी रखी।

चाहे रक्षा मंत्रालय हो, वित्त मंत्रालय, विदेश नीति हो या कमजोर गठबंधन सरकारों को संभालने की चुनौती — उन्होंने बिना किसी दिखावे के राष्ट्र का भार अपने कंधों पर उठाया। सत्ता शायद उनके पास नहीं आई, लेकिन कर्तव्य कभी उनसे दूर नहीं हुआ। अंततः प्रणब मुखर्जी ने यह साबित कर दिया कि राष्ट्रसेवा का मूल्य पदों से नहीं, बल्कि कार्य से आँका जाता है — और इसी कसौटी पर उनका योगदान भारतीय इतिहास में ऊँचा और निर्विवाद रूप से दर्ज है।

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