CAA और किसान आंदोलन में नरमी, UGC पर घर में कैद — BJP को जनरल वोटर से क्या दिक्कत है?

ज़रा सोचकर देखिए: यूपी के एक छोटे से शहर का रहने वाला 28-30 साल का एक नौजवान। एक स्कूल टीचर का बेटा। खूब जी-तोड़ मेहनत की, कोई प्रतियोगी परीक्षा निकाला, और सपना था की किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनेगा। जबसे वोट डालने लायक हुआ, तब से हर चुनाव में पूरे यकीन के साथ उसने बीजेपी को ही वोट दिया। उसके घर वालों ने दिवाली पर दीये जलाए, टीवी पर राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा देखते हुए उनकी आंखें भर आईं, और उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी अपनी पार्टी- हिंदू एकता और मेरिट की बात करने वाली पार्टी- उनके बच्चों के भविष्य का खयाल रखेगी।

लेकिन 8 मार्च 2026 की सुबह, जब ये लड़का UGC इक्विटी रेगुलेशंस 2026 के खिलाफ एक शांतिपूर्ण, संवैधानिक धरने में हिस्सा लेने दिल्ली के जंतर-मंतर की तरफ बढ़ा, तो हुआ क्या? दिल्ली पुलिस ने उसे जबरन रोका, बहुत देर हिरासत में रखा और वापस घर भेज दिया। उसी पुलिस ने उस जगह पर बैरिकेड लगा दिए जहां लोकतंत्र को खुलकर सांस लेनी चाहिए।

ये कोई हवा-हवाई बात या कोरी कल्पना नहीं है। ऐसा सच में हुआ है। 8 मार्च को अकेले दिल्ली में 100 से ज़्यादा लोगों को उठाया गया। रातों-रात आयोजकों को हाउस अरेस्ट कर लिया गया। यू.पी. के जाने-माने पत्रकार और कट्टर राइट विंग समर्थक- इन्फ्लुएंसर अजीत भारती ने बताया की 7 मार्च को ही यू.पी. पुलिस उनके घर पहुंच गई थी।

एक ऐसे इंसान को चुप कराने की कोशिश जिसने प्रदर्शन के बारे में सोशल मीडिया पर महज़ कुछ वीडियो ही तो डाले थे। उधर, रामलीला मैदान को पुलिस ने ऐसी छावनी में बदल दिया जैसे देश में कोई इमरजेंसी लग गई हो।

हैरानी तो इस बात की है की जिस सवर्ण वर्ग (ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, बनिया) और मेरिट की बात करने वाले ओबीसी वोटर्स के दम पर ये सरकार सत्ता में आई, आज वही सरकार उनकी आवाज़ दबाने के लिए पुलिस का डंडा चला रही है। ‘सेल्फ-गोल’ शब्द तो शायद इस भारी राजनीतिक ब्लंडर को समझाने के लिए बहुत छोटा पड़ जाएगा। ये तो ऐसा है जैसे टीम पहले से ही हार रही हो, और एक्स्ट्रा टाइम में अपने ही होम-क्राउड के सामने खुद के ही पाले में गोल दाग दे!

यूजीसी (UGC) के वो नियम जिनसे BJP का अपना ‘General वोटर’ खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है

जनवरी 2026 से लाखों स्टूडेंट्स, टीचर्स और आम लोग सड़कों पर क्यों उतरे हैं, इसे समझने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है की इन नियमों में असल में लिखा क्या है।

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को इन नियमों का नोटिफिकेशन निकाला। ऊपर-ऊपर से देखें तो लगेगा की इरादा बड़ा नेक है: जातिगत भेदभाव रोकने के लिए 2012 की पुरानी गाइडलाइंस की जगह एक नया और सख्त नियम लाना। यूजीसी का तर्क था की पिछले पांच सालों में भेदभाव की शिकायतें 118 फीसदी बढ़ गई हैं, इसलिए कड़े नियम चाहिए।

लेकिन पेंच यहीं फंस गया। ये नियम सुप्रीम कोर्ट की एक प्रक्रिया से निकले थे, जहां कोर्ट ने बस पुरानी गाइडलाइंस को लागू करने लायक बनाने को कहा था। पर जो ड्राफ्ट सामने आया, उसने सारे लीगल एक्सपर्ट्स के होश उड़ा दिए। ड्राफ्ट में ये मान लिया गया की जातिगत भेदभाव महज़ एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) के खिलाफ ही हो सकता है।

मतलब, सिर्फ आपके जन्म के आधार पर ये तय कर दिया गया की कौन हमेशा पीड़ित रहेगा और कौन हमेशा अपराधी। नियम 3(c) और 3(e) के तहत तो जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स को किसी सुरक्षा के दायरे में रखा ही नहीं गया।

अब जो कमेटियां बनेंगी, उनमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और विकलांग कोटे का होना लाज़िमी है, पर जनरल कैटेगरी के लिए कोई जगह तय नहीं है। सबसे खतरनाक बात तो ये है की अगर कोई झूठी शिकायत करता है, तो उसके खिलाफ एक्शन लेने वाला पुराना नियम ही चुपचाप हटा दिया गया। यानी जनरल कैटेगरी के किसी स्टूडेंट या टीचर पर कल को कोई झूठा आरोप लग जाए, तो उसके पास बचने का कोई लीगल रास्ता ही नहीं बचेगा।

सुप्रीम कोर्ट को भी ये बात हज़म नहीं हुई। उन्होंने माना की ये नियम संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 का उल्लंघन करते हैं और इन पर स्टे लगा दिया। पर स्टे लगने के बावजूद प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे… क्योंकि जनरल कैटेगरी को स्टे नहीं चाहिए। वो चाहते हैं की ये नियम जड़ से खत्म कर दिए जाएं।

अजीत भारती हाउस अरेस्ट और पुलिसिया एक्शन- अपने ही समर्थकों की आवाज़ दबाने का खेल

6 मार्च को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की परमिशन ये कहकर कैंसिल कर दी कि “लॉ एंड ऑर्डर” बिगड़ सकता है। रामलीला मैदान के लिए भी मना कर दिया गया।

पर बात सिर्फ परमिशन कैंसिल होने तक नहीं रुकी। 7 मार्च की रात और 8 की सुबह-सुबह, पुलिस सीधा आयोजकों के घरों पर धमक पड़ी। भूपेंद्र चौधरी, स्वामी आनंद स्वरूप, महिपाल सिंह जैसे कई लोगों के घरों के बाहर पुलिस का पहरा लग गया। सोशल मीडिया पर इसके वीडियोज़ वायरल होने लगे और पूरे राइट-विंग खेमे में ज़बरदस्त गुस्सा भड़क गया।

सबसे ज़्यादा बवाल तो अजीत भारती के अरेस्ट पर हुआ। एक ऐसा बंदा जो हिंदी पट्टी में सबसे ज़्यादा सुना जाता है, सालों से टीवी डिबेट्स में बीजेपी का बचाव करता आ रहा है… उसे यूपी पुलिस ने उसी के घर में हाउस अरेस्ट कर लिया! भारती ने साफ़ कर दिया की ये एक्शन उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स का नतीजा था।

“लीगल प्रदर्शन से एक रात पहले आयोजकों के घर पुलिस का पहुंचना… ये कोई क्राउड मैनेजमेंट नहीं है। ये अपने ही राजनीतिक साथियों की आवाज़ दबाना है।”

अजीत भारती जैसे इंसान को हाउस अरेस्ट करना कितनी बड़ी विडंबना है! ये वही इंसान है जिसने सालों-साल हिंदुत्व का नैरेटिव सेट किया है। इसका दर्शक वर्ग वही जनरल कैटेगरी का हिंदू वोटर है जिसने यूपी में बीजेपी को इतनी बड़ी जीत दिलाई थी। आधी रात को पुलिस भेजकर उसे रोकना… इसे शासन नहीं, धोखा कहते हैं। और सच कहूं तो, लोग इसे इतनी आसानी से भूलने वाले नहीं हैं।

सड़कों पर आखिर है कौन? विपक्ष नहीं, BJP का अपना वोटर

ये शायद पूरे मामले का सबसे अहम राजनीतिक सवाल है, और सरकार शायद इसी का जवाब समझने में बुरी तरह फेल रही है।

सड़कों पर उतरे ये लोग कोई भाड़े के टट्टू नहीं हैं जिन्हें बसों में भर-भर कर लाया गया हो। ये कोई बीजेपी के वैचारिक दुश्मन भी नहीं हैं। ये तो बेचारे नेट (NET) और सेट (SET) की तैयारी करने वाले वो छात्र हैं जिन्हें रात-दिन ये टेंशन सता रही है की आगे चलकर नौकरी मिली भी, तो इन कमेटियों की तलवार हमेशा उनकी गर्दन पर लटकती रहेगी। 

ये वो इंजीनियरिंग और मेडिकल के ग्रैजुएट हैं जो बिना किसी रिज़र्वेशन के लड़ते आए हैं। ये वो मां-बाप हैं- डॉक्टर, वकील, छोटे-मोटे व्यापारी- जिन्होंने दशकों तक अपने बच्चों को यही घुट्टी पिलाई की बेटा, मेहनत और मेरिट से ही सब हासिल होता है। सवर्ण सेना, करणी सेना, ब्राह्मण महासभा जैसे न जाने कितने संगठनों ने इसमें हिस्सा लिया है।

13 जनवरी के नोटिफिकेशन के बाद तो जैसे आग ही लग गई। दो हफ्ते के अंदर दिल्ली से लेकर लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़ और मुंबई तक धरने-प्रदर्शन शुरू हो गए। आगरा के एक बीजेपी नेता ने तो पीएम मोदी को अपने खून से खत तक लिख डाला। अकेले यूपी में एक दर्जन से ज़्यादा लोकल बीजेपी नेताओं ने इस्तीफे दे दिए। एक शाम तो 11 लोगों ने एक साथ ये कहते हुए इस्तीफा दे दिया की “पार्टी अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गई है।”

ये किसी विपक्ष की आवाज़ें नहीं हैं। ये बीजेपी के अपने लोग हैं। और 8 मार्च आते-आते जब सरकार ने रामलीला मैदान में बैरिकेडिंग कर दी और आयोजकों को घर में ही कैद कर लिया, तो एक बात साफ़ हो गई: पार्टी का अपना पॉलिटिकल इंटेलिजेंस पूरी तरह से ख़राब हो चुका है।

आनंद रंगनाथन की चेतावनी- “यह BJP का ‘सेल्फ-गोल’ है”

इन सब आवाज़ों के बीच एक आवाज़ सबसे भारी थी- आनंद रंगनाथन की। वैज्ञानिक, लेखक और राइट-विंग के सबसे प्रखर विचारकों में से एक।

रंगनाथन की आलोचना किसी वामपंथी या कांग्रेसी की आलोचना नहीं थी। वो तो उस इंसान का दर्द था जो खुद बीजेपी के मूल विचारों- हिंदू एकता, मेरिट और राष्ट्रवाद- में यकीन रखता है। वो खफ़ा हैं क्योंकि उन्हें अपनी ही पार्टी को वो सब कुछ बर्बाद करते हुए दिख रहा है जिसे बनाने में सालों लग गए। उन्होंने सीधा कहा कि ये सरकार का एक भयानक “सेल्फ-गोल” है। उनका तर्क एकदम सटीक है: जिन लोगों पर सरकार डंडा चला रही है, वो कोई और नहीं, बल्कि उनके अपने ही कोर वोटर्स हैं।

रंगनाथन ने साफ़ किया की सुप्रीम कोर्ट ने नियमों में सुधार की बात की थी, न की जनरल कैटेगरी के साथ भेदभाव करने की। उन्होंने सीधा-सीधा सवाल दागा की आखिर सरकार “अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी” क्यों मार रही है? क्या लीडरशिप का अपने बेस से कनेक्शन पूरी तरह कट चुका है, या फिर उन्हें एक ऐसे घेरे में रखा गया है जहां उन तक ज़मीनी हकीकत पहुंच ही नहीं रही? पीएम को ये सब सलाह दे कौन रहा है भाई?

ये बात बहुत मायने रखती है। जब विपक्ष सरकार को घेरता है, तो बात अलग होती है। लेकिन जब आपके अपने ही वोटर और उनके सबसे बड़े पैरोकार खुलेआम आप पर धोखा देने का आरोप लगाने लगें, तो समझ लीजिए कि मामला हाथ से निकल रहा है।

ना CAA प्रोटेस्ट वाले अरेस्ट हुए, ना किसान आंदोलन वाले’, फिर जनरल कैटेगरी पर एक्शन क्यों?

8 मार्च के इस एक्शन का सबसे नुकसानदेह पहलू खुद ये एक्शन नहीं है, बल्कि वो तुलना है जो अब लोग कर रहे हैं।

शाहीन बाग (दिसंबर 2019 – मार्च 2020): याद है ना? महीनों तक दिल्ली की एक मुख्य सड़क जाम रही। लाखों लोगों का जीना मुहाल हो गया। वो कोई तय की हुई प्रदर्शन की जगह भी नहीं थी। लेकिन तब सरकार ने असाधारण संयम दिखाया। कोई मास-अरेस्ट नहीं, किसी के घर रात को पुलिस नहीं गई। क्यों? क्योंकि वो विपक्ष के वोटर थे, और उन पर डंडा चलता तो दुनिया भर में बदनामी होती।

किसान आंदोलन (जनवरी 2021): पंजाब और पश्चिमी यूपी के किसानों ने दिल्ली घेर ली। 26 जनवरी को तो सीधे लाल किले पर ही चढ़ाई हो गई, झंडे फहरा दिए गए। पुलिस वालों के साथ मारपीट तक हुई। फिर भी… कुछ महीनों बाद पीएम मोदी ने खुद टीवी पर आकर तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया। वजह? पंजाब और पश्चिमी यूपी का जाट-सिख वोट बैंक नाराज़ नहीं किया जा सकता था।

आतंकियों के जनाज़े: देश भर में कई बार ऐसे खूंखार आतंकियों के जनाज़ों में भारी भीड़ उमड़ी, देश-विरोधी नारे लगे… पर पुलिस दूर खड़ी तमाशा देखती रही।

और अब, 8 मार्च 2026: जनरल कैटेगरी के छात्र, जो शांति से अपनी बात रखने जंतर-मंतर आना चाह रहे थे… उन पर बैरिकेड लगा दिए गए। न कोई सड़क जाम हुई, न कोई राष्ट्रीय स्मारक तोड़ा गया। फिर भी 500 से ज़्यादा लोग उठा लिए गए।

“गैरकानूनी तरीके से सड़क रोकने वालों को सरकार ने खुली छूट दी। लाल किले पर हिंसा करने वालों के केस चुपचाप वापस ले लिए गए। लेकिन जंतर-मंतर पर एक शांतिपूर्ण धरने के लिए हाउस अरेस्ट? ये कौन सा लॉजिक है?”

लगता है की प्रदर्शन जितना जायज़ और शांतिपूर्ण होगा, सरकार का डंडा उतना ही भारी पड़ेगा। बीजेपी का अपना वोटर इस बात को कतई भूलने वाला नहीं है।

BJP का कोर वोटर- आखिर ये “जनरल कैटेगरी” है कौन और इनकी ताकत क्या है?

मामले की चुनावी गंभीरता समझनी है तो पहले ये समझना होगा की आखिर ये ‘जनरल कैटेगरी’ वोटर है कौन, और बीजेपी के गणित में इनकी क्या अहमियत है।

भले ही आबादी के हिसाब से ये महज़ 24-28 प्रतिशत हों, लेकिन चुनावी राजनीति में इनका वज़न बहुत ज़्यादा है। ये लोग जमकर वोट डालते हैं, ओपिनियन सेट करते हैं। यूपी जैसे बड़े राज्य में तो सवर्ण वोट ही बीजेपी की धुरी रहा है। 2027 में यूपी के चुनाव सिर पर हैं। 2024 में जब सीटें 240 पर सिमट गईं, तो ये मान लिया गया की एससी-एसटी वोट खिसक गया, लेकिन इस चक्कर में जनरल कैटेगरी को भी खफ़ा कर देना… ये तो समस्या का हल नहीं, बल्कि अपने ही विनाश को न्योता देना है।

मोदी जी के नेतृत्व में बीजेपी ने इस वर्ग को एक खास मैसेज देकर अपने साथ जोड़ा था: की मेरिट की कद्र होगी, और हिंदू एकता जाति से ऊपर है। इन वोटर्स के पास कोई प्राकर्तिक विकल्प है भी नहीं। कांग्रेस, एसपी, आप- इन सबकी राजनीति ऐसी है जहां जनरल कैटेगरी फिट नहीं बैठती। लेकिन बीजेपी की ये ग़लतफ़हमी की “इनके पास तो कोई और ऑप्शन है ही नहीं, ये जाएंगे कहां?”, राजनीति में सबसे खतरनाक साबित हो सकती है। क्योंकि जब किसी के पास कोई विकल्प नहीं बचता, तो वो चुनाव के दिन घर पर ही बैठ जाना पसंद करता है।

दूसरे आंदोलन वालों पर मास-अरेस्ट क्यों नहीं हुआ? तब का पॉलिटिकल लॉजिक और अब की गलती

ये बात ज़रा ध्यान से समझने वाली है। CAA के वक्त सरकार को पता था की प्रदर्शन करने वाले उनका वोटर बेस नहीं हैं। डंडा चलाते तो दुनिया भर में बदनामी होती और विपक्ष इसका फायदा उठाता। किसान आंदोलन के वक्त भी समीकरण एकदम साफ़ थे- जाट और सिख वोट बैंक को नाराज़ करने की कीमत सरकार नहीं चुकाना चाहती थी।

पर ज़रा यही लॉजिक यूजीसी वालों पर लगाकर देखिए। ये तो बीजेपी के अपने कोर वोटर्स हैं न? सवर्ण सेना, ब्राह्मण महासभा… ये कोई विपक्षी पार्टियां तो हैं नहीं! अजीत भारती जैसे लोग तो सालों से सरकार का ही एजेंडा आगे बढ़ा रहे थे।

अगर शाहीन बाग में संयम दिखाने के पीछे अपने वोट बैंक को बचाना एक वजह थी, तो वो लॉजिक यहां क्यों गायब हो गया? क्या सरकार का इंटेलिजेंस सिस्टम इतना निकम्मा हो गया है की वो पहचान ही नहीं पा रहा कि धरने पर बैठा कौन है? या फिर किसी ने ये मान लिया है कि सवर्णों को तो आराम से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? दोनों ही बातें बेहद डरावनी हैं।

मोदी जी को क्या बताया जा रहा है जो पार्टी ‘Self-Goal’ कर रही है?

ये सवाल बार-बार घूमकर वहीं आता है- मोदी जी को आखिर सलाह दे कौन रहा है? सरकार के भीतर से सही इंफॉर्मेशन ऊपर तक क्यों नहीं पहुंच रही?

जब 2024 में सीटें घटीं, तो कई सीनियर नेताओं ने दबी ज़ुबान में माना था की अपर-कास्ट की एकता को ‘टेक फॉर ग्रांटेड’ लेना भारी पड़ा। लगता है वो सबक किसी ने सीखा ही नहीं। एजुकेशन मिनिस्ट्री के अंडर यूजीसी ने ये नियम बना दिए, बिना ये सोचे की बीजेपी के अपने बेस पर इसका क्या असर होगा। जब बवाल कटा, तो सब खामोश हो गए। बात-चीत करने के बजाय पुलिस को आगे कर दिया गया।

राजनीतिक असंतोष को ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का मसला मानकर पुलिस के डंडे से सुलझाने की ये जो नौकरशाही वाली आदत है, ये बहुत ही खतरनाक है। ये लोग कोई दंगाई नहीं थे, ये अपनी बात कहने आए थे। जब सरकार ऐसा करती है, तो वो साफ़ जता देती है की वो अपनों की ही बात सुनने को तैयार नहीं है।

जनरल कैटेगरी से बीजेपी का वो अलिखित वादा जो अब टूट रहा है

तीन दशकों से बीजेपी और जनरल कैटेगरी के वोटर के बीच एक अघोषित सा समझौता रहा है। मेनिफेस्टो में भले न लिखा हो, पर हर रैली में ये बात झलकती है: की हम हिंदू पहचान बचाएंगे, तुष्टिकरण नहीं करेंगे, तुम्हारी मेहनत और मेरिट का सम्मान करेंगे, और तुम्हें तुम्हारे ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक नहीं बनने देंगे।

लेकिन यूजीसी के ये नए नियम इसी वादे को तोड़ते हुए नज़र आते हैं। बात नीयत की नहीं है, बात इस ‘धारणा’ की है जो अब जनता के दिमाग में बैठ गया है। जब रायबरेली में बीजेपी किसान मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष श्याम सुंदर त्रिपाठी ये कहकर इस्तीफा दे देते हैं की “ये नियम मेरे स्वाभिमान और विचारधारा के खिलाफ हैं,” तो वो कोई पॉलिसी पर बहस नहीं कर रहे होते। वो अपना दर्द बता रहे होते हैं की उनके साथ धोखा हुआ है।

बीजेपी आज तक रिज़र्वेशन की इस कटीली राजनीति पर बड़े आराम से संतुलन बनाती आई थी। पर अब वो रस्सी टूट रही है। एक तरफ यूजीसी के नियम मंडल वाली राजनीति की तरह लग रहे हैं, और दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों पर पुलिस का डंडा। कुल मिलाकर हालात ऐसे बन गए हैं की जनरल कैटेगरी का वोटर अपनी ही पार्टी को पहचान नहीं पा रहा है।

BJP ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली 

चलिए वहीं लौटते हैं जहां से हमने शुरुआत की थी। जंतर-मंतर पर अरेस्ट हुआ एक बीजेपी का अपना वोटर। लखनऊ में हाउस अरेस्ट हुआ एक राइट-विंग कमेंटेटर। एक ही रात में इस्तीफा देने वाले 11 बीजेपी कार्यकर्ता। खून से खत लिखता एक नेता।

लोकतंत्र इसीलिए तो ज़िंदा रहता है क्योंकि वहां गुस्सा और नाराज़गी ज़ाहिर करने की जगह होती है। पर जब कोई सरकार अपने ही सपोर्टर्स के लिए वो दरवाज़े बंद कर दे… जब वो पुलिस और स्टेट की ताकत अपने दुश्मनों पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर छोड़ दे जिन्होंने उसे सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाया था… तो वो किसी खतरे को टालती नहीं, बल्कि एक नया खतरा पैदा कर देती है।

बीजेपी को अपने लिए नए राजनीतिक दुश्मन ढूंढ़ने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। इस एक वाकये से उसने खुद ही अपने दुश्मन खड़े कर लिए हैं। रामलीला मैदान से उठाया गया हर स्टूडेंट एक ‘वोट’ है जो अब हाथ से निकल गया है। घर में नज़रबंद किया गया हर कमेंटेटर उन लाखों लोगों की आवाज़ है जो अब समझ चुके हैं की जिस पार्टी पर उन्होंने भरोसा किया, वो उन पर भरोसा नहीं करती। यूपी में 2027 में चुनाव हैं, और 8 मार्च की ये कड़वी यादें लोगों के ज़ेहन में ताज़ा रहेंगी।

इसे सुधारना कोई बहुत रॉकेट साइंस नहीं है। बात करो उन छात्रों से। वापस लो यूजीसी के उन नियमों को। जितने लोगों को पकड़ा है, उन्हें बिना किसी शर्त के छोड़ो। और सबसे ज़रूरी बात- उन सलाहकारों की गिरेबान पकड़कर पूछो की डंडा चलाने का ये वाहियात आइडिया दिया किसने था?

आनंद रंगनाथन का वो ‘सेल्फ-गोल’ वाला ताना बिल्कुल सटीक बैठता है। चुनावी राजनीति के इस हाई-वोल्टेज खेल में एक ‘ओन-गोल’ सिर्फ एक मैच नहीं हरवाता, बल्कि कभी-कभी पूरा का पूरा सीज़न डुबा देता है। न CAA वाले अरेस्ट हुए। न किसान आंदोलन वाले। पर यूजीसी के प्रदर्शनकारी- जो खुद बीजेपी के ‘जनरल’ थे- उनके दरवाज़े पर मुंह-अंधेरे पुलिस खड़ी कर दी गई। सरकार में बैठे किसी न किसी शख्स को इसका जवाब तो देना ही होगा। और हां, बहुत जल्दी देना होगा।

Scroll to Top