#YogiModelJustice: राजपूत बच्ची के साथ दरिंदगी के बाद हत्या, बिहार चुप? नेताओं का ‘स्वर्ण-दलित’ वोट बैंक का गंदा खेल

11 मार्च 2026 की दोपहर। छपरा (सारण) की रहने वाली 15 साल की एक बच्ची अपने पुराने घर से कुछ सामान लेने निकली थी। किसे पता था की वो कभी ज़िंदा लौटकर नहीं आएगी? पांच दरिंदे पहले से ही घात लगाए बैठे थे। उन्होंने उसे घसीटकर बाथरूम में खींचा, उसके साथ दुष्कर्म किया। 

उसकी चीखें सुनकर माँ और बड़ी बहन घर की तरफ भागीं, लेकिन इससे पहले की वो वहां पहुँच पातीं, उन हैवानों ने बच्ची का मुँह बंद किया और उसे दूर घसीट ले गए। और फिर ज़िंदा ही दूर एक कुएं में फेंक दिया। वो उसी कुएं में घुट-घुट कर मर गई। बिल्कुल अकेली। खौफ में। उस हर एक सिस्टम से छली हुई, जिसका काम उसकी हिफाज़त करना था।

जब आपकी जाति तय करती है की आपको इंसाफ़ मिलेगा या नहीं

अब खुद से एक सीधा सा सवाल पूछिए: क्या आपको उस बच्ची का नाम तक पता है? क्या आपने सोशल मीडिया पर उसके लिए कोई हैशटैग ट्रेंड होते देखा? 

क्या प्राइम-टाइम पर किसी टीवी एंकर को छाती पीट-पीटकर उसके लिए इंसाफ़ मांगते देखा? क्या राहुल गांधी, अखिलेश यादव या किसी भी बड़े राष्ट्रीय नेता ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की? क्या वो सारण के लिए किसी उत्तेजक मोर्चे पर निकले या पीड़ित परिवार के साथ अपनी कोई फोटो पोस्ट की?

इन सब सवालों का जवाब है- ‘नहीं’। और इसकी इकलौती वजह ये है की वो एक राजपूत परिवार की बेटी थी। और हमारे देश की चुनावी सियासत के इस खूनी खेल में, ऐसे पीड़ित का कोई मोल नहीं होता।

“वो उसी कुएं में तड़प-तड़प कर मर गई। बिल्कुल अकेली। और उसके गुज़र जाने के बाद भी, दुनिया के इस ‘सबसे बड़े लोकतंत्र’ के पास उसके लिए कहने को दो शब्द तक नहीं थे।”

राजपूत बेटी के साथ पासवान समाज के लड़कों का वो कृत्य, जिसने एक गाँव को तो हिला दिया, लेकिन देश को नहीं

11 मार्च को जो हुआ, उसकी एफआईआर बच्ची की माँ ने देरनी पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी। एफआईआर के मुताबिक, पांच लोग- सचिन कुमार मांझी, युवराज मांझी, चंदन मांझी, अजय मांझी और विकास मांझी, जो पासवान समाज से आते हैं- उसका इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने उसे घसीटा, दुष्कर्म किया और कुएं में धकेल दिया, जिससे उसकी जान चली गई।

रोंगटे खड़े कर देने वाली बात तो ये है की वारदात के बाद, विकास नाम के एक आरोपी ने परिवार को सरेआम धमकियां दीं। कहा की अगर आवाज़ उठाई तो अंजाम बहुत बुरा होगा। उसने सीना ठोक कर कहा की वो पुलिस, प्रशासन और कोर्ट- सबको खरीद सकता है और कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। 

ज़रा सोचिए, ये बेशर्मी और कॉन्फिडेंस हवा-हवाई तो नहीं आता ना? ये उस सड़े हुए पॉलिटिकल सिस्टम की पैदाइश है, जिसे बड़े आराम से पाला-पोसा जाता है। जहाँ इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आपने कितना घिनौना जुर्म किया है, बल्कि सारा खेल इस बात का है की आप किस जाति के हैं और आपका वोटबैंक कितना तगड़ा है।

इसके बाद जो हुआ, वो और भी ज़्यादा शर्मनाक है। बच्ची की मौत की खबर मिलने के लगभग 24 घंटे बाद जाकर एफआईआर लिखी गई। सारण के सीनियर एसपी ने तो शुरुआत में इसे हादसा ही बता दिया था- की एक बच्ची खेलते-खेलते कुएं में गिर गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह ‘डूबना’ बताई गई, जिसे आधार बनाकर पुलिस मामले को रफा-दफा करने में जुट गई। जबकि परिवार पहले दिन से चीख-चीख कर कह रहा था की उनकी बेटी के साथ दुष्कर्म हुआ है और मुँह बंद करने के लिए उसे कुएं में फेंका गया है।

उन पांचों में से सिर्फ एक (युवराज कुमार) को शुरुआती कुछ दिनों में अरेस्ट किया गया। बाकी चारों मज़े से फरार रहे। जब गाँव वालों का गुस्सा फूटा और उन्होंने हंगामा किया, तब जाकर कहीं दिखावे के लिए एक SIT (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) बना दी गई। वो भी तब जब अफसरों ने फौरन इंसाफ दिलाने का वादा किया।

फौरन इंसाफ? वो भी उस पुलिस से जिसे एक एफआईआर लिखने में 24 घंटे लग गए?

सोच कर देखिए, उस बाप पर क्या बीत रही होगी जो राज्य से बाहर रहकर मज़दूरी करता है। पीछे गाँव में माँ अपनी दो बेटियों के साथ अकेली रह गई थी। जब इतना बड़ा कहर टूटा, तो कोई सरकारी अमला मदद के लिए नहीं दौड़ा। कोई बड़ा नेता हेलीकॉप्टर से वहाँ नहीं उतरा। दिल्ली के किसी नेशनल जर्नलिस्ट ने कैमरा-माइक लेकर उस माँ से नहीं पूछा की वो प्रधानमंत्री से क्या कहना चाहती है। वहां सिर्फ एक खौफनाक सन्नाटा था। और इस सन्नाटे की भी एक अपनी ‘जाति’ है।

बिहार में 33 राजपूत विधायक, लेकिन एक 15 साल की मृत बच्ची के लिए सबकी ज़ुबान बंद

बिहार की राजनीति कोई छुपी हुई चीज़ नहीं है। यहाँ हर एक बयान, हर दौरा, हर सोशल मीडिया पोस्ट जातिगत समीकरणों की कैंची से नाप-तौल कर की जाती है। अभी बिहार विधानसभा में करीब 33 राजपूत विधायक हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें राजपूत वोटर्स ने इस भरोसे के साथ चुना था की वो उनकी हिफाज़त करेंगे, उनके सम्मान की बात करेंगे।

कहाँ छुप गए ये सब?

सत्ताधारी दल के खेमे से एक भी बड़े नेता ने मुँह नहीं खोला। न राज्य सरकार से, और न ही खुद को ‘सबसे बड़ी राष्ट्रवादी पार्टी’ कहने वालों में से कोई सामने आया जो 11 मार्च के बाद परिवार के लिए इंसाफ मांगता। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, न कोई स्पेशल सेशन बुलाया गया। किसी भी राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कैमरे के सामने आकर ये जहमत तक नहीं उठाई की कह सके: “ये बर्दाश्त के बाहर है, आरोपियों को फौरन अरेस्ट करो और परिवार को इंसाफ दो।”

विपक्ष का हाल तो और भी बुरा था। आरजेडी (RJD), कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां- जो दिन-रात खुद को कमज़ोर वर्गों का मसीहा बताती हैं- उनकी खामोशी तो और भी कानों को चुभने वाली थी।

ऐसा क्यों? सीधा सा गणित है। आरोपी पासवान और महादलित समुदाय से आते हैं, जो बिहार की गठबंधन वाली राजनीति में एक बहुत बड़ा और ठोस वोटबैंक है। इन आरोपियों के खिलाफ बोलने का मतलब है उस वोटबैंक को नाराज़ करना। ज़ोर-शोर से इंसाफ मांगने का मतलब है चुनाव में नुकसान झेलना। तो नेताओं ने अपना नफा-नुकसान तौला, और उन्हें लगा की उस मरी हुई बच्ची के लिए आवाज़ उठाना घाटे का सौदा है। बस, और वो सब आगे बढ़ गए।

हाथरस याद है? बिल्कुल याद होगा। क्योंकि उन्होंने ये पक्का किया था की आप उसे भूल न पाएं।

सितंबर 2020 की बात है। यूपी के हाथरस में 19 साल की एक दलित लड़की के साथ चार सवर्ण लड़कों ने दुष्कर्म किया और उसे बुरी तरह पीटा। 29 सितंबर 2020 को दिल्ली के एक अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया। उसके बाद जो हुआ, वो सिर्फ न्यूज़ कवरेज नहीं था। वो पूरे देश को हिला देने वाला एक सोची-समझी और ज़ोरदार मुहिम थी।

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पैदल ही हाथरस निकल पड़े- और जब पुलिस ने उन्हें रोका, तो वो सबसे बड़ी हेडलाइन बन गई। राहुल गांधी के धक्के खाने की तस्वीरें चंद घंटों में हर अखबार के फ्रंट पेज, हर टीवी चैनल और हर सोशल मीडिया फीड पर छा गईं। अखिलेश यादव ने राज्य सरकार का इस्तीफा मांग लिया। लेफ्ट पार्टियों ने मोर्चे निकाले। पूरे देश की यूनिवर्सिटीज़ में कैंडल मार्च हुए।

इंटरनेशनल मीडिया भी कूद पड़ा। बीबीसी, अल जज़ीरा से लेकर यूरोप के बड़े न्यूज़ चैनल्स ने स्पेशल रिपोर्ट चलाईं। यूएन (UN) के प्रतिनिधियों ने चिंता जताई। इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स में ये मुद्दा उठा। #JusticeForHathras कई दिनों तक ट्रेंड करता रहा। संसद में बहस हुई। उस विक्टिम का चेहरा पूरे देश के ज़हन में छप गया।

देखिए, हाथरस की उस बेटी के हक़ में जो गुस्सा दिखा, वो सौ टका जायज़ था। वो हर कैंडल मार्च, हर न्यूज़ रिपोर्ट की हकदार थी। उसके साथ जो दरिंदगी हुई, वो दिल दहला देने वाली थी, और जिन्होंने उसके लिए इंसाफ की मांग की, उन्होंने बिल्कुल सही किया। यहां किसी को गलतफहमी नहीं होनी चाहिए- ये हाथरस वाले गुस्से या प्रोटेस्ट पर कोई सवाल नहीं है। वो गुस्सा ज़रूरी था।

लेकिन असल सवाल ये है, जिससे भारत का मीडिया और पॉलिटिकल सिस्टम मुँह चुराता है: क्या 2026 में सारण (बिहार) की उस 15 साल की बच्ची के साथ जो हुआ- दुष्कर्म, मर्डर और कुएं में फेंका जाना- क्या वो इस देश के गुस्से और इंसाफ की हकदार नहीं थी?

दरिंदगी बिल्कुल वैसी ही थी। दोनों विक्टिम्स बराबर की मासूम थीं। आरोपी बराबर के मुज़रिम हैं। दोनों परिवारों का दर्द एक जैसा है। फर्क- और सिर्फ इकलौता फर्क- जाति का है। हाथरस में आरोपी ऊपरी-जाती के थे और पीड़िता दलित थी। ये एक ऐसा ‘पॉलिटिकल नैरेटिव’ सेट करता है जिससे खास वोटबैंक को जुटाया जा सके।

पर सारण के केस में, आरोपी महादलित समुदाय के हैं और पीड़िता राजपूत परिवार की। ये चीज़ उस बने-बनाए नैरेटिव में फिट नहीं बैठती। इससे उन वोटबैंक पर खतरा मंडराने लगता है, जिसे नेता लोग खोना नहीं चाहेंगे। इसलिए पूरी की पूरी मशीनरी अचानक मुँहबंद हो जाती है। न्यूज़ एंकर्स सारण की फ्लाइट बुक नहीं करते। पार्टी वर्कर्स मार्च नहीं निकालते। राजनेताओं को पुलिस धक्के मारकर नहीं रोकती- क्योंकि वो पीड़ित परिवार तक पहुँचने की कोशिश ही नहीं कर रहे होते हैं।

ये उस दोगले सिस्टम पर एक करारा तमाचा है जो ये तय करता है की किस मर्डर पर पूरे देश को शोक मनाना है और किस मर्डर को चुपचाप फाइल में दफना देना है, सिर्फ और सिर्फ जाति देखकर।

भारत की राजनीति में, आपकी बेटी की जान की कीमत बस उतनी है, जितने वोट उसकी जाति दिला सकती है

नेता ऐसा क्यों करते हैं, इसे समझने के लिए बिहार के इस ठंडे और बेरहम जातिगत गणित को समझना होगा। बिहार में दलित और महादलित मिलाकर करीब 20% आबादी बनाते हैं, जो किसी भी चुनाव का पासा पलट सकते हैं। खासकर पासवान समुदाय, जिसकी नुमाइंदगी चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी करती है, वो NDA का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा है। 

वहीं दूसरी तरफ, राजपूत आबादी महज़ 3.45% के आसपास है। ऐसा नहीं है की उनकी कोई अहमियत नहीं है- लेकिन वो दलित वोटबैंक की तरह चुनाव आर-पार कराने वाले नंबर नहीं हैं।

नेता कोई संत-महात्मा नहीं होते। वो सिर्फ अपने चुनावी फायदे के हिसाब से चलते हैं। और 12 मार्च 2026 को बिहार में उनका फायदा-नुकसान बिल्कुल साफ था: पासवान आरोपियों के खिलाफ ज़ोर से बोलने का मतलब है गठबंधन के साथी से पंगा लेना। इसका मतलब था की विपक्ष का मीडिया तंत्र उन्हें ‘दलित विरोधी’ घोषित कर देगा। इसका सीधा मतलब था अगले चुनाव से पहले अपना बना-बनाया गणित बिगाड़ लेना। ऐसे में चुप रहना ज्यादा सेफ लगा, क्योंकि उस 15 साल की बच्ची की मौत पर सन्नाटा खींच लेना उन्हें भारी नहीं पड़ने वाला था।

ज़रा सोचिए, ज़मीन पर इसके क्या मायने हैं। आरोपियों का सीना ठोककर ये कहना की वो पुलिस और प्रशासन को खरीद सकते हैं… ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है। ये घमंड सिर्फ पैसों से नहीं आता। ये सालों से बिहार का पॉलिटिकल सिस्टम देखने के बाद आता है।

जब राजनीतिक पहुँच रखने वाले समुदायों को ये दिख जाता है की उनके लोगों के किए गए गुनाहों को बार-बार दबाया जा रहा है, एफआईआर लेट हो रही हैं, आरोपी बिना किसी डर के खुले घूम रहे हैं, और कोई भी बड़ा नेता उनके गाँव आकर इंसाफ नहीं मांग रहा- तो वो समझ जाते हैं की उनके सिर पर कितना बड़ा हाथ है।

ये उन सच्चे दलित कार्यकर्ताओं और नेताओं का भी सीधा अपमान है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी जातिवाद से लड़ने में लगा दी। जब नेता दलित पहचान को एक ‘कवच’ की तरह इस्तेमाल करके दलित आरोपियों को बचाते हैं, तो वो इंसाफ की लड़ाई को महज़ एक सौदेबाज़ी में बदल देते हैं। इससे असली इंसाफ और इस बनावटी पॉलिटिकल ड्रामे के बीच का फर्क ही मिट जाता है।

मीडिया का गंदा सच- गुस्सा भी जाति देखकर आता है

हमारे मेनस्ट्रीम मीडिया (कुछ इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर) ने एक फिक्स पैटर्न बना लिया है। अगर कोई क्राइम उनके सेट किए गए ‘नैरेटिव’ में फिट बैठता है, तो उसे महीनों तक प्राइम-टाइम पर घसीटा जाता है, खूब इमोशनल रिपोर्टिंग होती है। लेकिन जो क्राइम उस नैरेटिव को सूट नहीं करता, उसे बड़ी चालाकी से छोटी सी न्यूज़ बनाकर गायब कर दिया जाता है।

हाथरस केस हफ्तों तक टीवी पर चला। यूपी भर में कई टीमें दौड़ाई गईं। सरकार की एक-एक चूक को लेंस से दिखाया गया। बड़े-बड़े एंकर्स ने भारी मन से सिविल सोसाइटी के लोगों के इंटरव्यू किए।

लेकिन सारण वाला केस सिर्फ सोशल मीडिया पर ज़िंदा रहा, वो भी ज़्यादातर ‘राइट-विंग’ पेजों पर, जो अक्सर वो खबरें उठाते हैं जिन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया अनदेखा कर देता है। टीवी पर कोई प्राइम-टाइम डिबेट नहीं हुई। कोई स्पेशल टीम पीड़ित के गाँव नहीं पहुंची। किसी एंकर ने कुएं के पास खड़े होकर चीखते हुए ये नहीं पूछा की फरार आरोपी पकड़े क्यों नहीं गए। ये मुद्दा सिर्फ कुछ आम नागरिकों के भरोसे छोड़ दिया गया- जिनमें से बहुत से बिहार के थे, कई राजपूत थे- जिन्होंने ऑनलाइन इसके बारे में लिखकर इस मुद्दे को ज़िंदा रखा।

जब कोई न्यूज़रूम ये तय करता है की कौन सी मौत प्राइम-टाइम के लायक है और कौन सी नहीं, तो वो असल में सियासत कर रहा होता है। वो देश की चेतना को कंट्रोल कर रहा होता है। और जब ये कवरेज आरोपियों और विक्टिम की जाति देखकर कम-ज़्यादा की जाती है- तो मीडिया अन्याय को रिपोर्ट नहीं कर रहा होता, वो उसे बढ़ावा दे रहा होता है। कुछ जातियों के लिए अपना गुस्सा ‘ऑन’ कर लेना और कुछ के लिए ‘ऑफ’ कर देना पत्रकारिता नहीं है। ये पत्रकारिता का चोला ओढ़े हुए एक गंदी राजनीति है।

ये मुद्दा जाति का नहीं, ज़मीर का है।

यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए, क्योंकि इसमें कोई लाग-लपेट नहीं की जा सकती। ये हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी है।

इस लेख में दलित अधिकारों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं लिखा गया है। भारत में दलित समुदायों ने सदियों तक जिस खौफनाक हिंसा और भेदभाव को झेला है (और आज भी झेल रहे हैं), उसे कमतर आंकने की कोई कोशिश नहीं है। जाति-प्रथा हमारे इतिहास पर एक कलंक है, और इसके खिलाफ लड़ना बिल्कुल जायज़, ज़रूरी और आज के वक्त की मांग है।

इस देश में दलितों पर ज़ुल्म होते हैं, बार-बार होते हैं, और मुज़रिम अक्सर छूट जाते हैं। SC/ST एक्ट बिना किसी वजह के नहीं बना है। मैला ढोने की कुप्रथा आज भी मौजूद है। छुआछूत आज भी कई गाँवों की सच्चाई है। ये सब मनगढ़ंत नहीं है, ये कड़वा सच है और इसके खिलाफ आवाज़ उठनी ही चाहिए। अगर कोई इस आर्टिकल को दलित अधिकारों पर हमला मानता है, तो इसका सीधा मतलब है कि वो जानबूझकर इसे गलत समझना चाहता है।

लेकिन एक बात डंके की चोट पर कही जानी चाहिए: इंसाफ वन-वे ट्रैफिक नहीं हो सकता। अगर कोई दलित मुज़रिम है, तो उसका जुर्म कम नहीं हो जाता। अगर कोई विक्टिम सवर्ण (Upper caste) परिवार से है, तो उसका दर्द कम नहीं हो जाता। रोना और तड़पना जाति देखकर तो नहीं आता ना? जिस माँ की 15 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ और उसे मार डाला गया, वो इसलिए कम नहीं तड़प रही होगी क्योंकि उसकी बेटी एक राजपूत परिवार में पैदा हुई थी।

अगर भारत वाकई मानता है कि जातिगत भेदभाव गलत है- और एक संवैधानिक लोकतंत्र के तौर पर इसे मानना ही चाहिए- तो ये उसूल हर जगह लागू होना चाहिए। जवाबदेही इस बात से तय नहीं होनी चाहिए की किस समुदाय के पास कितने वोट हैं। दलितों के दर्द को अपनी सियासी दुकान चलाने के लिए इस्तेमाल करना भी, दरअसल असली दलित संघर्ष का ही अपमान है। जब कोई नेता किसी क्राइम सीन पर सिर्फ इसलिए भागकर जाता है क्योंकि विक्टिम की जाति उसे वोट दिला सकती है, तो वो इंसाफ नहीं मांग रहा होता। वो मौतों की फसल काट रहा होता है।

वो पहली नहीं है। और वो आखिरी भी नहीं होगी। जब तक की हम आवाज़ नहीं उठाते।

सारण की घटना कोई इकलौता मामला नहीं है। ये एक ऐसा पैटर्न है जिस पर कोई बात नहीं करना चाहता, क्योंकि इस बारे में बात करना कई बड़े लोगों की कुर्सी हिला सकता है।

पूरे देश में राजपूत, ब्राह्मण या अन्य सवर्ण समुदायों के खिलाफ जब भी कोई ऐसा अपराध होता है- और आरोपी किसी ‘राजनीतिक रूप से संरक्षित’ समुदाय से आते हैं- तो उसे न तो वैसी कवरेज मिलती है, न नेताओं का अटेंशन मिलता है, और न ही प्रशासन वैसी चुस्ती दिखाता है जैसा दलित पीड़ितों के केस में होता है। इसका मतलब ये कतई नहीं है की दलित पीड़ितों को कम इंसाफ मिले। इसका मतलब ये है की सबको बराबर का इंसाफ मिले। इंसाफ का पैमाना किसी के लिए भी नीचे नहीं आना चाहिए, सबके लिए ऊपर उठना चाहिए।

SC/ST एक्ट उन समुदायों की हिफाज़त के लिए बहुत ज़रूरी है जिन्हें सदियों से दबाया गया। लेकिन कई ऐसे ऑन-रिकॉर्ड केस हैं जहाँ निजी दुश्मनी, राजनीति या पैसों के लिए इसका गलत इस्तेमाल भी हुआ है- यहाँ तक की सुप्रीम कोर्ट ने भी 2018 में इस पर चिंता जताई थी (हालांकि बाद में संसद ने उस फैसले को पलट दिया)। वहीं दूसरी तरफ, अगर निचली जाति के आरोपियों द्वारा सवर्णों के खिलाफ कोई अपराध होता है, तो उन्हें न वैसा कानूनी कवर मिलता है, न सियासी तवज्जो और न ही मीडिया का वैसा हल्ला। 

आज के सियासी माहौल में, जहाँ किसी बड़े वोटबैंक वाले समुदाय के खिलाफ बोलना राजनीतिक खुदकुशी के बराबर है, सारण जैसे परिवार लावारिस छोड़ दिए जाते हैं- जिनका न कोई पावरफुल माई-बाप होता है और न ही कोई मीडिया आर्मी।

एक आम हिंदुस्तानी परिवार- वो पिता जो बच्चों का पेट पालने के लिए दूसरे राज्य में खटता है, वो माँ जो पीछे छूटकर घर को संभालती है, और वो 15 साल की बच्ची जिसके कंधे पर स्कूल का बस्ता और आँखों में पूरी ज़िंदगी का सपना था- वो देश से कहीं बेहतर इंसाफ की हकदार थी, उसी देश से जिसके संविधान ने सबको बराबरी का वादा किया था।

वो देश जो जाति देखकर शोक मनाता है, उसकी रूह कब की मर चुकी है

एक बच्ची, जो अब कभी कोई परीक्षा नहीं देगी। वो 15 साल की थी, दसवीं में पढ़ती थी। दोपहर में अपने पुराने घर से कुछ सामान लेने गई थी। और फिर कभी लौटकर नहीं आई। उसकी माँ उसकी चीखें सुनकर दौड़ी थी पर उसे बचा नहीं पाई। उसका बाप मीलों दूर पसीना बहा रहा था। और उसकी मौत के बाद, ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ के पास उसके लिए एक भी लफ्ज़ नहीं था।

न सरकार ने कुछ कहा। न विपक्ष ने। न टीवी एंकर्स ने। न कॉलम लिखने वालों ने। और न ही उस दुनिया की ‘सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी’ के नेताओं ने, जिसके पास उसी राज्य में उसी की जाति के 33 विधायक बैठे हैं।

12, 13 और 14 मार्च को जो नेता चुप रहे, वो इसलिए चुप नहीं थे की उन्हें कुछ पता नहीं था। वो इसलिए चुप थे क्योंकि वो गणित लगा रहे थे, और आखिर में ये तय किया की इसके लिए बोलना फायदे का सौदा नहीं है।

33 राजपूत विधायक हैं। बिहार में ऐसे बड़े दल हैं जिनका मुख्य वोटबैंक ही राजपूत है। पटना और दिल्ली दोनों जगह गठबंधन की सरकार है। और 15 साल की बच्ची का मर्डर हो जाता है, पर इनमें से किसी के भी कान पर जूं तक नहीं रेंगती।

लेकिन अब बड़ा सवाल ये है: क्या आम लोग अपने नेताओं को खुलेआम ऐसे ही गणित बिठाने देंगे? वो गणित जहाँ ज़मीर की जगह गठबंधन ले लेता है, और इंसाफ की जगह वोटों की गिनती ले लेती है?

सारण की उस बेटी को इंसाफ मिलना चाहिए था। उसके लिए भी लोगों का खून खौलना चाहिए था। उसके लिए भी कैंडल मार्च निकलने चाहिए थे, टीवी पर प्राइम-टाइम डिबेट्स होनी चाहिए थीं। और उन नेताओं की नींद उड़ जानी चाहिए थी जब तक कि उसके कातिल सलाखों के पीछे नहीं पहुँच जाते। उसकी जान की भी उतनी ही कीमत होनी चाहिए थी, जितनी किसी और की।

जब तक भारत ये गारंटी नहीं देता- बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी सियासी गणित के, और बिना पीड़ित  की जाति देखे- तब तक इस देश को खुद को ‘न्यायपूर्ण’ कहने का कोई हक नहीं है।

एक देश जो रोने और शोक मनाने के लिए भी जाति देखता है, वो बहुत पहले ही ये तय कर चुका है की उसके सारे बच्चे एक बराबर नहीं हैं।

हमें ऐसा देश बनने से इनकार करना होगा। इसी वक्त से। उस बच्ची के गाँव से, उसके परिवार से शुरू करते हुए- और उन पांच हैवानों की शक्लें तब तक इस देश के हर अखबार के फ्रंट पेज पर होनी चाहिए, जब तक की उन पर मुकदमा न चल जाए।

यह लेख जनहित में प्रकाशित किया गया है। इसमें बताए गए सभी तथ्य वेरीफाइड न्यूज़ रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। लेखक किसी विशेष जाति, पार्टी या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता- वह केवल और केवल एक समान न्याय के पक्ष में खड़ा है।

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