उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) एक ऐसी पार्टी है जिसने उत्तराखंड के पहाड़ी लोगों को वो दिया जो पीढ़ियों से उनके पास नहीं था- एक आवाज़, एक ख़्वाब और उसके लिए लड़ने का बेखौफ जज़्बा। उन्होंने पुलिस की लाठियां खाईं। बंदूकों के आगे सीना तान कर खड़े रहे। जब पूरा देश सो रहा था, तब हाइवे पर उनकी औरतों की आबरू लूटी गई।
और आख़िरकार 9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड बना, तो सत्ता के गलियारों में UKD नहीं पहुँची। उत्तराखंड के ही लोगों ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। कुर्सी पर वही पार्टियां बैठीं जिन्होंने दशकों तक इस सपने का मज़ाक उड़ाया था, मांगों को अनसुना किया था और खटीमा, मसूरी से लेकर मुज़फ्फरनगर की सड़कों पर UKD कार्यकर्ताओं का खून बहते हुए चुपचाप तमाशा देखा था।
ये उसी की कहानी है। इसे पढ़ना आसान नहीं होगा। ये भारत के राजनेताओं और उत्तराखंड वासियों के चेहरों से नकाब उतारती है।
बरसों तक अनदेखी में रहे उत्तराखंड के पहाड़
UKD को समझने के लिए आपको पहले ये समझना होगा की आज़ादी के बाद के दशकों में ‘पहाड़ी’ होने का मतलब क्या था। गढ़वाल और कुमाऊं ने भारत को बेहतरीन फौजी दिए, पक्के तीर्थयात्री दिए और सबसे मेहनती नागरिक दिए। पर बदले में भारत ने, या यूँ कहें की यूपी सरकार ने उन्हें क्या दिया? जवाब है- सिवाय अवहेलना के कुछ भी नहीं!
यूपी के ये पहाड़ी ज़िले असल में मैदानी इलाकों के लिए सिर्फ़ एक ‘रिसोर्स कॉलोनी’ बनकर रह गए थे। उनके जंगलों से लकड़ियां काटी गईं, नदियों पर बांध बनाकर वो बिजली पैदा की गई जिससे गंगा के मैदानी शहर रोशन हुए। और उनके जवानों को सरहद पर वो सीमाएं पार करने के लिए भेज दिया गया, जिनका जश्न मैदानी नेता अपने एयर-कंडीशन्ड दफ़्तरों में बैठकर मनाते थे।
खड़ी सीढ़ीदार ढलानों पर खून-पसीना एक करता पहाड़ी किसान बस बेबसी से देखता रहा की कैसे उसके बच्चों को ढंग के स्कूल तक नसीब नहीं हुए। एक पहाड़ी माँ मीलों पैदल चलकर नज़दीकी सरकारी अस्पताल पहुँचती, तो पता चलता की वहाँ डॉक्टर ही नहीं है। नौकरी की तलाश में पहाड़ी नौजवान को दिल्ली, देहरादून या लखनऊ धक्के खाने पड़ते, क्योंकि घर पर तो रोज़गार के नाम पर कुछ था ही नहीं।
यूपी की एक के बाद एक सरकारों में मैदानी इलाकों का ही दबदबा रहा। उनके पास पहाड़ों के विकास के लिए न तो कोई राजनीतिक वजह थी और न ही प्रशासनिक इच्छाशक्ति। नुमाइंदगी तो बस एक भद्दा मज़ाक थी- यूपी विधानसभा में पहाड़ी विधायक मैदानी नेताओं की भीड़ में कहीं खोकर रह जाते थे।
विकास का सारा पैसा मैदानों की तरफ बह गया। सड़कों का तो बस ख्वाब ही देखा जा सकता था। पहाड़ों से शहरों की तरफ पलायन कोई चॉइस नहीं, बल्कि एक सज़ा बन गई थी। पहाड़ धीरे-धीरे खाली हो रहे थे, और सत्ता में बैठे किसी भी शख्स को न तो इसकी परवाह थी, और न ही कोई सुध। इसी सन्नाटे और बरसों से सुलग रहे गुस्से के बीच एंट्री होती है उत्तराखंड क्रांति दल की।
जब ज़ुल्म के खिलाफ उठी पहाड़ों की पहली हुंकार और UKD का जन्म
25 जुलाई 1979 को पौड़ी गढ़वाल में कुछ लोगों ने वो किया जो भारत की राजनीति में बहुत कम देखने को मिलता है। उन्होंने एक पार्टी बनाई- सत्ता के लिए नहीं, अपनी जेबें भरने के लिए नहीं, न ही किसी जातिगत वोट बैंक के लिए, बल्कि अपने लोगों के लिए।
UKD का जन्म सिर्फ एक, बिना किसी समझौते वाली मांग के साथ हुआ था: यूपी से अलग उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए एक अपना राज्य। एक ऐसा राज्य जहां पहाड़ी लोग अपनी सरकार खुद चला सकें, अपनी किस्मत खुद लिख सकें और दूर बैठे मैदानी हुक्मरानों के गुलाम बनकर रहने के बजाय आज़ाद सांस ले सकें।
UKD की नींव रखने वाले कोई पक्के राजनेता नहीं थे जो तरक्की की सीढ़ियां खोज रहे हों। वो तो स्कूल टीचर, वकील, सोशल वर्कर और आम इंसान थे, जो पहाड़ों की इस बेइज़्ज़ती को बहुत लंबे समय से झेल रहे थे।
देवकी नंदन उनियाल, दीवान सिंह बिष्ट और काशी सिंह ऐरी जैसे इसके संस्थापकों को अच्छे से पता था की अलग राज्य की मांग कोई सियासी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि ये तो उनके वजूद, उनकी इज्ज़त और पहचान की लड़ाई थी।
गढ़वाल और कुमाऊं की अपनी एक अलग संस्कृति थी, अपनी ज़बान थी, अपना भूगोल था और अपनी एकदम अलग समस्याएं थीं। उन्हें अपना एक राज्य चाहिए था, जिसे वो लोग चलाएं जो वहां रहते हों, जो उस मिट्टी को समझते हों और जिन्हें उसके कल की परवाह हो।
वैसे, जिस चीज़ ने UKD को भारत की बाकी सभी पार्टियों से अलग किया- और जिस वजह से आगे चलकर इसकी कहानी इतनी दर्दनाक हो गई- वो थी इसके इरादों की सच्चाई। उनकी कोई राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं थी। उन्होंने दिल्ली के पावर ब्रोकर्स के साथ कोई गठजोड़ नहीं किया।
अपनी विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया। सच्चे मायनों में, ये एक राजनीतिक पार्टी के लिबास में लोगों का अपना आंदोलन था। और भारत की इस भ्रष्ट, लेन-देन वाली राजनीति में इतनी सच्चाई की सज़ा तो मिलनी ही थी।
जब UKD के कार्यकर्ताओं ने खाली जेब और नंगे पैर ज़ुल्म के खिलाफ मोर्चा लिया
अपनी शुरुआत के बाद दस साल से भी ज़्यादा वक़्त तक, UKD सिर्फ अपने उसूलों और घिसते जूतों के दम पर लड़ती रही। पहाड़ों में उनकी पदयात्राओं को कवर करने के लिए कोई टीवी कैमरे नहीं थे। उनकी रैलियों में पैसा लगाने वाला कोई अमीर डोनर नहीं था।
उनकी आवाज़ को तेज़ करने के लिए सोशल मीडिया का तो नामोनिशान नहीं था। सच कहूं तो, शुरुआती सालों में तो नेशनल मीडिया ने इस मांग को घास तक नहीं डाली। कांग्रेस- जिसका उस दौरान यूपी और केंद्र दोनों जगह राज था- उसने इस राज्य की मांग को बस क्षेत्रवाद कहकर खारिज कर दिया। बीजेपी तब अपना राष्ट्रीय एजेंडा सेट करने में लगी थी, तो उसने भी उत्तराखंड के पहाड़ी लोगों की इन खास मांगों में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।
फिर भी, UKD के लोग चलते रहे। साल दर साल, उनके कार्यकर्ता गढ़वाल की पहाड़ियों और कुमाऊं की घाटियों में गांव-गांव भटके। किसानों, औरतों, रिटायर्ड फौजी भाइयों और छात्रों को समझाया की आखिर अलग राज्य हमारी ज़रूरत क्यों है। उन्होंने चुनाव लड़े, कुछ जगहों पर थोड़ी-बहुत पकड़ भी बनाई, लेकिन कभी वो कामयाबी नहीं मिली जिसके उनके बलिदान हकदार थे। लखनऊ और दिल्ली के सियासी दिग्गजों ने यह मान लिया था- और वो एक हद तक सही भी थे- की जिस पार्टी के पास न पैसा है, न मीडिया और न ही मसल पावर, उसे तो आराम से इग्नोर किया जा सकता है।
लेकिन ये नेता इस बात का अंदाज़ा लगाने में चूक गए की UKD किस हद के गुस्से को आवाज़ दे रही थी। हर अनसुना किया गया लेटर, हर ठुकराई गई मांग, और हर वो चुनाव जहां पैसे के दम पर पहाड़ी लोगों की उम्मीदों को कुचला गया- ये सब उस गुस्से के गुबार में भरता जा रहा था, जो 1994 आते-आते फटने के लिए बेताब था। और जब ये आग भड़की, तो इसे लगाने वाले भी इसकी लपटें देखकर दहल गए।
UKD का 1994 में वो इंक़लाब जिसने पूरे उत्तराखंड को बारूद बना दिया
साल 1994 में कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का ऐलान कर दिया। इसमें आरक्षण का जो दायरा बढ़ाया गया, वो उत्तराखंड के पहाड़ी समाज को अपनी ज़मीनी हकीकत के हिसाब से सरासर नाइंसाफी लगा।
लेकिन आरक्षण का ये मुद्दा तो बस एक माचिस की तीली भर था। बारूद तो UKD के 15 साल के संघर्ष और पहाड़ियों के दो सदी पुराने दर्द से पहले ही बिछ चुका था। जैसे ही तीली लगी, पूरा का पूरा उत्तराखंड सुलग उठा।
UKD ने वक़्त की नज़ाकत को समझा और एक बेहतरीन रणनीति के तहत आरक्षण के विरोध को अपनी पुरानी अलग राज्य की मांग के साथ जोड़ दिया। हर ज़िले, हर तहसील, हर गांव से एक ही आवाज़ उठी: अब वक़्त आ गया है की लखनऊ को वो सुनाया जाए जो दिल्ली सुनने को तैयार नहीं है।
लोगों का रिस्पॉन्स रोंगटे खड़े कर देने वाला था। औरतें अपने घर-बार छोड़कर सड़कों पर उतर आईं। छात्रों ने क्लास जाना छोड़ दिया। देश की सरहदों पर गोलियां खाने वाले पूर्व सैनिक सिविलियन कपड़े पहनकर जुलूसों में शामिल हो गए। टीचर, दिहाड़ी मज़दूर, दुकानदार, सरकारी बाबू- पूरा का पूरा पहाड़ी समाज अपनी पहचान और अपने गुस्से को लेकर एक साथ खड़ा हो गया।
लखनऊ में बैठी मुलायम सिंह सरकार ने इस बगावत को एक ऐसे मैदानी नेता की नज़रों से देखा, जिसने पहाड़ों को कभी सीरियसली लिया ही नहीं था। उन्होंने बातचीत नहीं की, कोई रियायत नहीं दी, यहाँ तक की उनकी बात सुनने की तमीज़ तक नहीं दिखाई। उनका जवाब थी- पुलिस। और इसके बाद पुलिस ने जो किया, वो उत्तराखंड के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का सबसे खूनी पन्ना बन गया- एक ऐसा पन्ना जिसे न तो कभी माफ़ किया जा सकता है और न ही कभी भुलाया जाना चाहिए।
खटीमा और मसूरी की वो गलियां जहाँ UKD के जांबाज अपना लहू बहाकर गिरे
1 सितंबर 1994। उधम सिंह नगर ज़िले का खटीमा। प्रदर्शनकारियों की एक भीड़- निहत्थे, शांतिपूर्ण, जिनमें से ज़्यादातर तो आम ग्रामीण थे जिन्होंने ज़िंदगी में कभी पुलिस या सरकार से सीधे पंगा नहीं लिया था- अपने हक़ के लिए जमा हुए थे। यूपी पुलिस ने, एक ऐसी सरकार के आदेश पर जो ये तय कर चुकी थी की पहाड़ों को सिर्फ लाठी और गोली की भाषा ही समझ आएगी, अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
उस दिन गिरने वालों में भुवन सिंह कोरंगा और प्रेम सिंह भंडारी भी थे- ये वो नाम हैं जो उत्तराखंड के हर स्कूल में पढ़ाए जाने चाहिए, वो नाम जो देहरादून की हर सरकारी इमारत के बाहर पत्थरों पर उकेरे जाने चाहिए।
उनके हाथों में कोई हथियार नहीं थे, बल्कि उनके दिलों में एक आज़ाद उत्तराखंड का सपना था। वो आतंकवादी नहीं थे। दंगाई नहीं थे। वो तो बस वो नागरिक थे जो भारत के संविधान में किए गए वादे मांग रहे थे: इंसाफ़, नुमाइंदगी और एक ऐसी सरकार जो उनका शोषण करने के बजाय उनकी सेवा करे।
पहाड़ों के आंसू अभी सूखे भी नहीं थे की अगले ही दिन- 2 सितंबर 1994 को- पुलिस ने मसूरी में एक जुलूस पर गोलियां चला दीं। जान गंवाने वालों में बेलमती देवी भी थीं। एक ऐसी औरत जिसका खून उस राज्य की पहाड़ी मिट्टी में जज़्ब हो गया, जो अभी पैदा भी नहीं हुआ था, पर अपनी बेटियों की शहादत से सींचा जा रहा था। एक औरत। सीने पर गोली। सिर्फ जुलूस निकालने के लिए। सिर्फ अपना हक़ मांगने के लिए।
ये कोई हादसे नहीं थे। ये डरी हुई पुलिस की कोई गलती नहीं थी। ये उस आवाम के खिलाफ जानबूझकर किया गया स्टेट वायलेंस था, जिसने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने की जुर्रत की थी। लखनऊ में मुलायम सिंह सरकार ने कोई माफ़ी नहीं मांगी। कोई जांच नहीं बैठाई। बल्कि वो तो और अड़ गए। और ऐसा करके उन्होंने ये तय कर दिया की आगे जो होने वाला है, वो आज़ादी के बाद भारत में अपने ही नागरिकों के खिलाफ सरकार की क्रूरता का सबसे शर्मनाक अध्याय बनेगा।
2 अक्टूबर 1994- रामपुर तिराहे का वो खौफनाक कत्लेआम जिसने UKD के आंदोलन की रूह को ज़ख्मी कर दिया
2 अक्टूबर 1994। गांधी जयंती। वो दिन जब पूरा देश राष्ट्रपिता का जश्न मनाता है- उस इंसान का जिसने अहिंसा पर पूरा आंदोलन खड़ा कर दिया। इसी दिन, हज़ारों उत्तराखंडी प्रदर्शनकारी दिल्ली की तरफ पैदल निकल पड़े। उनके पास कोई हथियार नहीं थे। उनके हाथों में सिर्फ बैनर थे, नारे थे, और पहाड़ी लोगों का वो अटूट विश्वास था की अगर वो राजधानी तक अपनी आवाज़ पहुँचा सके, तो उन्हें इंसाफ़ ज़रूर मिलेगा।
उन्हें पश्चिमी यूपी में मुज़फ्फरनगर के पास रामपुर तिराहे पर रोक लिया गया। इसके बाद जो हुआ वो भीड़ को तितर-बितर करने के लिए कोई हल्का लाठीचार्ज नहीं था। इसके बाद जो हुआ वो एक सोची-समझी, दरिंदगी भरी, इतनी अमानवीय हिंसा थी की आज भी, तीन दशक बाद भी, इसे याद करते हुए गले में एक ही वक्त पर गुस्सा और रुलाई दोनों आ जाते हैं।
प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से पीटा गया। उन पर गोलियां चलाई गईं। लेकिन सबसे भयानक, जिसकी कभी माफी नहीं मिल सकती- मार्च में शामिल औरतों के साथ पुलिस वालों ने तब छेड़छाड़ की और उनकी आबरू लूटी, जब उनके साथ आए आदमियों को पीट-पीट कर अधमरा किया जा रहा था।
वो औरतें जो गांधी जी के आदर्शों पर चलकर, बिना किसी हिंसा के, बहादुरी से और अपनी पूरी इज़्ज़त के साथ वहां आई थीं- उनकी इज़्ज़त वर्दी वाले उन भेड़ियों ने तार-तार कर दी। और ये सब एक ऐसी राज्य सरकार की पूरी शह पर हो रहा था जो पहाड़ी औरतों को इंसान ही नहीं समझती थी, जो मानती थी की एक ‘दिक्कत’ पैदा करने वाले आंदोलन को कुचलने के लिए ये सब तो चलता है।
रामपुर तिराहे पर कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। मरने वालों और रेप का शिकार होने वालों का सही आंकड़ा आज तक सरकारी फाइलों में उलझा हुआ है- क्योंकि जो सरकारें ज़ुल्म करती हैं, वो सबूत मिटाने में भी माहिर होती हैं। लेकिन जो ज़िंदा बच गए, उन्हें सब याद है। परिवारों को याद है। और उत्तराखंड को याद है। रामपुर तिराहा उत्तराखंड का जलियांवाला बाग है। ये वो मनहूस पल है जब एक अंग्रेज़ों जैसी मानसिकता वाली सरकार ने अपने ही लोगों पर सिर्फ इसलिए गोलियां और लाठियां बरसा दीं क्योंकि उन्होंने बराबरी का हक़ मांगा था।
रामपुर तिराहे के बाद जो देशव्यापी गुस्सा फूटा, वो इस पूरी दहशत में शायद एकमात्र उम्मीद की किरण था। भारत के वो अखबार- जिन्होंने UKD के बीस साल के संघर्ष को पूरी तरह इग्नोर कर दिया था- अब पश्चिमी यूपी के हाइवे से आ रही दरिंदगी की तस्वीरों से नज़रें नहीं चुरा सके। देश भर की विपक्षी पार्टियों ने अचानक इस ओर ध्यान देना शुरू कर दिया। उत्तराखंड का मुद्दा, जिसे अब तक सिर्फ इलाके की ज़िद कहकर टाला जा रहा था, उसे अचानक एक सिविल राइट्स मूवमेंट (नागरिक अधिकार आंदोलन) जैसी नैतिक ताकत मिल गई।
आंसुओं और जनाज़ों के कंधों पर आखिरकार हुआ उत्तराखंड का जन्म
रामपुर तिराहे के बाद, उत्तराखंड आंदोलन को वापस दबाया नहीं जा सकता था। UKD ने पंद्रह सालों के खून-पसीने से जो नैतिक ज़मीन तैयार की थी, अब उसे पूरे देश के गुस्से का लाउडस्पीकर मिल गया था। अलग राज्य की मांग को अब खारिज करना नामुमकिन हो गया था।
कांग्रेस, जिसने राजनीतिक हवा का रुख भांप लिया था, उसने ज़ुबानी सपोर्ट देना शुरू कर दिया। बीजेपी ने नए राज्य के चुनावी गणित और केंद्र की सत्ता पर अपनी नज़र गड़ाते हुए, 1996 और 1998 के चुनाव प्रचार में उत्तराखंड को औपचारिक रूप से अपना वादा बना लिया।
और आख़िरकार, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली बीजेपी की एनडीए सरकार ने इस वादे को पूरा किया। संसद में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पास हुआ, और 9 नवंबर 2000 को भारत के 27वें राज्य के रूप में उत्तराखंड- जिसका नाम शुरुआत में उत्तरांचल रखा गया था- अस्तित्व में आया। हिमालय की वादियां जश्न में डूब गईं। हर गांव, हर कस्बे, गढ़वाल और कुमाऊं के हर दूर-दराज़ कोने में लोग एक साथ नाचे भी और रोए भी। ये उस सपने के सच होने का पल था जिसकी कीमत उन्होंने अपने खून से चुकाई थी।
लेकिन UKD के दफ्तरों में एक अजीब सी खामोशी थी। एक ठंडी सी भावना। जिन लोगों ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था- जो 1979 में तब सड़कों पर उतरे थे जब कोई देख नहीं रहा था, जिन्होंने 80 के उस मायूसी भरे दशक में भी इस लौ को बुझने नहीं दिया, जिन्होंने 1994 में अपने साथियों को सड़कों पर भेजा और उन्हें टूटकर वापस आते या कभी वापस ही न आते देखा- वो लोग उस जश्न के शोर के पीछे का सच समझ रहे थे। राज्य तो बन गया था। पर इसे चलाएगा कौन? और क्या जिन लोगों ने इसके लिए असली कुर्बानियां दी थीं, उन्हें सत्ता की टेबल पर बैठने की कोई जगह मिली भी?
UKD के साथ किया गया वो ऐतिहासिक फरेब जिसने घर बनाने वालों को ही बेघर कर दिया
नए राज्य उत्तराखंड के 2002 के पहले विधानसभा चुनावों में, उत्तराखंड क्रांति दल- वो पार्टी जिसने इस राज्य को मुमकिन बनाया था- बुरी तरह हार गई। इसलिए नहीं की लोग भूल गए थे कि UKD ने क्या किया है। इसलिए नहीं की लोग एहसान फरामोश थे। बल्कि इसलिए क्योंकि भारत का लोकतंत्र, अपने आज के रूप में, विचारों या कुर्बानियों की कोई प्रतियोगिता नहीं है।
ये तो पैसे, संगठन, जातिगत गणित और मीडिया के दबदबे का खेल है। और इन सारे पैमानों पर, UKD उन पार्टियों के सामने कहीं टिक ही नहीं पाई, जिन्होंने दशकों से यही मशीनरी तैयार करने में अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी।
बीजेपी नए राज्य में एक राष्ट्रीय पार्टी के संसाधनों, राज्य का बिल पास कराने के क्रेडिट और एक ऐसे पॉलिटिकल नेटवर्क के साथ उतरी, जिसकी UKD तो कल्पना भी नहीं कर सकती थी।
कांग्रेस का रिकॉर्ड भले ही कितना ही दागदार रहा हो- आखिरकार मुलायम सरकार की ये हिंसा उसी दौर में हुई थी जब कांग्रेस ने इस पूरी यथास्थिति पर मौन सहमति दे रखी थी- फिर भी उसने अपने पैसे, स्थानीय रसूखदार परिवारों से उतारे गए उम्मीदवारों और बड़े-बड़े वादों के दम पर खुद को दोबारा खड़ा कर लिया। इन दो हाथियों के बीच, UKD- जो स्कूल मास्टरों, किसानों और खाली जेब लेकिन जज़्बे से भरे पहाड़ियों की पार्टी थी- बस कुचल कर रह गई।
नए राज्य के पहले चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाया गया। राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं ने कैश, शराब और एहसानों की वो झड़ी लगाई, जिसका मुकाबला करने के लिए UKD के पास न तो पैसा था और न ही उनकी ऐसी नीयत थी। देहरादून में बैठे मीडिया ने, जो बड़े विज्ञापनदाताओं और नेताओं की मुट्ठी में था, UKD की आवाज़ को कोई खास तवज्जो नहीं दी। जातिगत गुटबाज़ी- यूपी स्टाइल के चुनावी हथकंडे- नए राज्य में ज्यों के त्यों इम्पोर्ट कर लिए गए। उसी ने उस पहाड़ी एकता को चकनाचूर कर दिया जिसे बनाने में UKD ने अपने बीस साल खपा दिए थे।
नतीजा एक ऐतिहासिक त्रासदी के रूप में सामने आया। जिस पार्टी ने सबसे ज़्यादा दिया, उसे ही सबसे कम मिला। उनके नेता, जिनमें से कई अब बूढ़े हो चुके थे, धीरे-धीरे राजनीति से ओझल हो गए। उनके कार्यकर्ता, जिन्होंने 1994 में मार्च किया था और लाठियां-गोलियां खाई थीं, बस बेबसी से देखते रहे की कैसे वो नेता नई राजधानी के शानदार दफ्तरों में बैठ गए, जिन्होंने इस आंदोलन के लिए एक तिनका तक नहीं तोड़ा था।
शहीदों के परिवारों- भुवन सिंह कोरंगा, प्रेम सिंह भंडारी, बेलमती देवी, और रामपुर तिराहे के उन गुमनाम शहीदों के परिवारों को मूर्तियां मिलीं, स्मारक मिले और सरकारी प्रस्ताव मिले। जो उन्हें नहीं मिला, वो थी सत्ता। जो उन्हें नहीं मिला, वो था इंसाफ़।
2026 का उत्तराखंड – पच्चीस साल बाद दरकते पहाड़ों के बीच क्या आज भी ज़िंदा है UKD का वो सपना
उत्तराखंड बने पच्चीस साल हो चुके हैं, और अब ये तीखा सवाल पूछा जाना बहुत ज़रूरी है: क्या इस राज्य ने वो सब हासिल किया जिसका सपना UKD ने देखा था? क्या खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहे की शहादतों ने एक ऐसा राज्य बनाया जो सच में पहाड़ी लोगों के काम आ रहा है? 2026 में इसका जवाब एक बेहद खौफनाक ‘ना’ है- कम से कम उन पहाड़ी लोगों के लिए तो बिल्कुल, जिन्होंने इस राज्य को बनाने के लिए सबसे भारी कीमत चुकाई थी।
‘घोस्ट विलेज’ का संकट पच्चीस साल के राज-काज पर उत्तराखंड का सबसे बड़ा तमाचा है। 2000 में अपने गठन के बाद से, उत्तराखंड में 1,806 से ज़्यादा गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं- जिन्हें आज बड़ी रुलाई के साथ “भूतहा गांव” कहा जाता है। वो घाटियां जहां कभी बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, मेले लगते थे और सीढ़ीदार खेतों में हरियाली होती थी, वहां आज मुर्दा शांति पसरी है।
पहाड़ों में जो आबादी बची है, उसमें ज़्यादातर बूढ़े और गरीब लोग हैं, जो उस पलायन की लहर में पीछे छूट गए हैं जिस पर सरकारें बस बड़ी-बड़ी बातें करती हैं, लेकिन काम कुछ नहीं करतीं। ‘रूरल डेवलपमेंट एंड माइग्रेशन प्रिवेंशन कमीशन’ के मुताबिक, पलायन करने वालों में से 50% से ज़्यादा ने इसकी सबसे बड़ी वजह विकास की कमी को बताया, और 15% ने खराब शिक्षा को- और ये दोनों ही सरकार की नाकामी हैं, न कि पहाड़ के भूगोल की।
युवाओं की बेरोज़गारी का हाल भी उतना ही डरावना है। उत्तराखंड में युवाओं की बेरोज़गारी दर करीब 20% है- जो राष्ट्रीय औसत 15% से कहीं ज़्यादा है। पहाड़ी ज़िलों के पढ़े-लिखे युवाओं का हाल तो और भी बुरा है- लगभग 40% ग्रेजुएट आज दर-दर भटक रहे हैं। ये महज़ कोई आंकड़े नहीं हैं। ये उन लोगों के बेटे-बेटियां हैं जिन्होंने 1994 की सड़कों पर मोर्चा संभाला था, जिन्हें लगा था की एक अलग राज्य का मतलब एक बेहतर कल होगा।
आज वही बच्चे लाखों की तादाद में पहाड़ छोड़कर दिल्ली, देहरादून, हरिद्वार और न जाने कहां-कहां धक्के खा रहे हैं, क्योंकि जिन पहाड़ों के लिए उनके दादा-परदादा लड़े और मरे, वो पहाड़ आज भी उन्हें दो वक्त की रोटी नहीं दे सकते।
जोशीमठ का संकट इस बात का जीता-जागता प्रतीक बन चुका है की उत्तराखंड को किस बुरे तरीके से चलाया गया है। दिसंबर 2022 से दिसंबर 2024 के बीच, हिमालय का ये प्राचीन शहर 30 सेंटीमीटर से ज़्यादा धंस गया- पूरे के पूरे मोहल्लों में दरारें आ गईं, 868 से ज़्यादा घरों की दीवारें फट गईं, और परिवारों को बेघर होना पड़ा, जिन्हें खुद नहीं पता था की वो जाएं तो जाएं कहां। जोशीमठ पुराने भूस्खलन के मलबे पर बसा है- ये बात भूवैज्ञानिकों ने 1976 की एक सरकारी रिपोर्ट में साफ-साफ बता दी थी।
लेकिन करीब पांच दशकों तक इन चेतावनियों को कचरे के डिब्बे में डाला गया। कंस्ट्रक्शन चलता रहा, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स ने पहाड़ों की नाज़ुक छाती को छलनी कर दिया, और बिना किसी ढंग के पर्यावरण आकलन के हाईवे चौड़े किए गए। नतीजा? एक पूरा शहर ज़मीन में समा रहा है-देवभूमि के अंधाधुंध विकास ने जो तबाही मचाई है, ये उसका सबसे खौफनाक और सीधा उदाहरण है।
पूरे राज्य में विकास का यही बदसूरत पैटर्न हावी है: सरकार का सारा ध्यान उन बड़े और दिखने वाले प्रोजेक्ट्स पर रहता है- हाईवे, बड़े-बड़े होटल, शहरी टूरिज़्म- जिनसे पैसा और पब्लिसिटी मिलती है। जबकि गांवों के स्कूल, हेल्थ सेंटर, वॉटरशेड मैनेजमेंट और पहाड़ों में रोज़गार जैसे बुनियादी और ज़रूरी कामों को एकदम दरकिनार कर दिया गया है।
ज़ाहिर है, एक दूर-दराज़ के गांव में एक चलता-फिरता अस्पताल बनाने से ज़्यादा जरुरी एक नई रिंग रोड बनाना है। एक पहाड़ी स्कूल में मास्टर जी की नियुक्ति करने से ज़्यादा अच्छी हेडलाइन ‘चार धाम हाईवे’ प्रोजेक्ट से मिलती है। और इसी चकाचौंध के बीच पहाड़ खाली होते जा रहे हैं, युवा पलायन कर रहे हैं और नेता बस फीते काटने में बिज़ी हैं।
गोलियां अपनों ने खाईं और राज गैरों को सौंप दिया, क्या उत्तराखंड अपनी ही जड़ों से गद्दारी कर रहा है?
पर सच तो ये है की सबसे बड़ी त्रासदी खुद उत्तराखंड के लोगों की है। एक के बाद एक हर चुनाव में यहाँ की जनता ने जानबूझकर UKD से अपना मुँह मोड़ा है- उसी UKD से, जो पहाड़ों की असली पहचान, यहाँ की ज़मीन की समझ और 1994 की उन कुर्बानियों की इकलौती वारिस है।
इसके बजाय, लोगों ने अपना वोट कांग्रेस और बीजेपी की झोली में डाल दिया। ये वही पार्टियां हैं जो या तो आंदोलन में बहुत देर से कूदीं या फिर उसे कुचलने में शामिल थीं। लोग लुभावने वादों, जाति के गणित और बड़ी पार्टियों के तामझाम में ऐसे फंसे की उन शहीदों और गोलियों को ही भूल गए जिनके दम पर आज ये राज्य खड़ा है।
ये सामूहिक नासमझी, और महज़ झूठी स्थिरता या पार्टी की वफादारी के लिए अपनों को भूल जाने की ये बीमारी उसी उपेक्षा को बढ़ावा दे रही है जिसे खत्म करने के लिए आंदोलन हुआ था। वही लोग, जिन्होंने कभी अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, आज वोट डालते वक़्त इतने लापरवाह हो गए हैं की अपने ही पहाड़ों को अंदर से खाली होता देख रहे हैं।
वोटरों की ये भूलने की आदत सिर्फ अहसान-फरामोशी नहीं है, बल्कि ये खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। ये उत्तराखंड को वापस उसी बर्बादी और गुलामी की ओर धकेल रहा है।
सच्चा इंसाफ़ सिर्फ साल में एक बार शहीदों की मूर्तियों पर फूल चढ़ा देने से नहीं होगा। इसके लिए उस इंक़लाबी जज़्बे को फिर से जगाना होगा। इसका मतलब है- UKD जैसी क्षेत्रीय आवाज़ों को ताकत देना, बिना किसी देरी के गैरसैंण को पूरी तरह से पहाड़ी राजधानी बनाना, और ऐसी नीतियां लाना जो स्थानीय रोज़गार और खेती के ज़रिए पलायन की इस आग को रोक सकें।
हमें अपने पहाड़ों की रक्षा उस तथाकथित ‘विकास’ से करनी होगी जो सिर्फ यहाँ की कुदरत को नोचना जानता है। इन पहाड़ों को वो स्वशासन चाहिए जिसकी बुनियाद खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहे के खून से लिखी गई थी- न कि वो हुकूमत जो दूर बैठे ‘हाईकमान’ के इशारों पर चले।
गोलियां तो अब थम गई हैं, लेकिन एक असली उत्तराखंड के लिए- एक ऐसा राज्य जो उन बेमिसाल कुर्बानियों के लायक हो- जंग आज भी जारी है। जब तक यहाँ के लोग अपनी इस चुनावी नींद से नहीं जागते और उन लोगों का कर्ज नहीं उतारते जिन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाई थीं, तब तक ये सपना अधूरा ही रहेगा और हिमालय यूँ ही खामोश आंसू रोता रहेगा। जिन UKD क्रांतिकारियों ने अपनी जान देकर ये राज्य बनाया है, उन्हें सिर्फ यादों में नहीं, बल्कि इस राज्य की सत्ता में भी उनका असली हक़ मिलना ही चाहिए।
