“मैं पंडित हूँ जो अवसर के अनुसार बदलता हूँ – लेकिन मेरे पूर्वज चाणक्य से हेडगेवार तक राष्ट्र और धर्म के लिए मर मिटे"

“मैं पंडित हूँ जो अवसर के अनुसार बदलता हूँ – लेकिन मेरे पूर्वज चाणक्य से हेडगेवार तक राष्ट्र और धर्म के लिए मर मिटे”

14 मार्च 2026 की बात है। यूपी पुलिस भर्ती की एक परीक्षा अचानक पूरे देश में बवाल का कारण बन गयी। परीक्षा में एक बहुत ही चालाकी भरा सवाल पूछा था: ‘अवसर के अनुसार कौन बदलता है?’ और इसके उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में एक ऐसा शब्द था जिस पर साज़िश की बू आ रही थी- ‘पंडित।’ ज़ाहिर है, इसके बाद जो हंगामा हुआ वो लाज़मी ही था। यूपी से लेकर पूरे देश में ब्राह्मण संगठनों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। 

साफ़-साफ़ दिख रहा था की कैसे समाज के एक ख़ास इकोसिस्टम ने ब्राह्मणों को योगी जी के खिलाफ करने और ब्राह्मणों की छवि ख़राब करने के लिए ये साज़िश रची। बात सीधे सीएम योगी आदित्यनाथ तक पहुँची। उन्होंने दखल दिया और पेपर सेट करने वाली एजेंसी को ब्लैकलिस्ट कर दिया। 

इस घटना ने एक बहुत ही खतरनाक सच को सामने ला दिया था: की ‘पंडित’ शब्द को ‘अवसरवादी’ या मौक़ापरस्त की तरह एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था।

यह लेख उसी परीक्षा के सवाल का एक सीधा जवाब है- और उस पूरी वैचारिक मशीनरी का भी जिसने इसे पैदा किया है।

ब्राह्मणों को ‘अवसरवादी’ बोलने से पहले इसे जान लो

इल्ज़ाम तो पुराना है: की ब्राह्मण अवसरवादी होते हैं, मतलब जिधर की सत्ता की हवा देखी, उधर ही मुड़ गए। की ये एक ऐसा समुदाय है जो सत्ता के साथ चिपकने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल करता है। सच कहूं तो, यह एक ऐसा घटिया तंज है जिसे ‘समाजशास्त्रीय नज़रिए’ का चोला पहनाकर बुद्धिजीवियों के बीच इतनी बार दोहराया गया है की अब बहुत से लोग इसे ही इतिहास का सच मान बैठे हैं।

अब ज़रा देखते हैं की अवसरवाद का असली मतलब क्या है। ‘अवसर’ एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब है मौक़ा। आज की भाषा में ‘अवसरवादी’ उसे कहते हैं जो सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करे और अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसूलों को ताक पर रख दे।

लेकिन ढलने और खुद को बदलने का एक दूसरा मतलब भी होता है- जिसे गीता में ‘विवेक’ कहा गया है। समय की मांग को समझना और इच्छाओं के बजाय ‘धर्म’ के अनुसार काम करना। यही तो फर्क है एक मौक़ापरस्त दल-बदलू और एक सच्चे राजनेता के बीच, जो युद्ध के मैदान को पढ़ता है और अपने फायदे से ऊपर उठकर एक बड़े लक्ष्य के लिए काम करता है।

आज जिस ब्राह्मण को अवसरवादी कहा जा रहा है, वो चाणक्य, मंगल पांडे, चंद्रशेखर आज़ाद, बाल गंगाधर तिलक, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, केशव बलिराम हेडगेवार और अटल बिहारी वाजपेयी के ही वंशज हैं। ये वो लोग थे जो समय के साथ बदले। अगर सच कहूं तो, वो शाब्दिक अर्थ में पूरी तरह से ‘अवसरवादी’ ही थे।

लेकिन वो जब भी बदले, उन्होंने और बड़ा बलिदान दिया, उनका समर्पण और गहरा हुआ, और उन्होंने अपने निजी स्वार्थ को राष्ट्र और सभ्यता के लिए पूरी तरह न्योछावर कर दिया। अगर इसे अवसरवाद कहते हैं, तो इस देश को अपने अवसरवादियों का जीवन भर कर्ज़दार रहना चाहिए।

वैसे, यह जो कीचड़ उछाला जा रहा है, यह कोई इत्तेफाक नहीं है। इसके पीछे एक पक्का सियासी डिज़ाइन है, एक फंडिंग का पूरा इकोसिस्टम है, और इसका निशाना है: वो हिंदू सामाजिक गठबंधन जो आज भारत की राजनीति को नया आकार दे रहा है। खैर, यह आर्टिकल उस साज़िश को बेनकाब करेगा, उन लोगों का सम्मान करेगा जिन्हें ये बदनाम करना चाहते हैं, और यह पक्का करेगा कि किसी भी एग्ज़ाम पेपर के मुकाबले इतिहास की आवाज़ ज़्यादा ज़ोर से गूंजे।

ब्राह्मण और ‘पंडित’ होने का मतलब और इसके पीछे छुपी सभ्यता

‘पंडित’ शब्द संस्कृत के ‘पंडिता’ से आया है, जिसकी जड़ ‘पंडा’ में है, यानी ज्ञान या बुद्धि। पंडित का मतलब सिर्फ पुजारी या कर्मकांड कराने वाला नहीं होता। इतिहास और शब्दों की बनावट के हिसाब से देखें, तो पंडित एक ऐसा विद्वान है जिसने ज्ञान के किसी क्षेत्र में महारत हासिल की हो और उस ज्ञान को समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सके। यह उपाधि राजाओं, क्रांतिकारियों, वैज्ञानिकों और शहीदों तक ने धारण की है। इस पर कभी सिर्फ मंदिरों का एकाधिकार नहीं रहा।

अंग्रेजों के ज़माने में और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने ब्राह्मणों की जो एक छवि गढ़ दी है, उसने इस समुदाय को महज़ पुजारियों के एक वर्ग तक समेट कर रख दिया है, मानो ये वो लोग हैं जो सिर्फ पूजा-पाठ पर कब्ज़ा करके अपना दबदबा बनाए रखते हैं। ये तो महज़ एक मज़ाक है।

पूरे भारतीय इतिहास को उठाकर देख लीजिए, ब्राह्मण बड़े-बड़े गणितज्ञ, खगोलशास्त्री, सेनापति, प्रशासक, कवि, योद्धा, साम्राज्य बनाने वाले और स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। मनुस्मृति को आज आप चाहे जैसे भी देखें, लेकिन हर ब्राह्मण की असल ज़िंदगी कभी वैसी नहीं थी- ज़मीनी हकीकत में वे अलग-अलग तरह के काम करते थे, उनके मकसद और बलिदानों में बहुत विविधता थी।

और सबसे बड़ी बात, ब्राह्मण की पहचान जड़ता या लकीर का फकीर होने से नहीं है। ‘विवेक’ की पूरी परंपरा यही तो कहती है की ज्ञानी व्यक्ति को समय की मांग को समझना चाहिए और उसी के हिसाब से काम करना चाहिए। आदि शंकराचार्य को ही ले लीजिए। जब पूरा भारत धार्मिक तौर पर टुकड़ों में बंट रहा था, तब उन्होंने पूरे उपमहाद्वीप को पैदल नाप दिया था।

अपनी तार्किक दलीलों और सुधारों के दम पर उन्होंने सनातन धर्म को एक किया। क्या वे अवसरवादी थे? या वे एक ऐसे इंसान थे जिसने समझा की उस पल की क्या ज़रूरत है और उसी के अनुसार काम किया?

चाणक्य- वो असली ‘अवसरवादी’ ब्राह्मण जिसने एक पूरा साम्राज्य खड़ा कर दिया

अगर भारत के इतिहास में कोई एक ऐसा इंसान है जो इस ‘अवसरवाद’ के इल्ज़ाम पर बिल्कुल फिट बैठता है और साथ ही इसकी धज्जियां भी उड़ा देता है, तो वो हैं आचार्य चाणक्य- जिन्हें हम कौटिल्य और विष्णुगुप्त भी कहते हैं। 350 ईसा पूर्व के आसपास जन्मे चाणक्य प्राचीन दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी तक्षशिला के एक ब्राह्मण विद्वान थे।

नंद वंश के राजा धनानंद के दरबार में उन्हें ज़लील किया गया था। कहा जाता है की उनके रंग-रूप और सामाजिक हैसियत को देखकर उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया गया, जबकि वे ज्ञान का समंदर थे। उस दरबार से वे एक कसम खाकर निकले थे।

उसी एक कसम ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का नक्शा बदलकर रख दिया। चाणक्य ने चंद्रगुप्त नाम के एक होनहार लड़के को ढूंढा और सालों के कड़े मार्गदर्शन, सैन्य रणनीतियाँ और सियासी दांव-पेंच के ज़रिए उसे नंद वंश को उखाड़ फेंकने में मदद की। उन्होंने मौर्य साम्राज्य की नींव रखी- जो उस समय तक का भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य था।

उनकी महान रचना ‘अर्थशास्त्र’ राजकाज चलाने की सबसे बेहतरीन किताबों में से एक है। इसमें टैक्स और सैन्य रणनीति से लेकर जासूसी और कूटनीति तक सब कुछ है। उनकी ‘चाणक्य नीति’ की मिसालें तो आज भी दी जाती हैं। आज का कोई भी नेता, रणनीतिकार या प्रशासक हो- चाहे वो लेफ्ट का हो या राइट का- वो कहीं न कहीं उनकी इसी बौद्धिक विरासत का ही इस्तेमाल कर रहा है, चाहे वो माने या न माने।

चाणक्य ने खुद को लगातार बदला। उन्होंने अपनी रणनीति, अपने गठबंधन, अपने तौर-तरीके सब बदले। जब ज़रूरत पड़ी तो उन्होंने छल का इस्तेमाल किया, जब मुमकिन हुआ तो बातचीत की, और जब ज़रूरी हुआ तो ताक़त का इस्तेमाल किया। अवसरवाद की जो सतही परिभाषा आज गढ़ी गई है, उसके हिसाब से तो वो सबसे बड़े अवसरवादी थे। फिर भी भारत उन्हें अवसरवादी नहीं कहता। भारत उन्हें अपना सबसे बड़ा राजनीतिक दिमाग मानता है।

मंगल पांडे- वो ब्राह्मण जिसने 1857 की पहली गोली दागी

तारीख़ थी 29 मार्च, 1857। कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के एक सिपाही ने दो अंग्रेज़ अफसरों पर अपनी बंदूक तान दी। नाम था मंगल पांडे। 1827 में आज के यूपी के बलिया जिले के नगवा गांव में उनका जन्म हुआ था। वो एक ब्राह्मण थे।

गुस्सा फूटने की तात्कालिक वजह थी नई एनफील्ड P-53 राइफल के कारतूस, जिन्हें लोड करने से पहले दांतों से काटना पड़ता था। हिंदू और मुस्लिम दोनों सिपाहियों में यह बात फैल गई थी की इन कारतूसों पर गाय और सुअर की चर्बी लगी है- जो सीधे तौर पर दोनों समुदायों के धर्म को भ्रष्ट करने की एक जानबूझकर की गई साज़िश थी।

मंगल पांडे के लिए धर्म सिर्फ किताबों की बातें नहीं थीं, बल्कि जीने का एक तरीका था। यह एक ऐसी लक्ष्मण रेखा थी जिसे पार नहीं किया जा सकता था।

उन्होंने कोई नफ़ा-नुकसान नहीं तोला, अपनी जान की कोई परवाह नहीं की और सीधे अंग्रेजों पर बंदूक तान दी। एक ब्राह्मण के लिए ‘धर्म’ महज़ किताब का पन्ना नहीं, जीने का तरीका होता है। उन्होंने फांसी का फंदा चूम लिया और वो आग लगा दी जिसने ब्रिटिश राज की जड़ें हिला दीं। खुद की जान देकर देश को जगाना- कोई ‘अवसरवादी’ ऐसा घाटे का सौदा करेगा क्या?

चंद्रशेखर आज़ाद- वो पंडित जी जिन्होंने समझौते के बजाय गोलियों को चुना

चंद्रशेखर तिवारी का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा गांव में हुआ था, जो आज मध्य प्रदेश में है। वो भी एक ब्राह्मण थे। और वो चंद्रशेखर आज़ाद कैसे बने? अपनी एक गज़ब की बगावत के ज़रिए। असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के जुर्म में महज़ पंद्रह साल की उम्र में उन्हें गिरफ्तार करके एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

जब उनसे उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने कहा ‘आज़ाद’। पिता का नाम? ‘स्वतंत्रता’। घर का पता? ‘जेल’। मजिस्ट्रेट ने चिढ़कर पंद्रह कोड़ों की सज़ा सुनाई। बताते हैं की उन्होंने हर कोड़े की मार पर सिर्फ ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाया।

आगे चलकर वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे खूंखार और खौफ पैदा करने वाले क्रांतिकारी बने। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के निर्विवाद नेता के रूप में, भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर उन्होंने 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन की मास्टरमाइंडिंग की और लाहौर षड्यंत्र केस में भी गहराई से शामिल रहे।

जहाँ गांधी जी का आंदोलन अहिंसा की बात करता था, वहीं आज़ाद की HSRA हथियारों के ज़रिए विरोध की वकालत करती थी- और वो अपनी जगह गलत नहीं थे, क्योंकि एक राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम में अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरीकों की ज़रूरत होती ही है।

27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में (जिसे अब आज़ाद पार्क कहा जाता है) ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें घेर लिया। वो अपनी आखिरी गोली तक अकेले लड़ते रहे। और वो आखिरी गोली उन्होंने खुद की कनपटी पर मार ली। उन्होंने कसम खाई थी की अंग्रेज़ उन्हें कभी ज़िंदा नहीं पकड़ पाएंगे, और उन्होंने अपनी वो कसम पूरी तरह से निभाई।

चंद्रशेखर आज़ाद सिर्फ चौबीस साल के थे। जब वो मरे, उनके पास कुछ नहीं था- न कोई प्रॉपर्टी, न पेंशन, न कोई रुतबा। सेंट्रल इंडिया के एक छोटे से गांव का वो एक ब्राह्मण लड़का था जिसने एक आज़ाद भारत के सपने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

जो लोग ये पूछते हैं न की ब्राह्मण अवसरवादी होते हैं क्या, उन्हें एक बार अल्फ्रेड पार्क में खड़े होकर सोचना चाहिए की आखिर किस तरह का अवसरवाद खुद को गोली मारने पर खत्म होता है।

पंडित बाल गंगाधर तिलक- स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है

सच कहूं तो तिलक वो ब्राह्मण थे जिन्होंने समय की नब्ज़ बिल्कुल सही पकड़ी। एक आम गणित के टीचर से देखते ही देखते वो पूरे देश की आवाज़ बन गए। जब उन्हें लगा की अंग्रेज़ों से सीधे नहीं लड़ा जा सकता, तो उन्होंने गणेश चतुर्थी और शिवाजी जयंती जैसे धार्मिक त्योहारों को ही राजनीतिक हथियार बना डाला। 

मांडले जेल में पड़े-पड़े ‘गीता रहस्य’ लिख दी और दुनिया को बताया की हाथ पर हाथ धरे बैठने से काम नहीं चलेगा, अन्याय के खिलाफ लड़ना ही धर्म है। आज के तथाकथित बुद्धिजीवी इसे भले ही ‘अवसरवाद’ कह दें, लेकिन अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करने के लिए हर मौके का इस्तेमाल करना- यही तो असली ब्राह्मण का ‘विवेक’ है। स्वराज्य के लिए उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी।

पंडित मदन मोहन मालवीय- बनारस को गढ़ने वाले

मदन मोहन मालवीय जी को ‘महामना’ ऐसे ही नहीं कहते। अवसरवादी लोग तो बनी-बनाई संस्थाओं को नोंच कर खाते हैं, उनका खून चूसते हैं। लेकिन मालवीय जी ने क्या किया? उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी खपाकर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) जैसी विशाल संस्था ही खड़ी कर दी। 

जब हिंदू पहचान और हकों की बात करना सियासी तौर पर बिल्कुल ‘घाटे का सौदा’ माना जाता था, तब भी वो डटकर खड़े रहे। उन्होंने अपने लिए कोई ‘मौक़ा’ नहीं तलाशा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए खुद को खपा दिया।

पंडित गोविंद वल्लभ पंत- देश में हिंदी की क्रान्ति के वास्तुकार

गोविंद वल्लभ पंत के पास आज़ादी के बाद गृह मंत्री के तौर पर बेतहाशा ताकत थी। अगर वो चाहते, तो किसी भी आम ‘अवसरवादी’ नेता की तरह अपने लिए रियासतें खड़ी कर लेते। लेकिन उन्होंने क्या किया? सरदार पटेल के साथ मिलकर देश को एक करने में अपनी सारी ताकत झोंक दी। 

हिंदी को राजभाषा बनाने के लिए कड़े राजनीतिक विरोध भी झेले। अपनी कुर्सी या फायदे की परवाह किए बिना, जिस चीज़ से देश मज़बूत हो उसे बेखौफ होकर लागू करना- क्या यही है आपका अवसरवाद?

पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी- कश्मीर के लिए जान देने वाले ब्राह्मण

अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी की ही बात ले लीजिए। चाहते तो आराम से मंत्री पद का सुख भोगते, सत्ता की मलाई खाते। लेकिन उन्होंने उसूलों के लिए कुर्सी को लात मार दी। ‘एक देश में दो विधान’ (कश्मीर का अलग कानून) वाला खेल उन्हें रत्ती भर भी मंज़ूर नहीं था।

एक सही मौके की नज़ाकत को समझते हुए, वो बिना परमिट के ही कश्मीर में घुस गए, सीधे मौत के मुंह में। 

भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की नींव रखने वाला एक ब्राह्मण नेता महज़ एक उसूल के लिए कश्मीर की जेल में अपनी जान दे देता है। कोई मौक़ापरस्त इंसान ऐसा करेगा भला? उन्होंने ऐसा ‘अवसर’ चुना जिसमें जान जाने का पक्का जोखिम था, बस इसलिए ताकि भारत के दो टुकड़े न हों।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय- एकात्म मानववाद के दार्शनिक

दीनदयाल उपाध्याय जी का किस्सा तो और भी झकझोर देने वाला है। जब पूरी दुनिया अमेरिका के पूंजीवाद या रूस के कम्युनिज्म की अंधी दौड़ में भाग रही थी, इस ब्राह्मण ने भारत की मिट्टी से जुड़ा अपना ‘एकात्म मानववाद’ का दर्शन रच दिया। जो चाहते तो किसी भी बड़े खेमे में घुसकर सत्ता सुख भोग सकते थे।

पार्टी के इतने बड़े नेता रहे, लेकिन पास में न कोई दौलत, न कोई शानो-शौकत। 

और अंत में क्या मिला? मुगलसराय स्टेशन के पास एक रहस्यमयी मौत। अगर ब्राह्मण इतना ही बड़ा ‘अवसरवादी’ है, तो फिर इस इंसान का ऐसा दर्दनाक और गुमनाम हश्र क्यों हुआ?

पंडित डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार- RSS के संस्थापक

डॉक्टर हेडगेवार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। पेशे से डॉक्टर थे, चाहते तो खूब पैसा-वैसा छापते। लेकिन उन्होंने इंसानों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की बीमारी पकड़ ली- की हिंदू समाज बुरी तरह बंटा हुआ है।

समय की मांग को देखते हुए उन्होंने इसका इलाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूप में निकाला। अंग्रेज़ों की जेल भी काटी। 

मजे की बात तो ये है की इतना विशाल संगठन खड़ा करने के बाद भी, उन्होंने अपने लिए कोई निजी साम्राज्य या कुर्सी नहीं बचाई। चुपचाप किनारे हो गए और कमान दूसरों को सौंप दी। बिना किसी लालच के, अपना पूरा जीवन देश को दे देना- अगर आप इसे ‘अवसरवाद’ कहते हैं, तो भाई फिर ‘निष्काम कर्म’ किसे कहेंगे?

पंडित अटल बिहारी वाजपेयी- वो ब्राह्मण जिसने भारत को परमाणु ताकत बनाया

और अंत में, अटल बिहारी वाजपेयी। एक ऐसा ब्राह्मण नेता जिसने सत्ता के लालच में दल बदलने के बजाय, अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा सिर्फ विपक्ष में रहकर सच्चाई बोलने में निकाल दिया।

और जब प्रधानमंत्री बने, तो अमेरिका और पूरी दुनिया की धमकियों को ठेंगा दिखाते हुए पोखरण-II परमाणु परीक्षण ‘ऑपरेशन शक्ति’ को हरी झंडी दे दी, जिसने भारत को घोषित रूप से एक परमाणु हथियार वाला देश बना दिया। 

इसका अंतरराष्ट्रीय विरोध तुरंत और बहुत भयंकर हुआ। अमेरिका, जापान और कई अन्य देशों ने प्रतिबंध लगा दिए।, लेकिन भारत की सुरक्षा के लिए ये जोखिम लेना ही था। अपने सियासी फायदे से ऊपर देश की ताकत को रखना- भगवान करे ऐसा ‘अवसरवाद’ हर हिंदुस्तानी नेता में आ जाए!

कुछ अन्य जाने-माने ब्राह्मण स्वतंत्रता सेनानी और योगदानकर्ता

भारत की आज़ादी और इसकी सभ्यता को बनाए रखने में ब्राह्मणों का योगदान इतना विशाल है की इसे किसी एक लिस्ट में समेटा ही नहीं जा सकता। लेकिन अगर ईमानदारी से इतिहास लिखा जाए, तो इन नामों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता:

विनायक दामोदर सावरकर- नासिक के एक चितपावन ब्राह्मण- जिन्हें अंडमान द्वीप की सेल्यूलर जेल (काला पानी) में कैद किया गया था, जहाँ के हालात इंसान को मानसिक रूप से तोड़ देने के लिए ही बनाए गए थे। लेकिन वो नहीं टूटे। जेल में रहते हुए उन्होंने अपने सेल की दीवारों पर 1857 का इतिहास उन नुकीली चीज़ों से लिख डाला जो उनके हाथ लगीं। उनका ‘हिंदुत्व’ का जो कंसेप्ट था- यानी भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान- उसने पीढ़ियों तक भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक दिशा तय की। बाद की राजनीति में आप उनसे चाहे कितनी भी असहमति रखें, लेकिन सेल्यूलर जेल में उनके इस बलिदान को कोई नकार नहीं सकता।

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल- इनका जन्म यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था। वो 1925 के काकोरी ट्रेन एक्शन के मुख्य नेताओं में से एक थे, जिसमें क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सरकार का खजाना ले जा रही ट्रेन को लूट लिया था। 19 दिसंबर, 1927 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। वो अमर कविता ‘सरफरोशी की तमन्ना’ के लेखक भी थे। सिर्फ तीस साल की उम्र में उनका निधन हो गया। एक ब्राह्मण कवि-क्रांतिकारी जो शहादत पर कविताएं लिखता था और अंत में खुद शहीद हो गया।

सुब्रमण्य भारती – महाकवि भरतियार – एक तमिल ब्राह्मण कवि और पत्रकार थे जिनकी आग उगलती राष्ट्रवादी कविताओं ने बीसवीं सदी की शुरुआत में तमिल स्वतंत्रता आंदोलन में जान फूंक दी थी। उन्होंने आज़ादी, महिला सशक्तिकरण, और हिंदू सभ्यता के गौरव पर ऐसी भाषा में लिखा जो हर साहित्यिक और सामाजिक दीवार को पार कर गई। आज उन्हें तमिलनाडु का सबसे महान आधुनिक कवि माना जाता है- एक ऐसा ब्राह्मण जिसकी विरासत हर उस कोशिश को नाकाम कर देती है जो तमिल पहचान को ब्राह्मण पहचान के खिलाफ खड़ा करना चाहती है।

बिपिन चंद्र पाल- जो लाल-बाल-पाल की मशहूर तिकड़ी (तिलक और लाजपत राय के साथ) का हिस्सा थे, ब्रिटिश राज से पूरी आज़ादी की मांग करने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे। ये वो दौर था जब कांग्रेस अभी भी साम्राज्यवादी ढांचे के भीतर ही कुछ सुधारों की भीख मांग रही थी। आज़ादी के आंदोलन की मांगों को आक्रामक बनाने में उनका रोल बहुत अहम रहा।

मोतीलाल नेहरू – जवाहरलाल के पिता – भारत के सबसे कामयाब वकीलों में से एक थे जब उन्होंने आज़ादी की लड़ाई के लिए अपना वो चमकता करियर और ऐशो-आराम ठुकरा दिया। और खुद जवाहरलाल नेहरू, उनकी सरकार के कामकाज को इतिहास चाहे जिस नज़र से देखे, वो भी एक ब्राह्मण ही थे – जो इस बात की याद दिलाता है की भारत के लिए ब्राह्मणों का योगदान हर विचारधारा, हर राजनीतिक परंपरा और हर युग में मौजूद रहा है।

धर्म की रक्षा करने वाले ब्राह्मण राजा और शासक

आजकल की जो आम ऐतिहासिक कहानियां गढ़ी जाती हैं, उनमें ब्राह्मणों को सिर्फ पुजारियों और विद्वानों के रूप में ही दिखाया जाता है। भारतीय इतिहास में ब्राह्मण शासकों और सैन्य नेतृत्व की जो पूरी परंपरा रही है, उसे बड़ी चालाकी से गायब कर दिया गया है। और सच कहूं तो, यह कोई इत्तेफाक नहीं है।

पुष्यमित्र शुंग अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की सेवा में एक ब्राह्मण सेनापति थे। लगभग 185 ईसा पूर्व में, उन्होंने मौर्य वंश का अंत किया, शुंग वंश की स्थापना की, और कई पारंपरिक ग्रंथों के अनुसार उन्हें उन वैदिक प्रथाओं को फिर से शुरू करने का श्रेय दिया जाता है जिन्हें मौर्य काल के अंत में बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण काफी हद तक किनारे कर दिया गया था। उनके शासनकाल में सदियों बाद अश्वमेध यज्ञ फिर से शुरू हुआ। वैसे, शुंग काल को सांची में बौद्ध कला के फलने-फूलने से भी जोड़ा जाता है- एक ऐसा सच जो एकतरफा एजेंडा चलाने वालों की हवा निकाल देता है।

मराठा साम्राज्य के पेशवा ब्राह्मणों के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व का शायद सबसे बेमिसाल पन्ना हैं। मराठा परिसंघ के प्रधानमंत्री रहे ये पेशवा चितपावन ब्राह्मण थे, जिन्होंने अठारहवीं सदी में एक क्षेत्रीय बगावत को भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे बड़े साम्राज्य में बदल दिया। मराठा ताकत जब अपने चरम पर थी, तब उनका साम्राज्य आज के पाकिस्तान बॉर्डर से लेकर बंगाल की सीमाओं तक और हिमालय से लेकर दक्कन तक फैला हुआ था।

बाजीराव प्रथम, जो 1720 से 1740 तक पेशवा रहे, उन्हें सैन्य इतिहासकार विश्व इतिहास के सबसे महान घुड़सवार सेनापतियों में से एक मानते हैं। उन्होंने इकतालीस जंगे लड़ीं और इतिहास गवाह है की वो एक भी जंग नहीं हारे। उन्होंने निज़ाम, मुगलों और पुर्तगालियों को धूल चटाई और मुगल साम्राज्य को ऐसी गर्त में धकेल दिया जहाँ से वो कभी वापस नहीं उठ सके। एक ब्राह्मण जो कभी कोई जंग नहीं हारा- ये वो इंसान है जिसे कुछ लोग ‘अवसरवादी’ कहने की जुर्रत करते हैं।

नाना साहब पेशवा ने कानपुर में 1857 के विद्रोह का गज़ब के साहस के साथ नेतृत्व किया। और तात्या टोपे का नाम- जो पेशवा की सैन्य परंपरा से गहराई से जुड़े थे- आज़ादी के औपचारिक आंदोलन के शुरू होने से पहले ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए इस आखिरी बड़े सशस्त्र विद्रोह में गुरिल्ला युद्ध के मास्टरमाइंड के रूप में हमेशा अमर रहेगा।

ब्राह्मणों को सीएम योगी आदित्यनाथ जी के खिलाफ करने की साज़िश

इस लेख की शुरुआत में ही मैंने बताया था की 14 मार्च 2026 में यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा का जो बवाल हुआ, वो महज़ पेपर सेट करने वालों की कोई लापरवाही नहीं थी। ‘अवसर के अनुसार कौन बदलता है?’ इस सवाल के जवाब में जानबूझकर ‘पंडित’ लिखना – ऐसा बिना उस वैचारिक इकोसिस्टम के हो ही नहीं सकता जिसने इस चीज़ को सामान्य कर दिया है। 

परीक्षा का पेपर सेट करने वाले उसी सांस्कृतिक और बौद्धिक माहौल का हिस्सा होते हैं जिसमे दशकों से अकादमिक दुनिया, मीडिया और अब सोशल मीडिया में ‘ब्राह्मण माने अवसरवादी’ का ये ज़हरीला नैरेटिव चलाया जा रहा है। और अब इस नैरेटिव के जरिये ब्राह्मण समाज को योगी जी के खिलाफ करने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। 

सीएम योगी आदित्यनाथ का सीधा दखल देना और उस एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करना बहुत ज़रूरी और काबिले-तारीफ कदम था। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है: यह इकोसिस्टम इतना बड़ा कैसे हो गया की इसने सरकारी परीक्षाओं के सिस्टम में भी घुसपैठ कर ली? इसका जवाब भारत के एजुकेशनल इंस्टिट्यूट्स में पिछले कई दशकों से चलाए जा रहे ब्राह्मण-विरोधी एजेंडे में छिपा है- और सोशल मीडिया के आने के बाद तो इस आग में जैसे घी डल गया है।

‘ठाकुर बनाम ब्राह्मण’ का नैरेटिव- एक गढ़ा हुआ बंटवारा

2017 में जब योगी आदित्यनाथ- जो एक राजपूत और संन्यासी हैं- यूपी के मुख्यमंत्री बने, तब से विपक्षी पार्टियों, खासकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने ‘ठाकुरवाद’ के नैरेटिव को ज़ोर-शोर से हवा दी है। वो ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं की योगी सरकार में सिर्फ ठाकुरों का बोलबाला है और बाकी समुदायों, खासकर ब्राह्मणों को दरकिनार किया जा रहा है।

इसके पीछे का राजनीतिक गणित शीशे की तरह साफ़ है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी का उभार उस बड़े हिंदू गठजोड़ की बदौलत हुआ है जिसने जातियों की पुरानी दीवारें तोड़ दी हैं। अगर इस गठजोड़ में दरार डाली जा सके- अगर ब्राह्मणों को यह पट्टी पढ़ाई जा सके की एक ठाकुर सीएम उन्हें साइडलाइन कर रहा है- तो चुनावी गणित पूरी तरह पलट जाएगा।

सपा और बसपा सिर्फ अपने पुराने वोट बैंक के भरोसे यूपी नहीं जीत सकतीं। उन्हें इस एकजुट हिंदू वोट बैंक को तोड़ना ही होगा। और ब्राह्मणों और राजपूतों के बीच दरार पैदा करना उनकी सबसे पक्की चाल है।

इतिहास गवाह है की ब्राह्मणों और राजपूतों ने सदियों तक धर्म और देश के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी है। ब्राह्मण पेशवाओं और राजपूत घरानों का गठजोड़ भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे शानदार गठबंधनों में से एक था।

एक ब्राह्मण डॉक्टर द्वारा बनाया गया RSS भी हमेशा से हिंदू एकता का ही प्रोजेक्ट रहा है, जो वर्ण-भेद से बहुत ऊपर है। यही सभ्यतागत गठजोड़ है जिससे विपक्ष डरता है, और ठीक इसीलिए वो इसे तोड़ने में लगा है।

शंकराचार्य विवाद- ब्राह्मण धार्मिक सत्ता पर हमला

प्रयागराज में 2026 के माघ मेले के दौरान, योगी सरकार और ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच थोड़ी खटपट देखने को मिली। विपक्ष ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाते हुए इसे इस तरह पेश किया की सरकार ‘हिंदू धर्म के सबसे बड़े पीठ का अपमान’ कर रही है और ब्राह्मण धार्मिक नेतृत्व को निशाना बना रही है।

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित यह संस्था सनातन धर्म में सबसे ज़्यादा पूजनीय है, और इससे जुड़ा कोई भी विवाद बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्व रखता है।

ये लोग इस बात को कभी नहीं मानेंगे कि धार्मिक हस्तियों और राजनीतिक सरकारों के बीच मतभेद होना किसी भी जीवंत लोकतंत्र में एक आम बात है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है की ब्राह्मणों की पहचान पर कोई युद्ध छेड़ दिया गया है।

असल में विपक्ष को शंकराचार्य की गरिमा या उनके धार्मिक अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं है- उन्होंने हिंदू धार्मिक संस्थाओं को बचाने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। उनका मकसद तो बस किसी भी तरह से ‘ब्राह्मण बनाम सरकार’ की लड़ाई का माहौल बनाना है ताकि वे अपनी चुनावी रोटियां सेंक सकें।

ब्राह्मण बौद्धिक परंपरा- धर्म ही अवसरवाद का सबसे बड़ा दुश्मन है

भगवद गीता, जो उस परंपरा का सबसे अहम ग्रंथ है जिसे ब्राह्मणों ने हज़ारों सालों से संजोकर रखा है और आगे बढ़ाया है, उसमें ‘निष्काम कर्म’ की बात कही गई है – यानी फल की इच्छा के बिना अपना काम करना। यह कोई निष्क्रियता नहीं है। यह तो बिना किसी निजी स्वार्थ के, अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित होने की मांग है। अगर आप बारीकी से देखें, तो दार्शनिक तौर पर यह अवसरवाद का एकदम उल्टा है।

अवसरवादी अपने निजी फायदे के लिए काम करता है। लेकिन ब्राह्मण आदर्श- भले ही कोई व्यक्ति इसे पूरी तरह से न जी पाए- ‘लोकसंग्रह’ की मांग करता है, यानी पूरे समाज की भलाई और एकजुटता के लिए काम करना। ब्राह्मण का पारंपरिक काम सिर्फ पूजा-पाठ कराना नहीं था, बल्कि वो तो सभ्यता की यादों का रखवाला था, पीढ़ियों तक ज्ञान को पहुंचाने वाला पुल था, और वो आवाज़ था जो अपनी जान जोखिम में डालकर भी राजाओं को उनके राज-धर्म की याद दिलाता था।

इस लेख में मैंने जिन भी महान लोगों का ज़िक्र किया है, वे सभी इसी परंपरा से आते हैं। चाणक्य ने राज्य ठुकरा दिया और गरीबी को गले लगाया। आज़ाद ने अंग्रेजों के हाथ आना मंज़ूर नहीं किया और मौत को गले लगाया। मुखर्जी ने समझौते को लात मारी और जेल को चुना। उपाध्याय जी ने दौलत ठुकरा दी और एक रहस्यमयी मौत का सामना किया।

सच कहूं तो वे सब सच्चे मायनों में ‘अवसरवादी’ थे: उन्होंने अपने समय की मांग को बहुत साफ तरीके से पढ़ा, और उन्होंने अपने निजी फायदे का गुणा-भाग नहीं लगाया, बल्कि धर्म और देश की खातिर अपना सब कुछ लुटाकर उसका करारा जवाब दिया।

अनगिनत आक्रमणों, उपनिवेशवाद और लगातार होने वाले वैचारिक हमलों के बावजूद ब्राह्मण समुदाय का डटकर खड़े रहना किसी अवसरवादी की खासियत नहीं हो सकती। यह तो उन लोगों की ताकत है जिन्होंने अपनी जान से कहीं बड़े उद्देश्य को अपने भीतर बसा लिया है- जो गीता के उस उपदेश को मानते हैं की आत्मा अजर-अमर है, और व्यक्तिगत नुकसान चाहे जो भी हो, धर्म का काम चलते रहना चाहिए।

हम अवसरवादी हैं, और हमें इस पर गर्व है

हाँ, हम बदलते हैं। चाणक्य एक अपमानित विद्वान से बदलकर उस इंसान में तब्दील हो गए जिसने भारत का पहला साम्राज्य खड़ा कर दिया। मंगल पांडे एक वफादार ब्रिटिश सिपाही से बदलकर आज़ादी की पहली लड़ाई का पहला शहीद बन गया। चंद्रशेखर आज़ाद एक किशोर प्रदर्शनकारी से बदलकर एक ऐसा क्रांतिकारी कमांडर बन गया जिसने गुलामी से बेहतर मौत (गोली) को चुना। 

बाल गंगाधर तिलक एक गणित के टीचर से बदलकर वो इंसान बन गए जिसने स्वराज्य को पूरे देश की मांग बना दिया। श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक कैबिनेट मंत्री से बदलकर एक ऐसे कैदी बन गए जिसने इस उसूल के लिए जान दे दी कि भारत एक होना चाहिए। 

दीनदयाल उपाध्याय एक RSS प्रचारक से बदलकर एक ऐसे दार्शनिक बन गए जिनके विचार आज दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चला रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी एक विपक्षी कवि से बदलकर वो प्रधानमंत्री बन गए जिसने परमाणु बम फोड़कर पूरी दुनिया को चौंका दिया।

ये सभी लोग सिर्फ उसी मायने में अवसरवादी थे जो वाकई में मायने रखता है: उन्होंने अपने दौर की मांग को बिल्कुल सटीकता से पढ़ा और निजी स्वार्थ से नहीं, बल्कि अपना सब कुछ झोंककर उसका जवाब दिया। ब्राह्मण ‘काल-जयी’ (समय को जीतने वाला) है- क्योंकि उसने हमेशा से यह समझा है की धर्म कोई जड़ चीज़ नहीं, बल्कि एक जीवंत ऊर्जा है, और इसकी सेवा करने के लिए यह विवेक होना ज़रूरी है की हर एक पल की मांग क्या है।

यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा का वो पेपर वापस ले लिया गया है। एजेंसी ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। लेकिन जिस विचारधारा ने उस सवाल को जन्म दिया, वो आज भी ज़िंदा है। वो और भी सवाल खड़े करेगी, और भी नैरेटिव गढ़ेगी, और भी बंटवारे पैदा करेगी। उन सब को हमारा बस एक ही जवाब है: जाओ और इतिहास की किताबें खोलो। उन नामों को पढ़ो। उनके बलिदानों को गिनो। और फिर मेरी आंखों में आंखें डालकर बताओ कि ये लोग ‘अवसरवादी’ कैसे थे?

हाँ, मैं पंडित हूँ। और हर अवसर पर मैंने भारत और अपने धर्म को चुना।

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