BJP की केंद्र सरकार होश में आओ और दलितों को शांति दूतों से बचाओ। Justice for Tarun Hindu – एनकाउंटर से कम कुछ नहीं।

होली सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है। देश भर के करोड़ों दलितों के लिए ये साल के उन गिने-चुने पलों में से एक है जब समाज की ऊंच-नीच मिट जाती है। जब रंग जाति के भेदभाव को मिटा देता है, और समाज के सबसे निचले तबगे पर पैदा हुआ इंसान भी सड़क पर सीना तान कर खड़ा हो सकता है।

उत्तम नगर,  दिल्ली का रहने वाला एक दलित युवा, तरुण कुमार, 4 फ़रवरी 2026 के दिन घर से इसी खुशी के साथ निकला था। लेकिन वह वापस वैसे नहीं लौटा।

दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में, होली के जश्न के बीच, तरुण कुमार पर हमला हुआ। हमलावर उसी मोहल्ले में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग थे। जो हुआ वह सिर्फ मारपीट नहीं थी। यह एक तरह की इलाके पर हुकूमत जताने वाली हिंसा थी- खून के ज़रिये दिया गया संदेश:

“यह त्योहार तुम्हारा है, यह खुशी तुम्हारी है, लेकिन हमें यहाँ तुम्हारी मौजूदगी मंज़ूर नहीं है।”

तरुण को अस्पताल ले जाना पड़ा। हमलावरों की पहचान भी हो चुकी थी। मगर पूरा इलाका अजीब-सी खामोशी में डूब गया- वही खामोशी जो अक्सर उन जगहों पर दिखती है जहाँ लोग समझ चुके होते हैं कि कुछ अपराधों पर कभी राष्ट्रीय गुस्सा नहीं फूटता है।

अब ज़रा खुद से एक सीधा-सा सवाल पूछिए। अगर मामला उल्टा होता- मान लीजिए किसी दलित आदमी ने ईद के दिन किसी मुस्लिम पर हमला कर दिया होता- तो क्या होता?

कितने न्यूज़ चैनल 72 घंटे तक लगातार बहस चलाते? कितने विपक्षी नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते? कितने कॉलम लिखे जाते कि देश में “नफरत का माहौल” बन रहा है?

सच कहें तो-  लगभग सब।

लेकिन तरुण कुमार के खून ने ऐसा तूफान नहीं उठाया। कुछ लोकल खबरें छपीं, कुछ लोग गिरफ्तार हुए, और फिर वही पुरानी चुप्पी।

ऐसी चुप्पी जो तब पैदा होती है जब राजनीति ने तय कर लिया हो कि वोट-बैंक की गणित में कुछ पीड़ितों को पूरा राष्ट्रीय आक्रोश मिलेगा और कुछ को अख़बार के सातवें पन्ने में दबी एक छोटी-सी खबर ही मिलेगी।

हम इस लेख के जरिये मांग कर रहे हैं- सीधे सरकार से, दलित नेताओं से, राष्ट्रीय मीडिया से, और हर उस व्यक्ति से जो संविधान की न्याय व्यवस्था की बात करता है- की आखिर कब तक दलितों पर मुस्लिमो के अत्याचार को अनदेखा किया जायेगा?

दलितों के खिलाफ मुस्लिमों की हिंसा का नक्शा- कई राज्यों में फैला एक खौफनाक पैटर्न

इस अनदेखी के पीछे के बड़े खेल को समझने के लिए महज़ एक घटना से बाहर निकलकर एक ख़ास पैटर्न को देखना ज़रूरी है। हमें वो करना होगा जो भारत की मेनस्ट्रीम मीडिया और राजनीति करने वाले लोग करने से कतराते हैं: अलग-अलग राज्यों में दलितों पर मुस्लिम हमलावरों द्वारा किए गए हमलों का हिसाब लगाना।

उत्तर प्रदेश की ही बात करें, जहाँ दलितों की आबादी भारत के किसी भी राज्य से ज़्यादा है. संभल, रामपुर, मुरादाबाद और मेरठ जैसे ज़िलों में मुस्लिम द्वारा दलितों पर हिंसा के मामले लगातार सामने आए हैं।

पैटर्न हर जगह एक जैसा है: मुस्लिम-बहुल इलाकों के पास या भीतर रहने वाले दलितों की ज़मीन पर कब्ज़ा होता है, उनके धार्मिक रिवाज़ों में दखल दिया जाता है, और हिंदू त्योहारों पर उन्हें डराया-धमकाया जाता है। इनमें से कई मामलों में दलित शिकायतकर्ताओं ने साफ़ तौर पर कहा है कि लोकल मुस्लिम नेताओं के दबाव में पुलिस, मुस्लिम हमलावरों के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज करने में आनाकानी करती है।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा और बीरभूम जैसे ज़िलों में जहाँ मुस्लिम आबादी बहुत ज़्यादा है, हिंदू दलितों की हालत समुदायिक संगठनों के लिए लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। भले ही बंगाली और नेशनल मीडिया ने इस पर आँखें मूंद रखी हों। इन ज़िलों में नामशूद्र और अन्य दलित समुदायों ने सांप्रदायिक तनाव के दौरान अपने घरों, मंदिरों और लोगों पर हमलों की शिकायतें दर्ज़ कराई हैं। 

कई मामलों में तो पूरे के पूरे दलित परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया गया. यह एक तरह का बादी का विस्थापन है जो खामोश ‘एथनिक क्लीन्ज़िंग’ (जातीय नरसंहार) का काम करता है. लेकिन पुलिस रिकॉर्ड्स में इसे महज़ ‘प्रॉपर्टी विवाद’ बताकर रफा-दफा कर दिया जाता है।

राजस्थान के भरतपुर और अलवर इलाकों में मुस्लिम गैंग्स द्वारा दलितों पर हमले देखे गए हैं, ख़ासकर लेदर (चमड़े) के काम से जुड़े कई दलितों को जानबूझकर निशाना बनाया गया।

केरल, जो लिबरल मीडिया का सबसे चहेता राज्य है, वहाँ भी मलप्पुरम, कोझीकोड और त्रिशूर में मुस्लिम युवा समूहों द्वारा दलित लड़कों पर हमलों को लोकल पत्रकारों ने बाकायदा रिपोर्ट किया है। लेकिन मजे की बात देखिए कि राज्य स्तर का मीडिया इस पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रहता है। 2022 में बैन होने से पहले, ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (PFI) पर खुद इंटेलिजेंस एजेंसियों ने उत्तरी केरल के दलित-बहुल इलाकों में टारगेटेड हिंसा करने के पक्के सबूत दिए थे।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) हर साल SC/ST एक्ट के तहत अत्याचारों के आंकड़े छापता है। लेकिन इस डेटा में एक बड़ी खामी है- और सच कहूं तो ये हमारे डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर का एक बहुत बड़ा फेलियर है- कि यह अपराधियों की धार्मिक पहचान को अलग-अलग करके नहीं दिखाता। 

जब अपराधी मुस्लिम होता है, तो अक्सर केस SC/ST एक्ट की जगह IPC की आम धाराओं में दर्ज कर लिया जाता है, या फिर दर्ज़ ही नहीं होता। इसका सीधा सा मतलब ये है कि मुस्लिम द्वारा दलित पर हिंसा का असली पैमाना हमारे सरकारी आंकड़ों में कहीं दर्ज़ ही नहीं है- ये एक ऐसा ‘ब्लाइंड स्पॉट’ है जो सिस्टम के भीतर ही जानबूझकर फिट कर दिया गया है।

सरहद पार का आईना: पाकिस्तान और बांग्लादेश में दलितों का क्या हाल है

अगर आप समझना चाहते हैं कि जब हिंदू दलित एक छोटी, राजनीतिक रूप से बेसहाय माइनॉरिटी बन जाते हैं और एक कट्टर धार्मिक बहुसंख्यक आबादी से घिर जाते हैं- तो उनका क्या भविष्य होता है? तो आपको ज़्यादा अंदाज़ा लगाने की ज़रूरत नहीं है। बस एक नज़र उठाकर देख लीजिए की आज, इसी वक्त, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू दलित समुदायों के साथ असलियत में क्या हो रहा है।

पाकिस्तान: हिंदू दलितों का नरसंहार

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में कोल्ही, मेघवाड़, बाल्मीकि और भील समुदाय- जो ऐतिहासिक रूप से दलित हिंदू जातियां हैं- आज भी ऐसी सामंती बंधुआ मज़दूरी वाली हालत में जी रहे हैं जिसके बारे में आज़ाद भारत में सोचना भी नामुमकिन है। ये वो लोग हैं जो हज़ारों सालों से सिंधु घाटी में रह रहे हैं, लेकिन आज एक ऐसे इस्लामिक राष्ट्र में पक्के तौर पर दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रह गए हैं, जहाँ उनकी पहचान को बचाने के लिए कोई संवैधानिक ढांचा ही नहीं है।

सिंध में हिंदू दलित लड़कियों का ज़बरन धर्म परिवर्तन कोई नयी घटना नहीं है। यह तो एक पूरी इंडस्ट्री बन चुकी है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP), अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) और कई इंटरनेशनल मानवाधिकार संस्थाओं ने इसे बाकायदा डॉक्युमेंट किया है। इसका पैटर्न भी बिल्कुल फिक्स है: एक दलित हिंदू लड़की- जो अक्सर नाबालिग होती है- उसका कोई मुस्लिम आदमी या गैंग किडनैप कर लेता है, उसे मदरसे ले जाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाया जाता है, और फिर उसी अपहरणकर्ता से उसकी ‘शादी’ करवा दी जाती है। 

पाकिस्तानी अदालतों ने बार-बार अपहरणकर्ताओं के हक़ में ही फैसला सुनाया है, यह कहते हुए कि लड़की ने अपनी मर्ज़ी से धर्म बदला है। लड़की का परिवार दलित है, हिंदू है और भूमिहीन है… इसलिए उनके पास कोई सियासी सहारा नहीं होता। वो पूरी तरह बेबस रह जाते हैं।

ज़बरन धर्म परिवर्तन के अलावा भी, ग्रामीण सिंध में मुस्लिम ज़मींदारों द्वारा हिंदू दलितों की ज़मीनें हड़प लेना, उन्हें कुओं और पानी के स्रोतों तक ना जाने देना, लोकल राजनीति से बाहर रखना, और उनके मंदिरों और श्मशानों को चुन-चुन कर तोड़ना आम बात है। 

ईशनिंदा कानून (पाकिस्तान दंड संहिता 295-C) को तो हिंदू दलितों के खिलाफ उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से डराने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। एक झूठा ईशनिंदा का आरोप लगा दो, और बस… भीड़ का हिंसक हो जाना, घर-बार जला देना, और उन्हें वहां से खदेड़ देना तय है। इसी झूठे आरोप में पाकिस्तान में कई दलित हिंदुओं की सरेआम लिंचिंग तक की जा चुकी है।

बांग्लादेश: चुनाव का चक्र और दलितों का खून

बांग्लादेश की कहानी थोड़ी अलग है, लेकिन वो भी उतनी ही खौफनाक है। वहां हिंदू दलित: नमोशूद्र, डोम, हरि, और सफाई कर्मचारी समुदाय एक ऐसी हिंसा झेलते हैं जो सीधे वहां की राजनीति से जुड़ी है। बांग्लादेश में हर चुनाव के दौरान जब ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ या कट्टरपंथी इस्लामिक गठबंधन हावी होते हैं, तो हिंदू-बहुल इलाकों पर हमले होना लगभग तय होता है।

अक्टूबर 2021 की दुर्गा पूजा के बाद बांग्लादेश में जो हिंसा हुई, वो इसके सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है। कोमिला में, कुरान के अपमान का एक झूठा फेसबुक पोस्ट बहाना बना और सात ज़िलों में हिंदू मंदिरों और घरों पर हमले शुरू हो गए। जो लोग शिकार बने, उनमें से ज़्यादातर दलित और निचली जातियों के हिंदू थे। जो बेचारे सबसे असुरक्षित बस्तियों में रहते थे और जिनके पास खुद को बचाने का कोई साधन नहीं था। दर्जनों मंदिर अपवित्र कर दिए गए, तोड़ दिए गए। सैकड़ों परिवारों को रातों-रात बेघर कर दिया गया। और मज़ाक देखिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी कोई खास निंदा नहीं हुई।

2024 में जब बांग्लादेश में तख्तापलट हुआ, शेख हसीना को हटाया गया और एक ऐसी अंतरिम सरकार आई जिस पर इस्लामवादियों का भारी प्रभाव था, तब से हिंदू माइनॉरिटीज- जिनमें दलित हिंदू भी शामिल हैं- पर हमले कई गुना बढ़ गए हैं। माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल और लोकल बांग्लादेशी हिंदू सिविल सोसाइटी ग्रुप्स की रिपोर्ट साफ़ बताती है कि कैसे दलित बस्तियों में आगजनी की गयी, हिंदू दलित औरतों का यौन उत्पीड़न हुआ, और उनकी ज़मीनों पर ज़बरदस्ती कब्ज़ा किया गया।

पाकिस्तान और बांग्लादेश, दोनों से मिलने वाला सबक बिल्कुल साफ़ है: जब दलित एक संवैधानिक लोकतांत्रिक ढांचे की सुरक्षा खो देते हैं और एक इस्लामिक राष्ट्र में कमज़ोर माइनॉरिटी बन जाते हैं, तो उनका खात्मा धीरे-धीरे नहीं होता… वो रातों-रात मिटा दिए जाते हैं। माना कि भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश नहीं है। लेकिन भाई, कुछ ज़िलों और मोहल्लों में भारत के दलितों को इसी खात्मे का ट्रेलर अभी से दिख रहा है- और दुख की बात ये है कि मेनस्ट्रीम राजनीति में कोई भी इसे खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

मुफ़्त राशन, मुफ़्त मकान- और विस्थापन का क्रूर अर्थशास्त्र

जब बात ‘वेलफेयर स्टेट’ (कल्याणकारी राज्य) की आती है, तो लेफ्ट विंग (वामपंथियों) को यह बहस सबसे ज़्यादा चुभने लगती है। यह मानना पड़ेगा कि मोदी सरकार ने भारत के इतिहास में सबसे बेहतरीन ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) सिस्टम बनाए हैं- रहने के लिए पीएम आवास योजना, सस्ते अनाज के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, गैस कनेक्शन के लिए उज्ज्वला योजना, और हेल्थ इंश्योरेंस के लिए आयुष्मान भारत। 

ये सारी योजनाएं दलितों और ग्रामीण गरीबों को ध्यान में रखकर ही बनाई गई थीं। और ज़मीनी हकीकत यही है कि कई दलित परिवारों के लिए इन्होंने वाकई ज़िंदगी बदल देने वाला काम किया है।

लेकिन ज़मीन पर, जिन मोहल्लों में ये योजनाएं पक्के मकानों और हर महीने के राशन में तब्दील हो रही हैं, वहां कुछ ऐसा भी चल रहा है जिस पर कोई सरकारी रिपोर्ट या अकादमिक पेपर ईमानदारी से बात ही नहीं करता। यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के वो ज़िले जहाँ दलित और मुस्लिम दोनों की मिली-जुली आबादी है, वहां एक अलग ही पैटर्न दिख रहा है। 

मुस्लिम परिवार जिनकी जन्म दर अक्सर ज़्यादा होती है और लोकल पॉलिटिक्स में पकड़ भी मज़बूत होती है- इन सरकारी मकानों को बहुत बड़े पैमाने पर हासिल कर रहे हैं। फिर इसी रिहायशी नज़दीकी का फायदा उठाकर वो अपने दलित पड़ोसियों पर अपना सामाजिक और क्षेत्रीय दबदबा बढ़ा रहे हैं।

यह कोई हवा-हवाई बात नहीं है। पूर्वी यूपी की ‘पीएम आवास’ कॉलोनियों में रहने वाले दलित परिवारों का सीधा कहना है कि वो अपने मुस्लिम पड़ोसियों की धमकियों के चलते हिंदू त्योहार तक ठीक से नहीं मना सकते। बिहार में राशन की लाइनों में दलित औरतों को मुस्लिम आदमियों द्वारा धक्के मारकर पीछे कर दिया जाता है, और लोकल कोटेदार (PDS डीलर) चुपचाप तमाशा देखते हैं। 

पश्चिम बंगाल की सरकारी हाउसिंग स्कीम्स में दलित परिवारों का हाल ये है कि वो चाहकर भी अपना अलॉट किया गया घर बेचकर वहां से निकल नहीं सकते, क्योंकि आसपास के मुस्लिम पड़ोसियों के घेराव और दुश्मनी के चलते उस प्रॉपर्टी को कोई खरीदता ही नहीं है। वो एक तरह से बिकने लायक बची ही नहीं है।

आबादी बढ़ने का ये अंतर कोई साज़िश नहीं है- ये एक डेमोग्राफिक सच्चाई है जो भारत के हर सेंसस (जनगणना) में दर्ज़ है। जिन ज़िलों में मुस्लिम आबादी सबसे तेज़ी से बढ़ रही है, वहां दलित समुदाय का लोकल राजनीति और आर्थिक जगहों से हिस्सा सिकुड़ता जा रहा है। ऐसा इसलिए नहीं है कि दलित दब्बू हैं या किसी से कम हैं- बल्कि इसलिए क्योंकि उनके पास वो कम्युनिटी सॉलिडेरिटी (सामुदायिक एकजुटता), वो धार्मिक संस्थाओं का सपोर्ट और राजनीतिक आकाओं का वो नेटवर्क नहीं है जो बाकी समुदायों को अपनी ज़मीन कब्ज़ाने और उसे फैलाने की ताकत देता है। 

मोदी सरकार की वेलफेयर स्कीम्स ज़रूरी भी हैं और कीमती भी। लेकिन अगर सुरक्षा नहीं है, तो वेलफेयर का सीधा सा मतलब है किसी जलते हुए घर में खैरात बांटना। पीएम आवास योजना के मकान का फायदा कोई दलित परिवार तभी उठा पाएगा ना, जब वो उस घर में ज़िंदा और सुरक्षित रह सकेगा। 

केंद्र सरकार की स्कॉलरशिप का इस्तेमाल एक दलित बच्चा तब करेगा, जब वो बिना इस डर के स्कूल जा सके कि बिंदी लगाने या नॉन-हलाल टिफिन ले जाने पर उसे पीटा जाएगा। आर्थिक मुद्दे और सुरक्षा के मुद्दे एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। पॉलिसी बनाने वाले जब इन दोनों को अलग-अलग करके देखते हैं, तो वो कोई गलती नहीं कर रहे होते, वो जानबूझकर आंखें मूंद रहे होते हैं।

क्यों दलित नेता अपनों को ही लावारिस छोड़ देते हैं

मुस्लिम द्वारा दलितों पर हिंसा को लेकर मुख्यधारा के दलित नेताओं की चुप्पी, आज की दलित राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी है। ऐसा नहीं है कि इन नेताओं को पता नहीं है- उन्हें बहुत अच्छे से मालूम है कि उनके अपने इलाकों में क्या चल रहा है। असली दिक्कत उनकी कायरता है, जो पूरी तरह से चुनावी जोड़-तोड़ से बंधी हुई है।

मायावती की अगुवाई में बसपा (BSP) ने अपना पूरा सियासी साम्राज्य दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर खड़ा किया। ऊपर से देखने में ये लॉजिक बड़ा शानदार लगता था: दो शोषित समाज, जिनकी आर्थिक परेशानियां एक जैसी हैं, उन्हें सवर्णों के दबदबे के खिलाफ एक हो जाना चाहिए। 

लेकिन ज़मीन पर इस गठजोड़ का बस एकतरफा फायदा उठाया गया: मुस्लिम वोट तो थोक के भाव BSP उम्मीदवारों को मिलते रहे, लेकिन बदले में BSP की पूरी राजनीतिक ताकत इस बात में झोंक दी गई कि दलितों पर होने वाली मुस्लिम हिंसा का कभी नाम तक ना लिया जाए, SC/ST एक्ट के तहत उन पर पूरी कार्रवाई ना हो, और इसे कभी चुनावी मुद्दा ना बनने दिया जाए। 

अपने 30 साल के राजनीतिक जीवन में मायावती ने एक बार भी- जी हाँ, एक बार भी- मुसलमानों द्वारा दलितों पर की गई हिंसा के खिलाफ खुलकर आवाज़ नहीं उठाई है।

कांग्रेस पार्टी, जो खुद को संविधान और आंबेडकर की विरासत के सबसे बड़े ठेकेदार के रूप में पेश करती है, उसका इस चयनात्मक खामोशी का इतिहास तो और भी पुराना है। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार रही है- राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक- वहां SC/ST एक्ट को हमेशा इसी चश्मे से देखा गया कि आरोपी कहीं उनके वोट-बैंक का हिस्सा तो नहीं है। 

मुस्लिम अपराधियों को साफ बचा लिया जाता है। सवर्ण अपराधियों पर केस ठोंक दिए जाते हैं। कानून का इस्तेमाल पूरी तरह से अपने फायदे के लिए होता है, जिसका सीधा सा मतलब है कि असल में वो लागू ही नहीं हो रहा है।

पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में लेफ्ट पार्टियों का रिकॉर्ड तो सबसे भद्दा रहा है। सीपीएम (CPM) ने 34 साल तक बंगाल पर राज किया। इस दौरान मुस्लिम-बहुल ज़िलों में दलित हिंदुओं की ज़मीनें छीनी गईं, उन्हें वहां से भगाया गया- और पार्टी ने हर ऐसी घटना को बड़ी चालाकी से ‘वर्ग संघर्ष’ या ‘ज़मीनी विवाद’ का नाम दे दिया। उन्होंने हर बार उस मज़हबी एंगल को मिटा दिया जो उनके मुस्लिम वोट बैंक को खिसका सकता था।

इसका नतीजा क्या निकला? एक ऐसा समुदाय जिसे राजनीतिक पहचान तो दे दी गई, लेकिन राजनीतिक सुरक्षा के नाम पर ठेंगा मिला। दलितों को रैलियों में भीड़ बढ़ाने, वोट डालने और संविधान के पोस्टर बॉय बनने के लिए तो बुलाया जाता है, लेकिन जब नार्थ-ईस्ट दिल्ली में होली के दिन तरुण कुमार को सरेआम पीटा जाता है, तो जो नेता राजपूत या जाट के हमलावर होने पर आसमान सिर पर उठा लेते, वो अचानक से रहस्यमयी तरीके से ‘नॉट अवेलेबल’ हो जाते हैं।

UGC और रिजर्वेशन से काम नहीं चलेगा – सबसे पहले दलितों के ज़िंदगी की सुरक्षा चाहिए 

UGC के नियमों, फैकल्टी की भर्तियों, NET परीक्षा, और दलित छात्रों के लिए उच्च शिक्षा पर हो रही बहसें पूरी तरह से जायज़ और बेहद ज़रूरी हैं। और मोदी सरकार की ये ज़िम्मेदारी बनती है कि वो इन्हें पूरी ईमानदारी से सुलझाए।

लेकिन एक कड़वा सच ये भी है जिसे ना तो BJP का कोई नेता बोलेगा, ना BSP का, और ना ही कांग्रेस का- IITs और IIMs में उस रिजर्वेशन से पढ़ रहे दलित लड़के के लिए कोई मतलब नहीं रह जाता जिसे अपने ही मोहल्ले में होली खेलने पर पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया हो। 

एक सरकारी नौकरी या सेंट्रल स्कॉलरशिप उस दलित बच्ची के लिए रद्दी के बराबर है जो स्कूल इसलिए नहीं जा पाती क्योंकि उसके इलाके पर एक ऐसे कट्टर समुदाय का कब्ज़ा हो गया है जिसे उस बच्ची के धर्म से ही चिढ़ है। 

आर्टिकल 21A में दिया गया ‘राइट टू एजुकेशन’ (शिक्षा का अधिकार) तब तक महज़ एक कागज़ी मज़ाक है, जब तक कि इंसान को ज़िंदा और सुरक्षित रहने का हक़ ही ना मिले।

सबसे अहम बात, आंबेडकर इस बात को भी बखूबी समझते थे कि धार्मिक बहुसंख्यक राजनीति से दलित मुक्ति को कितना बड़ा खतरा है। अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टिशन ऑफ इंडिया’ में, उन्होंने भारतीय मुसलमानों की सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति पर बड़ी बेबाकी से लिखा था। उन्होंने साफ़ किया था कि भले ही इस्लाम सिद्धांत में जाति-विहीन होने की बात करता हो, लेकिन भारत के मुसलमानों में जातिगत ऊंच-नीच गहराई तक धंसी हुई है। 

डॉ. आंबेडकर ने साफ शब्दों में कहा था: जो राजनीतिक ढांचा दलितों पर आने वाले हर एक खतरे का नाम खुलकर नहीं ले सकता, वो ढांचा आज़ादी का नहीं हो सकता, वो बस उन्हें ‘मैनेज करके गुलाम बनाए रखने’ का एक जुगाड़ है।

BJP को भी कई कांटे की टक्कर वाली सीटों पर मुस्लिम वोट चाहिए; इसलिए सत्ता में बैठा कोई भी इंसान ऐसी सरकार का ठप्पा नहीं लगवाना चाहता जो ऑफिशियली यह मान ले कि दलितों पर हिंसा करने वाले मुस्लिम हैं, भले ही सबूत चीख-चीख कर यही गवाही दे रहे हों।

राजनीति का ये घटिया गणित अब बदलना ही होगा। क्योंकि हर गुज़रते साल के साथ जब ये नहीं बदलता, तो कितने ही तरुण कुमार अस्पतालों में पहुँच जाते हैं, दलित परिवार मिली-जुली आबादी वाले इलाकों से अपना घर छोड़कर भागने लगते हैं, और पाकिस्तान में न जाने कितनी हिंदू दलित लड़कियां किडनैप हो जाती हैं… जबकि हमारे भारतीय दलित नेता बस इसी बहस में उलझे रहते हैं कि क्या वो सच बोलना सेफ है जो सबको पहले से ही पता है।

मोदी सरकार को दलितों की सुरक्षा के लिए तुरंत क्या करना चाहिए

इस संकट का हल निकालना कोई मुश्किल बात नहीं है। इसके लिए किसी नए प्रशासनिक चमत्कार से ज़्यादा राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है। नीचे दिए गए कदम बिल्कुल ठोस हैं, संवैधानिक दायरे में हैं, और इन पर आज से ही एक्शन लिया जा सकता है:

पहला: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) को तुरंत यह निर्देश दिया जाना चाहिए कि वो SC/ST एट्रोसिटी (अत्याचार) डेटा में आरोपी की धार्मिक पहचान दर्ज करने के लिए एक ज़रूरी कॉलम जोड़े। 

आज हमारा डेटा सिस्टम ये तो बता देता है कि कितनी दलित महिलाओं के साथ रेप हुआ और आरोपी किस जाति से था, लेकिन वो किस ‘धर्म’ का था, ये गोल कर दिया जाता है। इसे फौरन खत्म होना चाहिए। पारदर्शी डेटा ही किसी भी ईमानदार पॉलिसी की नीव होता है।

दूसरा: SC/ST एक्ट का इस्तेमाल बिल्कुल निष्पक्ष होना चाहिए, चाहे आरोपी का धर्म कुछ भी हो। आज के समय में केस रिकॉर्ड्स, एक्टिविस्ट्स की गवाहियों और पत्रकारों की रिपोर्ट्स से ऐसे कई पक्के सबूत मिलते हैं कि मुस्लिम-बहुल इलाकों में पुलिस अक्सर तब SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज़ करने से कन्नी काट जाती है जब आरोपी मुस्लिम होता है। 

इसके बजाय वो या तो IPC की हल्की धाराओं में केस थोप देती है या फिर एफआईआर ही नहीं लिखती। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) को इतनी पावर दी जानी चाहिए कि वो इस पैटर्न पर नज़र रखे और ऐसे मामलों में खुद से संज्ञान ले।

तीसरा: विदेश मंत्रालय (MEA) को पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू दलितों पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा हर कूटनीतिक मंच पर ज़ोर-शोर से उठाना चाहिए। 

सिंध में दलित लड़कियों का ज़बरन धर्म परिवर्तन, बांग्लादेश में दलितों के मंदिरों को तोड़ा जाना, और दोनों देशों में मुस्लिम ज़मींदारों के नीचे दलितों की बंधुआ मज़दूरी- इन सभी बातों को भारत की बाईलैटरल कूटनीति और संयुक्त राष्ट्र (UN) मानवाधिकार मंचों पर साफ-साफ नाम लेकर उठाया जाना चाहिए। ये वो भारतीय समुदाय हैं जिनका इस मिट्टी से ऐतिहासिक नाता है, और उन्हें बचाना भारत का एक नैतिक और रणनीतिक फर्ज़ है।

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