साम्राज्य अक्सर भय के सहारे टिके रहते हैं। छत्रपति संभाजी महाराज ने इसी भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया। बेड़ियों में जकड़े होने पर भी, यातनाओं से घिरे होने पर भी और एक विशाल साम्राज्यिक शक्ति के सामने खड़े होकर भी, उन्होंने झुकने से साफ इंकार कर दिया।
उनका साहस किसी क्षणिक आवेग का परिणाम नहीं था—वह सोच-समझकर लिया गया, अनुशासन से भरा और पूरी तरह अडिग निर्णय था।
वह सम्राट जिसने सिर नहीं झुकाया
छत्रपति संभाजी महाराज (14 मई 1657 – 11 मार्च 1689) मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति थे। 1681 में उन्होंने अपने पिता, छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद शासन संभाला।
उनका पूरा शासनकाल कठिन परिस्थितियों में बीता। लगातार युद्ध होते रहे, भीतर षड्यंत्र चलते रहे और मुगल सम्राट औरंगज़ेब से उनका सीधा और लगातार सामना रहा।
हालाँकि उनका शासनकाल लंबा नहीं था, फिर भी यह भारतीय प्रतिरोध के इतिहास में सबसे निर्णायक और साहस से भरा अध्याय माना जाता है।
प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण
संभाजी महाराज का जन्म पुणे के निकट पुरंदर किले में हुआ। कम आयु में ही उनकी माता सईबाई का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी जिजाबाई ने किया।
उन्होंने युद्धक प्रशिक्षण के साथ-साथ बौद्धिक शिक्षा भी प्राप्त की। संस्कृत, फारसी और मराठी में दक्षता के साथ उन्होंने शासन, कूटनीति और युद्धनीति से जुड़े शास्त्रों का अध्ययन किया। 1666 की पुरंदर संधि के बाद उन्हें बाल्यावस्था में आगरा के मुगल दरबार ले जाया गया। वहाँ उन्होंने साम्राज्यिक सत्ता को बहुत निकट से देखा—यह अनुभव आगे चलकर मुगल प्रभुत्व के प्रति उनके अडिग विरोध की नींव बना।
युवावस्था में पिता से मतभेदों के बावजूद, शिवाजी महाराज के निधन से पहले दोनों में पुनः मेल हुआ और संभाजी महाराज अत्यंत जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में सिंहासन पर आरूढ़ हुए।
शासन और प्रतिरोध
संभाजी महाराज को ऐसा साम्राज्य विरासत में मिला, जो चारों ओर से घिरा हुआ था। जहाँ शिवाजी महाराज का काल संगठन और विस्तार का था, वहीं संभाजी का शासन निरंतर रक्षा और संघर्ष की माँग करता था।
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मुगलों के विरुद्ध:
उन्होंने बार-बार होने वाले मुगल आक्रमणों को रोका, औरंगज़ेब को दक्कन में वर्षों तक उलझाए रखा और साम्राज्यिक संसाधनों को क्षीण कर दिया। -
पुर्तगालियों के विरुद्ध:
कोंकण तट और गोवा में आक्रामक अभियान चलाए, औपनिवेशिक शक्ति को चुनौती दी और जबरन धर्मांतरण का विरोध किया। -
जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध:
समुद्री शक्ति के महत्व को समझते हुए मराठा नौसेना का विस्तार किया।
प्रशासनिक रूप से उन्होंने शिवाजी महाराज की शासन-पद्धति को बनाए रखा—स्वराज्य, धार्मिक सहिष्णुता और स्वदेशी संस्थाओं की रक्षा।
विद्वत्ता और राज्यकला
अक्सर अनदेखा किया गया पक्ष यह है कि संभाजी महाराज एक गंभीर विद्वान भी थे। उनका संस्कृत ग्रंथ ‘बुधभूषण’ राजनीति, नैतिकता और राजधर्म पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।
वे विद्वानों और कवियों के संरक्षक थे—एक ऐसे शासक का आदर्श, जो तलवार और शास्त्र—दोनों में समान निष्ठा रखता था।
यातना और बलिदान
फरवरी 1689 में, संगमेश्वर के निकट, एक निकट संबंधी के विश्वासघात के कारण संभाजी महाराज बंदी बना लिए गए। उन्हें तुलापुर ले जाया गया, जहाँ औरंगज़ेब ने उन पर भीषण यातनाएँ दीं और इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला। संभाजी महाराज ने इनकार कर दिया।
सप्ताहों की क्रूर यातना के बाद, 11 मार्च 1689 को उनका वध कर दिया गया। जो घटना साम्राज्यिक आतंक का प्रदर्शन बननी थी, वही मराठा प्रतिरोध की नई ज्वाला बन गई। इसी बलिदान ने उन्हें ‘धर्मवीर’ की अमर उपाधि दिलाई।
विरासत
संभाजी महाराज की शहादत से मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई—वह और अधिक सुदृढ़ हुई। राजाराम और बाद में शाहू प्रथम के नेतृत्व में मराठाओं ने पुनर्गठन किया और आगे चलकर मुगल सत्ता के पतन को तेज़ किया।
आज संभाजी महाराज को स्मरण किया जाता है—
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उस शासक के रूप में, जिसने आत्मसमर्पण से बेहतर मृत्यु को चुना
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सांस्कृतिक और धार्मिक स्वायत्तता के रक्षक के रूप में
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एक विद्वान-योद्धा के रूप में, जिसकी दृढ़ता साम्राज्यिक भय से कहीं बड़ी थी
उनकी स्मृति महाराष्ट्र और पूरे भारत में स्मारकों, संभाजी जयंती, साहित्य और शोध के माध्यम से जीवित है।
ऐतिहासिक मूल्यांकन
संभाजी महाराज का शासन मराठा राज्य की सबसे कठिन परीक्षा था। विश्वासघात और अत्यधिक बल के बावजूद उनका झुकने से इनकार ही मराठा संप्रभुता को बचा सका।
आधुनिक राजनीति चाहे उनकी छवि का उपयोग करे, किंतु इतिहास उन्हें प्रारंभिक आधुनिक भारत के सबसे प्रखर साम्राज्य-विरोधी नेताओं में स्थापित करता है।
संघर्ष में खड़ा उत्तराधिकारी
छत्रपति संभाजी महाराज केवल शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारी नहीं थे— वे वह ढाल थे, जिसने साम्राज्य पर आई सबसे बड़ी चोट को स्वयं झेला।
उन्होंने अल्पकाल तक शासन किया। उन्होंने असहनीय यातनाएँ सही। लेकिन— उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।
आगरा से पलायन (1666): शिवाजी महाराज, संभाजी और साम्राज्य को दी गई चुनौती
संदर्भ और बंदी जीवन
1666 में दक्कन की उभरती शक्ति और मराठा राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज अपने नौ वर्षीय पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के साथ आगरा पहुँचे। यह यात्रा मुगल सम्राट औरंगज़ेब के निमंत्रण पर हुई थी, जो औपचारिक रूप से उसके पचासवें जन्मदिवस के अवसर पर भेजा गया था।
हालाँकि यह निमंत्रण केवल सम्मान का संकेत नहीं था। शिवाजी महाराज का बढ़ता प्रभाव मुगल दरबार को असहज कर रहा था, और आगरा औरंगज़ेब के लिए अपने सबसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी को नियंत्रण में लेने का अवसर था।
12 मई 1666 को शिवाजी महाराज आगरा पहुँचे और उन्हें शाही दरबार में बुलाया गया। वहाँ उन्हें जानबूझकर छोटे दर्जे के मनसबदारों के बीच बैठाया गया—यह एक सोची-समझी अपमानजनक व्यवस्था थी। शिवाजी महाराज ने इसका खुला विरोध किया और दरबार छोड़ दिया। इससे औरंगज़ेब क्रोधित हो गया।
इसके तुरंत बाद शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज को कड़ी निगरानी में एक भवन में नज़रबंद कर दिया गया। उनकी गतिविधियाँ पूरी तरह नियंत्रित कर दी गईं।
आसन्न संकट और रणनीतिक छल
शीघ्र ही शिवाजी महाराज को यह सूचना मिली कि औरंगज़ेब उन्हें या तो कंधार जैसे दूरस्थ सीमांत क्षेत्र में निर्वासित करने या फिर समाप्त करने पर विचार कर रहा है। अपने जीवन और मराठा राज्य—दोनों पर मंडराते खतरे को समझते हुए शिवाजी महाराज ने धैर्य और गहरी मानसिक समझ पर आधारित एक पलायन योजना बनानी शुरू की।
उन्होंने गंभीर बीमारी का नाटक किया और स्वयं को बिस्तर पर पड़ा हुआ बताया। इसके साथ ही उन्होंने धार्मिक पश्चाताप और स्वस्थ होने की प्रार्थना के रूप में साधुओं और मंदिरों में मिठाई व फल वितरित करने की अनुमति माँगी। यह अनुरोध सामान्य और निर्दोष लगा, इसलिए अनुमति दे दी गई।
समय के साथ प्रतिदिन बड़े-बड़े टोकरों में प्रसाद बाहर भेजा जाने लगा। शुरू में इन टोकरों की सख़्त जाँच होती थी, लेकिन धीरे-धीरे पहरेदार इस प्रक्रिया के आदी हो गए और जाँच औपचारिक रह गई।
इसी दौरान शिवाजी महाराज ने बीमारी का हवाला देकर अपने अधिकांश सेवकों को धीरे-धीरे महाराष्ट्र वापस भेज दिया। अंततः केवल कुछ विश्वस्त सहयोगी—हिरोजी फरज़ंद और मदारी मेहतर—ही अंतिम योजना के लिए साथ रहे।
पलायन की रात
19 अगस्त 1666 की रात (कुछ विवरणों में 17 अगस्त का भी उल्लेख मिलता है) इस योजना को अमल में लाया गया।
शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज रोज़ भेजे जाने वाले मिठाइयों के टोकरों में छिप गए। शिवाजी महाराज की मौजूदगी का भ्रम बनाए रखने के लिए कुछ सेवक या समान कद-काठी वाले व्यक्ति बिस्तर पर ढँककर निश्चल पड़े रहे।
हिरोजी फरज़ंद और मदारी मेहतर ने कुलियों का वेश धारण किया और टोकरों को पहरेदारों के सामने से बाहर ले गए। केवल औपचारिक जाँच के बाद उन्हें जाने की अनुमति मिल गई।
नगर से बाहर निकलते ही शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज टोकरों से बाहर आए और मुगल क्षेत्र से होकर एक अत्यंत जोखिमपूर्ण यात्रा पर निकल पड़े।
वे पहचान से बचने के लिए बार-बार भेष बदलते रहे— कभी साधु बनकर कभी साधारण यात्री के रूप में और सीधे मार्गों के बजाय
घुमावदार रास्तों से आगे बढ़ते रहे। लगभग तीन महीनों की इस गुप्त और कठिन यात्रा के बाद 20 नवंबर 1666 को वे सुरक्षित रूप से महाराष्ट्र पहुँच गए।
परिणाम और रणनीतिक प्रभाव
अगले दिन औरंगज़ेब को इस पलायन की जानकारी मिली और उसने व्यापक खोज अभियान का आदेश दिया, लेकिन तब तक शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज बहुत दूर निकल चुके थे। मुगल गुप्तचर व्यवस्था को भ्रमित करने के लिए शिवाजी महाराज ने बाद में संभाजी महाराज के लिए प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी कराया, जिससे यह धारणा फैली कि यात्रा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई है। इससे संभाजी महाराज मुगल निगरानी से बाहर हो गए।
यह पलायन केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं था, बल्कि एक गहरा रणनीतिक और मानसिक विजय था। इससे मुगल दरबार को अपमानित होना पड़ा, मराठा मनोबल पुनः सशक्त हुआ और शिवाजी महाराज की छवि एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित हुई, जो बल नहीं, बल्कि बुद्धि से साम्राज्य को मात दे सकता था।
बालक संभाजी महाराज के लिए यह अनुभव अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुआ। वे 1680 में अपने पिता के उत्तराधिकारी बने और 1689 में अपने बलिदान तक मराठा प्रतिरोध का नेतृत्व करते रहे।
ऐतिहासिक महत्व
आगरा से पलायन भारतीय इतिहास की सबसे असाधारण घटनाओं में गिना जाता है। इसने यह सिद्ध किया कि साम्राज्यिक शक्ति को केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, अनुशासन और रणनीतिक छल से भी पराजित किया जा सकता है। यह केवल साहसिक पलायन नहीं था, बल्कि संप्रभुता की स्पष्ट घोषणा थी।
आज भी यह घटना प्रतिरोध, रणनीतिक प्रतिभा और अधीनता से इनकार का प्रतीक बनी हुई है—जो भारतीय ऐतिहासिक स्मृति और मराठा परंपरा में गहराई से अंकित है।
छत्रपति संभाजी महाराज के प्रारंभिक सैन्य अभियान
सत्ता ग्रहण और रणनीतिक दृष्टि
1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद आंतरिक षड्यंत्रों और बाहरी शत्रुता के बीच छत्रपति संभाजी महाराज ने मराठा राज्य की बागडोर संभाली। यद्यपि उनका औपचारिक राज्याभिषेक जुलाई 1680 में पन्हाला में हुआ, परंतु उससे पहले ही वे रायगढ़ पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर चुके थे।
शिवाजी महाराज के शासनकाल के स्थिरीकरण चरण के विपरीत, संभाजी महाराज को एक ऐसे राज्य का नेतृत्व करना पड़ा जो तत्काल संकट में था। औरंगज़ेब के अधीन मुगल साम्राज्य, जंजीरा के सिद्दी, पुर्तगाली शक्तियाँ और दक्षिणी राज्य—सभी निरंतर चुनौती बने हुए थे। संभाजी महाराज ने गतिशीलता, अचानक आक्रमण, आपूर्ति-श्रृंखला को बाधित करने और बड़े निर्णायक युद्धों से बचने की रणनीति अपनाई।
बुरहानपुर अभियान (1680–1681)
संभाजी महाराज ने सत्ता संभालते ही मुगल क्षेत्रों में आक्रामक छापों से अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। 1680 के अंत में मराठा सेनाओं ने सूरत, खानदेश और औरंगाबाद के आसपास के क्षेत्रों में एक साथ आक्रमण कर मुगल रक्षा व्यवस्था पर दबाव डाला।
फरवरी 1681 में संभाजी महाराज ने स्वयं बुरहानपुर—एक प्रमुख मुगल प्रशासनिक केंद्र—पर निर्णायक हमला किया। मराठों ने स्थानीय सैन्य बल को पराजित किया, पर्याप्त संपत्ति प्राप्त की और प्रतिकार से पहले ही लौट आए। इस अभियान ने मुगल प्रशासन को अस्थिर किया और औरंगज़ेब को अपने क्षेत्रीय सूबेदार को हटाने पर मजबूर किया।
नौसैनिक महत्वाकांक्षा और जंजीरा अभियान (1681–1682)
पश्चिमी तट के रणनीतिक महत्व को समझते हुए संभाजी महाराज ने जंजीरा के सिद्दियों को कमजोर करने का प्रयास किया। प्रारंभिक अभियानों में असफलता मिली और भारी क्षति हुई। इसके बाद जंजीरा का लंबा घेरा डाला गया, जिसमें तोपखाने, बड़ी सैन्य तैनाती और पत्थर का मार्ग बनाने जैसे प्रयास शामिल थे।
अंदर से किले को कमजोर करने के लिए गुप्त एजेंट भी भेजे गए, लेकिन योजना उजागर हो गई। मानसून और मुगल सेना के दबाव के कारण 1682 में यह अभियान छोड़ना पड़ा। इसके बाद बंबई के पास नौसैनिक संघर्ष भी मराठों के पक्ष में नहीं रहे।
पुर्तगालियों से संघर्ष (1682–1684)
पुर्तगालियों से संभाजी महाराज की शत्रुता का कारण उनका मुगलों से गठजोड़ और तटीय क्षेत्रों पर नियंत्रण था। प्रारंभिक प्रयासों के बाद संघर्ष कोंकण और गोवा तक फैल गया।
1683 में मराठों ने कई पुर्तगाली द्वीपों पर कब्ज़ा किया। 1684 में बारदेज़ और साल्सेट पर आक्रमण कर मुगल आपूर्ति मार्ग बाधित किए गए। सैन्य दृष्टि से सफल होने के बावजूद यह अभियान संसाधनों पर भारी पड़ा और मुगल हस्तक्षेप के कारण समाप्त हुआ। इसी अवधि में संभाजी महाराज ने हथियारों के लिए बंबई के अंग्रेज़ों से सीमित सहयोग भी किया।
राजकुमार अकबर से गठबंधन और मुगल दबाव
1681 में औरंगज़ेब के विद्रोही पुत्र राजकुमार मुहम्मद अकबर ने मराठा क्षेत्र में शरण ली। इस गठबंधन से मुगल आक्रमण और तीव्र हो गए।
इसके बावजूद मराठा किले टिके रहे। 1682 में रामसेज किले की लंबी मुगल घेराबंदी विफल रही। 1683 में शिर्के वंश से जुड़ा षड्यंत्र उजागर हुआ और दबा दिया गया, जिससे मराठा सत्ता की आंतरिक चुनौतियाँ भी सामने आईं।
मैसूर अभियान (1686)
1686 में संभाजी महाराज ने मैसूर के शासक चिक्कदेवराज वोडेयार के विरुद्ध दक्षिणी अभियान का नेतृत्व किया। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति अपनाते हुए मराठों ने मैसूर को संधि और कर देने के लिए बाध्य किया।
प्रारंभिक अभियानों का मूल्यांकन
लगातार दबाव और सीमित संसाधनों के बीच लड़े गए ये अभियान मराठा राज्य के लिए जीवन-रक्षक सिद्ध हुए। यद्यपि कुछ नौसैनिक प्रयास असफल रहे, परंतु गति, गुप्तचर तंत्र और व्यवधान की रणनीति ने लगभग एक दशक तक मुगल वर्चस्व को रोके रखा।
संभाजी महाराज के शासनकाल में सौ से अधिक सैन्य कार्रवाइयों का उल्लेख मिलता है। इन अभियानों ने 1689 में उनके बलिदान के बाद भी मराठा प्रतिरोध की नींव बनाए रखी।
झुका नहीं, लड़ा
छत्रपति संभाजी महाराज के प्रारंभिक सैन्य अभियान एक ऐसे शासक को दर्शाते हैं जो घेराबंदी की स्थिति में भी अडिग रहा। अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में उन्होंने समर्पण के बजाय प्रतिरोध और स्थिरता के बजाय गतिशीलता को चुना।
यद्यपि उनका शासन हिंसक अंत तक पहुँचा, लेकिन इन अभियानों ने यह सुनिश्चित किया कि मराठा राज्य जीवित रहे और साम्राज्यिक विजय को अपरिहार्य न बनने दिया जाए।
छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन और उत्तराधिकार संकट (1680)
मराठा राज्य के स्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन 3 अप्रैल 1680 को रायगढ़ किले में हुआ। लगभग बारह दिनों तक चली गंभीर बीमारी के बाद उन्होंने दोपहर बाद प्राण त्यागे। मृत्यु के कारणों पर मतभेद हैं, किंतु अधिकांश इतिहासकार इसे प्राकृतिक मानते हैं।
उनके पीछे दो पुत्र थे—छत्रपति संभाजी महाराज और राजाराम। वैध उत्तराधिकारी होने के बावजूद, शिवाजी महाराज के अंतिम दिनों में संभाजी महाराज रायगढ़ में उपस्थित नहीं थे और पन्हाला में नजरबंद थे।
रायगढ़ में शीघ्र अंतिम संस्कार किया गया। शिवाजी महाराज के निधन का समाचार पूरे मराठा क्षेत्र में फैल गया और राज्य की स्थिरता को लेकर गहरी चिंता उत्पन्न हुई।
छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा दरबार में सत्ता को लेकर तीव्र आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया। उस समय लगभग बीस वर्ष के संभाजी महाराज के पास उत्तराधिकार का सबसे मज़बूत वैधानिक दावा था, लेकिन उनके पिता से पूर्व में हुए मतभेदों के कारण स्थिति जटिल बनी हुई थी।
उत्तराधिकार का संघर्ष
1678 में संभाजी महाराज ने कुछ समय के लिए दिलेर ख़ान के नेतृत्व वाले मुगलों से संपर्क किया था, हालाँकि 1679 में वे पुनः मराठा सेवा में लौट आए। इसके बावजूद उनके आचरण और निष्ठा को लेकर संदेह बना रहा। इन्हीं कारणों से उन्हें नजरबंद किया गया, जिससे उत्तराधिकार के निर्णायक क्षण में उनकी स्थिति कमजोर हो गई।
इस अनिश्चितता का लाभ उठाते हुए शिवाजी महाराज की दूसरी पत्नी सोयराबाई—जो राजाराम की माता थीं—ने दरबार के एक गुट का नेतृत्व किया और अपने दस वर्षीय पुत्र को गद्दी पर बैठाने का प्रयास किया। उन्हें अष्टप्रधान परिषद के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेष रूप से अन्नाजी दत्तो और मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले, का समर्थन प्राप्त था।
इस गुट ने संभाजी महाराज की शासन-क्षमता पर प्रश्न उठाए और कुछ स्रोतों के अनुसार उनके निधन या अक्षम होने की अफ़वाहें भी फैलाई गईं।
21 अप्रैल 1680 को रायगढ़ में जल्दबाज़ी में राजाराम का राज्याभिषेक कर दिया गया और सोयराबाई ने संरक्षिका (रेजेंट) के रूप में शासन संभाला। संभाजी महाराज के समर्थकों को गिरफ़्तार किया गया और पन्हाला में उन्हें स्थायी रूप से निष्क्रिय करने के प्रयास किए गए।
संभाजी महाराज का उदय
इन सभी प्रयासों के बावजूद संभाजी महाराज को कई प्रमुख सैन्य नेताओं का समर्थन प्राप्त रहा, विशेष रूप से मराठा सेनापति हंबीरराव मोहिते का। विश्वस्त अधिकारियों और अपनी पत्नी येसुबाई के सहयोग से संभाजी महाराज नजरबंदी से निकलने में सफल हुए।
उन्होंने शीघ्र ही सेना संगठित की और रायगढ़ की ओर कूच किया।
18 जून 1680 को संभाजी महाराज ने लगभग बिना किसी बड़े प्रतिरोध के रायगढ़ पर अधिकार कर लिया। षड्यंत्र में शामिल प्रमुख व्यक्तियों को गिरफ़्तार किया गया। अल्पवयस्क होने के कारण राजाराम को पद से हटाया गया, लेकिन उन्हें क्षति नहीं पहुँचाई गई।
जिन्हें तख़्तापलट का मुख्य सूत्रधार माना गया, उन्हें राजद्रोह के आरोप में दंडित किया गया। सोयराबाई की मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं—कुछ स्रोत इसे आत्महत्या बताते हैं, कुछ फाँसी, और कुछ अस्पष्ट परिस्थितियों में हुई मृत्यु के रूप में उल्लेख करते हैं।
20 जुलाई 1680 को संभाजी महाराज का औपचारिक रूप से छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक हुआ, जिससे उनकी सत्ता सुदृढ़ हुई। कुछ विवरणों में बाद में एक अतिरिक्त औपचारिक पुष्टि समारोह का भी उल्लेख मिलता है।
निर्णय जिन्होंने राज्य बचाया
इस उत्तराधिकार संकट ने मराठा अभिजात वर्ग के भीतर गहरे मतभेदों को उजागर किया, किंतु इसके शीघ्र समाधान ने अंततः संभाजी महाराज की स्थिति को और मजबूत किया। बाहरी ख़तरों से घिरे इस समय में उनके कठोर निर्णयों ने आंतरिक विरोध को समाप्त किया और उन्हें प्रशासन को पुनर्गठित करने का अवसर दिया।
यद्यपि इन कठोर कार्रवाइयों के कारण उनकी छवि एक सख़्त शासक के रूप में बनी, लेकिन उनके राज्यारोहण ने शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित संप्रभुता को सुरक्षित रखा और शासन की निरंतरता सुनिश्चित की।
सिंहासन की रक्षा
छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन मराठा इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इसके बाद का संक्षिप्त लेकिन तीव्र सत्ता संघर्ष उस राज्य की दृढ़ता की परीक्षा था, जिसे उन्होंने स्थापित किया था।
नजरबंदी से निकलकर राज्याभिषेक तक पहुँचना संभाजी महाराज के लिए अचानक और हिंसक प्रक्रिया थी, किंतु इसी ने उस समय राज्य के विघटन को रोका। सिंहासन सुरक्षित कर उन्होंने शिवाजी महाराज की विरासत को एक नए और अधिक संघर्षपूर्ण चरण में आगे बढ़ाया—और यह सुनिश्चित किया कि मराठा राज्य अपने संस्थापक के बाद भी जीवित और सशक्त बना रहे।
छत्रपति संभाजी महाराज के राज्याभिषेक की पृष्ठभूमि
3 अप्रैल 1680 को छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बाद मराठा राज्य अत्यंत संवेदनशील अवस्था में आ गया। बाहरी शक्तियाँ सत्ता परिवर्तन का लाभ उठाने की प्रतीक्षा में थीं और आंतरिक प्रतिस्पर्धाएँ स्थिरता के लिए खतरा बन चुकी थीं।
संक्षिप्त लेकिन तीव्र उत्तराधिकार संघर्ष के बाद, जून 1680 के मध्य तक संभाजी महाराज निर्विवाद और वैध शासक के रूप में उभरे।
तत्काल परिस्थितियों में उन्होंने 20 जुलाई 1680 को पन्हाला किले में राजसत्ता संभाली। यह औपचारिक राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि संकट के समय में संप्रभुता की आवश्यक घोषणा थी। उस समय मराठा राज्य को औरंगज़ेब के नेतृत्व वाले मुगल साम्राज्य, जंजीरा के सिद्दी, पश्चिमी तट के पुर्तगाली और दक्षिण के शत्रु राज्यों से एक साथ चुनौती मिल रही थी। सत्ता का शीघ्र सुदृढ़ीकरण अनिवार्य था।
इसके बावजूद संभाजी महाराज यह समझते थे कि एक विधिवत राज्याभिषेक अत्यंत आवश्यक है। इससे शासन को वैधता मिलेगी, आंतरिक एकता मज़बूत होगी और शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित मराठा स्वराज्य की निरंतरता सार्वजनिक रूप से स्थापित होगी। इसलिए रायगढ़ किले—मराठा शक्ति के प्रतीक और 1674 के राज्याभिषेक स्थल—पर भव्य राजाभिषेक का निर्णय लिया गया।
जुलाई 1680 से जनवरी 1681 के बीच का समय रणनीतिक रूप से उपयोग किया गया। संभाजी महाराज ने शेष षड्यंत्रों को समाप्त किया, प्रशासन का पुनर्गठन किया और सेना की निष्ठा सुनिश्चित की।
हंबीरराव मोहिते को पुनः सेनापति नियुक्त किया गया, जबकि कवि कलश एक प्रमुख राजनीतिक और बौद्धिक सहयोगी के रूप में उभरे। इसी अवधि में प्रारंभिक सैन्य कार्रवाइयों ने राज्य को स्थिर किया।
राज्याभिषेक समारोह (16 जनवरी 1681)
16 जनवरी 1681 को रायगढ़ किले में संभाजी महाराज का औपचारिक राज्याभिषेक सम्पन्न हुआ। हिंदू राजपरंपरा के अनुसार शुभता सुनिश्चित करने के लिए यह तिथि ज्योतिषीय परामर्श से तय की गई थी।
इस समारोह के साथ संभाजी महाराज मराठा राज्य के द्वितीय छत्रपति के रूप में विधिवत सिंहासन पर आसीन हुए। यद्यपि उपलब्ध विवरण शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक जितने विस्तृत नहीं हैं, फिर भी अनुष्ठान वैदिक और तांत्रिक परंपराओं के अनुरूप सम्पन्न हुए।
इनमें शुद्धिकरण विधि, यज्ञ (होम), मंत्रोच्चार और पवित्र जल से अभिषेक शामिल था—जो दैवी स्वीकृति और नैतिक दायित्व का प्रतीक था। विद्वान ब्राह्मणों ने अनुष्ठान संपन्न कराए, जबकि मराठा सरदारों, सैन्य अधिकारियों और दरबारी सदस्यों ने निष्ठा की शपथ ली।
संभाजी महाराज पूर्ण राजसी वेश में उपस्थित हुए, शस्त्र और राजचिह्न धारण किए—जो उनके शासक और राज्यरक्षक, दोनों रूपों को दर्शाते थे। यह समारोह हिंदू राजसत्ता और स्वतंत्रता पर विशेष बल देता था तथा मुगल अधीनता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता था।
रायगढ़ को भव्य रूप से सजाया गया। संगीत, भोज और सार्वजनिक उत्सवों ने इस राज्याभिषेक को मराठा संप्रभुता की सामूहिक घोषणा में बदल दिया।
राज्याभिषेक के बाद: परिणाम और ऐतिहासिक महत्व
राज्याभिषेक के बाद संभाजी महाराज ने स्वयं को एक स्वतंत्र और दृढ़ शासक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अपने नाम से सिक्के जारी किए, प्रशासनिक केंद्रीकरण को मज़बूत किया और धार्मिक सहिष्णुता की नीति को बनाए रखते हुए हिंदू संस्थाओं की सक्रिय रूप से रक्षा की। संस्कृत शिक्षा और दरबारी संस्कृति को संरक्षण देकर उन्होंने शिवाजी महाराज की वैचारिक परंपरा को आगे बढ़ाया।
राज्याभिषेक ने मराठा सत्ता के भीतर मौजूद विभिन्न गुटों को एकजुट किया और दीर्घकालिक सैन्य अभियानों के लिए आवश्यक वैधता प्रदान की। कुछ ही महीनों के भीतर, 1681 में बुरहानपुर पर आक्रमण जैसे बड़े सैन्य अभियान आरंभ किए गए। साथ ही, उनका औपचारिक राज्यारोहण मुगल सत्ता के लिए खुली चुनौती था, जिससे औरंगज़ेब ने मराठों के विरुद्ध अपने प्रयास और तेज़ कर दिए। इसके साथ ही लंबे और कठिन युद्धकाल की शुरुआत हुई।
इतिहास में संभाजी महाराज का राज्याभिषेक निरंतरता और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। यह ऐसे समय में हुआ जब स्वराज्य का अस्तित्व संकट में था। यद्यपि 1689 में उनका अंत बलिदान के रूप में हुआ, लेकिन राज्याभिषेक से प्राप्त वैधता ने उनके उत्तराधिकारियों के समय मराठा पुनरुत्थान को संभव बनाया और अंततः मुगल प्रभुत्व के पतन में योगदान दिया।
आज 16 जनवरी को छत्रपति संभाजी महाराज राज्याभिषेक दिवस के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन स्मरण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और ऐतिहासिक चिंतन के माध्यम से उस शासक को श्रद्धांजलि दी जाती है, जिसने साहस, सिद्धांत और बलिदान के माध्यम से स्वराज्य की रक्षा की।
संभाजी महाराज के विस्तार और विजय अभियान: रणनीति, विस्तार और सीमाएँ
छत्रपति संभाजी महाराज (1680–1689) का शासनकाल निरंतर युद्ध और विस्तार का काल था। शिवाजी महाराज से विरासत में मिला मराठा राज्य उस समय एक साथ कई शक्तियों से घिरा हुआ था—औरंगज़ेब के नेतृत्व वाला मुगल साम्राज्य, जंजीरा के सिद्दी, गोवा के पुर्तगाली और दक्षिण में मैसूर राज्य।
जहाँ कई शासक स्थिरता के लिए सीमाओं को सुरक्षित करने पर ध्यान देते, वहीं संभाजी महाराज ने स्थायी संघर्ष की रणनीति अपनाई। उनका उद्देश्य केवल क्षेत्र विस्तार नहीं था, बल्कि शत्रु की शक्ति को निरंतर बाधित करके स्वराज्य का अस्तित्व बनाए रखना था। नौ वर्षों में उन्होंने सौ से अधिक सैन्य कार्रवाइयों का नेतृत्व किया या उनमें भाग लिया। वे स्थायी कब्ज़े के बजाय गति, गुप्त सूचना और छापामार युद्ध पर निर्भर रहे।
उत्तरी और पश्चिमी अभियान (1680–1684)
शुरुआती वर्षों में संभाजी महाराज ने उत्तर और पश्चिम भारत में मुगल शासन की आर्थिक और सैन्य कमजोरियों को निशाना बनाया। 1680 के अंत में सूरत, खानदेश और औरंगाबाद के आसपास एक साथ छापे मारे गए, जिससे मुगल प्रशासन पर भारी दबाव पड़ा।
फरवरी 1681 में बुरहानपुर पर किया गया आक्रमण सबसे प्रभावशाली रहा। संभाजी महाराज ने स्वयं इस अभियान का नेतृत्व किया। मराठा सेना ने मुगल चौकी को पराजित किया, विशाल धन पर अधिकार किया और समय रहते लौट गई। यद्यपि कोई क्षेत्र स्थायी रूप से नहीं जोड़ा गया, लेकिन इस आक्रमण ने मुगल शासन को गहरा आघात पहुँचाया और स्थानीय सूबेदार को हटाना पड़ा।
पश्चिमी तट पर जंजीरा के सिद्दियों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए गए। 1681–1682 के बीच जंजीरा और उंदेरी द्वीप पर कई प्रयास असफल रहे—मजबूत किलेबंदी, मानसून और मुगल हस्तक्षेप के कारण। फिर भी सिद्दी नौसैनिक शक्ति कुछ समय के लिए सीमित हुई।
पुर्तगालियों के साथ संघर्ष भी तेज़ हुआ। 1683–1684 में बार्देज़ और सासष्टी के अभियान मुगल आपूर्ति मार्गों को बाधित करने के उद्देश्य से किए गए। कुछ किले और द्वीप अस्थायी रूप से कब्ज़े में लिए गए, परंतु मुगल-पुर्तगाली सहयोग के कारण मराठों को पीछे हटना पड़ा।
दक्षिणी विस्तार और मैसूर अभियान (1681–1686)
संभाजी महाराज की सबसे उल्लेखनीय सैन्य सफलता दक्षिण भारत में रही। शिवाजी महाराज की कर्नाटक नीति को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने मैसूर के शासक चिक्कदेवराज वोडेयार के विरुद्ध अभियान चलाया। प्रारंभिक प्रतिरोध के बावजूद, 1682 तक मराठों को निर्णायक सफलता मिली।
इस संघर्ष का अंत संधि के साथ हुआ, जिसके अंतर्गत मैसूर ने भारी कर स्वीकार किया और मराठा सैन्य प्रभुत्व को मान्यता दी। इससे दक्षिणी व्यापार मार्ग खुले और वर्तमान कर्नाटक तक मराठा प्रभाव फैला। यद्यपि इन लाभों को पूरी तरह संस्थागत रूप नहीं दिया जा सका, फिर भी यह संभाजी के शासनकाल में मराठा राज्य की सबसे दक्षिणी सीमा थी।
अंतिम वर्ष और रक्षात्मक युद्ध (1685–1689)
1685 के बाद औरंगज़ेब स्वयं विशाल सेना के साथ दक्कन में उतर आया। शक्ति संतुलन बदल गया। संभाजी महाराज ने प्रत्यक्ष युद्ध से बचते हुए मुगल आपूर्ति लाइनों पर निरंतर आक्रमण किए। खानदेश और कर्नाटक में मुगल सेनाओं को बार-बार पीछे हटना पड़ा।
हालाँकि, नुकसान भी बढ़ते गए। 1687 में सेनापति हंबीरराव मोहिते की मृत्यु से नेतृत्व कमजोर हुआ। कई किले युद्ध से नहीं, बल्कि विश्वासघात से गिरे। इसके बावजूद संभाजी महाराज ने संघर्ष जारी रखा और 1689 में अपनी गिरफ़्तारी तक मुगलों को निर्णायक विजय नहीं लेने दी।
मूल्यांकन और विरासत
संभाजी महाराज के अभियानों से कोई स्थायी साम्राज्य नहीं बना, लेकिन उन्होंने मराठा स्वतंत्रता को सबसे कठिन समय में जीवित रखा। उनके युद्धों ने मुगल साम्राज्य को थका दिया, संसाधनों को नष्ट किया और मराठा प्रतिरोध को उनके बाद भी जारी रहने योग्य बनाया।
उनकी विजय अस्थायी थीं, लेकिन उनका प्रभाव स्थायी रहा। इन्हीं अभियानों ने आगे चलकर मराठा पुनरुत्थान और मुगल शक्ति के क्षरण की नींव रखी।
इस अर्थ में, संभाजी महाराज केवल विस्तारवादी शासक नहीं थे—वे वह ढाल थे, जिसने स्वराज्य को उस समय बचाए रखा जब उसका अस्तित्व सबसे अधिक संकट में था।
गिरफ़्तारी
1 फ़रवरी 1689 को मुगल सेनाओं ने संगमेश्वर के निकट मराठा शिविर पर अचानक आक्रमण किया। संभाजी महाराज के सैनिकों ने साहसपूर्वक प्रतिरोध किया, लेकिन संख्या और रणनीतिक स्थिति में वे कमजोर थे। कई घंटों के संघर्ष के बाद संभाजी महाराज और कवि कलश को जीवित पकड़ लिया गया।
उन्हें बेड़ियों में जकड़कर भारी सुरक्षा के बीच तुलापुर के पास बहादुरगढ़ स्थित औरंगज़ेब के शिविर में ले जाया गया। यह यात्रा जानबूझकर लंबी रखी गई, ताकि किसी भी बचाव प्रयास को रोका जा सके और पूरे क्षेत्र में मुगल सत्ता का प्रदर्शन किया जा सके।
दबाव और अस्वीकार
शिविर में पहुँचते ही संभाजी महाराज को योजनाबद्ध अपमान का सामना करना पड़ा। इसका उद्देश्य उनकी राजकीय वैधता को तोड़ना और मराठा मनोबल को गिराना था।
औरंगज़ेब ने सशर्त दया का प्रस्ताव रखा—इस्लाम स्वीकार करना, मराठा किलों की जानकारी देना और मुगल सत्ता को स्वीकार करना।
संभाजी महाराज ने बिना किसी हिचक के सभी शर्तें अस्वीकार कर दीं। उनका इनकार पूर्ण था—राजनीतिक, वैचारिक और धार्मिक। कवि कलश ने भी उसी दृढ़ता के साथ किसी भी प्रकार के सहयोग से इनकार किया।
जिससे संघर्ष नहीं रुका
कई सप्ताह की कैद और असफल दबाव के बाद, 11 मार्च 1689 को तुलापुर में भीमा और इंद्रायणी नदियों के संगम पर संभाजी महाराज और कवि कलश का वध कर दिया गया।
इस निष्पादन का उद्देश्य विद्रोह को अंतिम रूप से कुचलना था। यह उद्देश्य पूरा नहीं हुआ।
प्रतिरोध का अंत नहीं
औरंगज़ेब को विश्वास था कि संभाजी महाराज की मृत्यु से मराठा प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा। इसके विपरीत, नेतृत्व राजाराम महाराज के हाथों में चला गया, जिन्होंने दक्षिण से संघर्ष को पुनर्गठित किया।
मराठा सेनानायकों ने और अधिक गतिशील युद्धनीति अपनाई, जिससे दक्कन क्षेत्र मुगल सेना और कोष पर लगातार बोझ बन गया।
औरंगज़ेब 1707 में मृत्यु तक दक्कन में ही फँसा रहा। जिस समर्पण की वह अपेक्षा कर रहा था, वह उसे कभी प्राप्त नहीं हुआ।
ऐतिहासिक अर्थ
संभाजी महाराज की गिरफ़्तारी पराजय का संकेत नहीं थी। यह प्रतिरोध के स्वरूप में आए परिवर्तन का क्षण था—जहाँ संघर्ष बल से हटकर धैर्य और दृढ़ता में बदल गया।
दबाव के आगे झुकने से उनके स्पष्ट इंकार ने उन्हें केवल शासक नहीं रहने दिया, बल्कि एक प्रतीक में बदल दिया। इतिहास उन्हें धर्मवीर और स्वराज्य के रक्षक के रूप में स्मरण करता है। मुगल साम्राज्य कुछ समय तक और बना रहा, लेकिन मराठा राज्य औरंगज़ेब के बाद भी जीवित रहा।
यही संभाजी महाराज की वास्तविक विरासत है—विजय नहीं, बल्कि अपार शक्ति के सामने संप्रभुता की रक्षा। उनकी मृत्यु ने युद्ध को समाप्त नहीं किया। उसने यह सुनिश्चित किया कि साम्राज्य केवल बल के सहारे उसे जीत नहीं सकता।
संभाजी महाराज का प्रतिरोध: पूर्ण दबाव में अडिग आस्था
1689 में छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा धर्म त्याग से इनकार भारतीय इतिहास में नैतिक संप्रभुता की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है। विश्वासघात के माध्यम से पकड़े जाने और औरंगज़ेब के सामने प्रस्तुत किए जाने पर, उनके सामने केवल सत्ता का अंत नहीं था, बल्कि मराठा स्वतंत्रता की वैचारिक नींव को मिटाने का प्रयास था।
कैद का उद्देश्य केवल राजनीतिक समर्पण नहीं, बल्कि धार्मिक और प्रतीकात्मक आत्मसमर्पण था। औरंगज़ेब का प्रस्ताव स्पष्ट था—जीवन, पद और सुरक्षा के बदले धर्मांतरण, सहयोग और मराठा सुरक्षा तंत्र का खुलासा।
संभाजी महाराज ने हर शर्त को अस्वीकार किया। उनका संदेश स्पष्ट था—धर्म और स्वराज्य की कीमत पर मिली जीवन-रक्षा, जीवन नहीं होती। दीर्घ दबाव के बावजूद वे नहीं झुके। समकालीन मुगल और मराठा स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि उन्होंने न तो धर्म बदला, न सहयोग किया। यह प्रतिरोध दिखावटी नहीं, बल्कि निरंतर और स्थिर विश्वास का परिणाम था।
कवि कलश भी अंत तक उसी दृढ़ता पर अडिग रहे, जिससे मराठा नेतृत्व की वैचारिक एकता और स्पष्ट हुई। 11 मार्च 1689 को हुआ निष्पादन प्रतिरोध को समाप्त करने के लिए था, लेकिन उसने संघर्ष को नैतिक रूप दे दिया। राजाराम के नेतृत्व में मराठा प्रतिरोध और तेज़ हुआ और दक्कन में मुगल साम्राज्य एक लंबे, थकाऊ और अंततः असफल युद्ध में उलझ गया।
संभाजी महाराज की विरासत विजय में नहीं, बल्कि अस्वीकार में निहित है। उन्होंने दिखाया कि बल से सत्ता तो थोपी जा सकती है, लेकिन विवेक और आस्था को बाध्य नहीं किया जा सकता।
उनकी मृत्यु ने मराठा संप्रभुता समाप्त नहीं की—उसका अर्थ स्पष्ट किया। साम्राज्य शक्ति थोप सकते हैं। अंतरात्मा को नहीं।
संभाजी महाराज को बचाया क्यों नहीं जा सका
फ़रवरी 1689 में छत्रपति संभाजी महाराज की गिरफ़्तारी मराठा इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय है। लोकप्रिय कथाएँ इसे केवल विश्वासघात तक सीमित कर देती हैं, लेकिन यह उस समय की कठोर रणनीतिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ करता है।
मराठों में साहस या निष्ठा की कमी नहीं थी—वे परिस्थिति, पैमाने और एक ऐसे शत्रु से जूझ रहे थे जो अपनी शक्ति के चरम पर था।
गिरफ़्तारी का क्षण
1 फ़रवरी 1689 को गनोji शिर्के द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद मुगल सेनापति मुक़र्रब ख़ान ने संगमेश्वर में अचानक हमला किया। उस समय संभाजी महाराज सीमित बल के साथ थे और रक्षा से अधिक गति पर निर्भर थे।
मराठा सैनिकों ने कई घंटों तक डटकर युद्ध किया और आक्रमणकारियों को नुकसान पहुँचाया, लेकिन बिना पूर्व सूचना और तत्काल सहायता के, गिरफ़्तारी को टालना संभव नहीं था।
रणनीति की सीमा
गिरफ़्तारी के बाद संभाजी महाराज को अत्यंत कड़ी सुरक्षा में बहादुरगढ़ ले जाया गया। उस समय औरंगज़ेब ने दक्कन में पाँच लाख से अधिक सैनिक तैनात कर रखे थे। मार्ग सील थे, शिविर किलेबंद थे और गुप्तचर तंत्र पूरी तरह सक्रिय था।
किसी भी बचाव प्रयास के लिए मुगल-नियंत्रित क्षेत्र के भीतर सीधा हमला करना पड़ता, जो मराठा युद्ध सिद्धांत के विपरीत था। छापामार कौशल, पूर्ण रूप से तैयार साम्राज्य के सामने सीमित हो जाता है।
मराठा राज्य के भीतर दबाव
1687 में हंबीरराव मोहिते की मृत्यु से नेतृत्व कमजोर हो गया था। पूर्व में हुए कठोर दंडों के कारण कुछ प्रभावशाली वंश असंतुष्ट थे, जिससे एकता प्रभावित हुई।
संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव जैसे सेनानायक सक्रिय थे, लेकिन अनेक मोर्चों की रक्षा और केंद्रीय नेतृत्व की कमी के कारण संगठित बचाव लगभग असंभव था।
लड़ाई जारी रही
यह धारणा कि संभाजी महाराज को छोड़ दिया गया, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
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गिरफ़्तारी के समय मराठा सैनिकों ने उग्र प्रतिरोध किया।
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कैद के दौरान गुप्त सूचना और सीमित हमले जारी रहे।
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निष्पादन के दिन तुलापुर के पास अंतिम बचाव प्रयास भी हुआ, जिसे सतर्क मुगल पहरेदारों ने विफल कर दिया।
उस समय मराठा नेतृत्व को कठोर निर्णय लेना पड़ा—एक असफल सीधा आक्रमण पूरे प्रतिरोध को नष्ट कर सकता था।
अस्थिरता से प्रतिरोध तक
संभाजी महाराज की मृत्यु से मराठा राज्य अस्थायी रूप से अस्थिर हुआ। रायगढ़ गिरा, परिवार बंदी बना। लेकिन यह विजय खोखली सिद्ध हुई।
राजाराम सुरक्षित निकल गए और दक्षिण से संघर्ष को पुनर्जीवित किया। अगले अठारह वर्षों तक औरंगज़ेब दक्कन में फँसा रहा, जब तक उसका साम्राज्य थकान से टूट नहीं गया।
ऐतिहासिक निष्कर्ष
संभाजी महाराज इसलिए नहीं हारे कि मराठे विफल हुए, बल्कि इसलिए कि वे एक चरम पर पहुँचे साम्राज्य के सामने अकेले खड़े रहे और झुकने से इनकार कर दिया।
मराठे उनका जीवन नहीं बचा सके, लेकिन उनके बलिदान से उन्होंने अपना भविष्य बचा लिया। उनकी शहादत ने स्वराज को समाप्त नहीं किया— उसे अटूट बना दिया।
औरंगाबाद से छत्रपति संभाजीनगर
औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर किया जाना कोई अचानक लिया गया राजनीतिक निर्णय नहीं था। यह एक लंबी, जटिल और संघर्षपूर्ण प्रक्रिया का परिणाम था, जो महाराष्ट्र के इतिहास, संस्कृति और राजनीति से गहराई से जुड़ी रही।
इसके केंद्र में एक बड़ा प्रश्न था— सार्वजनिक स्मृति में किसकी विरासत को स्थान मिलना चाहिए।
नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस नगर की स्थापना 1610 में मलिक अम्बर ने खड़की नाम से की थी। बाद में इसका नाम फतेहनगर रखा गया। 1653 में मुगल राजकुमार औरंगज़ेब ने इसे दक्कन में अपने प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया और तभी इसका नाम औरंगाबाद पड़ा।
हालाँकि यह नाम मुगल सत्ता की स्मृति से जुड़ा था, लेकिन महाराष्ट्र में यह हमेशा विवाद का विषय बना रहा। मराठों के विरुद्ध औरंगज़ेब का लंबा युद्ध और 1689 में छत्रपति संभाजी महाराज का वध—इन घटनाओं ने इस नाम को क्षेत्रीय ऐतिहासिक गौरव के विपरीत बना दिया।
स्मृति की राजनीति
औरंगाबाद का नाम बदलने की माँग पहली बार 1988 में राजनीतिक रूप से मुखर हुई, जब बाल ठाकरे ने इसे संभाजीनगर नाम देने का प्रस्ताव रखा।
इसका उद्देश्य प्रतीकात्मक था— एक साम्राज्यवादी शासक की स्मृति के स्थान पर उस मराठा राजा को सम्मान देना, जिसने स्वराज के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। स्थानीय निकायों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और “संभाजीनगर” नाम राजनीतिक व सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। फिर भी, यह नाम कई दशकों तक आधिकारिक मान्यता से वंचित रहा।
देरी के कारण
तीन दशक से अधिक समय तक नाम परिवर्तन टलता रहा, इसके पीछे कई कारण थे:
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गठबंधन राजनीति, जहाँ सहयोगी दल वैचारिक आधार पर विरोध करते रहे
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सामाजिक और साम्प्रदायिक संवेदनशीलताएँ, क्योंकि नगर की जनसंख्या विविध है
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प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएँ, जिनमें राज्य और केंद्र की स्वीकृति आवश्यक थी
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राजनीतिक हिचक, जहाँ यह मुद्दा निर्णायक कार्रवाई की बजाय बयानबाज़ी तक सीमित रहा
परिणामस्वरूप, यह नाम भावनात्मक रूप से जीवित रहा, लेकिन कानूनी पहचान नहीं पा सका।
निर्णायक मोड़ (2022–2023)
जून 2022 में महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर करने का निर्णय लिया। इसमें पहली बार संभाजी महाराज की छत्रपति के रूप में औपचारिक मान्यता भी स्पष्ट रूप से जोड़ी गई। सरकार परिवर्तन के बाद, 2023 में आवश्यक अधिसूचनाओं के माध्यम से यह निर्णय लागू हुआ और केंद्र की स्वीकृति के साथ प्रक्रिया पूरी हुई। 2026 तक यह नाम प्रशासनिक रूप से पूर्णतः स्थापित हो चुका था, भले ही अनौपचारिक बातचीत में पुराना नाम कहीं-कहीं प्रयोग में रहा।
सम्मान या पहचान की राजनीति
समर्थकों के लिए यह नाम परिवर्तन ऐतिहासिक सुधार और सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रतीक है— जहाँ साम्राज्यवादी प्रभुत्व के बजाय
स्वदेशी प्रतिरोध को सम्मान दिया गया।
आलोचकों के लिए यह एक प्रतीकात्मक कदम है, जो शासन से अधिक पहचान की राजनीति पर बल देता है।
स्मृति और संप्रभुता
औरंगाबाद का नाम बदलना केवल नामकरण का प्रश्न नहीं था। यह इतिहास पर अधिकार और स्मृति की दिशा तय करने का निर्णय था।
चाहे इसे उत्सव के रूप में देखा जाए या आलोचनात्मक दृष्टि से, छत्रपति संभाजीनगर महाराष्ट्र के उस प्रयास को दर्शाता है, जिसमें वह अपने अतीत को अपनी शर्तों पर परिभाषित करना चाहता है— और यह तय करना चाहता है कि सार्वजनिक स्मृति में किसे स्थायित्व मिलना चाहिए। छत्रपति संभाजी महाराज ने अधीनता से कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने सत्ता से दया नहीं माँगी। उन्होंने प्रतिरोध चुना—उसकी पूरी कीमत जानते हुए। उनकी विरासत कोई त्रासदी नहीं है— वह एक सिद्धांत है।
यह घोषणा कि संप्रभुता माँगी नहीं जाती, बचाई जाती है; आस्था सौदेबाज़ी नहीं करती; और गरिमा वहीं जीवित रहती है, जहाँ आत्मसमर्पण से इनकार किया जाता है। यह कथा इतिहास को नरम करने के लिए नहीं है। यह संकल्प को कठोर करने के लिए है। संभाजी महाराज इस सत्य के प्रमाण हैं कि साम्राज्य भूभाग जीत सकते हैं— लेकिन इच्छाशक्ति को नहीं।
