अधीनता अस्वीकार: संभाजी महाराज – शेर के छावा का अडिग संकल्प

साम्राज्य अक्सर भय के सहारे टिके रहते हैं। छत्रपति संभाजी महाराज ने इसी भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया। बेड़ियों में जकड़े होने पर भी, यातनाओं से घिरे होने पर भी और एक विशाल साम्राज्यिक शक्ति के सामने खड़े होकर भी, उन्होंने झुकने से साफ इंकार कर दिया।

उनका साहस किसी क्षणिक आवेग का परिणाम नहीं था—वह सोच-समझकर लिया गया, अनुशासन से भरा और पूरी तरह अडिग निर्णय था।

वह सम्राट जिसने सिर नहीं झुकाया

छत्रपति संभाजी महाराज (14 मई 1657 – 11 मार्च 1689) मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति थे। 1681 में उन्होंने अपने पिता, छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद शासन संभाला।

उनका पूरा शासनकाल कठिन परिस्थितियों में बीता। लगातार युद्ध होते रहे, भीतर षड्यंत्र चलते रहे और मुगल सम्राट औरंगज़ेब से उनका सीधा और लगातार सामना रहा।

हालाँकि उनका शासनकाल लंबा नहीं था, फिर भी यह भारतीय प्रतिरोध के इतिहास में सबसे निर्णायक और साहस से भरा अध्याय माना जाता है।

प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व निर्माण

संभाजी महाराज का जन्म पुणे के निकट पुरंदर किले में हुआ। कम आयु में ही उनकी माता सईबाई का देहांत हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी जिजाबाई ने किया।

उन्होंने युद्धक प्रशिक्षण के साथ-साथ बौद्धिक शिक्षा भी प्राप्त की। संस्कृत, फारसी और मराठी में दक्षता के साथ उन्होंने शासन, कूटनीति और युद्धनीति से जुड़े शास्त्रों का अध्ययन किया। 1666 की पुरंदर संधि के बाद उन्हें बाल्यावस्था में आगरा के मुगल दरबार ले जाया गया। वहाँ उन्होंने साम्राज्यिक सत्ता को बहुत निकट से देखा—यह अनुभव आगे चलकर मुगल प्रभुत्व के प्रति उनके अडिग विरोध की नींव बना।

युवावस्था में पिता से मतभेदों के बावजूद, शिवाजी महाराज के निधन से पहले दोनों में पुनः मेल हुआ और संभाजी महाराज अत्यंत जटिल राजनीतिक परिस्थितियों में सिंहासन पर आरूढ़ हुए।

शासन और प्रतिरोध

संभाजी महाराज को ऐसा साम्राज्य विरासत में मिला, जो चारों ओर से घिरा हुआ था। जहाँ शिवाजी महाराज का काल संगठन और विस्तार का था, वहीं संभाजी का शासन निरंतर रक्षा और संघर्ष की माँग करता था।

  • मुगलों के विरुद्ध:
    उन्होंने बार-बार होने वाले मुगल आक्रमणों को रोका, औरंगज़ेब को दक्कन में वर्षों तक उलझाए रखा और साम्राज्यिक संसाधनों को क्षीण कर दिया।

  • पुर्तगालियों के विरुद्ध:
    कोंकण तट और गोवा में आक्रामक अभियान चलाए, औपनिवेशिक शक्ति को चुनौती दी और जबरन धर्मांतरण का विरोध किया।

  • जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध:
    समुद्री शक्ति के महत्व को समझते हुए मराठा नौसेना का विस्तार किया।

प्रशासनिक रूप से उन्होंने शिवाजी महाराज की शासन-पद्धति को बनाए रखा—स्वराज्य, धार्मिक सहिष्णुता और स्वदेशी संस्थाओं की रक्षा।

विद्वत्ता और राज्यकला

अक्सर अनदेखा किया गया पक्ष यह है कि संभाजी महाराज एक गंभीर विद्वान भी थे। उनका संस्कृत ग्रंथ ‘बुधभूषण’ राजनीति, नैतिकता और राजधर्म पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।

वे विद्वानों और कवियों के संरक्षक थे—एक ऐसे शासक का आदर्श, जो तलवार और शास्त्र—दोनों में समान निष्ठा रखता था।

यातना और बलिदान

फरवरी 1689 में, संगमेश्वर के निकट, एक निकट संबंधी के विश्वासघात के कारण संभाजी महाराज बंदी बना लिए गए। उन्हें तुलापुर ले जाया गया, जहाँ औरंगज़ेब ने उन पर भीषण यातनाएँ दीं और इस्लाम स्वीकार करने का दबाव डाला। संभाजी महाराज ने इनकार कर दिया।

सप्ताहों की क्रूर यातना के बाद, 11 मार्च 1689 को उनका वध कर दिया गया। जो घटना साम्राज्यिक आतंक का प्रदर्शन बननी थी, वही मराठा प्रतिरोध की नई ज्वाला बन गई। इसी बलिदान ने उन्हें ‘धर्मवीर’ की अमर उपाधि दिलाई।

विरासत

संभाजी महाराज की शहादत से मराठा शक्ति समाप्त नहीं हुई—वह और अधिक सुदृढ़ हुई। राजाराम और बाद में शाहू प्रथम के नेतृत्व में मराठाओं ने पुनर्गठन किया और आगे चलकर मुगल सत्ता के पतन को तेज़ किया।

आज संभाजी महाराज को स्मरण किया जाता है—

  • उस शासक के रूप में, जिसने आत्मसमर्पण से बेहतर मृत्यु को चुना

  • सांस्कृतिक और धार्मिक स्वायत्तता के रक्षक के रूप में

  • एक विद्वान-योद्धा के रूप में, जिसकी दृढ़ता साम्राज्यिक भय से कहीं बड़ी थी

उनकी स्मृति महाराष्ट्र और पूरे भारत में स्मारकों, संभाजी जयंती, साहित्य और शोध के माध्यम से जीवित है।

ऐतिहासिक मूल्यांकन

संभाजी महाराज का शासन मराठा राज्य की सबसे कठिन परीक्षा था। विश्वासघात और अत्यधिक बल के बावजूद उनका झुकने से इनकार ही मराठा संप्रभुता को बचा सका।

आधुनिक राजनीति चाहे उनकी छवि का उपयोग करे, किंतु इतिहास उन्हें प्रारंभिक आधुनिक भारत के सबसे प्रखर साम्राज्य-विरोधी नेताओं में स्थापित करता है।

संघर्ष में खड़ा उत्तराधिकारी

छत्रपति संभाजी महाराज केवल शिवाजी महाराज के उत्तराधिकारी नहीं थे— वे वह ढाल थे, जिसने साम्राज्य पर आई सबसे बड़ी चोट को स्वयं झेला।

उन्होंने अल्पकाल तक शासन किया। उन्होंने असहनीय यातनाएँ सही। लेकिन— उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।

आगरा से पलायन (1666): शिवाजी महाराज, संभाजी और साम्राज्य को दी गई चुनौती

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top