युवा वोट से बनती हैं सरकारें, फिर संसद में शिक्षित युवाओं की आवाज क्यों कुचल दी जाती है?

भारत एक युवा देश है। यहां की आधी से ज़्यादा (करीब 65%) आबादी 35 साल से कम उम्र की है। और औसत उम्र सिर्फ 28 साल है। आज स्टार्टअप्स हों, व्यावसायिक ऑफिस हों या फिर क्रिकेट का मैदान- हर जगह हमारे युवा दुनिया को टक्कर दे रहे हैं और जीत भी रहे हैं।

लेकिन ज़रा लोकसभा, किसी भी राज्य की विधानसभा या बड़ी पार्टियों की जड़ में झांककर देखिए। वहां आपको ऐसे नेता भरे मिलेंगे जो उम्र में इन युवाओं के दादा-दादी के बराबर हैं। इनमें से कई तो उस दौर की राजनीति में पले-बढ़े हैं, जो भारत अब वजूद में ही नहीं है।

और सच कहूं तो, यह सिर्फ देखने में अजीब लगने वाली बात नहीं है। यह सीधे-सीधे गवर्नेंस का एक ऐसा संकट है, जो हमारे ठीक सामने है लेकिन हम उसे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं।

होता क्या है की हर पांच साल में, चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या कोई भी क्षेत्रीय दल- सब के सब युवाओं को आगे बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे करते हैं। होर्डिंग्स पर युवाओं के चमकते चेहरे लगा दिए जाते हैं। यूथ विंग बना दिए जाते हैं। टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर पार्टी का पक्ष रखने के लिए फर्राटेदार बोलने वाले युवा नेताओं को आगे कर दिया जाता है। 

लेकिन… जब बात उस एक चीज़ की आती है जो असल में मायने रखती है- यानी चुनाव लड़ने के लिए टिकट बांटने की- तो इन्हीं युवाओं को समझ आता है की  टिकट का उनकी काबलियत, पढ़ाई-लिखाई या जनता के बीच उनकी पकड़ से कोई लेना-देना ही नहीं है।

टिकट का सारा खेल तो जातियों के गुणा-भाग, वफादारी, गठबंधन के समीकरण और पैसे की ताकत पर टिका है।

आपने आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा का नाम तो सुना ही होगा। वो चार्टर्ड अकाउंटेंट, राज्यसभा सांसद और अपनी पीढ़ी के सबसे शानदार वक्ताओं में से एक हैं। लेकिन आज उस पार्टी में उनका कद लगातार घटाया जा रहा है, जिसने कभी एक ‘क्लीन’ राजनीति करने का दावा किया था। 

दूसरे नाम सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा नेताओं के हैं, जिनकी काबिलियत ऐसी थी की उन्हें उनकी पार्टियों ने ‘पोस्टर बॉय’ बनाना चाहिए था, लेकिन ऊँचे पदों में बैठे नेताओं ने इन युवाओं को बस ठेंगा दिखा के बैठा दिया। 

इन लोगों की कहानियां सिर्फ इनका निजी नुकसान नहीं हैं। ये दिखाती हैं की  भारतीय राजनीतिक पार्टियां अपने युवाओं के साथ जो कर रही हैं, उसमें बुनियादी तौर पर कितना बड़ा झोल है।

राघव चड्ढा- एक तेज़-तर्रार युवा आवाज़, जिसे खुद उनकी AAP पार्टी ने ‘म्यूट’ करके कोने में बिठा दिया

2013 में जब आम आदमी पार्टी (AAP) नेशनल राजनीति में आई, तो उसने साफ वादा किया था की वो बाकियों से अलग है। न कोई दागी, न कोई परिवारवाद, न ही कोई जातीय समीकरण। पार्टी इसी आइडिया पर खड़ी हुई थी की राजनीति में पढ़े-लिखे, प्रोफेशनल और ईमानदार लोगों को लाकर देश का सिस्टम बदला जाएगा।

ऐसे लोग जो राजनीति में इसलिए नहीं आएंगे क्योंकि उन्हें कोई बाप-दादा की सीट मिली है, बल्कि इसलिए आएंगे क्योंकि उनके पास सच में देश को देने के लिए कुछ है।    

ऊपर से देखने पर तो राघव चड्ढा बिल्कुल इसी वादे की जीती-जागती मिसाल लगते थे। एक सीए, जिसके पास अच्छे संस्थानों की डिग्रियां हैं, जो कई भाषाओं में फर्राटेदार बात कर सकता है, जो अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और संविधान जैसे भारी-भरकम मुद्दों पर गहरी समझ रखता है। वो एक ऐसे सांसद थे जिनकी हमारे लोकतंत्र को सख्त ज़रूरत है।

राज्यसभा में उनकी स्पीच सिर्फ नेताओं के बीच ही नहीं, बल्कि आम जनता में भी चर्चा का विषय बनती थी। चाहे सोशल मीडिया डेटा प्राइवेसी का मुद्दा हो, राज्यों के वित्तीय अधिकार हों या भारत की विदेश नीति- उनकी तैयारी और लॉजिक हमेशा सॉलिड होते थे, जो अक्सर सदन में देखने को नहीं मिलता।

लेकिन ‘आप’ के अंदर राघव चड्ढा का करियर ग्राफ उस कहानी से बिल्कुल अलग है जो पार्टी ने शुरुआत में गढ़ी थी। कमेटियों के नॉमिनेशन से जुड़े आरोपों (जिन्हें उन्होंने सिरे से नकारा) को लेकर राज्यसभा से उनका सस्पेंशन एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसके बाद जो हुआ वो साफ देखा जा सकता है- पार्टी के बड़े फैसलों और चुनावी मोर्चों से उन्हें धीरे-धीरे लेकिन पूरी तरह से किनारे कर दिया गया।

किस्मत का मज़ाक देखिए। जो आम आदमी पार्टी पुरानी राजनीतिक संस्कृति को खत्म करने के नाम पर बनी थी, उसी ने अपने सबसे काबिल युवा नेताओं में से एक को उन्हीं पुराने राजनीतिक हथकंडों के ज़रिए साइडलाइन कर दिया- यानी गुटबाज़ी, गठबंधन का गणित और उन आवाज़ों का चुपचाप गला घोंटना जो इतनी आज़ाद हैं की उन्हें पूरी तरह कंट्रोल नहीं किया जा सकता।

जब मेरिट के आधार पर राजनीति करने का ढिंढोरा पीटने वाली पार्टियां भी अपने युवाओं को उसी तरह दबाने लगें जैसे उनकी पुरानी और भ्रष्ट विरोधी पार्टियां करती आई हैं, तो एक बात साफ हो जाती है- दिक्कत विचारधारा की नहीं, सिस्टम की है। भारतीय चुनावी राजनीति का ढांचा ही ऐसा है की वो इसमें उतरने वाली हर पार्टी को भ्रष्ट कर देता है, चाहे पार्टी की नीयत शुरुआत में कितनी भी साफ क्यों न रही हो।

“आम आदमी पार्टी जाति से ऊपर उठकर टैलेंट को अहमियत देने के वादे पर बनी थी। और फिर उसने ठीक उसी तरह के नेता को साइडलाइन कर दिया जिसे आगे बढ़ाने का उसने वादा किया था।”

सचिन पायलट- वो युवा लड़ाका जिसने कांग्रेस पार्टी को राजस्थान में ज़मीन पर खड़ा किया, लेकिन उसे दरवाज़े पर ही छोड़ दिया गया

आज की राजनीति में टैलेंटेड युवा नेताओं की जो दुर्दशा है, उसे समझना हो तो सचिन पायलट की कहानी से बेहतर कोई मिसाल नहीं है। और यह कहानी इसलिए भी आंखें खोलने वाली है क्योंकि पायलट के पास वो सब कुछ था जो किसी भी नेता को अपनी पार्टी में अजेय बना सकता था- एक बड़ा सियासी खानदान, खुद के दम पर जीते गए चुनाव, बतौर मंत्री काम करने का तजुर्बा, और बरसों की ज़मीनी मेहनत से बनाई गई अपनी एक पक्की पहचान।

अगर इतने सारे प्लस पॉइंट वाले नेता को भी उसकी अपनी ही पार्टी लटका सकती है, रास्ते से हटा सकती है और आखिर में सरेआम ज़लील कर सकती है, तो समझ लीजिए की इस सिस्टम की जड़ों में सड़न कितनी गहरी है।

सचिन पायलट कांग्रेस के कद्दावर और चहेते नेता रहे राजेश पायलट के बेटे हैं। सचिन दौसा से दो बार लोकसभा चुनाव जीते, यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे, और 2014 में उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। वो भी तब, जब कांग्रेस का सबसे बुरा दौर चल रहा था।

वो पढ़े-लिखे हैं, फर्राटेदार बोलते हैं, और उनकी इमेज एकदम साफ है। 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनावों में जब कांग्रेस जीती, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सचिन पायलट का ही पूरा हक बनता था। चुनाव प्रचार उन्होंने ही लीड किया था। 2013 की शर्मनाक हार के बाद जब पार्टी ज़मीन पर लेट चुकी थी, तब उन्होंने ही इसे दोबारा खड़ा किया था।

ज़मीनी कार्यकर्ता भी इस जीत का सीधा क्रेडिट उन्हें ही दे रहे थे। राजनीति में अगर इंसाफ नाम की कोई चीज़ होती- तो दिसंबर 2018 में सचिन पायलट को ही राजस्थान का सीएम बनना था।

पर ऐसा हुआ नहीं। कुर्सी सौंप दी गई अशोक गहलोत को- जो कांग्रेस के पुराने धुरंधर और कई बार के सीएम रह चुके थे। पायलट को थमा दिया गया डिप्टी सीएम का पद। सुनने में तो यह पद बहुत भारी-भरकम लगता है, लेकिन असल में इसके पास कोई पावर नहीं होती। वो भी तब, जब सीएम ने खुलेआम साफ कर दिया हो की सरकार तो उनके ही हिसाब से चलेगी।

करीब दो साल तक पायलट इसी अजीब सी कशमकश में घुट-घुट कर काम करते रहे। वो देखते रहे कि कैसे बड़े फैसलों में उन्हें पूरी तरह साइडलाइन किया जा रहा है, नियुक्तियों में उनकी सिफारिशें रद्दी में डाली जा रही हैं, और जिस सरकार को उन्होंने अपने खून-पसीने से बनाया था, उसी में उनके साथ किसी ‘जूनियर पार्टनर’ जैसा बर्ताव हो रहा है।

फिर जुलाई 2020 में सब्र का बांध टूट गया। पायलट और उनके वफादार विधायकों ने गहलोत सरकार से किनारा कर लिया। देखते ही देखते ऐसा सियासी ड्रामा शुरू हुआ की राजस्थान में सरकार गिरने की नौबत आ गई।

इस पूरे बवाल पर कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री पद से हटा दिया। मतलब, आपके साथ बदसलूकी हो रही है और अगर आप उसकी शिकायत कर दें, तो सज़ा भी आपको ही मिलेगी। संदेश एकदम साफ था- कांग्रेस में सीनियरिटी, गुटबाज़ी और गांधी परिवार के करीब होना… ज़मीन पर की गई मेहनत और चुनाव जिताने की काबलियत पर हमेशा भारी पड़ता है। हर बार।

ये कोई इत्तेफाक नहीं है, पूरे सिस्टम में ही उभरते युवा नेताओं को कुचलने की फुल सेटिंग है

मन को तसल्ली देने के लिए हम कह सकते हैं की सचिन पायलट और राघव चड्ढा के मामले सिर्फ अपवाद हैं, या उनकी अपनी पार्टी के अंदर की राजनीति का नतीजा हैं। लेकिन सच तो ये है कि सुबूत कुछ और ही गवाही देते हैं।

ज़रा ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही देख लीजिए। अच्छी पढ़ाई-लिखाई और जनता में पैठ वाले एक और कांग्रेसी नेता। आखिरकार उन्हें लगने लगा की अपनी पुरानी पार्टी में उनके सपनों के लिए कोई जगह नहीं बची है, और उन्होंने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम लिया।

उनका यह कदम भले ही विवादों में रहा हो, लेकिन इसके पीछे की उनकी खीझ एकदम जायज़ थी- कांग्रेस हो या भारत की कोई भी दूसरी पार्टी, वहां स्वतंत्र पहचान वाले युवाओं को तभी तक बर्दाश्त किया जाता है जब तक वे चुनाव प्रचार के लिए काम आएं। जैसे ही उनके हाथ में असली पावर आने लगती है, वे पार्टी को खटकने लगते हैं।

मिलिंद देवड़ा को भी मत भूलिए। शहरी, पढ़े-लिखे और सच में सुधार चाहने वाले नेता। चुनाव जीतने और पार्टी के अंदर एक समझदार आवाज़ माने जाने के बावजूद, उन्हें कांग्रेस की मुंबई पॉलिटिक्स में धीरे-धीरे पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया।

इन सभी मामलों में जो बात कॉमन है, वो इनकी पार्टी नहीं है। असल बात ये है की सचिन पायलट और राघव चड्ढा की तरह ही इन नेताओं ने भी अपनी एक ऐसी सियासी पहचान बनाई थी जो पूरी तरह से जाति के वोट बैंक या खानदानी विरासत पर टिकी नहीं थी। 

और यही चीज़ भारतीय चुनावी गणित में उन्हें एक ही समय पर बहुत काम का (क्योंकि मीडिया उन्हें पसंद करता है, वे अच्छी डिबेट कर सकते हैं और पढ़े-लिखे शहरी वोटर्स को खींच सकते हैं) और आसानी से ‘हटाए जाने लायक’ बना देती है।

क्योंकि जब बात सच में चुनाव जीतने की आती है, तो पार्टी हाईकमान के लिए गुड गवर्नेंस की बातें करने वाले उम्मीदवार से ज्यादा वो नेता कीमती हो जाता है जो किसी खास जाति का थोक वोट दिलवा सके।

जाति-धर्म-समुदाय वाला टिकट फॉर्मूला जहां पढ़े-लिखे युवा नेताओं की अहमियत  नहीं

अगर समझना है की भारत की पार्टियां पढ़े-लिखे युवाओं को लगातार साइडलाइन क्यों कर रही हैं, तो हमें टिकट बंटवारे के असली खेल को समझना होगा- वो नहीं जो हमें टीवी पर बताया जाता है, बल्कि वो जो पर्दे के पीछे चलता है।

भारत की हर बड़ी पार्टी किसी भी अहम चुनाव से पहले बाकायदा जाति और समुदाय के सर्वे करवाती है। इन इंटरनल सर्वे में हर सीट का डेटा निकाला जाता है-किस जाति के कितने वोटर हैं, किस धर्म के कितने हैं, और कौन सी उप-जाति का पलड़ा भारी है। इसके बाद उम्मीदवार चुनने का पूरा प्रोसेस बस इसी बात पर टिक जाता है की किस नेता की पहचान उस इलाके की सबसे बड़ी जाति से मैच खाती है।

पार्टियां जिसे ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) कहती हैं, उसका उम्मीदवार के पुराने काम, उसकी पढ़ाई या उसके विज़न से कोई लेना-देना नहीं होता। इसका सीधा सा मतलब ये होता है की क्या वो नेता चुनाव के दिन किसी खास समुदाय का वोट पोलिंग बूथ तक ला सकता है या नहीं।

इसमें पैसे का खेल गाड़ी में पेट्रोल का काम करता है। राज्य स्तर का चुनाव लड़ने के लिए इतना पैसा चाहिए होता है जितना ज़्यादातर युवा प्रोफेशनल्स के पास होता ही नहीं है। चुनाव आयोग की खर्च सीमा का ज़मीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है।

अगर आपको किसी टफ सीट पर ढंग का चुनाव लड़ना है, तो ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़ने, बूथ मैनेज करने, वोटर्स तक पहुंचने और लॉजिस्टिक्स में ही करोड़ों रुपये फूंकने पड़ते हैं। 

अब जो उम्मीदवार इतना फंड ला सकते हैं, वो या तो खुद बहुत अमीर होते हैं, या फिर उन्हें ऐसे समुदायों का बैकअप होता है जिनके पास मोटा पैसा है। ऐसे में जो युवा बिना किसी खानदानी पैसे या कम्युनिटी सपोर्ट के राजनीति में आते हैं, वो सिस्टम के सामने इतने बेबस हो जाते हैं की उनका टैलेंट धरा का धरा रह जाता है।

जाति और पैसे के इस डबल फिल्टर का ही नतीजा है की आज हमारी संसद और विधानसभाओं की शक्ल वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए थी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आंकड़े बताते हैं की हमारी संसद में ऐसे सांसदों की भरमार है जिन पर क्रिमिनल केस चल रहे हैं।

दूसरी तरफ, वो उम्मीदवार बार-बार चुनाव मैदान में उतारे जाते हैं जिनकी एकमात्र ‘काबलियत’ ये होती है की वे अपनी सीट की सबसे बड़ी जाति का चेहरा होते हैं।

यह सब गलती से नहीं हो रहा है। आज के भारतीय लोकतंत्र का सिस्टम ही ऐसा बन गया है, और पार्टियां उसी के हिसाब से चल रही हैं। पार्टियां कोई चैरिटी संस्थाएं नहीं हैं। उनका काम है ज्यादा से ज्यादा वोट बटोरना। जब तक चुनाव जीतने के लिए पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा ‘जाति’ की गारंटी चलती रहेगी, तब तक खेल इन्हीं नियमों से खेला जाता रहेगा।

आज के यूथ को चाहिए उनके जैसे युवा नेता, पर सिस्टम उनके सिर पर बैठा रहा है आउटडेटेड राजनेता

इस पूरी कहानी का सबसे क्रूर हिस्सा ये नहीं है की चंद युवा नेताओं के साथ नाइंसाफी हो रही है। असली त्रासदी तो उन करोड़ों भारतीय युवाओं के साथ हो रही है, जिन पर एक ऐसा पॉलिटिकल क्लास राज कर रहा है जिसे न तो युवाओं की हकीकत पता है, न उनके सपने पता हैं, और न ही यह समझ है की भारत को असल में क्या बनने की ज़रूरत है।

देश में युवाओं की बेरोज़गारी कई सालों से एक बहुत बड़ी टेंशन बनी हुई है। जब युवा डिग्रियां लेकर नौकरी के बाज़ार में उतरते हैं, तो उन्हें पता चलता है की जिस रफ्तार से वे आ रहे हैं, उस रफ्तार से नौकरियां तो पैदा ही नहीं हो रहीं। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भले ही कुछ जगहों पर वर्ल्ड-क्लास हो, लेकिन यह देश की बहुत छोटी सी आबादी तक ही सीमित है।

छोटे शहरों, कस्बों और मिडिल क्लास परिवारों के ज्यादातर युवा आज एक ऐसी भूलभुलैया में फंसे हैं जहां डिग्रियों की कोई वैल्यू नहीं बची, कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स में गलाकाट मुकाबला है, और ढंग की नौकरियां न के बराबर हैं। ऊपर से कोई सिस्टमेटिक सपोर्ट भी नहीं है।

ये कोई हवा-हवाई पॉलिसी के सवाल नहीं हैं। ये इस देश की मेजॉरिटी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी है। लेकिन सोचिए, जो संसद इन सवालों पर बहस करती है, जो हमारे बजट, शिक्षा नीतियां और रोज़गार की स्कीमें पास करती है, वहां ऐसे लोग बैठे हैं जिनका पूरा बचपन और जवानी एक अलग ही भारत में गुज़री है- वो भारत जो लाइसेंस राज वाला था, जहां इंटरनेट नहीं था, और जहां समाज पूरी तरह बंद था।

आज राज करने वालों और जिन पर राज हो रहा है, उनके बीच सोच और उम्र का फासला इतना ज़्यादा पहले कभी नहीं था।

आज का युवा पहले की किसी भी पीढ़ी के मुकाबले राजनीति को लेकर ज़्यादा जागरूक भी है और ज़्यादा निराश भी। सोशल मीडिया ने उन्हें वो जानकारी और एनालिसिस दे दिया है जिसके बारे में पहले की पीढ़ियां सोच भी नहीं सकती थीं। वो देश के इकोनॉमिक डेटा को समझ सकते हैं, भारत के काम करने के तरीके की तुलना दुनिया के दूसरे देशों से कर सकते हैं, और नीतियों की खामियां पकड़ सकते हैं।

लेकिन, चूंकि उन्हें ऐसे नेता नहीं मिलते जो उनकी भाषा बोलें, इसलिए यह सारी जानकारी उन्हें राजनीति से जोड़ने के बजाय और ज़्यादा दूर कर रही है। आज का पढ़ा-लिखा शहरी युवा राजनीति को बस एक तमाशे की तरह देखने लगा है- एक ऐसी चीज़ जिस पर वो कमेंट कर सकता है, भड़ास निकाल सकता है, लेकिन उसे यह भरोसा नहीं रहा की उसके हिस्सा लेने से कुछ बदल जाएगा।

नेताओं और जनता के बीच की यह दूरी कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, इसका सीधा असर देश के कामकाज पर पड़ता है। जब शिक्षा नीति बनाने वालों को यही नहीं पता की 2026 में एक मिडिल क्लास परिवार के लिए हमारा एजुकेशन सिस्टम कितनी मुश्किलें खड़ी कर रहा है, तो उनकी बनाई नीतियां कभी भी असली समस्याओं को सुलझा ही नहीं पाएंगी।

जब रोज़गार पर बहस करने वालों ने कभी देखा ही नहीं की आज के जॉब मार्केट में एक नए इंजीनियर को किन धक्के-ठोकरों से गुज़रना पड़ता है, तो उनके बनाए नियम बेअसर ही रहेंगे। राजनीतिक नेतृत्व और ज़मीनी हकीकत के बीच की यही वो खाई है, जिसकी भारी कीमत भारत रोज़ाना चुका रहा है।

‘यूथ लीडरशिप’ के नाम पर फरेब- मेरिट वाले युवा बाहर, और ‘सियासी घरानों के चिराग’ अंदर

यहां इस बात का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है की कई लोग कहेंगे- “पार्टियां युवाओं को आगे तो बढ़ाती हैं!” और ये सच भी है। बीजेपी ने कई सीटों पर युवा उम्मीदवार उतारे हैं। कांग्रेस बार-बार राहुल गांधी को एक नए और मॉर्डन विज़न वाले नेता के तौर पर पेश करती है।

क्षेत्रीय पार्टियां भी आए दिन अपने संस्थापकों के बेटे-बेटियों को अगली पीढ़ी के नेता के रूप में लॉन्च करती रहती हैं। शिव सेना ने आदित्य ठाकरे को प्रमोट किया। आरजेडी तेजस्वी यादव पर दांव लगा रही है। नेशनल पीपुल्स पार्टी के पास अगाथा संगमा हैं।

लेकिन यहां एक बहुत बड़ा फर्क है जिसे अक्सर छिपा लिया जाता है: भारत की राजनीतिक पार्टियां जिन ‘युवाओं’ को आगे बढ़ाती हैं, वो लगभग सारे के सारे राजनीतिक घरानों के चिराग होते हैं।

ये वो युवा हैं जो पहले से ही एक बना-बनाया वोट बैंक, एक पारिवारिक राजनीतिक ब्रैंड और वो पूरी मशीनरी लेकर आते हैं जो उनके माता-पिता या दादा-दादी ने दशकों में खड़ी की है। सच कहूं तो, यह कोई यूथ एम्पावरमेंट नहीं है। यह तो बस उसी पुराने परिवारवाद को एक नए और जवान चेहरे के साथ पेश करना है।

वहीं दूसरी तरफ वो युवा नेता होता है जो अपने टैलेंट के दम पर ऊपर आता है- जिसने अपनी मेहनत से अपना मुकाम बनाया है, अपनी फॉलोविंग खड़ी की है, और जिसके नाम के पीछे किसी बड़े राजनीतिक खानदान का टैग नहीं लगा है। 

पार्टियों के लिए ऐसे नेता एक बिल्कुल अलग ही चीज़ होते हैं। वो काम के तो बहुत होते हैं क्योंकि वो स्मार्ट हैं और लोगों को खींच सकते हैं। लेकिन पार्टी की नज़र में वो ‘खतरनाक’ भी होते हैं, क्योंकि वो आज़ाद होते हैं। एक ऐसा नेता जिसकी सियासी हैसियत उसकी अपनी मेहनत की कमाई है, उसे पूरी तरह से कंट्रोल नहीं किया जा सकता।

उसके पास बार्गेनिंग पावर होती है, और वो कई बार पुरानी लीडरशिप को चुनौती भी दे डालता है। इसके उलट, किसी खानदान से आया युवा नेता पूरी तरह से उस पार्टी सिस्टम पर टिका होता है जो उसके परिवार ने बनाया है। उसकी वफादारी की तो पक्की गारंटी होती है।

यही असली वजह है की भारत की पार्टियों में टैलेंटेड युवा नेता एक लिमिट के बाद ऊपर नहीं जा पाते। ‘जाति का गणित’ तो बस दुनिया को दिखाने का एक बहाना है। असली पेंच परिवारवाद बनाम टैलेंट का है। 

बहुत हो चुका तमाशा! अगर युवा नेताओं को पावर नहीं मिली, तो इस देश का भविष्य दांव पर है

हर बार जब किसी काबिल, पढ़े-लिखे और अपने दम पर खड़े हुए युवा नेता को दरकिनार करके किसी ‘कम्युनिटी लीडर’ (जिसके पास शासन चलाने का कोई तजुर्बा नहीं है) को आगे किया जाता है, तो देश को चलाने वाली लीडरशिप थोड़ी और कमज़ोर हो जाती है।

हम 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना एक ऐसी लीडरशिप के साथ कर रहे हैं जो 20वीं सदी में भी आउटडेटेड हो चुकी थी। इसकी कीमत हमें रोज़ाना घटिया पॉलिसियों, छूटते हुए मौकों और भारत की युवा आबादी के पोटेंशियल के बर्बाद होने के रूप में चुकानी पड़ रही है।

पार्टियां खुद-ब-खुद नहीं सुधरने वालीं। जो लालच उन्हें इस तरह काम करने पर मजबूर करता है, वो बहुत गहरा है। बदलाव तभी आएगा जब दो चीज़ें एक साथ होंगी: पहला, जब पढ़े-लिखे युवा वोटर्स ऐसे उम्मीदवारों को वोट देना बंद कर देंगे जो सिर्फ जाति के नाम पर खड़े हैं; और दूसरा, जब नेताओं की एक नई पीढ़ी पार्टी के अंदर या बाहर हर प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करके एक नई तरह की राजनीति की मांग करेगी।

पार्टियों के यूथ विंग्स को सिर्फ दिखावे की चीज़ से हटाकर सचमुच की लीडरशिप तैयार करने वाली नर्सरी में बदलना होगा। अभी जो मॉडल चल रहा है, उसमें यूथ विंग का अध्यक्ष बनना बस एक रुतबे की बात होती है, जिसमें कोई असली पावर नहीं होती। और वहां से भी आगे वही बढ़ता है जो बड़े नेताओं की चापलूसी या गुटबाज़ी कर सके।

एक ऐसा यूथ विंग जो सच में कड़े कॉम्पिटिशन से उम्मीदवार चुने, युवाओं को सही में गवर्नेंस की ट्रेनिंग दे, और जहां से आगे बढ़ने का साफ रास्ता हो- वही आने वाले कल के लिए ऐसे नेता तैयार कर सकेगा जिन्हें सरकार चलानी आती हो।

जैसे-जैसे भारत के वोटर ज़्यादा पढ़े-लिखे और जागरूक होंगे, और नेताओं के काम का हिसाब मांगना शुरू करेंगे, तब जाकर पार्टियां मजबूर होंगी की वे सिर्फ ‘जाति के चेहरे’ नहीं बल्कि असल में ‘काबिल’ लोगों को टिकट दें। यह बदलाव धीरे-धीरे आएगा। लेकिन यह नामुमकिन नहीं है।

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