कम आबादी, ज्यादा टैक्स — जैन समाज के वैभव जैन का करियर झूठे SC/ST केस से तबाह, सवर्ण आयोग समय की जरूरत

ज़रा सोचिए, साल 2013, इंदौर का एक एग्जामिनेशन हॉल। बच्चे टेंशन में हैं, हाथों में पेन और एडमिट कार्ड लिए अपनी-अपनी सीट की तरफ जा रहे हैं। इन्हीं के बीच एक और नौजवान है। घबराया हुआ तो वो भी है, लेकिन परीक्षा की वजह से नहीं, बल्कि इस वजह से की उसके हाथों में हथकड़ियां हैं!

नाम है वैभव जैन। भोपाल का रहने वाला यह लड़का एमजीएम (MGM) मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस (MBBS) का स्टूडेंट था। पढ़ाई में तेज़, उसूलों का पक्का और पूरी तरह से बेगुनाह। इस लड़के ने कई हफ़्ते जेल की कालकोठरी में काटे हैं। किसी जुर्म की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसने अपनी एक सहपाठी को चीटिंग कराने से साफ़ मना कर दिया था। और उसी ने वैभव को एक झूठे SC/ST केस में फंसा दिया। 

वो पुलिस वालों की कस्टडी में, हथकड़ियां पहने वो अपने दूसरे साल की परीक्षा दे रहा था। किसी होनहार विद्यार्थी की इस तरह सबके सामने सरेआम बेइज़्ज़ती… ये सब मध्य प्रदेश में हुआ, और वो भी कानून की नाक के नीचे। कानून ने उसे बचाने के लिए कुछ नहीं किया। सच कहूं तो, उसी कानून ने ही तो उसके हाथों में ये हथकड़ियां पहनाई थीं।

वैभव जैन की कहानी कोई इकलौता मामला नहीं है। ये तो महज़ एक लक्षण है- एक ऐसी कानूनी व्यवस्था का जो इस कदर एकतरफा हो चुका है की एक सामान्य वर्ग के बेगुनाह नौजवान का पूरा करियर और जिंदगी तबाह हो जाती है। सदमे से उसके पिता को लकवा मार जाता है, पूरी ज़िंदगी पलट जाती है। 

और जिस इंसान ने ये सब किया? वो बिना एक दिन की सज़ा काटे आराम से निकल जाती है। ये लेख उसी कहानी के बारे में है। उस कानूनी सड़न के बारे में- उन एकतरफा SC/ST नियमों के बारे में, और उन 2026 के नए UGC अधिनियमों के बारे में, जो अब इसी सड़न को हमारे विश्वविद्यालयों में लाने वाले हैं- वो भी सरकारी मोहर के साथ।

वैभव जैन की दास्तान- झूठे SC/ST केस में 50 दिन की जेल और साज़िश रचने वालों को खुली छूट

डॉ. वैभव जैन इंदौर के MGM मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे। उनकी ही एक क्लासमेट थी- नेहा वर्मा। नेहा का एडमिशन कुख्यात व्यापम घोटाले के ज़रिए हुआ था। वही घोटाला जिसने पूरे मध्य प्रदेश को हिला कर रख दिया था। नेहा, जिसकी खुद की डॉक्टरी बेईमानी की बुनियाद पर टिकी थी, उसे शायद अपनी बेईमानी को और आगे बढ़ाने में कुछ भी गलत नहीं लगा।

2011 की बात है। नेहा ने वैभव के सामने एक डील रखी: उसकी छोटी बहन पूजा के पीएमटी (PMT) एग्जाम में उसे ‘प्रॉक्सी’ बनना था। आसान भाषा में कहें तो एग्जाम में कैंडिडेट के पीछे बैठकर उसे उत्तर बताना। ये सरासर चीटिंग थी, एक क्रिमिनल काम। और हर ईमानदार स्टूडेंट से यही उम्मीद की जाती है की वो इस तरह के काम को मुंह पर मना कर दे।

वैभव ने वही किया, साफ़ इनकार कर दिया। बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी, उसने बाकी स्टूडेंट्स को भी ऐसा करने से रोका। देखा जाए तो वैभव वैसा ही सच्चा और उसूलों वाला लड़का था, जिसकी हर कॉलेज को ज़रूरत होती है और जिससे हर भ्रस्ट सिस्टम खौफ खाता है।

नेहा को ये ‘ना’ बर्दाश्त नहीं हुई। इसके बाद शुरू हुआ लीगल हैरेसमेंट का एक लंबा, सोची-समझी साज़िश वाला खेल। अक्टूबर 2012 में उसने शिकायत दर्ज कराई की वैभव ने उसके नाम से एक फेक फेसबुक प्रोफाइल बनाई है और उसमें अश्लील फोटो डाल दिए हैं। पलासिया पुलिस स्टेशन में आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज हो गया। लेकिन वैभव को इसमें एंटीसिपेटरी बेल (अग्रिम ज़मानत) मिल गई।

जब आईटी एक्ट वाला दांव खाली गया, तो नेहा ने अपनी चाल और बड़ी कर दी। 18 फरवरी 2013 को वो फिर थाने पहुंची। इस बार इल्ज़ाम था की वैभव ने उसे जातिसूचक गालियां दीं और उसके साथ बदतमीजी की। इस बार केस सिर्फ आईपीसी (IPC) में नहीं, बल्कि सीधे एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट की धारा 3(1)(10) और 3(1)(11) के तहत दर्ज हुआ। बाद में इसमें कुछ और आईपीसी की धाराएं (294, 506, 469, 500 और 354) भी जोड़ दी गईं।

अब दिक्कत ये है की एससी/एसटी एक्ट में ज़मानत मिलना लगभग नामुमकिन होता है। वैभव को अरेस्ट कर लिया गया और उसने 50 दिन जेल (ज्यूडिशियल कस्टडी) में काटे। उसे हथकड़ियों में अपना सेकंड-ईयर का एग्जाम देने लाया गया। अपने बेटे को एक क्रिमिनल की तरह यूं हथकड़ियों में जकड़ा देख उसके पिता ये शर्म और सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्हें पैरालिसिस (लकवा) का अटैक आ गया, जिससे वो फिर कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए।

“मेरी ज़िंदगी के वो छह साल अब तक के सबसे बुरे साल थे। इस झूठे केस ने मेरा करियर बर्बाद कर दिया। मुझे हथकड़ियों में एग्जाम देने लाया गया। मैं अपने दोस्तों से नज़रें तक नहीं मिला पा रहा था।” – डॉ. वैभव जैन

वैभव ने 2016 में 62% अंकों के साथ अपनी एमबीबीएस पूरी की। उस लड़के के लिए ये एक बहुत बड़ा अचीवमेंट था, जिसने हथकड़ियों में बैठकर पेपर दिए हों और जिसकी बाकी की पूरी पढ़ाई एक क्रिमिनल केस के साये में गुज़री हो। 

पर चूंकि केस अभी भी चल रहा था, इसलिए वो सरकारी नौकरी के लायक ही नहीं माना गया। एक योग्य डॉक्टर पब्लिक की सेवा नहीं कर पा रहा था, और वो भी इसलिए क्योंकि स्टेट की लीगल मशीनरी का इस्तेमाल एक ऐसी लड़की उसके खिलाफ कर रही थी, जिसका खुद का मेडिकल करियर फ्रॉड पर टिका था।

खैर, पांच साल तक चले कोर्ट केस के बाद आखिरकार सच सामने आ ही गया। गवाहों ने इस बात को पुख्ता किया की नेहा ने वैभव को स्कोरर बनने के लिए कहा था और उसने मना किया था। कोर्ट में एक कॉल रिकॉर्डिंग भी पेश की गई, जिससे ये साबित हो गया कि 11 फरवरी 2013 को (यानी एससी/एसटी केस दर्ज होने से पूरे एक हफ्ते पहले) नेहा के एक साथी ने वैभव को कॉल करके पैसे मांगे थे और साफ़ धमकी दी थी की  पैसे नहीं दिए तो केस ठोक देंगे। 

ये सीधा-सीधा एक्सटॉर्शन (वसूली) का मामला था। यानी वो एससी/एसटी केस किसी के साथ हुए अन्याय की शिकायत नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चाल और हथियार था। और तो और, नेहा कोर्ट में ये तक साबित नहीं कर पाई की  वो असल में पिछड़ी जाती से है भी या नहीं- कोर्ट ने उसके कास्ट सर्टिफिकेट की फोटोकॉपी को अमान्य कर दिया। फेसबुक प्रोफाइल, अश्लील फोटो, जातिसूचक गालियां… इनमें से एक भी इल्ज़ाम साबित करने के लिए उसके पास कोई सबूत नहीं था।

आखिरकार 1 अगस्त 2018 को, जज बी.के. द्विवेदी ने डॉ. वैभव जैन को बाइज्ज़त बरी कर दिया। पूरे छह साल बीत चुके थे। नेहा वर्मा को उसके व्यापम फ्रॉड की वजह से कॉलेज से निकाला जा चुका था। लेकिन एक झूठा एससी/एसटी केस फाइल करने के लिए उसे कोई सज़ा नहीं मिली, वसूली के लिए कोई केस नहीं चला। एक बेगुनाह की ज़िंदगी तबाह करने की उसने कोई कीमत नहीं चुकाई।

सवर्णों की सुरक्षा और पलटवार के लिए बने एक मजबूत सवर्ण आयोग

अब छोटे-मोटे न्यायिक सुधारों का वक्त चला गया है। आज भारत को, और इंसाफ को, एक ऐसी बनावटी समस्या के लिए एक बनावटी समाधान की ज़रूरत है। हमारी मांग है की एक ‘नेशनल जनरल कैटेगरी प्रोटेक्शन कमीशन’ बनाया जाए- एक ऐसा लीगल ढांचा जिसके पास ये पावर हों:

पहली बात, इस कमीशन के पास एससी/एसटी एक्ट के उन मामलों को ‘फास्ट-ट्रैक’ रिव्यू करने का अधिकार होना चाहिए जहां शुरुआती तौर पर ही ये दिख रहा हो की  केस झूठा है या किसी खुन्नस में किया गया है। 

इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है की  जो वाकई जातिवाद के शिकार हुए हैं, उनसे उनका हक़ छीना जा रहा है। इसका सिर्फ इतना सा मतलब है की  इस कानून का इस्तेमाल वसूली के लिए न हो सके, इस पर एक अतिरिक्त नज़र रखी जाए। वैभव जैन के केस में मिली वो कॉल रिकॉर्डिंग एक सबक है- जब फर्जी केस या वसूली के सुबूत मौजूद हों, तो उन पर तुरंत एक्शन होना चाहिए, न की  उन्हें दस-दस साल के लिए ट्रायल में घसीट कर दफन कर देना चाहिए।

दूसरी बात, इस कमीशन को ये मांग करनी चाहिए और संसद को ये कानून बनाना चाहिए की  झूठी एससी/एसटी शिकायत पर सख्त और ज़रूरी सज़ा मिलेगी। अगर कोई शिकायत जानबूझकर परेशान करने के लिए की गई है- जैसे वसूली के कॉल्स, फर्जी सुबूत, या फिर ये साबित ही न कर पाना की  वो खुद उस कम्युनिटी से आते भी हैं या नहीं- तो ऐसे शिकायत करने वालों पर क्रिमिनल केस चलना चाहिए। आज के दौर में जो ‘जीरो-कंसिक्वेंस’ (कोई सज़ा नहीं) का माहौल है, वो न तो नैतिक रूप से सही है और न ही कानूनी तौर पर।

तीसरी बात, इस कमीशन को उन जनरल कैटेगरी के लोगों को लीगल एड (कानूनी मदद) देनी चाहिए जिन्हें एससी/एसटी एक्ट में झूठा फंसाया गया है और जो सालों साल चलने वाले केसों का खर्च नहीं उठा सकते। वैभव जैन ने छह साल तक वो केस लड़ा जिसने उसका करियर और उसके पिता की सेहत दोनों बर्बाद कर दिए। उन छह सालों में स्टेट ने उसकी कोई मदद नहीं की। एससी/एसटी के शिकायतकर्ताओं के लिए जो लीगल एड का सिस्टम मौजूद है, ठीक वैसा ही सिस्टम जनरल कैटेगरी के झूठे फंसाए गए लोगों के लिए भी बनना चाहिए।

चौथी बात, हम शिक्षा मंत्रालय से ये मांग करते हैं की वो 2026 के UGC नियमों में तुरंत बदलाव करे। जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स को भी इसके दायरे में लाए; झूठी शिकायत करने वालों पर उतनी ही सख्त पेनाल्टी लगाए जितनी जातिगत भेदभाव करने वालों पर है; वो 24-घंटे वाली बेतुकी टाइम-लिमिट को बढ़ाकर कम से कम 72 घंटे करे और उसमें शुरुआती जांच को ज़रूरी बनाए; ‘इम्पलिसिट डिस्क्रिमिनेशन’ और ‘माइक्रो-एग्रेशन’ जैसे शब्दों की सही और स्पष्ट परिभाषा दे ताकि कोई इसका गलत इस्तेमाल न कर सके; और ‘इक्विटी स्क्वाड्स’ को किसी न्यूट्रल (निष्पक्ष) कैंपस अथॉरिटी के अंतर्गत रखे, न की किसी जाति-आधारित सोच वाले ग्रुप के हाथ में।

हमारी इन मांगों का संवैधानिक आधार बहुत सीधा सा है। संविधान का आर्टिकल 14 देश के ‘सभी’ नागरिकों को कानून के सामने बराबरी का हक़ देता है, सिर्फ ‘कुछ’ को नहीं। आर्टिकल 21 ज़िंदगी और पर्सनल लिबर्टी की गारंटी देता है- और एक ऐसा इंसान जिसकी ज़िंदगी एक झूठे केस ने बर्बाद कर दी हो, जिसका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया हो, जिसके पिता सदमे से लकवाग्रस्त हो गए हों… उसकी ज़िंदगी भी आर्टिकल 21 का उतना ही बड़ा उल्लंघन है जितना कि कोई भी दूसरी हिंसा। 

हमारा संविधान एक दलित नागरिक और एक जैन नागरिक के सम्मान के बीच कोई फर्क नहीं करता। तो कानून को भी ऐसा नहीं करना चाहिए।

जैन समुदाय देता है देश को सबसे ज्यादा टैक्स, लेकिन सिस्टम की नज़र में सबसे लावारिस

वैभव जैन की ये त्रासदी एक बहुत बड़ी और गहरी कड़वाहट की तरफ इशारा करती है, जो हमारे देश के लीगल और पॉलिटिकल सिस्टम का असली चेहरा दिखाती है। वैभव जैन समुदाय से आता है- वो समुदाय जो भारत का सबसे छोटी, लेकिन सबसे ज़्यादा आर्थिक उत्पादन देने वाला और संस्थागत रूप से सबसे असुरक्षित कम्युनिटीज़ में से एक है।

2011 के सेंसस (आखिरी बार जब धर्म के आधार पर सही आंकड़े आए थे) की मानें, तो भारत की 140 करोड़ से ज़्यादा की आबादी में जैन मुश्किल से 0.37% (करीब 45 लाख) हैं। आबादी के हिसाब से देखा जाए तो जैन इस देश के सबसे छोटे धार्मिक समूहों में से हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2005 के ‘बाल पाटिल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ केस में जैनों को एक धार्मिक अल्पसंख्यक (माइनॉरिटी) का दर्जा दिया था।

इसके बावजूद, ये मुट्ठी भर लोग देश के टैक्स, आर्थिक उत्पादन और भलाई के कामों में इतना बड़ा हिस्सा देते हैं की आप सोच भी नहीं सकते। डायरेक्ट टैक्स भरने में वो सबसे आगे रहते हैं। इस कम्युनिटी ने सालों से देश भर में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और न जाने कितने चैरिटेबल ट्रस्ट बनाए हैं। अगर इकॉनमी में योगदान की बात करें, तो जैन देश के सबसे एक्टिव नागरिकों में से एक हैं।

लेकिन फिर भी… जैनों के लिए कोई ‘नेशनल कमीशन’ नहीं है। अगर वैभव जैसे किसी जैन को झूठे केस में फंसा दिया जाए, तो उसे बचाने के लिए एससी/एसटी जैसा कोई खास कानूनी प्रोटेक्शन नहीं है। उसके पास जाने के लिए कोई ऐसा मंच नहीं है जहां वो तब जा सके जब कानून का ही इस्तेमाल उसे मारने के लिए किया जा रहा हो। 

एससी, एसटी और माइनॉरिटीज़ के लिए अलग-अलग नेशनल कमीशन हैं जो उनकी आवाज़ उठाते हैं। लेकिन जनरल कैटेगरी (जिसमें अगड़ी जातियां, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, बनिया, जैन और कई दूसरे लोग आते हैं) के लिए ऐसा कोई इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट नहीं है। उनसे यही उम्मीद की जाती है की वो अकेले ही कोर्ट के धक्के खाएं, अपनी जेब से वकीलों की भारी-भरकम फीस भरें, और न्याय मिलने तक सिस्टम की हर मार को चुपचाप सहते रहें।

2026 के UGC नियम हैं सवर्ण छात्रों को बर्बाद करने की एक नई और सरकारी साज़िश

अगर एससी/एसटी एक्ट की खामियां हमारी पुरानी विधायी विफलता हैं, तो 2026 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के ‘जाति आधारित भेदभाव’ पर आए नए नियम एक नया और खौफनाक खतरा हैं। ये नियम उन्हीं पुरानी कमियों को हमारे विश्वविद्यालयों और कैंपसों में और भी ज़्यादा निगरानी के साथ लागू करने जा रहे हैं। कल तक जो हथियार कोर्टरूम में चलता था, अगर इन नियमों पर रोक नहीं लगी, तो वो अब कैंपस में 24-घंटे चलने वाला हथियार बन जाएगा।

2026 में जारी हुए ये नए UGC नियम देखने में तो बड़े अच्छे लगते हैं। कहा गया है की उच्च शिक्षा के संस्थानों में ‘इक्विटी कमेटी’ बनाई जाएगी जो जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव को रोकेगी। कागज़ों पर ये आइडिया बहुत नेक लगता है। लेकिन हकीकत में इसके प्रावधान इतने खतरनाक हैं की पूछिए मत। और इस पूरे मामले पर शिक्षा मंत्रालय और भारत सरकार की चुप्पी और भी ज़्यादा डराने वाली है।

पहली बात तो ये की इन नियमों में भेदभाव की डेफिनेशन ही देखिए। इसके मुताबिक, भेदभाव का मतलब सिर्फ वो काम है जो किसी एससी, एसटी या ओबीसी स्टूडेंट के खिलाफ किया गया हो। अब इसमें ‘जनरल कैटेगरी’ के स्टूडेंट्स (जिनमें गरीब सवर्ण भी आते हैं, जिन्हें खुद भी कैंपस में तानों, नफरत या हैरेसमेंट का सामना करना पड़ता है) उन्हें इस प्रोटेक्शन से पूरी तरह बाहर रखा गया है। 

ये कोई छोटी-मोटी भूल नहीं है। ये जानबूझकर किया गया एक फैसला है, जो कैंपस में न्याय के दो अलग-अलग स्तर बनाता है। एक तरफ वो स्टूडेंट्स हैं जिनके लिए खास कमेटी है, शिकायत करने का सिस्टम है और एक तय टाइम-लिमिट है। और दूसरी तरफ वो स्टूडेंट्स हैं जिनके लिए कुछ भी नहीं है। अगर कल को किसी जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट को परेशान किया जाता है, तो इस सिस्टम की नज़र में वो है ही नहीं।

दूसरी और सबसे खतरनाक बात- इन नियमों में झूठी या फंसाने वाली शिकायतों पर कोई सज़ा या फाइन का सिस्टम ही नहीं है। यही तो वो बुनियादी दिक्कत थी जिसने एससी/एसटी एक्ट का बेड़ा गर्क किया, और अब इसे कैंपस के रूल्स में भी कॉपी-पेस्ट किया जा रहा है। अगर झूठी शिकायत पर कोई पेनल्टी नहीं होगी, तो ये सीधे-सीधे एक खुली छूट देने जैसा है। 

मतलब कोई भी स्टूडेंट किसी भी जनरल कैटेगरी के क्लासमेट पर केस ठोक सकता है, और उसे इसका कोई डर नहीं होगा की अगर वो गलत साबित हुआ तो क्या होगा। आज के दौर में जब पहले से ही जातियों को लेकर इतना टेंशन है, ये तो वही बात हुई की आप बारूद के ढेर पर बैठे लोगों के हाथों में जलती हुई माचिस थमा दें। अच्छी बात ये है की हर जलती माचिस से आग नहीं लगती। लेकिन बुरी बात ये है की वैभव जैन के केस में वो आग लगी थी, और सब कुछ जलकर खाक हो गया था।

तीसरी बात, ये नियम कहते हैं की शिकायत मिलने के 24 घंटे के अंदर इक्विटी कमेटी को एक्शन लेना ही होगा। इस सुपर-फास्ट स्पीड को ‘अच्छा शासन’ कहकर बेचा जा रहा है। लेकिन सच कहूं तो ये सीधे-सीधे इंसान के खुद को बचाने के हक को छीनना है। 24 घंटे का मतलब है की आरोपी स्टूडेंट को इससे पहले की शिकायत समझ में आए, या वो किसी घरवाले या सलाहकार से बात कर पाए, उसे कमेटी के सामने खड़ा कर दिया जाएगा, फॉर्मल इन्क्वायरी शुरू हो जाएगी या शायद उसे सस्पेंड भी कर दिया जाए। 

जल्दी-बाज़ी कोई अच्छी चीज़ नहीं है जब वो निष्पक्षता को ही खत्म कर दे। बिना ठीक से जांच किए जल्दबाज़ी में लिया गया एक्शन इंसाफ नहीं होता, वो सिर्फ इंसाफ का दिखावा होता है- जो तेज़ है, सबको दिखता है, लेकिन पूरी तरह गलत है।

चौथी बात, इन नियमों में ‘इक्विटी स्क्वाड्स’ बनाने की बात कही गई है- यानी ऐसे उड़नदस्ते जो कैंपस में ‘संवेदनशील’ जगहों पर गश्त लगाएंगे। साथ ही ‘इक्विटी एंबेसडर्स’ रखे जाएंगे जो लोगों के व्यवहार पर नज़र रखेंगे और रिपोर्ट करेंगे। बताया ये जा रहा है की इससे भेदभाव रुकेगा। पर असलियत में ये जातियों के आधार पर एक पूरा सर्विलांस सिस्टम तैयार कर देगा। 

जिन जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स को पहले ही किसी प्रोटेक्शन से बाहर रखा गया है, अब उनकी हर छोटी-बड़ी बातचीत को जाति के चश्मे से देखा जाएगा। और अगर किसी बात का गलत मतलब निकाल लिया गया, तो उनके पास अपनी सफाई देने का कोई रास्ता भी नहीं होगा। ये कोई समावेशी (सबको साथ लेकर चलने वाला) कैंपस नहीं है। ये एक ऐसा कैंपस है जो पहचान आधारित निगरानी दस्ते में बंट गया है। इससे जातिवाद कम नहीं होगा, बल्कि और ज़्यादा बढ़ेगा।

पांचवीं बात, इन नियमों में ‘भेदभाव’ में सिर्फ सीधे-सीधे किए गए काम नहीं, बल्कि ‘इम्पलिसिट’ (अप्रत्यक्ष), ‘माइक्रो-एग्रेशन’ (सूक्ष्म आक्रामकता) और ‘स्ट्रक्चरल बायस’ (ढांचागत पूर्वाग्रह) जैसे भारी-भरकम शब्दों को भी शामिल किया गया है। ये शब्द अकादमिक बहस के हैं, जहां इनके मतलब पर रोज़ बहस होती है। पर जब आप इन्हें नियमो में डाल देते हैं, तो ये बड़े खतरनाक बन जाते हैं क्योंकि इन्हें अपनी मर्जी से मोड़ा जा सकता है। 

क्या होता है ‘माइक्रो-एग्रेशन’? कौन तय करेगा? 24 घंटे वाली इक्विटी कमेटी? या वो इक्विटी एंबेसडर? अगर ये नियम ऐसे ही लागू हो गए, तो कैंपस में होने वाली किसी भी सामान्य सी बातचीत या मज़ाक को भी ‘भेदभाव’ का रंग दिया जा सकता है। 

अगर जनरल कैटेगरी का कोई स्टूडेंट कोई तगड़ी स्कॉलरशिप जीत लेता है, अच्छे ग्रेड्स लाता है, या फिर बस किसी ऐसी जगह बैठता है जहां किसी और को लगता है की उसे नहीं बैठना चाहिए- तो इस सामान्य सी बात को भी ‘संरचनात्मक पक्षपात’ का नाम दिया जा सकता है। कोई सुरक्षित क्षेत्र नहीं बचेगा, कोई क्लैरिटी नहीं होगी, कोई लिमिट नहीं होगी।

SC/ST Act- जब इंसाफ की ढाल ही सवर्णों का गला काटने वाली तलवार बन जाए

1989 में जब SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट लाया गया था, तो इसके पीछे वाकई एक बहुत ठोस और ज़रूरी वजह थी। हमारे देश में जाति के नाम पर हिंसा और भेदभाव का इतिहास काफी लंबा और शर्मनाक रहा है। इस कानून को इसलिए बनाया गया था ताकि कागज़ों पर जो हक़ मिले हैं, वो ज़मीन पर भी दिखें। ताकि सदियों से सताए गए लोगों को तब इंसाफ मिल सके जब उन्हें उनकी जाति की वजह से निशाना बनाया जाए।

इरादा तो नेक था। लेकिन पिछले तीस सालों में जिस तरह से इसे लागू किया गया है, उससे साफ हो गया है की इसके ढांचे में ही बहुत बड़ा झोल है। बाकी क्रिमिनल कानूनों से उलट, एससी/एसटी एक्ट में एफआईआर (FIR) दर्ज होने से पहले किसी शुरुआती जांच की ज़रूरत नहीं होती। 

शिकायत सही है या नहीं, ये क्रॉस-चेक करना भी ज़रूरी नहीं है। ये कानून पहले से ही मान कर चलता है की आरोपी गुनहगार है। ज़मानत मिलना तो भूल ही जाइए। सिर्फ एक इल्ज़ाम काफी है किसी को सीधे जेल में डालने के लिए। नतीजतन, ये एक ऐसा सिस्टम बन गया है जहां कोर्ट का ‘प्रोसेस’ ही अपने आप में एक सज़ा है। अगर कोई किसी से खुन्नस निकालना चाहे, तो उसके लिए ये एक्ट किसी सटीक हथियार से कम नहीं।

अगर आप हर साल आने वाले एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े उठाकर देखें, तो पाएंगे की बाकी क्रिमिनल मामलों के मुकाबले एससी/एसटी एक्ट के मामलों में लोगों के बरी होने का रेट कहीं ज़्यादा है। इसका सीधा सा मतलब है की या तो बिना सुबूतों के केस ठोके जा रहे हैं, या फिर शिकायतें ही फर्जी हैं। बड़े-बड़े लीगल एक्सपर्ट्स और रिटायर्ड जजों ने भी इस खामी की तरफ कई बार इशारा किया है। बात इतनी बिगड़ गई थी कि खुद सुप्रीम कोर्ट को इसमें दखल देना पड़ा।

2018 में ‘डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र’ केस में, सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच ने कुछ बहुत ज़रूरी सुरक्षा उपाय तय किए थे। जैसे की एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच ज़रूरी होगी, और अरेस्ट करने से पहले किसी सीनियर अधिकारी की परमिशन लेनी होगी। 

बस, इसके बाद तो जैसे सियासी भूचाल ही आ गया। कुछ ही महीनों के भीतर, संसद ने आनन-फानन में एससी/एसटी (संशोधन) एक्ट, 2018 पास कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जो सुरक्षा कवच दिए थे, सरकार ने उसे पलट दिया और उसी पुराने सिस्टम को वापस ला खड़ा किया जहां इस कानून के गलत इस्तेमाल की पूरी छूट थी। पॉलिटिक्स जीत गई, और अकल हार गई… और बेगुनाह लोग आज भी इसकी कीमत चुका रहे हैं।

सवर्णों के वोट से बनी सरकार आखिर सवर्णों पर हो रहे अत्याचार पर चुप क्यों है

2014 से भारत में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार है। इस पार्टी ने बराबरी, मेरिट और हर हिंदुस्तानी के सम्मान की बातें हमेशा बड़े ज़ोर-शोर से की हैं। इन्होंने 10% EWS कोटा भी लागू किया, जिससे कम से कम ये तो माना ही गया की जनरल कैटेगरी के लोगों को भी कुछ ढांचागत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। देखा जाए तो बीजेपी का एक बहुत बड़ा और पक्का वोट बैंक सवर्ण मतदाता ही है, जिन्होंने चुनाव दर चुनाव उन पर अपना भरोसा जताया है।

और फिर भी, जब बात SC/ST एक्ट के गलत इस्तेमाल की आती है, तो बीजेपी सरकार के मुंह पर ताला लग जाता है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे रोकने के लिए कुछ सेफगार्ड्स दिए थे, तो वो बीजेपी की अगुवाई वाली संसद ही थी जिसने कुछ ही महीनों में गठबंधन के दबाव और दलित वोट बैंक खिसकने के डर से उस फैसले को ही पलट दिया था। 

अब इन 2026 के UGC नियमों की ही बात कर लें- UGC शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है, और शिक्षा मंत्रालय बीजेपी सरकार चला रही है। लेकिन फिर भी, एक भी मंत्री ने सामने आकर ये नहीं माना की इन नियमों से जनरल कैटेगरी के स्टूडेंट्स को बाहर कर दिया गया है। झूठी शिकायत करने वालों पर जुर्माना लगाने की कोई बात नहीं की गई, और ना ही उस बेतुके 24 घंटे वाले नियम को बदलने पर कोई चर्चा हुई।

जब सरकार किसी ऐसे नियम पर चुप्पी साध ले जो सरेआम नागरिकों के एक हिस्से के साथ भेदभाव कर रहा हो और उन्हें एक हथियार बन चुके शिकायत प्रणाली के आगे निहत्था छोड़ रहा हो, तो उस चुप्पी का मतलब सहमति ही होता है। 

वो जनरल कैटेगरी जो इस देश में सबसे ज़्यादा टैक्स भरती है, सबसे ज़्यादा डॉक्टर, इंजीनियर और एडमिनिस्ट्रेटर बनाती है, और बिना किसी रिज़र्वेशन या सरकारी सपोर्ट के इस देश को आगे बढ़ाने में लगी है… वो कम से कम अपनी चुनी हुई सरकार से इस खामोशी से कुछ बेहतर की उम्मीद तो रखती ही है।

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