रविवार, 15 मार्च 2026 को चित्तौड़गढ़ के इनानी सिटी सेंटर में ‘जौहर श्रद्धांजलि समारोह’ का आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम जौहर स्मृति संस्थान के द्वारा हुआ, जो उन वीरांगनाओं की यादों को सहेजने का काम कर रहा है जिन्होंने भारत पर सदियों तक चले इस्लामिक हमलों के बीच हिन्दुओं के गौरव की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी।
इस कार्यक्रम में कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद थीं। मंच पर मेवाड़ राजवंश के वंशज महाराणा विश्वराज सिंह मेवाड़ मौजूद थे- जो सीधे तौर पर उन योद्धाओं के खून से जुड़े हैं जिनकी याद में यह कार्यक्रम हो रहा था। उनके साथ केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, राजस्थान के कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर, सांसद सी.पी. जोशी, कई विधायक और बड़े आध्यात्मिक गुरु भी वहां मौजूद थे।
लेकिन इस साल इस जमावड़े का माहौल एक अलग ही था, वजह थी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी। वो हिंदू सभ्यता और अस्मिता की रक्षा करने वाली भारत की सबसे बुलंद और बेबाक आवाज़ों में से एक हैं। इस पवित्र धरती से उन्होंने जो कुछ भी कहा, उसने पूरे राष्ट्र के हिन्दुओं में ऊर्जा भर दी।
इस खास मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन लोगों को सम्मानित भी किया जिन्होंने समाज, संस्कृति और हिंदू विरासत को बचाने के लिए बेहतरीन काम किया है।
साथ ही उन्होंने पंजाब के पूर्व राज्यपाल वी.पी. सिंह की लिखी एक किताब का विमोचन किया, जो राजपूतों की वीरता और बलिदान के इतिहास को और मज़बूती से दुनिया के सामने रखती है।
सच कहूं तो, समारोह के चप्पे-चप्पे में बस एक ही भावना गूंज रही थी की जौहर को याद रखना कोई बीती बातों में खोना नहीं है, बल्कि ये हमारा सभ्यतागत फर्ज़ है।
हिन्दुओं के गौरव को जगाता योगी आदित्यनाथ का जौहर के ऊपर वो ओजस्वी भाषण
जौहर श्रद्धांजलि समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भाषण कोई आम राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं था।
यह तो हमारी सभ्यता की यादों को जगाने वाली एक गड़गड़ाहट थी। हिंदू समाज को बांटने वालों पर एक करारा प्रहार था। और उन वीर पुरुष-महिलाओं को एक भावभीनी श्रद्धांजलि थी जिन्होंने सदियों के खून-खराबे और शहादत से भारत की आत्मा को गढ़ा है।
आइए, उनके इस ऐतिहासिक भाषण की कुछ अहम बातों पर नज़र डालते हैं।
“कोई कायरता नहीं, दरिंदों के मुँह पर तमाचा थे चित्तौड़गढ़ के वो तीन महान जौहर”
1303, 1535 और 1568 में चित्तौड़गढ़ में हुए तीन महान जौहरों का ज़िक्र करते हुए, योगी आदित्यनाथ ने इन्हें हिंदू नारी के सम्मान और साहस के तीन सबसे चमकदार सूरज बताया। खासकर उन्होंने महारानी पद्मिनी की आत्मा का आह्वान किया- चित्तौड़गढ़ की वो महान रानी जिन्होंने 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के किले में घुसने पर पहले जौहर का नेतृत्व किया था।
उन्होंने रानी पद्मिनी के उस दृढ़ निश्चय की तुलना माता सीता की पवित्रता से की। जिस तरह माता सीता ने बंदी होने के बावजूद अपने सम्मान को आंच नहीं आने दी, ठीक वैसे ही महारानी पद्मिनी ने विजय के घमंड में चूर दुश्मन के हाथों अपमानित होने के बजाय पवित्र अग्नि को चुन लिया।
योगी जी ने ज़ोर देकर कहा की ये कोई निराशा या हार मान लेने वाले कदम नहीं थे। ये उस सर्वोच्च संप्रभुता के प्रतीक थे- ये उन औरतों के फैसले थे जो जानती थीं की उनका सम्मान वो आखिरी किला है जिसे कोई भी हमलावर कभी नहीं भेद सकता। जब योगी जी यह बात कह रहे थे, तो हॉल में बैठे उन्हीं राजपूत घरानों के वंशजों की आँखें छलक उठीं।
“80 घावों के बाद भी नहीं झुखने वाला हमारा वो शेर महाराणा सांगा”
भाषण का सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाला हिस्सा वो था जब उन्होंने महाराणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) को श्रद्धांजलि दी। 16वीं सदी की शुरुआत में मेवाड़ पर राज करने वाले महाराणा सांगा के शरीर पर 80 से ज्यादा घाव थे- एक आँख चली गई थी, एक हाथ कट चुका था, पैर से लंगड़ा कर चलते थे- लेकिन उन्होंने लड़ना कभी नहीं छोड़ा।
योगी जी ने जिस जोश के साथ इस शूरवीर का बखान किया, उसने पूरे माहौल में एक बिजली सी दौड़ा दी। उन्होंने कहा की शरीर पर इतने घाव होने के बावजूद, महाराणा सांगा का ध्यान अपने दर्द पर नहीं बल्कि राष्ट्र के सम्मान पर था।
ज़ख्म पर ज़ख्म खाते रहे, लेकिन विदेशी हमलावरों के सामने दीवार बनकर खड़े रहे और उन्हें भारत के दिल तक नहीं पहुँचने दिया। शरीर से टूट चुके लेकिन इरादों से फौलाद इस योद्धा की वो तस्वीर आज भी हिंदू सभ्यता के अजेय होने की कहानी कहती है- हम हज़ार साल के हमलों से छलनी ज़रूर हुए, लेकिन कभी सच में हारे नहीं, कभी मिटे नहीं।
“’महान’ अकबर का घमंड चूर करने वाले महाराणा प्रताप”
इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने मेवाड़ के सबसे महान योद्धा-राजा महाराणा प्रताप को खास श्रद्धांजलि दी। उन्होंने याद दिलाया की कैसे महज़ 27 साल की छोटी सी उम्र में प्रताप ने 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में अकबर के विशाल मुगल साम्राज्य से सीधा लोहा लिया था।
उस दौर में जब कई अन्य राजपूत रियासतें शाही दबाव के आगे झुक कर अधीनता स्वीकार कर रही थीं, प्रताप ने घुटने टेकने के आराम को लात मार दी और जंगल, पहाड़ों और दर-दर भटकने की ज़िंदगी को चुना। उन्होंने उस तथाकथित ‘महान’ अकबर को उसके शासनकाल की सबसे मुश्किल और कभी न सुलझने वाली जंग में उलझा कर रख दिया।
योगी जी ने बड़े ही कड़क अंदाज़ में कहा की भारतीय इतिहास के पन्ने महाराणा प्रताप के इस साहस को ज़ुल्म के खिलाफ बगावत की सबसे बड़ी मिसाल के तौर पर हमेशा याद रखेंगे।
“सर कटवाए, दीवार में चुनवा दिए गए, लेकिन झुके नहीं- महाराणा प्रताप से लेकर गुरु गोबिंद सिंह और नेताजी तक एक ही खून”
खैर, बात सिर्फ राजस्थान तक नहीं रुकी। योगी आदित्यनाथ ने भारत के तमाम हिंदू नायकों को एक ही धागे में पिरोते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोबिंद सिंह का नाम भी महाराणा प्रताप के साथ लिया। उन्होंने कहा की इन तीनों ने किसी निजी सत्ता या राजवंश की शान के लिए नहीं, बल्कि अपने धर्म, अपनी जनता और अपने राष्ट्र की आज़ादी के लिए तलवार उठाई थी।
गुरु गोबिंद सिंह के उस सर्वोच्च बलिदान का ज़िक्र करते हुए उनकी आवाज़ भारी हो गई- जब उनके चारों बेटे शहीद हो गए- दो युद्ध के मैदान में और दो को सरहिंद के मुगल सूबेदार ने ज़िंदा दीवार में चुनवा दिया- तब भी वो महान गुरु ज़रा भी नहीं डगमगाए। न उन्होंने सर झुकाया, न ही पंथ और हिंदू-सिख परंपरा की रक्षा के अपने संकल्प से रत्ती भर भी पीछे हटे।
उन्होंने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को भी याद किया, जिन्होंने महज़ 26 साल की उम्र में 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी। पीठ पर अपने नवजात बच्चे को बांधकर घोड़े पर सवार होकर उन्होंने सरेंडर करने के बजाय लड़ते हुए वीरगति पाना चुना। और फिर उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के उस अमर नारे को दोहराया- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”
योगी जी ने एक बेहद दमदार बात कही- अगर आज़ादी के समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस ज़िंदा और वहां मौजूद होते, तो शायद भारत के बँटवारे का वो दर्दनाक दिन हमें कभी नहीं देखना पड़ता, और पाकिस्तान कभी वजूद में ही नहीं आता। उनकी इस बात पर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
“श्री राम मंदिर बनाया और गुलामी का निशान मिटा दिया”
अब बात करते हैं अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर के निर्माण की। योगी जी ने इसका सीधा कनेक्शन चित्तौड़गढ़ की भावना से जोड़ा। भगवान राम धर्म के सर्वोच्च आदर्श इसलिए बने क्योंकि उन्होंने धरती से बुराई मिटाने, कमज़ोरों की रक्षा करने और अधर्म के खिलाफ पहाड़ बनकर खड़े होने का संकल्प लिया था।
और आज, योगी जी ने पूरे गर्व से कहा, अयोध्या में वो भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है- और अब उस पवित्र जन्मभूमि पर गुलामी का एक भी निशान बाकी नहीं बचा है।
इसके बाद उन्होंने उन लोगों पर तीखा और सीधा हमला बोला जो दशकों से हमारी संस्कृति के इस पुनर्जागरण का विरोध कर रहे थे- वही लोग जो कहते थे की राम और कृष्ण कभी थे ही नहीं; जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को कोर्ट और सड़कों पर रोकने की हर मुमकिन कोशिश की; जिन्होंने राम सेतु को तोड़ने की साज़िश रची; और जो हमेशा हमारी सबसे पवित्र संस्थाओं के इर्द-गिर्द शक का ज़हर घोलते रहे।
योगी जी ने साफ़ शब्दों में कहा, “ये वही लोग हैं जो आज जातिवाद का ज़हर घोलकर हिंदू समाज के टुकड़े करना चाहते हैं।”
“जब सत्ता रक्षक बन जाए तो औरतों को आग में नहीं कूदना पड़ता- यूपी का ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ मॉडल”
योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में आए उस बड़े बदलाव के बारे में बड़े ही गर्व से बात की। एक ऐसा राज्य जहाँ 25 करोड़ लोग बसते हैं, और जो कभी अपने गुंडाराज और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए बदनाम था।
उन्होंने बताया की जब 2017 में उनकी सरकार आई, तो उन्होंने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा के मामले में ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (ज़रा सी भी ढील नहीं) की नीति अपनाई। नतीजे सबके सामने हैं: आज यूपी में लड़कियाँ बेखौफ होकर स्कूल जाती हैं; महिलाएँ रात की शिफ्ट में फैक्ट्रियों में काम करके बिना डरे घर लौटती हैं; और जिन माफियाओं का कभी पूरे के पूरे ज़िलों में खौफ हुआ करता था, आज उनका पूरा का पूरा साम्राज्य मिट्टी में मिला दिया गया है।
उन्होंने जौहर की परंपरा, जो राजसत्ता के कमज़ोर होने पर जन्म लेती है, और अपनी सरकार के मिशन के बीच एक सीधा कनेक्शन खींचा। उनका संकल्प है की यूपी की किसी भी हिंदू महिला को कभी भी अपने सम्मान और अपनी जान में से किसी एक को नहीं चुनना पड़े।
जब राज्य ताकतवर होता है, जब कानून बिना किसी भेदभाव या डर के अपना काम करता है, तो जौहर महज़ इतिहास का हिस्सा बन जाता है- और इसकी ज़रूरत ही जड़ से खत्म हो जाती है। सुशासन पर ये उनका सबसे तगड़ा संदेश था।
“लुटेरों को तो कब्रें भी नसीब नहीं हुईं, और हमारे शूरवीरों का खून आज भी ज़िंदा है”
योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण का अंत शायद सबसे दमदार और दिल जीत लेने वाली बात से किया। उन्होंने बड़ी ही गंभीरता से कहा की बाबर, औरंगज़ेब और अकबर के वंशज- वो लोग जिन्होंने जौहर करवाए, मंदिर तोड़े, हमारे नायकों का कत्लेआम किया- आज उनका कहीं नामोनिशान तक नहीं है। उनकी नस्लें मिट चुकी हैं। उनके साम्राज्य खाक में मिल चुके हैं।
और फिर… वो एक पल के लिए रुके, और कहा- आज इसी मंच पर महाराणा प्रताप के वंशज ज़िंदा बैठे हैं। और 1303 में चित्तौड़गढ़ के पहले जौहर का नेतृत्व करने वाली उस महान रानी पद्मिनी का वंश सात सदियों बाद आज भी इस धरती पर शान से चल रहा है।
उन्होंने ऐलान किया की सनातन धर्म के मूल्य शाश्वत हैं। उन्होंने हर हमले, हर ज़ुल्म, हर तबाही को झेला है- और वो आगे भी बचे रहेंगे। जौहर की वो आग जो दुख और पीड़ा में जलाई गई थी, आखिरकार गौरव बनकर धधकी। और योगी जी के शब्दों में कहें तो, वो लौ अब कभी नहीं बुझेगी।
जौहर का अर्थ- कोई आत्महत्या नहीं, ‘जीते जी मुझे कोई दरिंदा छू नहीं सकता’- ये उस ज़िद का ऐलान था
जौहर के इतिहास में झांकने से पहले, यह समझना बहुत ज़रूरी है की आखिर ये परंपरा थी क्या- और क्या नहीं थी। जौहर कोई आम आत्महत्या नहीं था। ना ही ये कोई हार या निराशा से उठाया गया कदम था। यह एक हिंदू स्त्री द्वारा अपनी संप्रभुता का वो सबसे चरम ऐलान था जो वो एक ऐसे हमलावर के मुँह पर करती थी, जो उसे गुलाम बनाने, उसका शोषण करने और उसे ज़लील करने के इरादे से दरवाज़े पर खड़ा था।
जौहर दरअसल एक हुंकार थी- ‘तुम मेरे शरीर पर कब्ज़ा कर सकते हो, लेकिन मेरी आत्मा को कभी नहीं छू पाओगे। तुम इन दीवारों को तो भेद लोगे, लेकिन मेरे सम्मान को कभी नहीं रौंद पाओगे।’
अगर इसके कर्मकांड की बात करें, तो जौहर रात के वक्त किया जाता था, ठीक उससे पहले जब किले के दरवाज़े पुरुषों के आखिरी आत्मघाती हमले के लिए खोले जाने होते थे- जिसे ‘साका’ कहा जाता था। औरतें अक्सर अपने दुल्हन वाले जोड़े में सजकर आती थीं, मानो किसी मातम में नहीं बल्कि शादी में जा रही हों।
एक विशाल चिता सजाई जाती थी। ब्राह्मण पुजारी वैदिक मंत्र पढ़ते थे। माताएं अपने बच्चों को सीने से लगाए रखती थीं। छोटी बच्चियां एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलती थीं। और फिर, एक साथ, वो धधकती लपटों में समा जाती थीं। हिंदू नज़रिए से देखें तो आग को ही क्यों चुना गया, इसके पीछे भी एक गहरी वजह है।
अग्निदेव हिंदू विवाह के सबसे पवित्र साक्षी माने जाते हैं। आग में भस्म होने का मतलब था उसी देवता की मौजूदगी में प्राण त्यागना जिसने विवाह संपन्न कराया था, खुद को पवित्र करना और आज़ाद हो जाना।
सच कहूं तो इसके पीछे एक बहुत बड़ी व्यावहारिक वजह भी थी- आग शरीर को पूरी तरह राख कर देती थी, जिससे दुश्मन न तो उनके शवों को अपवित्र कर सकता था, न ही उन्हें ट्रॉफी की तरह नुमाइश के लिए ले जा सकता था, और न ही हिंदू रीति-रिवाज़ों के खिलाफ उन्हें दफना सकता था।
साका की परंपरा जौहर से ही जुड़ी हुई थी। जैसे ही औरतें आग में समा जाती थीं, पुरुष केसरिया बाना पहन लेते थे। मुँह में तुलसी का पत्ता और माथे पर जौहर की चिता की पवित्र भस्म लगाकर- वो किले के दरवाज़े खोल देते थे और खुद से कई गुना बड़ी दुश्मन सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़ते थे।
उनका मकसद सिर्फ एक था- आखिरी सांस तक लड़ना। वहाँ सरेंडर करने या समझौता करने का कोई सवाल ही नहीं था। वह एक आखिरी, शानदार बगावत थी। जब पूरी की पूरी राजपूत कौम के मिटने का वक्त आता था, तब जौहर और साका मिलकर उनकी पूरी आध्यात्मिक ताकत को झकझोर देते थे- जहाँ वो बेड़ियों में जीने के बजाय पूरे सम्मान के साथ मौत को गले लगाना चुनते थे।
आखिर भारत में क्यों शुरू हुआ जौहर ?
मूल कारण – इस्लामी आक्रमणों में हिंदू नारियों की दुर्दशा।
जौहर की शुरुआत क्यों हुई, इसे समझने के लिए हमें उस कड़वे लेकिन ऐतिहासिक सच का सामना करना ही पड़ेगा- 8वीं सदी से भारतीय उपमहाद्वीप में घुसपैठ करने वाली इस्लामी सेनाओं के लिए हिंदू औरतों को बंदी बनाना, उन्हें गुलाम बनाकर रखना और उनका ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाना महज़ एक इत्तेफाक नहीं था।
यह एक सोची-समझी नीति थी, जिसका जश्न मनाया जाता था। 712 ईस्वी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम के सिंध पर हमले में इसका सबसे पहला लिखित प्रमाण मिलता है। इस हमले के मुख्य अरबी दस्तावेज़ ‘चचनामा’ में साफ-साफ लिखा है की कैसे जीते हुए हिंदू और बौद्ध शहरों की औरतों और बच्चों को बड़ी तादाद में गुलाम बनाया गया और उन्हें जंग की लूट के माल की तरह आपस में बांट लिया गया।
1192 ईस्वी में जब तराइन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया और उत्तर भारत के सीने में पहली स्थायी इस्लामी सल्तनत का झंडा गाड़ा, तो उसने उस खौफनाक सिलसिले के दरवाज़े खोल दिए जो अगली चार सदियों तक दोहराया जाने वाला था।
शहरों और किलों की घेराबंदी होती; आदमियों को या तो काट दिया जाता या उनका धर्म बदल दिया जाता; और औरतों को बंदी बनाकर या तो हरम में झोंक दिया जाता या फिर बाज़ारों में गुलामों की तरह बेच दिया जाता। यह कोई छिटपुट घटना नहीं थी- इन सेनाओं की फितरत और उनके युद्ध के उसूलों में यह बात पूरी तरह से रची-बसी थी।
गुजरात के राजा की पत्नी राजपूत रानी कमला देवी- जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी ने बंदी बनाकर दिल्ली के अपने हरम में रख लिया था- और बाद में उनकी बेटी देवल देवी की दिल दहला देने वाली कहानी, जिसकी ज़बरदस्ती खिलजी के बेटे से शादी करा दी गई थी, इस खौफनाक पैटर्न के सबसे दर्दनाक सबूतों में से एक है।
ज़रा सोचिए, जब हिंदू औरतों के लिए हारने का मतलब रोज़-रोज़ की यह दरिंदगी हो, तब जौहर कोई ऊपर से थोपी गई प्रथा नहीं था। बल्कि यह समाज के भीतर से उठा एक स्वाभाविक विद्रोह था- जब बचने के सारे रास्ते बंद हो जाएं, तो यह बचाव की आखिरी ढाल थी।
चित्तौड़गढ़ से पहले की वो अनसुनी चीखें
वैसे, जौहर की शुरुआत चित्तौड़गढ़ के उन मशहूर किस्सों से काफी पहले हो चुकी थी। 1232 ईस्वी में, जब शम्स-उद-दीन इल्तुतमिश ने ग्वालियर के किले को घेरा था, तब वहाँ की राजपूत औरतों ने जौहर किया था।
जिस जगह पर वो सामूहिक चिता जलाई गई थी, उसे आज भी वहां के लोग ‘जौहर ताल’ के नाम से जानते हैं। यह इस बात की एक दर्दनाक याद दिलाता है की सम्मान के लिए मौत को गले लगाने की यह परंपरा उस वक्त तक अच्छी-खासी स्थापित हो चुकी थी।
1301 ईस्वी में, उसी अलाउद्दीन खिलजी ने- जिसने बाद में चित्तौड़गढ़ को घेरा था- अपनी सेना का रुख राजस्थान के रणथंभौर किले की तरफ किया। उस समय वहाँ चाहमान वंश के शूरवीर हम्मीरदेव का राज था।
जब यह तय हो गया की किला अब दुश्मनों के हाथ में चला जाएगा, तो हम्मीरदेव की पत्नी रानी रंगा देवी और उनकी बेटी पदमला ने जौहर किया, और खुद हम्मीरदेव ने अपनी छोटी सी टुकड़ी के साथ खिलजी की विशाल सेना पर आखिरी ‘साका’ का धावा बोल दिया। पैटर्न बिल्कुल वही था- औरतें आग में समा गईं, पुरुष रणभूमि में उतर गए, और सब कुछ लुटाकर भी अपना सम्मान बचा लिया गया।
चित्तौड़गढ़ के तीन महान जौहर – जब इस्लामिक लुटेरों को किले तो मिले, लेकिन हमारी औरतों की परछाईं तक नसीब नहीं हुई
पूरे भारतीय इतिहास में चित्तौड़गढ़ के तीन जौहर सबसे ज़्यादा अहमियत रखते हैं और ये भावनात्मक रूप से सबसे ज़्यादा रुला देने वाले भी हैं। इनमें से हर एक जौहर हिंदू सभ्यता की सामूहिक याददाश्त पर पड़े किसी गहरे घाव की तरह है।
पहला जौहर 1303 ईस्वी में हुआ था जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ को घेरा था। लोककथाओं और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की मानें तो, उसकी नज़र मेवाड़ के राणा रतन सिंह की बेहद खूबसूरत महारानी पद्मिनी पर थी। महीनों की घेराबंदी और धोखेबाज़ी के बाद आख़िरकार किला गिर गया।
लेकिन इससे पहले की दुश्मन अंदर घुस पाते, महारानी पद्मिनी ने हज़ारों राजपूत औरतों के साथ चित्तौड़गढ़ का पहला और सबसे बड़ा जौहर किया। जब खिलजी किले में घुसा, तो उसे खुले दरवाज़े मिले, मैदान में पुरुषों की लाशें मिलीं, और महल के अंदर सिर्फ राख और उस चिता का पवित्र धुआं मिला जो वो सब कुछ निगल चुका था जिसे पाने के लिए वो दिल्ली से चलकर आया था। उसने पत्थरों का किला तो जीत लिया था, लेकिन उस किले की आत्मा हार गया था।
दूसरा जौहर 1535 ईस्वी में हुआ जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़गढ़ पर हमला किया। उस समय मेवाड़ की कमान राजमाता रानी कर्णावती के हाथों में थी, जो युवा विक्रमादित्य की माँ थीं। कहा जाता है की उन्होंने मुगल बादशाह हुमायूं को मदद के लिए राखी भी भेजी थी, लेकिन हुमायूं की मदद पहुँचने में बहुत देर हो चुकी थी।
जैसे ही बहादुर शाह की सेना ने किले की बाहरी दीवारें तोड़ीं, रानी कर्णावती के नेतृत्व में लगभग 13,000 औरतों ने चित्तौड़गढ़ का दूसरा जौहर किया। पुरुषों ने साका किया। एक बार फिर, हमलावर को ईंट-पत्थर तो मिले, लेकिन जीत नसीब नहीं हुई।
तीसरा जौहर 1568 ईस्वी में हुआ, और यह उस दौर के दस्तावेज़ों में सबसे अच्छी तरह दर्ज़ है- खासकर अबुल फज़ल की ‘आईन-ए-अकबरी’ में, जो खुद बादशाह अकबर का दरबारी इतिहासकार था।
जब अकबर ने चित्तौड़गढ़ को घेरा और किले के सेनापति जयमल वीरगति को प्राप्त हुए, तो अबुल फज़ल लिखता है की एक ही घंटे के भीतर किले के अंदर कई जगह भयानक आग की लपटें उठने लगीं- जौहर शुरू हो चुका था।
हमारे ‘सेक्युलर’ इतिहासकार जिस अकबर को ‘महान’ बताकर पूजते हैं, उसने असल में राख, विधवाओं और अनाथों से भरा एक किला जीता था। मुगलों की कैद में जाने के बजाय हज़ारों राजपूत औरतों और बच्चों ने आग में जलना पसंद किया। और जो बचे-खुचे राजपूत योद्धा थे, वो केसरिया बाना पहनकर रणभूमि में अपनी मौत को गले लगाने उतर गए।
21वीं सदी में बैठकर जौहर की बात क्यों? क्योंकि जो अपना इतिहास भूल जाते हैं, उनका भूगोल मिटते देर नहीं लगती
अब कोई यह पूछ सकता है- 21वीं सदी में बैठकर हम जौहर पर इतनी बात क्यों कर रहे हैं? सात सौ साल पहले बुझ चुकी लपटों को आज मुड़कर देखने की क्या ज़रूरत है? खैर, इसका जवाब बहुत सीधा है- जो कौम अपना इतिहास भूल जाती है, वो उसे दोबारा भुगतने के लिए अभिशप्त होती है।
और याद रहे, जिन हालात की वजह से जौहर करना पड़ा था, वो कोई इत्तेफाक नहीं थे। वो एक बँटे हुए, जातिवाद में उलझे और टुकड़े-टुकड़े हो चुके हिंदू समाज का सीधा सा नतीजा थे, जो एक सुनियोजित और कट्टर सोच वाले हमले के खिलाफ कभी एक नहीं हो सका। चित्तौड़गढ़ में योगी आदित्यनाथ की वो चेतावनी सिर्फ कोई बीती बातें याद दिलाना नहीं था- वो आज के लिए एक सायरन था।
हिंदू समाज पर मंडराने वाले खतरों का बस रूप बदला है, उनकी नीयत आज भी वही है। जाति के आधार पर वोट-बैंक की राजनीति- जिसकी योगी जी ने दिनकर की कविता के ज़रिए कड़ी निंदा की- वो उन्हीं छोटी-छोटी आपसी दरारों का नया रूप है, जिनका फायदा उठाकर कभी हमलावरों ने एक राजपूत कबीले को दूसरे राजपूत कबीले से लड़वाया था, एक हिंदू राज्य को दूसरे हिंदू राज्य से भिड़वाया था, और फिर धीरे-धीरे सबको जीत लिया था।
आज के कुछ स्वार्थी नेता भी सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए हिंदू समाज में दरारें डालकर बिल्कुल वही हालात पैदा कर सकते हैं, जिसकी वजह से 1303 में महारानी पद्मिनी को बाहर से कोई मदद नहीं मिल पाई थी।
इस पुरानी बीमारी का सबसे ठोस और आधुनिक इलाज उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सुशासन में दिखता है। एक ऐसा राज्य जहाँ महिलाएँ सुरक्षित हों, वहाँ जौहर के बारे में सोचना भी नामुमकिन है- इसलिए नहीं की हम उसे भूल गए हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन हालातों को ही जड़ से उखाड़ फेंका गया है जिन्होंने जौहर पैदा किया था।
अपराध पर ज़ीरो टॉलरेंस, तुरंत न्याय, और हर हिंदू महिला के सम्मान की रक्षा करने की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति- सुशासन का यह मॉडल सीधे तौर पर चित्तौड़गढ़ की सीख से निकला है।
अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण हमारी सभ्यता के इस पुनर्जागरण का दूसरा बड़ा स्तंभ है। जिन ताकतों ने 1528 में राम मंदिर को तोड़ा था- ये वही साल था जब बाबर ने चंदेरी को भी घेरा था- उन्हीं ताकतों ने दशकों तक हिंदुओं को उसे दोबारा बनाने के अधिकार से दूर रखा।
अब वो मंदिर बन चुका है, और उसके लिए लड़ने वालों का सीधा राजनीतिक वारिस आज भारत के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बनकर बैठा है। यह कोई छोटी बात नहीं है; और योगी जी ने भी बिल्कुल सही जगह पर इस बात को महाराणा प्रताप से लेकर आज तक चल रही हिंदू प्रतिरोध की उस अखंड कड़ी से जोड़ा है।
