यूपी में एक वक्त ऐसा भी था जब खाकी वर्दी, जो आम आदमी की सुरक्षा और कानून का सबसे बड़ा प्रतीक है, उसे भी मुस्लिम भीड़ के आगे घुटने टेकने पड़ते थे। 6 जुलाई 2011 को मुरादाबाद के मैनाठेर में जो हुआ वो कोई आम दंगा नहीं था। वो एक कट्टरपंथी भीड़ का सीधे-सीधे देश के खिलाफ एक खूनी ऐलान था। उस दिन कानून के रखवालों का शिकार किया गया, और एक सर्विंग डीआईजी (DIG) को तो पीट-पीट कर मौत के मुंह तक पहुंचा दिया गया था।
हाल ही में 28 मार्च को मुरादाबाद कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस केस से जुड़े 16 इस्लामी आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। ये CM योगी आदित्यनाथ सरकार की एक बड़ी क़ानूनी जीत है।
बाहर से देखने वालों को लग सकता है की एक दशक पुराने दंगे का फैसला आ गया। लेकिन जो लोग यूपी की राजनीति की काली सच्चाई समझते हैं, उनके लिए ये फैसला समाजवादी पार्टी (SP) के चेहरे से नकाब नोंच लेने जैसा है। मैनाठेर की घटना आम कानून-व्यवस्था बिगड़ने का मामला नहीं थी। इसमें सत्ता में बैठे लोगों की जो मिलीभगत थी, वो रोंगटे खड़े कर देने वाली है।
सच कहूं तो, ये कहानी सिर्फ एक हिंसक भीड़ की नहीं है। ये इस बात का कच्चा-चिट्ठा है की कैसे अखिलेश और मुलायम सिंह यादव जैसे सपा नेताओं ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी हदें ही पार कर दी थीं।
सोचिए, महिला के साथ कुकर्म करने वाले को बचाने के लिए पूरा का पूरा सियासी इकोसिस्टम खड़ा कर दिया गया। पुलिस को रोकने के लिए धर्म के अपमान की झूठी अफवाहें फैलाई गईं। वोट-बैंक के लालच में इंसाफ का गला घोंट दिया गया। जब “सेक्युलरिज्म” का इस्तेमाल मुजरिमों की ढाल के तौर पर होने लगे, तो अंजाम कितना खौफनाक होता है, ये वाकया उसी का जीता-जागता सुबूत है।
6 जुलाई 2011- जिस दिन मुस्लिम दंगाईयों ने मैनाठेर-डिंगरपुर को आगजनी कर दिया
मैनाठेर में असल में हुआ क्या था, ये समझने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर पुलिस वहाँ गई क्यों थी।
मुरादाबाद के डिंगरपुर इलाक़े में (जो मैनाठेर पुलिस स्टेशन के अंदर आता है) एक छोटी बच्ची के साथ बहुत ही संगीन जुर्म हुआ था। पुलिस बस अपना काम करने और आरोपियों को पकड़ने उनके घर गई थी। लेकिन उसके बाद जो हुआ, वो लोगों का अचानक फूटा गुस्सा नहीं था, बल्कि पुलिस को रोकने के लिए रची गई एक सोची-समझी साज़िश थी।
इलाक़े में बड़ी ही चालाकी से एक अफ़वाह फैला दी गई की पुलिस ने कुरान का अपमान किया है और मुस्लिम महिलाओं के साथ दुव्यवहार किया है। बात बिलकुल झूठी थी। लेकिन इतनी काफी थी! देखते ही देखते वहाँ एक हिंसक भीड़ जमा हो गई। उन्हें लगने लगा की उनके धर्म पर हमला हुआ है, और उस हंगामे में वो असली जुर्म- उस बच्ची के साथ हुई दरिंदगी- कहीं पीछे छूट गया। भीड़ को तो बस इस बात से खुंदक थी की पुलिस ने उनके मुस्लिम भाईयों को पकड़ने की जुर्रत कैसे की।
फिर भीड़ ने मोरादाबाद और संभल रोड को बहुत जगहों से ब्लॉक कर दिया। और मैनाठेर के पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, साथ ही डिंगरपुर पुलिस चौकी को भी आगजनी कर दिया।
हालात बिगड़ते देख मुरादाबाद प्रशासन ने अपने टॉप अफ़सरों को वहाँ भेजा। तत्कालीन DIG/SSP अशोक कुमार सिंह- जो यूपी के सबसे तेज़-तर्रार IPS अफ़सरों में गिने जाते हैं- DM राजशेखर, SI रविकुमार और अपनी पूरी एस्कॉर्ट टीम के साथ डिंगरपुर पहुँचे।
इसके बाद जो हुआ, उसने इतिहास में मैनाठेर कांड के नाम से एक काला पन्ना जोड़ दिया।
वो DM जो भाग खड़ा हुआ। और वो DIG अशोक कुमार सिंह जिसे मरने के लिए छोड़ दिया गया।
DIG अशोक कुमार सिंह ने बाद में इस घटना की पूरी कहानी विभागी पूछताछ में लिखकर दी थी- वो भी दिल्ली के AIIMS के बिस्तर से, जहाँ उन्हें मुरादाबाद के अस्पताल से एमरजेंसी में रेफ़र किया गया था। उनका बयान रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
जब अफ़सरों का काफ़िला डिंगरपुर पहुँचा, तो भीड़ पहले से ही भड़की हुई थी। दोनों अफ़सर (अशोक कुमार सिंह और रविकुमार) अपनी-अपनी गाड़ियों से नीचे उतरे। DIG साहब ने भीड़ से बात करनी शुरू की ताकि मामला शांत हो सके। लेकिन ज़रा सोचिए, महज़ एक मिनट के अंदर DM राजशेखर चुपचाप वहाँ से रफूचक्कर हो गए, वो भी बिना अपनी गाडी से बाहर उतरे! न उन्होंने DIG को कुछ बताया, न कोई सलाह ली, बस दुम दबाकर निकल लिए।
DM के इस तरह भागने से भीड़ को एक सीधा मेसेज मिल गया। उनके हौसले बुलंद हो गए की प्रशासन तो डर कर भाग रहा है। भीड़ और उग्र हो गई।
DIG ने भीड़ को रोकने के लिए अपनी पिस्तौल से फायर भी किया, लेकिन लोग हज़ारों में थे और वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बताया जाता है की एस्कॉर्ट के 7 पुलिसवाले भी मौके से भाग खड़े हुए।
DM के इस तरह अचानक भागने से जो अफ़रातफ़री मची, उसमें DIG की खुद की एस्कॉर्ट गाड़ियाँ भी भ्रमित होकर DM की गाड़ियों के पीछे-पीछे निकल गईं। और बीच सड़क पर उस हिंसक भीड़ के बीच DIG अशोक कुमार सिंह और SI रविकुमार बिल्कुल अकेले छूट गए।
भीड़ ने DIG को जानवरों की तरह पीटा। SI रविकुमार पर भी जानलेवा हमला हुआ। इस्लामी भीड़ के लोग उन्हें तब तक मारते रहे जब तक उन्हें ये तसल्ली नहीं हो गई की DIG मर चुका है। इसके बाद ही वो वहाँ से हटे। DIG खून से लथपथ सड़क पर पड़े थे, हिलने तक की हालत में नहीं थे।
पूरे दो घंटे तक, DIG अशोक कुमार सिंह दर्द से तड़पते हुए उसी सड़क पर पड़े रहे, इस इंतज़ार में कि कोई मदद आएगी। लेकिन मदद नहीं आई। DM तो भाग ही चुके थे। डीएम बस वायरलेस में DIG मिसिंग की सुचना दे रहे थे। कोई रेस्क्यू टीम नहीं आई। यूपी कैडर का एक शानदार IPS अफ़सर दो घंटे तक मरने के लिए लावारिस छोड़ दिया गया था, सिर्फ इसलिए क्योंकि सिस्टम बैठ चुका था- और सरकारी गाड़ी में बैठे एक आदमी ने अपना फ़र्ज़ निभाने के बजाय भागना ज़्यादा सही समझा।
आखिरकार दो घंटों बाद रेस्क्यू टीम आयी और उन्हें अधमरी हालत में ले गए। लेकिन इस देश को ये जानना बहुत ज़रूरी है की इसके बाद असल में हुआ क्या- क्योंकि हिंसा के बाद जो हुआ, वो उस हिंसा से भी कहीं ज़्यादा ख़तरनाक था।
यहाँ ये बताना भी ज़रूरी है की विभाग पूछताछ में DM के रोल को लेकर क्या सामने आया। राजशेखर का बिना किसी को बताए भाग जाना कोई मामूली गलती नहीं थी। ये उनकी नाकामी थी जिसकी वजह से एक घायल DIG को पूरे दो घंटे तक मेडिकल हेल्प नहीं मिल पाई।
मायावती सरकार ने ये इन्क्वायरी बिठाई थी, जिसका मतलब है कीउन्हें भी अंदाज़ा था कि भीड़ की हिंसा के अलावा भी कुछ बहुत बड़ा झोल हुआ है। लेकिन DM की उस बुज़दिली और एक अफ़सर को भीड़ के बीच मरने के लिए छोड़ देने की कभी वो पब्लिक जांच नहीं हुई जो होनी चाहिए थी। ये बात भी इस पूरी कहानी का एक अहम हिस्सा है, जिसे भूला नहीं जाना चाहिए।
मायावती का एक्शन और 6 FIR
उस वक़्त यूपी में मायावती की सरकार थी। सरकार का काम करने का जो भी तरीका रहा हो, पर कम से कम कागज़ों पर तो काम हुआ। मैनाठेर हिंसा को लेकर कुल 6 FIR दर्ज की गईं।
इन केसों में उस दिन हुए हर जुर्म का ज़िक्र था- DIG पर हुआ जानलेवा हमला, पुलिस की गाड़ियों को फूंकना, थाने और चौकियों में आग लगाना, और वो पूरा दंगा। मायावती के राज में इन केसों पर धीरे-धीरे ही सही, पर काम चल रहा था। पर अफ़सोस, ये केस अगली सरकार के आने के बाद टिक नहीं पाए।
रिज़वान का रोल- वो MLA जिसने भीड़ को भड़काया
अब इससे पहले कि हम बात करें की अखिलेश यादव ने इन केसों का क्या हाल किया, एक नाम लेना बहुत ज़रूरी है- रिज़वान! समाजवादी पार्टी के तत्कालीन कुंदर के MLA।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब पुलिस ने उस आदमी (जिस पर बच्ची के साथ हुए जुर्म का असली आरोप था) को छोड़ने से साफ़ मना कर दिया, तो ये रिज़वान ही था जिसने आग में घी डालने का काम किया। कुरान का अपमान वाली जो झूठी अफ़वाह उड़ी थी, वो इसी सियासी माहौल में फैलाई गई थी, जहाँ पर्दे के पीछे इस MLA का पूरा रसूख काम कर रहा था।
ये कोई ऐसा दंगा नहीं था जहाँ लोग सच में किसी धार्मिक बात पर भड़क गए हों। ये तो पुलिस की कार्रवाई से एक अपराधी को बचाने के लिए जानबूझकर खेला गया एक ‘धार्मिक कार्ड’ था। एक चुने हुए विधायक ने सबसे भड़काऊ बात का सहारा लेकर एक सामान्य पुलिस अरेस्ट को दंगे में बदल दिया। ज़रा सोचिए, एक मुस्लिम विधायक को एक मुस्लिम कुकर्मी को बचाना था, और इसकी कीमत एक DIG को अपनी जान दांव पर लगाकर चुकानी पड़ी।
सामान्य हालात में तो इस एक बात से ही रिज़वान का पूरा पॉलिटिकल करियर खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसका उल्टा, इस बात को हमेशा के लिए दबा दिया गया।
मुलायम का मैनाठेर जाना-और बीच रास्ते में रोका जाना
समाजवादी पार्टी का इस केस से जो लगाव था, वो सिर्फ रिज़वान के लोकल सपोर्ट तक ही सीमित नहीं था। पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने तो खुद मुरादाबाद जाकर उन आरोपियों से मिलने का ऐलान कर दिया।
ज़रा इस बात की गहराई को समझिए। मुलायम सिंह यादव दंगे के पीड़ितों या घायल DIG के परिवार से मिलने नहीं जा रहे थे। वो उन आरोपियों से मिलने जा रहे थे जिन्हें भीड़ का हिस्सा होने और पुलिस स्टेशन फूंकने के आरोप में अरेस्ट किया गया था।
जब वो निकले, तो मायावती सरकार के प्रशासन ने उन्हें गाज़ियाबाद में ही रोक लिया और उनका काफ़िला आगे नहीं जाने दिया। इस पर मुलायम सिंह का रिएक्शन क्या था? वो अपने समर्थकों के साथ वहीं सड़क पर धरने पर बैठ गए और चिल्लाने लगे कि यूपी में मुसलमानों पर ज़ुल्म हो रहा है!
यानी वो लोग जिन्होंने एक IPS अफ़सर को अधमरा कर दिया था और सरकारी प्रॉपर्टी फूंक दी थी, मुलायम की नज़र में वो बेचारे ‘पीड़ित’ थे।
ये कोई गलती नहीं थी। ये एक सोची-समझी पॉलिटिकल चाल थी। समाजवादी पार्टी अपने मुस्लिम वोट-बैंक को ये मैसेज दे रही थी की हम तुम्हारे साथ खड़े हैं- कानून के साथ नहीं, सड़क पर खून से लथपथ पड़े पुलिसवाले के साथ नहीं, उस बच्ची के साथ नहीं जिसके साथ जुर्म हुआ था- बल्कि हम उस हिंसक भीड़ और उन आरोपियों के साथ खड़े हैं। और इस बात की नुमाइश वो नेशनल हाईवे पर कैमरे के सामने खुलेआम कर रहे थे।
अखिलेश सत्ता में आये और इंसाफ़ का गला घोंट दिया
मार्च 2012 में समाजवादी पार्टी यूपी में बंपर जीत के साथ सत्ता में आई। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बन गए। अब मैनाठेर के वो 6 केस (जो मायावती सरकार ने दर्ज किए थे) उस सरकार के रहम-ओ-करम पर थे जो उसी वोट-बैंक के दम पर सत्ता में आई थी, जिसके लोग इस केस में आरोपी थे।
फिर जो हुआ, वो एक झटके में नहीं हुआ, बल्कि बाकायदा सिस्टमैटिक तरीके से किया गया।
सपा सरकार ने 6 में से 5 FIR वापस ले लीं। ये वो 5 केस थे जो पुलिस की गाड़ियां जलाने, थाने फूंकने और सरकारी प्रॉपर्टी को राख करने से जुड़े थे। ये कोई छोटे-मोटे अपराध नहीं थे। किसी पुलिस स्टेशन को आग लगाना कोई आम बात नहीं होती, ये सीधे तौर पर सिस्टम के खिलाफ एक जंग होती है।
लेकिन अखिलेश सरकार में ये सारे केस चुपचाप वापस ले लिए गए। बिना किसी शोर-शराबे के। बिना कोई ऐसा कानूनी लॉजिक दिए जो अदालत में टिक सके। महज़ एक सरकार ने एक हिंसक भीड़ पर लगे 5 आपराधिक केस हवा में उड़ा दिए। और वो लोग जिन्होंने पुलिस की संपत्ति फूंकी थी, आराम से बेखौफ घूमने लगे।
जो इकलौता केस वापस नहीं लिया गया, वो था DIG अशोक कुमार सिंह पर हुए जानलेवा हमले का केस। इसे सीधे तौर पर वापस लेना शायद थोड़ा ज़्यादा ही रिस्की हो जाता, मीडिया में बवाल मचता। इसलिए सपा सरकार ने एक बहुत ही शातिर तरीका अपनाया: ‘कमज़ोर वकील’ खड़े करना।
ये भ्रष्टाचार का वो तरीका है जिसमें कोई सुबूत नहीं छूटता। कागज़ों पर सरकार केस लड़ रही होती है, लेकिन अगर सरकार जानबूझकर ऐसे निकम्मे या कमज़ोर वकील खड़े कर दे जिनका मकसद केस जीतना हो ही न, तो केस अपने आप अंदर से खोखला हो जाता है।
गवाहों से ढंग के सवाल ही नहीं पूछे गए। कोई भी सबूत दमदारी से पेश नहीं किया गया। बस तारीखों-पे-तारीखें पड़ती रहीं। साल गुज़रते गए। फाइलें धूल-वूल फांकने लगीं। सिस्टम इंसाफ़ का नाटक करता रहा और आरोपी आराम से बाहर घूमते रहे।
सपा राज में मैनाठेर केस का बस यही हश्र हुआ- ये महज़ एक नौटंकी बनकर रह गया।
सबूतों से छेड़छाड़, और फाइलों का सड़ना
सिर्फ कानूनी दांव-पेंच ही नहीं, सबूतों के साथ भी जमकर खिलवाड़ हुआ।
सपा राज के बाद वाले सालों में ये बात खुलकर सामने आई की मैनाठेर केस से जुड़ी फाइलें बस धूल खाने के लिए छोड़ दी गई थीं। और कई जगह तो कागज़ों के साथ छेड़छाड़ तक की गई थी। 2012 से 2017 के बीच यूपी के प्रशासन में सपा का जो रसूख था, उसका पूरा इस्तेमाल इस बात के लिए किया गया की ये केस कोर्ट में कभी जीता ही न जा सके।
ये कोई लापरवाही नहीं थी। छोटे-मोटे केसों में सरकारें इतनी मेहनत नहीं करतीं। इस केस को कमज़ोर करने के लिए जो भी किया गया- FIR वापस लेना, बिकाऊ वकील खड़े करना, फाइलों से छेड़छाड़- ये सब उस संगठित नेटवर्क का काम था जिसे पता था की वो क्या कर रहे हैं और किसके लिए कर रहे हैं।
मंज़ूर, हाशिम, फिरोज़, कमरुल, अली, नाज़िम, मुजीफ, यूनुस और बाकी आरोपी इसी सिस्टम का फायदा उठा रहे थे। उन्होंने एक ड्यूटी पर तैनात IPS पर जानलेवा हमला किया था। अगर कहीं और की बात होती तो उन्हें तुरंत सज़ा मिल गई होती, लेकिन यहाँ वो सालों तक आराम से बैठ कर देखते रहे की कैसे सिस्टम उनके खिलाफ बने केस को खुद ही दीमक की तरह खा रहा है।
इंसाफ का वो लंबा सफर- योगी आदित्यनाथ की अटूट जिद
मार्च 2017 में यूपी में बीजेपी की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। नई सरकार आते ही मैनाठेर केस को दोबारा ज़िंदा किया गया। लेकिन फिर भी, 16 दोषियों को उम्रकैद की सज़ा मिलने में मार्च 2026 आ गया- यानी योगी सरकार के पूरे 9 साल बाद! क्यों?
इस सवाल का ईमानदारी से जवाब देना बहुत ज़रूरी है। योगी राज में लगे इन 9 सालों की सबसे बड़ी वजह वो बर्बादी थी जो सपा सरकार ने इस केस की कर दी थी। जिस इमारत को जानबूझकर गिरा दिया गया हो, उसे दोबारा खड़ा करने में टाइम तो लगता ही है!
उन गवाहों को ढूँढना जो सालों से आरोपियों और उनके राजनीतिक आकाओं के डर के साये में जी रहे थे। उन फाइलों से सबूत जुटाना जिन्हें सड़ने के लिए छोड़ दिया गया था या जिनसे छेड़छाड़ हुई थी। 10 साल पुराने केस में सुबूतों की कड़ियाँ दोबारा जोड़ना कोई बच्चों का खेल नहीं था।
अदालत में 300 से ज़्यादा तारीखें लगीं, 22 गवाह पेश हुए, और 26 दस्तावेज़ सामने रखे गए। ये कोई सीधा-साधा केस नहीं था, बल्कि एक बर्बाद कर दिए गए केस को तिनका-तिनका जोड़कर वापस खड़ा करने की जद्दोजहद थी।
ये सज़ा मिलना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है। और घटना के 15 साल बाद जो फैसला आया है, वो अदालतों या योगी सरकार की नाकामी नहीं है-बल्कि ये 2012 से 2017 के बीच की उस सपा सरकार के मुँह पर तमाचा है जिसने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए खूंखार अपराधियों को बचाने में किया क्योंकि उसे अपना मुस्लिम वोट-बैंक खिसकने का डर था।
अखिलेश यादव के PDA का गणित और वो सवाल जो अब उठने चाहिए
आजकल अखिलेश यादव अपने PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का खूब ढिंढोरा पीटते हैं। 2027 के यूपी चुनावों के लिए ये उनका मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
लेकिन मैनाठेर का फैसला इस फॉर्मूले की असलियत पर एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।
इस PDA फॉर्मूले में ‘A’ यानी अल्पसंख्यक समुदाय के किसी आदमी के जुर्म करने पर क्या होता है? जब कोई किसी बच्ची के साथ दरिंदगी करता है, और एक भीड़ उसे बचाने के लिए धर्म के नाम पर झूठी अफ़वाह फैलाकर दंगा करती है… जब वो भीड़ एक DIG को मार-मारकर अधमरा कर देती है और पुलिस स्टेशन फूंक देती है, तो क्या PDA फॉर्मूले के तहत उन्हें खुली छूट मिल जानी चाहिए?
मैनाठेर कांड हमें यही दिखाता है की सपा का PDA असल में काम कैसे करता है- 5 FIR चुपचाप वापस ले लो, कमज़ोर वकील लगा दो, सबूत मिटा दो, और मुलायम सिंह यादव को हाईवे पर बिठाकर आरोपियों के हक़ में धरना दिलवा दो! यहाँ ‘A’ (अल्पसंख्यक) होने का मतलब ये था की आपको हर जुर्म करने की पूरी छूट है- एक ऐसी पार्टी का सपोर्ट है जो अपने वोट-बैंक के लिए पूरे क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को ही सेट कर लेगी।
ये कोई हवा-हवाई बात नहीं है, ये ऑन-रिकॉर्ड है। मैनाठेर केस तो बस एक उदाहरण है, लेकिन ये सपा की उस पूरी सोच को बेनकाब करता है जहाँ मुस्लिम समुदाय के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को ‘पॉलिटिकली गलत’ मानकर उसे दबा दिया जाता था।
अब जब सपा 2027 के लिए अपने PDA का नारा बुलंद कर रही है, तो मैनाठेर का फैसला एक पब्लिक रिकॉर्ड की तरह सामने खड़ा है। ये अब कोर्ट का साबित किया हुआ सच है की उन 16 लोगों ने एक सीनियर IPS की जान लेने की कोशिश की थी। ये कागज़ों में दर्ज है की सपा सरकार ने 6 में से 5 केस वापस लिए थे। और ये भी इतिहास का हिस्सा है कि मुलायम सिंह यादव खुद उन आरोपियों के सपोर्ट में खड़े हुए थे।
जब अखिलेश यादव रोज़ प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यूपी की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि बीजेपी सरकार फेल है, तो मैनाठेर का फैसला उनकी बातों को आईना दिखाता है। और ये आईना किसी विरोधी नेता ने नहीं, बल्कि यूपी की अदालत ने दिखाया है।
योगी के यूपी के बारे में ये फैसला क्या कहता है?
साफ शब्दों में कहें तो 2017 के बाद क्या बदला- योगी सरकार ने मैनाठेर केस खुद नहीं बनाया था। उन्हें तो एक लगभग खत्म हो चुका केस मिला था जिसे उन्होंने लड़ने का फैसला किया। आज 16 लोगों को जो उम्रकैद मिली है, वो इस बात का सुबूत है की जब सिस्टम से पॉलिटिकल प्रेशर हटा लिया जाता है, तो वो कैसे काम करता है।
सपा और योगी राज का फर्क बिल्कुल साफ है। सपा के राज में, सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल आरोपियों को बचाने के लिए हुआ। योगी राज में, उसी मशीनरी ने उन्हें सज़ा दिलवाई। सपा ने केस हराने के लिए बिकाऊ वकील खड़े किए। योगी सरकार ने एक-एक गवाह, एक-एक कागज़ और एक-एक तारीख के ज़रिए (पूरे 300 हियरिंग्स में) वो केस दोबारा ज़िंदा किया।
वो DIG अशोक कुमार सिंह- जो उस हमले में बच गए और आज ADG रैंक तक पहुँचकर लखनऊ में तैनात हैं- उन्होंने आख़िरकार इंसाफ़ की शक्ल देख ही ली। 15 साल की देरी से ही सही, पर इंसाफ़ मिला। वो दो घंटे जो उन्होंने डिंगरपुर की सड़क पर खून से सने हुए बिताए थे, जब उनका DM उन्हें मरने के लिए छोड़कर भाग गया था- वो चीखें खाली नहीं गईं।
मैनाठेर की उस घटना को इतिहास के भूले-बिसरे पन्नों में कभी नहीं खोने देना चाहिए। ये इस बात की एक कड़वी और डरावनी केस स्टडी है की जब भीड़ की हिंसा और गुंडागर्दी को बचाने के लिए “सेक्युलरिज्म” को एक कानूनी ढाल बना दिया जाता है, तो असल में होता क्या है।
ये अखिलेश यादव जैसे नेताओं की पोल खोल देता है जो सिर्फ अपने एक लोकल मुस्लिम वोट बैंक को पक्का करने के लिए टॉप पुलिस अफसरों की जान और एक पीड़िता की इज्जत को भी हंसते-हंसते दांव पर लगा देते।
जैसे-जैसे यूपी भविष्य की तरफ बढ़ रहा है, और खासकर 2027 के अहम विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, हिंदू बहुसंख्यक समाज और शांति चाहने वाले हर नागरिक को मैनाथर का वो खौफनाक मंंजर याद रखना ही होगा।
जब अखिलेश यादव अपनी उस “PDA” वाली राजनीति का चूरन बेचें, तो वोटरों को याद आना चाहिए वो जलते हुए थाने, जान बचाकर भागते हुए कांस्टेबल, और उस DIG का वो खून से लथपथ शरीर जिसे एक मुस्लिम भीड़ ने मरा हुआ समझकर सड़क पर छोड़ दिया था।
ये ‘PDA’ का मॉडल कुछ और नहीं है, बस उस “गुंडाराज” को छुपाने का एक मीठा सा नाम है जहां एक खास समुदाय के मुजरिमों का कानून भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
आज यूपी की जनता चैन की नींद सोती है क्योंकि अब राज्य उनके हाथ में नहीं है जो मुस्लिम दंगाइयों के लिए आंसू बहाने के लिए गाज़ियाबाद की सड़कों पर धरना देकर बैठ जाते थे। आज यूपी को एक ऐसा मुख्यमंत्री चला रहा है जो ये पक्का करता है की अगर किसी ने भी राज्य का माहौल ख़राब करने की कोशिश करी, तो उसे इंसाफ के उस सख्त और अड़ियल डंडे का सामना करना पड़ेगा।
भीड़ के आगे घुटने टेकने का वो दौर अब दफ़न हो चुका है। इंसाफ के बुलडोजर ने सारी ज़मीन समतल कर दी है, और मैनाठेर के उन मुजरिमों को आखिर ये समझ आ ही गया है की योगी के यूपी में कानून किसी को नहीं बख्शता, और तुम्हारा सियासी मुस्लिम वोट बैंक तुम्हें तुम्हारे गुनाहों की सज़ा से नहीं बचा सकता।
