1967 में चीन को खदेड़ा, 1971 में पाकिस्तान के किए दो टुकड़े — भारत के प्रथम फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को नमन

दुनिया में कुछ शहर ऐसे हैं जो संतों को जन्म देते हैं, कुछ कवियों को और कुछ दार्शनिकों को। लेकिन 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर के शहर ने भारतीय उपमहाद्वीप को कुछ ऐसा दिया जो उसकी रूह में हमेशा के लिए छप जाने वाला था- एक असली योद्धा। उनका पूरा नाम ‘सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ’ था। लेकिन दुनिया उन्हें एक बेहद दमदार और सीधे नाम से जानने वाली थी- सैम बहादुर।

आज, 3 अप्रैल को, जब भारत उनकी 112वीं जयंती मना रहा है, तो हमें ये जान लेना चाहिए की भारत की सभ्यता सिर्फ साधुओं के आश्रमों या कवियों की कविताओं तक ही सीमित नहीं है। ये हमारे जवानों की रगों में भी उतनी ही शिद्दत से दौड़ती है। सैम मानेकशॉ उसी सभ्यता का जीता-जागता रूप थे।

अपने चालीस साल से भी लंबे मिलिट्री करियर में, उन्होंने तीन महाद्वीपों में पांच युद्ध लड़े और कभी हार का मुंह नहीं देखा। कहाँ तो वो एक जिद्दी बच्चे थे जो बस यूं ही किस्मत के फेर से फौज में आ गए थे, और कहाँ वो भारत के पहले और सबसे चहेते फील्ड मार्शल बन गए- देश का सबसे ऊंचा फौजी सम्मान।

आज़ादी के बाद के सबसे बड़े भारत-पाकिस्तान युद्ध की जीत के असली सूत्रधार वही तो थे। ये वो इंसान था जिसने एक प्रधानमंत्री के मुंह पर सीधा कह दिया था की देश अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं है। और जब सही वक़्त आया, तो उन्होंने सिर्फ जीत ही नहीं दिलाई- बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक जीत दिलाई जिसने दक्षिण एशिया का नक्शा हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।

“एक प्रोफेशनल फौजी अच्छी तरह जानता है की जंग का मतलब है लोगों का मारा जाना, उनका अपाहिज होना, और परिवारों का अनाथ हो जाना। आप बस यही कोशिश कर सकते हैं की वो परिवार सामने वाले का हो।”

– फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

सैम मानेकशॉ की शुरुआती ज़िंदगी- एक छोटी सी उम्र की बगावत से शुरू हुई सैम के फौजी बनने की वो ज़बरदस्त दास्तान

सैम मानेकशॉ एक पारसी परिवार में पैदा हुए। ये समुदाय भी किसी भी दूसरे भारतीय समुदाय की तरह ही है, लेकिन अनुशासन, पढ़ाई-लिखाई और एक खामोश ईमानदारी इनकी रग-रग में बसी है। उनके पिता, डॉ. होर्मुसजी मानेकशॉ, एक डॉक्टर थे- एकदम उसूलों वाले इंसान। मां, हीराबाई, गुजरात के वलसाड से थीं। परिवार उत्तर की तरफ पंजाब आ गया और अमृतसर में बस गया।

छोटा सैम वैसे ही बड़ा हुआ जैसे ज़्यादातर होशियार और बेचैन बच्चे होते हैं- जिज्ञासु, अपनी बात पर अड़े रहने वाला, और दुनिया की उम्मीदों से हमेशा थोड़ा उल्टी दिशा में चलने वाला। नैनीताल के जाने-माने शेरवुड कॉलेज से उन्होंने पढ़ाई की। यहीं उनके अंदर वो तेज़ दिमाग, फिजिकल अनुशासन और लीडरशिप की वो खूबी पनपी जो आगे चलकर उनकी पहचान बनने वाली थी। 

इसके बाद वो अमृतसर के हिंदू सभा कॉलेज गए। पंद्रह साल की उम्र तक कैम्ब्रिज बोर्ड के स्कूल सर्टिफिकेट एग्जाम में डिस्टिंक्शन ला चुके थे- उस ज़माने में ये कोई छोटी बात नहीं थी।

पिता का सपना था की सैम लंदन जाकर डॉक्टरी पढ़ें। लेकिन लड़के के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था, हालांकि शुरू में फौज का तो कोई इरादा नहीं था। जब पिता ने छोटी उम्र का हवाला देते हुए उन्हें लंदन भेजने से साफ मना कर दिया, तो सैम ने छोटी उम्र की बगावत में वो कदम उठाया जो इतिहास के सबसे शानदार फैसलों में से एक साबित हुआ। 

उन्होंने देहरादून में नई-नई खुली इंडियन मिलिट्री अकादमी (IMA) का एंट्रेंस एग्जाम देने की ठान ली। IMA तब इसलिए ही बनी थी ताकि भारतीयों को ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कमीशंड ऑफिसर बनने का मौका मिल सके, जो उससे पहले सिर्फ अंग्रेजों का हक़ माना जाता था।

1 अक्टूबर 1932 को, सैम मानेकशॉ IMA में सिर्फ उन पंद्रह कैडेट्स में से एक के रूप में दाखिल हुए, जिन्हें ओपन कॉम्पिटिशन से चुना गया था- उनका मेरिट में छठा नंबर था। ये वो बैच था जिसे एकेडमी बाद में ‘द पायनियर्स’ कहने वाली थी- भारतीय सैन्य कैडेट्स का एकदम पहला बैच। 

उनके साथ कुछ ऐसे लोग भी थे जो बाद में जाकर पूरे उपमहाद्वीप में सेनाओं का नेतृत्व करने वाले थे, जैसे बर्मा और पाकिस्तान के भावी सेनाध्यक्ष। जो चालीस कैडेट्स इस कोर्स में शामिल हुए, उनमें से सिर्फ बाईस ही इसे पूरा कर पाए। सैम उनमें से एक थे। 1 फरवरी 1935 को वो ग्रेजुएट हुए और 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की चौथी बटालियन में सेकंड लेफ्टिनेंट बन गए।

उनके पिता, वो जो ये सब रोकना चाहते थे, आखिरकार बेटे की ज़िद के आगे झुक गए। सालों बाद, जब वही लड़का फील्ड मार्शल बना, तो शायद उस बूढ़े डॉक्टर को भी एहसास हो गया होगा की कभी-कभी बगावत असल में किस्मत का ही दूसरा नाम होती है।

बर्मा के जंगलों में गोलियों से छलनी सैम का मौत को हराकर मिलिट्री क्रॉस जीतना

दूसरा विश्व युद्ध दुनिया भर में एक सूनामी की तरह आया, और लाखों लोगों के साथ जवान सैम भी इसकी लहरों में खिंचे चले गए। भारत के बेटों को एक ऐसी जंग में झोंक दिया गया जो उनकी थी ही नहीं। एक ऐसे साम्राज्य को बचाने के लिए जो खुद उन्हें आज़ादी देने को राज़ी नहीं था। उन सालों में लड़ने और जान गंवाने वाले सैनिक इस विडंबना को अच्छी तरह समझते थे। फिर भी वो लड़े। 

वो ब्रिटेन के ताज के लिए नहीं लड़े, बल्कि अपनी वर्दी की इज़्ज़त, अपने साथ लड़ने वाले भाइयों की हिफ़ाज़त और इस पक्के भारतीय विश्वास के लिए लड़े की एक योद्धा का फ़र्ज़ हर हाल में पवित्र होता है, चाहे राजनीति कुछ भी हो।

सैम को जापानी सेना के खिलाफ चल रहे एलाइड अभियान के तहत बर्मा (आज का म्यांमार) भेजा गया। बर्मा के उन्हीं जंगलों और नदियों के बीच अमृतसर का ये लड़का हमेशा के लिए एक असली फौजी बन गया। 

सबसे बड़ा पल 22 फरवरी 1942 को आया, जब सितांग ब्रिज की लड़ाई चल रही थी- बर्मा कैंपेन की सबसे खूनी जंगों में से एक। तब वो कैप्टन थे, और अपनी कंपनी को जापानी ठिकानों पर हमले के लिए लीड कर रहे थे। इसके बाद जो हुआ वो किसी डरावने सपने जैसा भी था और लेजेंड बनने की कहानी भी।

उन्हें कई गोलियां लगीं। घाव जानलेवा थे- उनका पेट और फेफड़े छलनी हो चुके थे। डॉक्टरी नज़रिए से देखें तो सैम को उसी मैदान में दम तोड़ देना चाहिए था। लेकिन उन्होंने लड़ना नहीं छोड़ा। वो अपने आदमियों को तब तक आगे बढ़ाते रहे जब तक शरीर ने पूरी तरह जवाब नहीं दे दिया और वो गिर नहीं पड़े। उन्होंने वो ज़मीन अपने खून से जीती थी।

घायलों की अंतहीन कतारों का इलाज करते-करते थक चुके एक ब्रिटिश सर्जन ने जब उनसे पूछा की ये सब कैसे हुआ, तो मौत के मुंह में खड़े इस कैप्टन ने ऊपर देखा और कहा: ‘एक खच्चर ने लात मार दी यार।’ सर्जन भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया और बोला, ‘तुम्हारे इस मज़ाकिया अंदाज़ की दाद देनी पड़ेगी। मुझे लगता है तुम्हें बचाना ही पड़ेगा।’

और सच में उन्हें बचाना ज़ायज़ था। सितांग ब्रिज पर उनकी बेमिसाल बहादुरी और लीडरशिप के लिए सैम को ‘मिलिट्री क्रॉस’ से नवाज़ा गया- जो युद्ध के मैदान में बहादुरी का सबसे बड़ा सम्मान है। उनकी इन्फेंट्री डिवीज़न के कमांडिंग ऑफिसर, मेजर जनरल डेविड कोवान उन पर इतने फिदा थे की उन्होंने अपनी वर्दी से खुद का मिलिट्री क्रॉस रिबन उतारा और सैम की वर्दी पर लगा दिया। 

सैम ठीक हुए, फिर से ड्यूटी पर लौटे, और फिर से घायल हुए- ये एक ऐसी बात है जिसे कहानी में शायद ही कोई याद रखता है, क्योंकि चोट और दर्द सहना तो उनकी आदत सी बन गई थी।

लकीरों से बंटा देश, लेकिन सरहदों को मिला सैम बहादुर नाम का एक निडर रक्षक

अगस्त 1947 अपने साथ आज़ादी भी लाया और बंटवारे का दर्द भी। भारत का बंटवारा बीसवीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था। लाखों लोग बेघर हुए, हज़ारों मारे गए, और लंदन में खींची गई चंद लकीरों ने एक पूरी सभ्यता को फाड़ दिया। फौजें भी बंटीं। सैम की 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट नए बने पाकिस्तान के हिस्से में चली गई। सैम मानेकशॉ का ट्रांसफर 8वीं गोरखा राइफल्स में कर दिया गया।

ये ट्रांसफर इतिहास के पन्नों में एक अहम मोड़ साबित होने वाला था। गोरखा जवानों ने- जो दुनिया के सबसे बेहतरीन लड़ाकों में गिने जाते हैं- अपने नए कमांडर को दिल से अपना लिया। उन्होंने ही उन्हें ‘बहादुर’ का नाम दिया। ये कोई ऑफिशियल टाइटल नहीं था। ये तो उन जवानों का अपने कमांडर के लिए प्यार था, जिस पर वो अपनी जान से भी ज़्यादा भरोसा करते थे। बस उसी पल से, वो सैम बहादुर बन गए- बैर्कों में, अखबारों में, और पूरे देश के दिलों में।

आज़ादी के शुरुआती सालों ने इस नई सेना का कड़ा इम्तिहान लिया। अभी आज़ादी के कागज़ों पर स्याही सूखी भी नहीं थी की कश्मीर को लेकर 1947 का भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ गया। इस लड़ाई के दौरान भारतीय सैन्य अभियानों की प्लानिंग और रणनीतिक दिशा तय करने में मानेकशॉ ने बहुत बड़ा रोल निभाया। वो उसी वक़्त हैदराबाद संकट में भी शामिल थे- वो ऑपरेशन जिसने निज़ाम की रियासत को भारतीय संघ का हिस्सा बनाया।

ये साल सिर्फ जंग लड़ने के नहीं, बल्कि संस्थाओं को खड़ा करने के भी थे। भारत को अपनी एक ऐसी फौज चाहिए थी जो पूरी तरह से उसकी अपनी हो- अंग्रेजों की कोई बची-खुची या नक़ल की हुई फौज नहीं, बल्कि एक ऐसी सेना जिसकी अपनी पहचान हो, प्रोफेशनल गौरव हो और सोच मॉडर्न हो। सैम इस बात को अच्छी तरह समझते थे। वो अपनी शानदार रणनीति, करिश्माई व्यक्तित्व और प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स से समझौता न करने की ज़िद्द के दम पर रैंकों में लगातार ऊपर चढ़ते गए।

रैंकों में सफर- मानेकशॉ की शिखर तक पहुंचने की राह

1950 के दशक और 60 के शुरुआती सालों में सैम ने कमांड और स्टाफ का इतना गहरा तजुर्बा हासिल कर लिया था की वो सबसे अलग नज़र आने लगे थे। मई 1953 में उन्हें 8वीं गोरखा राइफल्स का कर्नल नियुक्त किया गया।

फिर उन्होंने डिफेंस सर्विसेज़ स्टाफ कॉलेज के कमांडेंट का पद संभाला- एक ऐसी ज़िम्मेदारी जिसने उन्हें सीधे उस जगह लाकर खड़ा कर दिया जहां से इंडियन आर्मी के ऑफिसर्स की ट्रेनिंग और उनका भविष्य तय होता था। इसके बाद उन्होंने 26वीं इन्फेंट्री डिवीज़न के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (GOC) के तौर पर काम किया, जिससे उन्हें बड़े ऑपरेशन्स का वो अनुभव मिला जो हाई कमांड के लिए ज़रूरी होता है।

खैर, इसी दौरान सैम का सामना मिलिट्री लाइफ़ की एक बेहद भद्दी सच्चाई से हुआ: राजनीति! 1962 में, जब भारत चीन के साथ एक विनाशकारी युद्ध की ओर बढ़ रहा था- एक ऐसा युद्ध जिसने सेना में नेताओं की बेवजह दखलअंदाज़ी की पोल खोल कर रख दी- तब सैम को एक मनगढ़ंत देशद्रोह के मामले में फंसा दिया गया।

आरोप बिल्कुल बेबुनियाद थे। इसके पीछे सिर्फ ब्यूरोक्रेसी और गुटबाज़ी का हाथ था। आखिर में वो पूरी तरह बेदाग साबित हुए, लेकिन नुकसान तो हो ही चुका था। इस पूरे ड्रामे की वजह से वो 1962 की जंग में हिस्सा नहीं ले सके। भारत को अपने सबसे बेहतरीन फौजी के बिना ही चीन से भिड़ना पड़ा।

चीन के हाथों 1962 की हार भारत की राष्ट्रीय यादों में आज भी एक गहरे ज़ख्म की तरह है। और सच पूछें तो ये हार हमारे जवानों की बहादुरी में कमी की वजह से नहीं थी, बल्कि ऊपर बैठे नेताओं की दखलअंदाज़ी, बिना तैयारी के जंग में उतरने और खराब रणनीतियों का नतीजा थी।

सैम ने इससे जो सबक सीखा, उसे उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी गांठ बांध कर रखा- फौजियों को अपना काम करने दो। उन्हें रिसोर्स दो, टाइम दो, तैयारी करने दो- और फिर पीछे हट जाओ। ये वो सबक था जिसे नौ साल बाद वो खुद दुनिया को अपनी ज़बरदस्त कामयाबी से सिखाने वाले थे।

1967 में सैम मानेकशॉ के उस करारे पलटवार ने नाथू ला में तोड़ दिया था चीन का गुरूर

1963 तक आते-आते, मानेकशॉ आर्मी कमांडर बन चुके थे और वेस्टर्न कमांड की ज़िम्मेदारी संभाल रहे थे। 1964 में उनका ट्रांसफर ईस्टर्न कमांड में कर दिया गया- ये वो फ्रंटलाइन थी जहां चीन के साथ हिमालयी सीमा का विवाद लगातार सुलग रहा था। यहीं पर, सितंबर 1967 में एक ऐसा पल आया जिसने बहुत कुछ बदल कर रख दिया- सिक्किम के नाथू ला और चो ला की झड़पें।

इसका बैकग्राउंड समझना बहुत ज़रूरी है। 1962 की बेइज़्ज़ती के पांच साल बाद भी, हिमालयी सरहदों पर भारत का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ था। चीनी सेना बॉर्डर पर लगातार आक्रामक हो रही थी, हमें तंग कर रही थी और डराने की कोशिश कर रही थी।

जब चीनी सैनिकों ने नाथू ला और बाद में चो ला के विवादित इलाकों में घुसपैठ शुरू की, तो मानेकशॉ की कमांड वाली भारतीय सेना पीछे नहीं हटी, डरी नहीं और न ही घुटने टेके। उन्होंने पलटवार किया, और जीत भी हासिल की।

आज़ादी के बाद चीन के खिलाफ ये भारत की पहली साफ़ जीत थी। चीनी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उन्हें खदेड़ दिया गया। भले ही ये बड़ी लड़ाई नहीं थी, लेकिन रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक रूप से इसके मायने बहुत बड़े थे।

इसने भारत, चीन और पूरी दुनिया को ये संदेश दे दिया की 1967 की इंडियन आर्मी अब 1962 वाली सेना नहीं रही। कुछ तो बदल गया था। किसी ने तो इस हवा का रुख मोड़ दिया था। और वो इंसान सैम मानेकशॉ ही थे।

सैम का वो जिगरा जब उन्होंने प्रधानमंत्री को युद्ध के लिए सीधे ‘ना’ कह दिया था

1969 में, सैम मानेकशॉ भारतीय सेना के सातवें चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बने- सेना का सबसे बड़ा ओहदा। वो आर्मी हेडक्वार्टर में अपनी उसी बेबाकी, गज़ब के प्रोफेशनलिज़्म और ‘जीरो टॉलरेंस’ वाले रवैये के साथ आए थे। उन्हें ना तो निकम्मापन बर्दाश्त था और ना ही मिलिट्री के मामलों में राजनीति का कोई दखल। उनके इन उसूलों का सबसे बड़ा टेस्ट अभी बाकी था।

1971 की शुरुआत तक पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) जल रहा था। पाकिस्तानी सेना के ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ ने बीसवीं सदी के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक को जन्म दे दिया था। लाखों रिफ्यूजी बॉर्डर पार करके भारत में घुस रहे थे। इंटरनेशनल प्रेशर बढ़ रहा था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार पर तुरंत एक्शन लेने का दबाव था।

इंदिरा गांधी ने मानेकशॉ को बुलाया और सीधे शब्दों में पूछा: क्या हम अभी युद्ध के लिए जा सकते हैं? सैम का जवाब जितना साफ़ था, उतना ही हिम्मत भरा भी। उन्होंने कहा, ‘नहीं प्रधानमंत्री जी। सेना तैयार नहीं है।’ मानसून की वजह से टैंकों का चलना नामुमकिन था। हथियारों की सप्लाई चेन मज़बूत करनी थी।

मुक्ति वाहिनी (बंगाली लड़ाकों) को हथियार और ट्रेनिंग देने के लिए टाइम चाहिए था। जल्दबाज़ी में लड़ी गई जंग का मतलब सिर्फ हार था। कहते हैं की उन्होंने मिसेज गांधी को सीधे बोल दिया था- ‘प्रधानमंत्री जी, अगर आप मुझे अभी युद्ध में उतरने को कहेंगी, तो मैं आपको पक्की हार की गारंटी देता हूं।’

कोई और इंसान होता- जिसे देश से ज़्यादा अपने करियर की फिक्र होती- तो शायद प्रधानमंत्री को वही जवाब देता जो वो सुनना चाहती थीं। लेकिन सैम ने उन्हें वो बताया जो भारत के लिए सुनना ज़रूरी था। और इंदिरा गांधी की भी दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने ये बात मानी। सैम को वो वक़्त मिल गया जो उन्होंने मांगा था। 

उन्होंने उस एक-एक दिन का इस्तेमाल बेहतरीन और पुख्ता तैयारी में किया। मुक्ति वाहिनी को एक असली लड़ाकू फोर्स में तब्दील कर दिया गया। राशन और हथियारों का स्टॉक जमा किया गया। एक साथ कई मोर्चों पर हमले की गज़ब की टैक्टिकल प्लानिंग की गई। इंडियन एयरफोर्स और नेवी को भी इस वॉर प्लान का हिस्सा बनाया गया। 

और सबसे बड़ी बात, मानेकशॉ ने जंग के लिए दिसंबर का महीना चुना- मानसून के बाद का वो वक़्त जब हिमालय के दर्रे बर्फ से बंद हो जाते हैं, ताकि चीन दखल न दे सके, और मौसम भी भारतीय टैंकों और एयरपावर के लिए एकदम सही हो।

1971 युद्ध के उन 13 दिनों में सैम बहादुर ने बदल कर रख दिया था पाकिस्तान और दुनिया का नक्शा

3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल कर दी। उसकी एयरफोर्स ने पश्चिम में भारत के हवाई अड्डों पर अचानक हमले कर दिए। लेकिन इससे उल्टा भारत को वो बहाना मिल गया जिसकी उसे तलाश थी। इंदिरा गांधी ने ऐलान कर दिया की भारत अब युद्ध में है। सैम मानेकशॉ की महीनों की तैयारी अब टेस्ट होने वाली थी।

इसके बाद के तेरह दिनों में जो हुआ, वो मॉडर्न वॉरफेयर की एक मास्टरक्लास थी- तेज़, हर तरफ से मार करने वाली और जानलेवा। पूर्वी मोर्चे पर, भारतीय सेना कई दिशाओं से एक साथ पूर्वी पाकिस्तान के अंदर तक घुस गई। ग्राउंड फोर्सेज के साथ एयरफोर्स ने ऐसा तालमेल बिठाया की ढाका के ऊपर पाकिस्तान की हवाई ताक़त पल भर में तबाह हो गई। 

इंडियन नेवी ने पूर्वी पाकिस्तान के बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी, जिससे समंदर के रास्ते भागने का हर रास्ता बंद हो गया। रणनीति सिर्फ पाकिस्तान से लड़ने की नहीं थी; बल्कि उसे घेरने, अलग-थलग करने और पूरी पाकिस्तानी मिलिट्री को घुटनों पर लाने की थी।

पश्चिमी मोर्चे पर भी भारतीय सेना और एयरफोर्स ने पाकिस्तान के हमलों का डटकर सामना किया, ज़बरदस्त काउंटर-अटैक किए और यह सुनिश्चित किया की पश्चिम में मामला कंट्रोल में रहे ताकि पाकिस्तान वहां कोई प्रेशर बनाकर पूरब में हो रही अपनी तबाही से ध्यान न भटका सके।

सैम नई दिल्ली के आर्मी हेडक्वार्टर में बैठे-बैठे ये सब मॉनिटर कर रहे थे, अपने फील्ड कमांडरों से लगातार संपर्क में थे, और अपनी पूरी अथॉरिटी और तेज़ दिमाग से इस जंग को आगे बढ़ा रहे थे।

16 दिसंबर 1971- ये वो तारीख़ है जो भारतीय इतिहास में ‘विजय दिवस’ के रूप में हमेशा के लिए दर्ज़ हो गई। पाकिस्तानी ईस्टर्न कमांड के चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाज़ी ने ढाका में सरेंडर के कागज़ात पर दस्तख़त कर दिए। उनके साथ लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए। 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ये दुनिया का सबसे बड़ा मिलिट्री सरेंडर था, और एकदम मुकम्मल था। बांग्लादेश का जन्म हुआ। दक्षिण एशिया के भूगोल में एक नई हक़ीक़त रच दी गई थी, और इसे अंजाम देने वाला अमृतसर का वही पारसी फौजी था जो कभी डॉक्टर बनना चाहता था।

इस जीत की रफ़्तार और इसके असर ने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया। युद्ध की शुरुआत से लेकर पाकिस्तान के सरेंडर तक: सिर्फ तेरह दिन। मिलिट्री के जानकार आज भी 1971 के इस अभियान को जॉइंट ऑपरेशन्स, मोर्चेबंदी की रफ़्तार और रणनीतिक तैयारी के एक मॉडल के तौर पर पढ़ते हैं।

और इन सबके केंद्र में हमेशा एक ही चेहरा था- सैम मानेकशॉ। वो इंसान जिसने जल्दबाज़ी करने से साफ इनकार कर दिया था, जिसने हर छोटी-छोटी चीज़ की बारीकी से तैयारी की और फिर उसी परफेक्शन के साथ उसे अंजाम तक पहुंचाया।

1971 के बाद भारत एक पूरी तरह से बदला हुआ देश बन चुका था। अब ये कोई ऐसा बड़ा और गरीब लोकतंत्र नहीं था जो अपनी पहचान के लिए जूझ रहा हो। ये वो देश था जिसने अपनी सामरिक इच्छाशक्ति और सैन्य ताक़त के दम पर पूरे उपमहाद्वीप का नक्शा बदल दिया था।

अमेरिका और चीन जैसे देश, जो जंग के दौरान भारत के खिलाफ थे, उन्हें भी अब दक्षिण एशिया की इस नई हक़ीक़त को मानना पड़ा। सैम ने भारत को सिर्फ एक फौजी जीत ही नहीं दी थी, बल्कि उसे रणनीतिक तौर पर एक नया आत्मविश्वास भी दिया था।

हर मिलिट्री नियम से ऊपर उठकर सैम मानेकशॉ बने भारत के पहले फील्ड मार्शल

1 जनवरी 1973 को, सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ को फील्ड मार्शल के पद पर प्रमोट किया गया। इंडियन आर्मी का सबसे ऊंचा पद। आज़ाद भारत के इतिहास में ये 5-स्टार रैंक सिर्फ दो ही अफसरों को मिली है। दूसरे थे जनरल के.एम. करियप्पा, जो आज़ादी के बाद भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ थे।

फील्ड मार्शल का पद कोई रूटीन प्रमोशन नहीं होता। ये एक रुतबा है- देश की तरफ से एक ऐलान की उसके किसी सिपाही ने इतनी बड़ी और ऐतिहासिक सेवा की है जिसे सेना के आम नियम-कानूनों में नहीं बांधा जा सकता। सैम मानेकशॉ के मामले में ये रैंक सिर्फ उनके हक़ की ही बात नहीं थी; बल्कि बहुत से लोगों का मानना था की ये बहुत पहले ही मिल जानी चाहिए थी। 

कुछ लोगों का तो ये भी कहना है की सियासत की वजह से इस सम्मान में देरी हुई, और जब ये मिला तो ये उनकी महानता के जश्न के साथ-साथ उनके साथ हुई नाईंसाफी को सुधारने का भी एक तरीका था।

वक़्त चाहे जो भी रहा हो, इसका मैसेज बहुत पावरफुल था। भारत आधिकारिक रूप से ये बता रहा था की देश किसी फौजी को जो सबसे बड़ा सम्मान दे सकता है, सैम बहादुर आज उसी शिखर पर खड़े हैं। ये राष्ट्रीय गर्व का एक ऐसा पल था जिसने साबित किया की हमारा गणतंत्र अपने असली हीरो को पहचानना और उनका सम्मान करना जानता है।

पद्म भूषण, पद्म विभूषण, और अनगिनत फौजी सम्मानों के साथ सैम बहादुर की देश के दिलों पर कायम वो सल्तनत

सैम मानेकशॉ को देश और इतिहास से जो सम्मान मिले, उनका ऑफिशियल रिकॉर्ड कुछ इस तरह है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सितांग ब्रिज की लड़ाई में बेमिसाल बहादुरी के लिए ‘मिलिट्री क्रॉस’- एक ऐसा सम्मान जो सीधे एक कमांडिंग जनरल ने अपने हाथों से उनकी वर्दी पर लगाया। 

नगालैंड और मिज़ोरम में उग्रवाद को कंट्रोल करने के लिए 1968 में भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’। 1972 में ‘पद्म विभूषण’- दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान। और सबसे बढ़कर, 1973 में ‘फील्ड मार्शल’ की रैंक।

लेकिन इन सरकारी सम्मानों से परे, सांस्कृतिक तौर पर भी उन्हें कम पहचान नहीं मिली। मशहूर नॉवेलिस्ट सलमान रुश्दी ने अपनी बुकर प्राइज़ जीतने वाली किताब ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ के एक चैप्टर ‘सैम और टाइगर’ में उन्हें हमेशा के लिए अमर कर दिया। 

16 दिसंबर 2008 को, तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया, जिस पर वो फील्ड मार्शल की वर्दी में थे- और ये भी विजय दिवस यानी पाकिस्तान के सरेंडर वाले दिन ही रिलीज़ किया गया।

और फिर 2023 में आई बॉलीवुड फिल्म ‘सैम बहादुर’, जिसमें विक्की कौशल ने उनका किरदार निभाया, ने इस कहानी को इंडियन्स की उस नई पीढ़ी तक पहुंचाया जो इस लेजेंड के नाम से तो वाकिफ थी लेकिन असली इंसान से नहीं।

नीलगिरि की वादियों में सैम बहादुर की आखिरी नींद

27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित मिलिट्री अस्पताल में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का निधन हो गया। वजह निमोनिया थी। वो 94 साल के थे। उन्होंने भारत को एक परमाणु ताकत बनते देखा, और उस देश को- जिसे उन्होंने कभी टूटने से बचाया था- एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनते हुए भी देखा।

अपने आखिरी दिनों में उन्हें वो भरपूर प्यार मिला जो बड़े देश अक्सर अपने उन हीरोज के लिए बचा कर रखते हैं, जिनकी अहमियत उन्हें बाद में ही सही, लेकिन समझ आ जाती है।

कहते हैं की वहां मौजूद मेडिकल स्टाफ से उनके आखिरी शब्द थे- ‘आई एम ओके (मैं ठीक हूँ)।’ मौत की दहलीज़ पर खड़े होकर भी सैम बहादुर अपने आस-पास के लोगों को तसल्ली ही दे रहे थे।

उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ नीलगिरि की पहाड़ियों में ऊटी के पारसी कब्रिस्तान में दफनाया गया- अपनी प्यारी पत्नी सीलू के ठीक बगल में। तमिलनाडु की जिन पहाड़ियों ने उनके आखिरी सालों में उन्हें पनाह दी थी, अब उन्होंने सैम को हमेशा के लिए अपनी गोद में सुला लिया था।

भारत माता की सेनाओं ने इतिहास के हर दौर में एक से बढ़कर एक महान योद्धा पैदा किए हैं। लेकिन सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ- सैम बहादुर- एक ऐसे मुकाम पर खड़े हैं जहां बस वो हैं और सिर्फ वो हैं। जब तक भारत रहेगा, वो इस देश के सबसे चहेते फौजी बनकर हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे।

जय हिंद। जय भारत।

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