ममता बनर्जी ने 15 साल के राज में बंगाल का क्या हाल कर दिया है ये जानने के लिए आपको कोलकाता के बाहरी इलाके से निकलने वाली किसी लोकल ट्रेन में बैठना पड़ेगा। आप पाएंगे की रेलवे लाइन के दोनों तरफ झोपड़ियां और ढांचे खड़े कर दिए गए हैं।
ये बस्तियां उन बंगाली हिंदुओं की नहीं हैं जो पीढ़ियों से यहां बसते आए हैं। न ही ये झारखंड या बिहार से आए मज़दूरों के घर हैं। ये सारी झोपड़ियां और घर बिना दस्तावेज़ वाले बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या मुसलमानों के हैं।
ये लोग बंगाल के खुले बॉर्डर से भारत में घुसे, सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा जमाया और पक्के मकान तान लिए- और ये सब हुआ तृणमूल कांग्रेस (TMC) मशीनरी के खामोश संरक्षण में।
आखिर बंगाल की ये नौबत आई कैसे? जो राज्य कभी भारत का सबसे ज़्यादा औद्योगीकृत, सबसे सुसंस्कृत और पढ़ा-लिखा सूबा हुआ करता था- टैगोर, विवेकानंद, बोस और सत्यजीत रे का राज्य- वो आज अवैध मुस्लिम घुसपैठियों का सुरक्षित ठिकाना, हिंदू विरोधी हिंसा का अखाड़ा और उद्योगों का कब्रिस्तान कैसे बन गया?
जवाब सिर्फ एक नाम में छिपा है: ममता बनर्जी। एक कट्टर ‘राष्ट्रवादी’ नेता से लेकर भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की सबसे बेशर्म खिलाड़ी बनने तक का उनका ये सफर, आधुनिक भारत के सबसे बड़े धोखों में से एक है।
कालीघाट की गलियों से संसद तक- एक कट्टर ‘राष्ट्रवादी’ नेता ने सत्ता के लिए कैसे बदल लिया अपना चोला?
ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को कोलकाता के कालीघाट इलाके में हुआ- एक ऐसा इलाका जिसका नाम ही प्राचीन और पवित्र कालीघाट मंदिर के नाम पर पड़ा है, जो हिंदुओं के 51 शक्तिपीठों में से एक है।
जब वो महज़ एक टीनएजर थीं, तभी उनके पिता प्रोमिलेश्वर बनर्जी का निधन हो गया और परिवार घोर आर्थिक संकट में फंस गया। अपनी इसी वर्किंग-क्लास यानी मज़दूर वर्ग वाली पृष्ठभूमि को उन्होंने दशकों तक राजनीति में खूब भुनाया, खुद को ‘माटी की बेटी’ और आम बंगालियों की आवाज़ बताकर पेश किया।
टीनएज में ही उन्होंने कांग्रेस और उसकी छात्र इकाई ‘छात्र परिषद’ जॉइन कर ली। जल्द ही वो सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने वाली एक बेहद निडर नेता के रूप में पहचानी जाने लगीं। उस दौर में उनकी राजनीतिक पहचान पूरी तरह से राष्ट्रवादी थी।
बंगाली हिंदू संस्कृति में उनकी गहरी जड़ें थीं- दुर्गा पूजा पंडालों में जाना, भाषणों में मां काली का ज़िक्र करना, और 1977 से राज कर रही नास्तिक, बंगाली-विरोधी वामपंथी सरकार के सामने खुद को बंगाल की हिंदू विरासत की रक्षक के तौर पर खड़ा करना।
कांग्रेस में उनका कद तेज़ी से बढ़ा। साल 1984 में उन्होंने जादवपुर लोकसभा सीट पर सीपीएम (CPI-M) के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर ऐसा बड़ा उलटफेर किया कि रातों-रात नेशनल स्टेज पर उनकी धमक सुनाई देने लगी। फिर नरसिम्हा राव सरकार में वो केंद्रीय राज्य मंत्री बनीं।
1997 तक आते-आते पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी बन गईं। लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं- और उनका अहंकार- कांग्रेस के ढांचे में समाने के लिए बहुत बड़े थे। 1998 में, उन्होंने कांग्रेस से नाता तोड़कर अपनी खुद की पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ (TMC) बना ली। ये एक ऐसा फैसला था जिसने बंगाल की राजनीति को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
सियासत का सबसे बेशर्म ‘यू-टर्न’- जब खुद ममता संसद में बांग्लादेशियों के खिलाफ गरजती थीं!
कहानी का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा तो यहीं से शुरू होता है। क्योंकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की ‘मसीहा’ बनने से पहले, ममता बनर्जी खुद उनकी सबसे मुखर आलोचक हुआ करती थीं।
जो महिला आज सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA) का जी-जान से विरोध करती है, जो नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (NRC) को अल्पसंख्यकों के खिलाफ साज़िश बताती है, जो अवैध प्रवासियों को रेलवे की ज़मीन पर पक्की कॉलोनियां बसाने की खुली छूट देती है- उसी महिला ने अपने पिछले राजनीतिक अवतार में संसद में गरजते हुए कहा था की बांग्लादेशी घुसपैठ भारत के वजूद के लिए ही एक खतरा है।
90 के दशक के आखिर में, ममता का बकायदा ये रिकॉर्ड है की उन्होंने अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की थी। अपनी 1999 की किताब ‘स्ट्रगल फॉर एक्सीस्टेंस’ में उन्होंने साफ लिखा था की बांग्लादेशी घुसपैठ पश्चिम बंगाल और देश के सामने मौजूद सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।
उनकी मांग थी की सरकार इन अवैध प्रवासियों की पहचान करे, दस्तावेज़ बनाए और उन्हें वापस भेजे। उन्होंने भारतीय नागरिकों को विदेशियों से अलग करने के लिए एक राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने का भी सपोर्ट किया था- जी हां, बिल्कुल वही तंत्र जिसे वो आज ‘फासीवादी’ और ‘मुस्लिम विरोधी’ कहकर खारिज कर देती हैं।
90 के दशक में संसद में बोलते हुए उन्होंने कई बार घुसपैठ का मुद्दा उठाया, सीमावर्ती ज़िलों के बदलते डेमोग्राफिक स्वरूप (जनसांख्यिकी) की तरफ इशारा किया और केंद्र सरकार से बॉर्डर सील करने की मांग की। उनकी भाषा में तब कोई कन्फ्यूज़न नहीं था, वो पूरी तरह राष्ट्रवादी थी। उन्होंने अपनी चिंताओं को किसी ‘मानवीय’ आवरण में नहीं लपेटा था। उन्होंने घुसपैठ को वही कहा जो वो थी- एक अवैध आक्रमण, एक डेमोग्राफिक खतरा और राष्ट्रीय सुरक्षा का आपातकाल।
उस दौर के संसदीय रिकॉर्ड गवाह हैं की ममता ने इस मुद्दे को बार-बार उठाया। हालांकि तब वो अकेली नहीं थीं- उस वक्त कांग्रेस ने भी आधिकारिक तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठ को एक समस्या माना था। लेकिन ममता सबसे ज़्यादा वोकल (मुखर) थीं। उन्होंने सरकार से सर्वे कराने, वोटर लिस्ट तैयार करने और ये सुनिश्चित करने को कहा था की विदेशियों को भारत में वोटर आईडी और राशन कार्ड किसी कीमत पर न मिलने पाएं।
फिर कुछ बदल गया। लेफ्ट सरकार गिर गई। 2011 में ममता सत्ता में आ गईं। और सत्ता के साथ ही शुरू हुआ चुनावी वजूद बचाए रखने का ठंडा, क्रूर गणित। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का करीब 27-30 प्रतिशत है- जम्मू-कश्मीर और असम के बाद किसी भी भारतीय राज्य में ये सबसे ज्यादा है।
अब इसमें अवैध बांग्लादेशी वोटरों को भी जोड़ लीजिए- जिनकी संख्या कई एजेंसियों के मुताबिक लाखों में है- तो ये वोट-बैंक का गणित इतना लुभावना हो गया की ममता खुद को रोक नहीं पाईं। वो राष्ट्रवादी नेता कहीं गायब हो गई। और तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली नई ममता का जन्म हुआ।
इमामों को सैलरी और हिंदुओं पर पाबंदी- TMC का जन्म और ‘तुष्टिकरण’ का वो घटिया खेल
1998 में जब ममता ने टीएमसी बनाई, तो उनकी स्ट्रैटेजी बिल्कुल साफ थी: उन्हें एक ऐसा वोटर बेस चाहिए था जिसकी काट लेफ्ट के पास न हो। ग्रामीण बंगाल के हिंदू बंगाली वोट पर सीपीएम का अपनी कैडर मशीनरी के ज़रिए पक्का कब्ज़ा था।
ऐसे में ममता की सत्ता की राह सीधे मुस्लिम वोटों से होकर गुज़रती थी- और उन अवैध घुसपैठियों की बस्तियों से, जिन्होंने चुपचाप कई सीटों को टीएमसी के पक्के गढ़ में बदल दिया था।
इस तुष्टिकरण का ताना-बाना बड़े तरीके से बुना गया। इसका सबसे कुख्यात और आर्थिक रूप से चौंकाने वाला हिस्सा है ‘इमाम भत्ता’ योजना- ममता सरकार की शुरू की गई एक ऐसी स्कीम जिसमें राज्य के खजाने से मस्जिदों के इमामों को हर महीने वज़ीफा दिया जाता है।
इसका सीधा सा मतलब ये है की टैक्सपेयर्स का पैसा- चाहे वो हिंदू का हो या मुसलमान का- पश्चिम बंगाल सरकार मुस्लिम धर्मगुरुओं की सैलरी देने में इस्तेमाल कर रही है। हिंदू पुजारियों, पंडितों या मंदिर कमेटियों के लिए ऐसी कोई स्कीम नहीं है।
इस स्कीम की संवैधानिक वैधता को चुनौती भी दी गई, खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर सवाल उठाए, फिर भी ये बेरोकटोक जारी है। सच कहें तो, ये सीधे-सीधे राज्य द्वारा प्रायोजित धार्मिक तुष्टिकरण है, नंगा और बेशर्म।
खैर, ये तुष्टिकरण यहीं नहीं रुका। ऐसे कई दस्तावेज़ी सुबूत मौजूद हैं जिनमें टीएमसी के स्थानीय नेताओं और बूथ-लेवल वर्करों पर अवैध बांग्लादेशियों को वोटर आईडी और राशन कार्ड बनवाने में मदद करने के आरोप लगे हैं। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे ज़िलों की वोटर लिस्ट में ऐसे हज़ारों नाम मिले हैं जिनका कोई भारतीय मूल साबित नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग के अधिकारियों और सिविल सोसाइटी के जांचकर्ताओं ने इन ज़िलों में वोटर लिस्ट के इस तरह से फूलने पर रेड फ्लैग (चेतावनी) भी जारी किए हैं, क्योंकि ये आंकड़े प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि दर से मेल ही नहीं खाते।
इस बीच, टीएमसी राज में हिंदू धार्मिक मान्यताओं को सुनियोजित तरीके से किनारे किया गया है। स्थानीय प्रशासन द्वारा स्कूलों में सरस्वती पूजा पर पाबंदी लगाने के कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां वजह ‘संवेदनशीलता’ बताई गई।
दुर्गा पूजा- जो बंगाली हिंदुओं का सबसे बड़ा सांस्कृतिक त्योहार है- उसे नौकरशाही के झमेलों का सामना करना पड़ा है; पुलिस की परमिशन मिलने में देरी की जाती है और लाउडस्पीकर के नियम चुनिंदा तौर पर सिर्फ हिंदुओं पर ही थोपे जाते हैं।
इसके उलट, मस्जिदों के लाउडस्पीकर पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं होती। पूरे बंगाल के हिंदुओं को एकदम साफ मेसेज दे दिया गया है: आप इस सरकार की प्राथमिकता तो कतई नहीं हैं।
‘नैनो’ की बलि और टाटा की विदाई- वो मनहूस दिन जब ममता ने बंगाल के सुनहरे भविष्य का गला घोंट दिया
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल का कितना बड़ा नुकसान किया है, ये समझने के लिए हमें 2006 के दौर में जाना होगा- एक ऐसा साल जिसे बंगाल के औद्योगिक पुनर्जागरण की शुरुआत होना चाहिए था, लेकिन वो इसकी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की कब्रगाह बन गया।
2006 में, भारत के इतिहास के सबसे सम्मानित उद्योगपतियों में से एक, रतन टाटा ने ऐलान किया की टाटा ग्रुप दुनिया की सबसे सस्ती कार ‘नैनो’ का प्लांट पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले के सिंगूर में लगाएगा। नैनो एक ऐतिहासिक प्रोजेक्ट था- सिर्फ टाटा के लिए नहीं, पूरे भारत के लिए। ये वो कार थी जो आम भारतीय परिवार को चार पहियों पर लाने वाली थी।
और इसके लिए बंगाल को चुना गया। वामपंथी सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए सिंगूर में लगभग 997 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण किया- हालांकि ज़मीन अधिग्रहण की इस प्रक्रिया, खासकर बहु-फसली ज़मीन को लेकर विवाद भी हुए।
बस यहीं ममता बनर्जी की एंट्री होती है। सीपीएम के खिलाफ एक बड़ा सियासी मौका भांपते हुए, उन्होंने विस्थापित किसानों के हक की आड़ में एक ज़बरदस्त आंदोलन छेड़ दिया। उनका विरोध प्रदर्शन लगातार चलने वाला, आक्रामक और बेहद नाटकीय था- बिल्कुल वैसी ही सड़कों वाली राजनीति जिसमें उन्हें दशकों की महारत हासिल थी।
उन्होंने सिंगूर में ही डेरा डाल लिया। भूख हड़तालें कीं। भारी भीड़ जुटाई। उन्होंने नैनो प्लांट के विरोध को एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया।
लेकिन उन्होंने बंगाल की जनता को जो नहीं बताया- जो बात उन्होंने किसानों की एकजुटता के नारों के पीछे बड़ी चालाकी से छिपा ली- वो ये थी की उनका ये आंदोलन असल में किसानों के लिए था ही नहीं। उनका इकलौता मकसद किसी भी कीमत पर लेफ्ट सरकार को तबाह करना था।
उनका ये ठंडा और शातिर कैलकुलेशन था की अगर इतना बड़ा इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट ठप हो गया, तो सीपीएम के पतन की रफ्तार तेज़ हो जाएगी। सच पूछें तो, किसान तो सिर्फ मोहरे थे। नैनो उनका हथियार था। और इस पूरी राजनीति में बलि चढ़ी बंगाल की।
अक्टूबर 2008 आते-आते, रतन टाटा के सब्र का बांध टूट गया। इस आंदोलन ने प्रोजेक्ट को काम करने लायक छोड़ा ही नहीं था। सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो चुकी थी। और फिर आखिरकार टाटा मोटर्स ने ऐलान कर दिया की वो सिंगूर छोड़ रहे हैं। नैनो का प्लांट अब बंगाल में नहीं लगेगा।
पश्चिम बंगाल के लिए इसके नतीजे बेहद भयानक और दूरगामी साबित हुए। भारत और पूरी दुनिया के हर एक उद्योगपति को एकदम क्लियर मेसेज चला गया: बंगाल में अब बिज़नेस के लिए कोई जगह नहीं है। अगर आप यहां पैसा लगाएंगे, तो राजनीतिक उपद्रवी आपका प्लांट, आपकी सप्लाई चेन और आपके कर्मचारियों की सुरक्षा सब तबाह कर देंगे।
नैनो के जाने के बाद से पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्तर का कोई भी बड़ा इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट आज तक सफलतापूर्वक नहीं लग पाया है। देश के कुल औद्योगिक निवेश में राज्य की हिस्सेदारी लगातार गिरती जा रही है। बंगाली युवाओं में बेरोज़गारी का आलम बदस्तूर कायम है।
नतीजा ये है की पढ़े-लिखे बंगाली नौजवान मज़बूरन मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या फिर विदेश भाग रहे हैं- और स्वतंत्र भारत के सबसे दर्दनाक ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) की एक बड़ी वजह बन रहे हैं।
बंगाल के पास तो एक शानदार इतिहास था, बेहतरीन ज्योग्राफिकल लोकेशन थी, पोर्ट का एक्सेस था और बौद्धिक पूंजी की कोई कमी नहीं थी। भारत के औद्योगिक भविष्य का नेतृत्व करने के लिए जो कुछ चाहिए था, वो सब बंगाल के पास था। लेकिन ममता बनर्जी ने अपने एक सियासी फायदे के लिए ये सब कुछ उठाकर कचरे में फेंक दिया।
रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशियों के लिए कैसे ‘जन्नत’ बन गया ममता दीदी का बंगाल
2011 में सत्ता में आने के बाद से, ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल को अवैध प्रवासियों के लिए एक ‘सुरक्षित पनाहगाह’ बनाकर रख दिया है। वैसे तो घुसपैठियों की कोई पुख्ता संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि उनके पास कागज़ात नहीं होते, लेकिन फिर भी जो आंकड़े सामने आते हैं, वो किसी को भी डराने के लिए काफी हैं।
केंद्र सरकार के कई अनुमानों और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों ने बार-बार इस तरफ इशारा किया है की लाखों की तादाद में अवैध बांग्लादेशी नागरिक पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं, जो मुख्य रूप से मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और बीरभूम ज़िलों में जमे हुए हैं।
पश्चिम बंगाल में रोहिंग्याओं की मौजूदगी- खासकर कोलकाता के बाहरी इलाकों में- भले ही हाल ही का मामला हो, लेकिन ये उतना ही डरावना है। 2017 के क्रैकडाउन (सैन्य कार्रवाई) के बाद म्यांमार के रखाइन स्टेट से भागे रोहिंग्या बांग्लादेश के रास्ते भारत में घुसे और कोलकाता की कई बस्तियों में बस गए, खासतौर पर मेटियाब्रुज, गार्डन रीच और बाहरी ज़िलों की रेलवे कॉलोनियों में।
इन बस्तियों का कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। इनमें रहने वालों का कोई लीगल इमिग्रेशन स्टेटस भी नहीं है। इसके बावजूद, इनमें से कइयों ने आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जुगाड़ लिए हैं- यही वो कागज़ात हैं जो राज्य की सारी कल्याणकारी योजनाओं और सबसे अहम चीज़ ‘वोट देने के अधिकार’ का रास्ता खोलते हैं।
CAA (नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019) और NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) को लेकर ममता सरकार के रवैये से पूरी कहानी शीशे की तरह साफ हो जाती है। CAA खास तौर पर एक ऐसा कानून था जिसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए सताए हुए धार्मिक अल्पसंख्यकों- हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, ईसाइयों और पारसियों- को नागरिकता देने के लिए बनाया गया था।
इसने साफ तौर पर उन लोगों को बाहर रखा था जो गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुसे थे और जिनके पास धार्मिक उत्पीड़न का कोई दावा नहीं था। वहीं, NRC का मकसद असम और भविष्य में शायद बाकी राज्यों से भी अवैध घुसपैठियों की पहचान करना था।
ममता बनर्जी ने इन दोनों का इतनी भयंकर आक्रामकता से विरोध किया जिसका संवैधानिक सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं था, बल्कि पूरा फोकस सिर्फ और सिर्फ अपना वोट बैंक बचाने पर था। उन्होंने ऐलान कर दिया की बंगाल में NRC ‘लागू नहीं होने दिया जाएगा।’ उन्होंने CAA के खिलाफ सड़क पर उतरकर रैलियां निकालीं।
उन्होंने CAA विरोधी दंगाइयों को पश्चिम बंगाल में जमकर आगज़नी और तोड़फोड़ करने की खुली छूट दे दी, जिसका नतीजा संपत्तियों के नुकसान और पुलिस पर हमलों के रूप में सामने आया। वजह एकदम साफ है: NRC से उन लाखों अवैध बांग्लादेशियों की पहचान हो जाती और शायद उनका वोटिंग का अधिकार छिन जाता जो टीएमसी के कोर वोटर बेस का एक बड़ा हिस्सा हैं।
वहीं, CAA ने बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देकर बंगाल के कम्युनल बैलेंस (सांप्रदायिक समीकरण) को टीएमसी के खिलाफ मोड़ने का खतरा पैदा कर दिया था। ज़ाहिर है, इसे हर हाल में रोका ही जाना था।
संदेशखाली की चीखें और सड़कों पर बहता खून- ममता के राज में बंगाली हिंदुओं का संहार
ममता बनर्जी की सरकार पर सबसे बड़ा दाग उनकी आर्थिक नाकामी, बॉर्डर की लापरवाही या इमाम भत्ता योजना भी नहीं है। उनका सबसे बड़ा पाप है बंगाली हिंदुओं का वो खून जो बंगाल की सड़कों पर बिना किसी खौफ के बहाया गया। वो भी एक ऐसी सरकार की नाक के नीचे जिसने या तो आंखें मूंद लीं, या फिर जांच और कानूनी कार्रवाई को पूरी ताकत से दबा दिया।
टीएमसी के राज में सांप्रदायिक हिंसा की लिस्ट बहुत लंबी और खौफनाक है। दिसंबर 2016 में हावड़ा ज़िले के धुलागढ़ में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों पर हमले किए गए और उन्हें जला दिया गया। कई परिवारों को घर छोड़ना पड़ा। महिलाओं पर हमले हुए। देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ी गईं।
लेकिन राज्य सरकार का रवैया क्या था? उन्होंने इस हिंसा के सांप्रदायिक होने की बात को ही सिरे से नकार दिया और पुलिस की कार्रवाई में राजनीतिक दखल देकर दंगाइयों को बचाया। नेशनल मीडिया को वहां जाने से रोका गया। जो विपक्षी नेता वहां जाना चाहते थे, उन्हें बीच में ही रोक दिया गया।
2017 में उत्तर 24 परगना के बशीरहाट में दंगे भड़क गए, जिसका निशाना फिर से हिंदू समुदाय ही था। ट्रिगर पॉइंट एक सोशल मीडिया पोस्ट था- लेकिन उसके जवाब में हिंदुओं पर जो भीड़ का हमला हुआ, वो कहीं से भी आनुपातिक नहीं था। पैटर्न यहां भी बिल्कुल सेम था- पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, राजनेताओं का दखल चला, दोषियों को बचाया गया और पीड़ितों से कहा गया की वे अपना मुंह बंद रखें। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इन दोनों मामलों से निपटने के तरीके को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस भी थमाए।
और फिर आई मई 2021 की चुनाव के बाद की हिंसा- जिसे आज़ाद भारत के इतिहास में चुनाव के बाद हुई सबसे भयंकर राजनीतिक और सांप्रदायिक हिंसा कहा जा सकता है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की प्रचंड जीत के बाद, पूरे राज्य में हिंसा की एक ऐसी लहर दौड़ी जिसने बीजेपी कार्यकर्ताओं, आरएसएस से जुड़े लोगों और आम हिंदू समुदायों को सीधा निशाना बनाया।
एनएचआरसी ने एक स्पेशल कमेटी बनाई जिसने बंगाल का दौरा करके अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा की वहां ‘दहशत का माहौल’ है। कलकत्ता हाई कोर्ट में पेश की गई इस रिपोर्ट में हत्याओं, रेप, आगज़नी और हिंदू परिवारों के बड़े पैमाने पर पलायन का ज़िक्र था।
हाई कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए। हिंसा का वो बड़ा स्तर और उसका सुनियोजित तरीका साफ तौर पर इशारा कर रहा था की ये अचानक नहीं हुआ था- बल्कि राज्य की मशीनरी ने या तो खुद इसे भड़काया था, या फिर जानबूझकर मूकदर्शक बनी रही।
और उसके बाद सामने आया संदेशखाली, 2024। उत्तर 24 परगना के संदेशखाली इलाके में, भारी संख्या में महिलाओं ने- जिनमें ज़्यादातर हिंदू समुदायों से थीं- टीएमसी के बाहुबली शेख शाहजहां और उसके गुर्गों द्वारा किए गए व्यवस्थित यौन शोषण और ज़मीन हड़पने की आपबीती सुनाई। उनकी बातें रूह कंपा देने वाली थीं। बंदूक की नोक पर ज़मीनें छीनी गईं। महिलाओं को ऑफिस में बुलाकर उनके साथ दरिंदगी की गई। जिसने भी विरोध किया, उसे भयानक अंजाम भुगतना पड़ा।
जब ये खबर आखिरकार नेशनल मीडिया में फैली, तो ममता सरकार का पहला रिएक्शन क्या था? उन्होंने सबसे पहले आरोपियों को ही बचाने की कोशिश की। शाहजहां हफ्तों तक फरार रहा, और बंगाल पुलिस ने उसे पकड़ने की कोई गंभीर कोशिश ही नहीं की। नेशनल मीडिया का संदेशखाली में जमावड़ा लग गया। जिन महिलाओं ने आवाज़ उठाई थी, उन्हें धमकाया जाने लगा। जब राजनीतिक दबाव बर्दाश्त के बाहर हो गया, तब जाकर कहीं शाहजहां को गिरफ्तार किया गया।
अभी पिछले साल अप्रैल 2025 में मुर्शिदाबाद जिले में वक़्फ़ बिल को लेकर हिन्दुओ पर मुसलमानों ने हमला कर दिया था। जिसके बाद से हिन्दू परिवारों को अपने ही घरबार को छोड़ के दूसरे इलाकों में एक शरणार्थी बन कर रहना पढ़ रहा है।
ये सब पिछले 13 सालों के उस गवर्नेंस मॉडल का सीधा नतीजा है जिसने बंगाली हिंदू महिलाओं, किसानों और समुदायों की जान को एकदम सस्ता समझ लिया है- मुस्लिम वोट बैंक की वेदी पर दी गई एक बलि।
आंकड़े जो खून सुखा देंगे- सीमावर्ती ज़िलों से हिंदुओं का खामोश ‘पलायन’ और घुसपैठिए मुसलमानों का विस्फोट
नेता भले ही झूठ बोल लें, लेकिन आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते। पश्चिम बंगाल के लिए भारत की जनगणना के आंकड़े एक बेहद डरावना और तेज़ी से बढ़ता ट्रेंड दिखाते हैं: बांग्लादेश बॉर्डर से लगे एक के बाद एक ज़िले में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत गिर रहा है- जबकि मुसलमानों की आबादी का प्रतिशत इतनी तेज़ रफ्तार से बढ़ रहा है जिसे सिर्फ प्राकृतिक डेमोग्राफिक बदलाव का नाम देकर खारिज नहीं किया जा सकता।
मुर्शिदाबाद ज़िले में, 1980 के दशक तक हिंदू बहुमत में थे। लेकिन 2011 की जनगणना आते-आते वो अल्पसंख्यक हो गए। बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले इस ज़िले में मुस्लिम आबादी 2011 में ही 66 प्रतिशत को पार कर गई थी। मालदा ज़िले में मुस्लिम आबादी 51 प्रतिशत पार कर चुकी थी।
उत्तर 24 परगना के सीमावर्ती ब्लॉकों में भी भयंकर जनसांख्यिकीय बदलाव देखे गए हैं। 2011 का सेंसस- जो की उपलब्ध सबसे ताज़ा पूरा सेंसस है- उसमें ही ये ट्रेंड्स साफ दिखने लगे थे। ज़रा 2024 तक की कल्पना कीजिए- टीएमसी के 13 और साल और बेरोकटोक घुसपैठ- इन ज़िलों की ज़मीनी सच्चाई कथित तौर पर और भी ज़्यादा खतरनाक हो चुकी है।
इस डेमोग्राफिक बदलाव का इंसानी अंजाम वो हिंदू परिवार भुगत रहे हैं जो पीढ़ियों से इन ज़िलों में बसे थे। हिंदुओं पर बाज़ार भाव से कम दाम पर ज़मीन बेचने का दबाव डालना, मंदिरों पर कब्ज़ा करना, हिंदू त्योहारों में खलल डालना, हिंदू महिलाओं के साथ छेड़छाड़- ये उन पीड़ितों की बकायदा दर्ज की गई गवाहियां हैं जो भारी निजी जोखिम उठाकर कोर्ट, मानवाधिकार संगठनों और मीडिया तक पहुंचते हैं।
मुर्शिदाबाद, मालदा और दक्षिण 24 परगना के कुछ हिस्सों से परिवार दूसरे ज़िलों और दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो रहे हैं। ये पलायन बेहतर नौकरी या आर्थिक मौकों की तलाश में नहीं हो रहा है। ये मुसलमानों के फैलाये डर के कारण हो रहा है- ये बिल्कुल वैसा ही पलायन है जो भारत ने आखिरी बार बंटवारे (Partition) के वक्त देखा था।
और ये सब 21वीं सदी के भारत में, एक संवैधानिक लोकतंत्र में, उस सरकार की नाक के नीचे हो रहा है जिसे ‘मां, माटी, मानुष’ के वादे पर चुना गया था। सवाल तो यही है की किसकी मां? किसकी माटी? और कौन से मानुष?
बर्बादी की कगार पर खड़ा बंगाल- अब हिंदुओं को सब्र का बांध तोड़ना होगा और हर उस धोखे का हिसाब माँगना होगा
बंगाल आज एक ऐसा राज्य बनकर रह गया है जहां रेलवे की ज़मीन पर घुसपैठिए मुसलमानों द्वारा बसाई गई अवैध बस्तियों के पास से गुज़रते वक्त ट्रेन को रेंगना पड़ता है।
जहां संदेशखाली में हिंदू महिलाओं की आवाज़ को सरकारी मशीनरी कुचल देती है। जहां दुर्गा पूजा कमेटियों को सरकारी बाबूओं के चक्कर काटने पड़ते हैं, जबकि मस्जिदों को पूरा राजकीय संरक्षण मिलता है।
जहां वोटर लिस्ट में उन लोगों के नाम भरे पड़े हैं जो भारत के नहीं, बांग्लादेश के हैं। जहां की मुख्यमंत्री, जो कभी बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए गरजती थीं, आज उन्हें पहचानने वाले किसी भी कानून को रोकने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही हैं।
बंगाली हिंदू वोटर- जो बड़ा धैर्यवान, पढ़ा-लिखा और ऐतिहासिक रूप से सहनशील रहा है- उसे अब खुद से ये सवाल ज़रूर पूछना चाहिए की वो आखिर कब तक ये सब बर्दाश्त करेगा।
ममता बनर्जी ने 13 सालों के पुख्ता सबूतों के साथ ये साबित कर दिया है की उनकी राजनीति बंगाल के लिए नहीं है। वो बंगालियों के लिए भी नहीं है। उनकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ उस मुस्लिम वोट बैंक के लिए है जिसे तुष्टिकरण से पाला गया है, खौफ के बल पर कायम रखा गया है, और जिसकी कीमत बंगाल की गरिमा, सुरक्षा और भविष्य ने चुकाई है।
