आपको 18 जून 2025 का दिन तो याद ही होगा। इसी दिन आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले में पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की एक राजनीतिक रैली गुज़र रही थी। इस रैली में 50 गाड़ियों का काफिला जा रहा था। इसी रैली में 55 साल का चीली सिंगैया नाम का एक प्लंबर भी था, जो रैली की भीड़ के कारण वहां फंस गया था। और आपको पता है उसके साथ क्या हुआ? वो भीड़ की वजह से अचानक फिसलता है और सीधे गाड़ी के पहियों के नीचे आ जाता है। आप यकीन नहीं करेंगे की पूर्व मुख्यमंत्री की खुद की गाड़ी का आगे वाला पहिया सिंगैया की गर्दन को कुचलता हुआ निकल जाता है। उसकी वहीं पर मौत हो जाती है।
ये कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं है। ये तो एक पुरानी बीमारी है, जिसका बाकायदा एक नाम है- ‘VIP कल्चर’। और ये कल्चर दशकों से आम नागरिकों को उन्हीं की टैक्स की कमाई से बनी सड़कों पर परेशान कर रहा है और कुचल रहा है, जबकि उनके अपने ‘चुने हुए सेवक’ काले शीशों वाली गाड़ियों में बैठकर आराम से गुज़र जाते हैं।
अब ज़रा इस नज़ारे की तुलना सीमा पार नेपाल से कीजिए। 27 मार्च 2026 को नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह अपने अफसरों के सामने खड़े होकर ऐलान करते हैं की वीआईपी मूवमेंट के नाम पर जनता को परेशान करना लोकतंत्र का सरेआम मज़ाक है। उन्होंने कोई दिखावटी कमेटी नहीं बनाई। सीधा फरमान जारी कर दिया की वीआईपी लोगों- यहां तक की प्रधानमंत्री- के लिए भी रास्ते रोकना अभी के अभी बंद किया जाए।
उसी हफ्ते प्रधानमंत्री द्वारा पुलिस को खुली छूट दे दी गई की सरकारी गाड़ियों को भी बिल्कुल वैसे ही रोककर चेक किया जाए जैसे आम नागरिक की गाड़ी होती है। किसी के रुतबे या पद की कोई परवाह नहीं। कोई छूट नहीं।
एक देश का नेता 50 गाड़ियों का काफिला लेकर निकलता है- वो भी तब जब उसे ऐसा करने से साफ़ मना किया गया था- और एक आदमी को कुचल कर मार डालता है। वहीं दूसरी तरफ एक और देश की सरकार है, जो सत्ता में आने के कुछ ही दिनों के भीतर उस पूरे सिस्टम को ही जड़ से उखाड़ फेंकती है जिसकी वजह से ऐसे काफिले बन पाते हैं।
आखिर ये VIP कल्चर है क्या, और ये सिर्फ हमारे ही देश में इतना भद्दा क्यों है
भारत के किसी भी बड़े शहर में चले जाइए, ये नज़ारा आम है। किसी भी मंत्री का काफिला ट्रैफिक को ऐसे चीरता हुआ निकलता है जैसे किसी दुश्मन देश की फौज कब्ज़ा करने आई हो। दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी हेडलाइट्स जलाकर बाइकों पर चलते गार्ड्स आगे-आगे रास्ता बनाते हैं। एक पायलट कार जो हर आम गाड़ी को रुकने पर मजबूर कर देती है।
उसके पीछे बॉडीगार्ड्स, स्टाफ, प्रेस वालों और प्रोटोकॉल अफसरों की दर्ज़नों गाड़ियां। पुलिसवालों को उनकी असली ड्यूटी से हटा दिया जाता है, किलोमीटरों तक सड़कें खाली करवा ली जाती हैं, और आम जनता को फुटपाथ पर खड़ा कर दिया जाता है कि भई, पहले राजा साहब को गुज़र जाने दो।
सच कहूं तो ये कोई सिक्योरिटी नहीं है। ये महज़ एक नौटंकी है। सत्ता का ऐसा भौकाल, जिसका पूरा खर्चा आम आदमी के टैक्स के पैसों से निकलता है, और जिसका इकलौता मकसद आपको ये अहसास दिलाना है की आप नौकर हैं और वो मालिक।
विकसित देशों में ऐसा तमाशा नहीं होता। जर्मनी की चांसलर आम फ्लाइट्स में सफर करती हैं। कनाडा का पीएम एयरपोर्ट पर लाइन में लगता है। न्यूज़ीलैंड की पूर्व पीएम शुरुआत में खुद गाड़ी चलाकर ऑफिस जाती थीं। स्कैंडिनेवियाई देशों के नेता तो साइकिल पर घूमते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति को सबसे ज़्यादा खतरा है, फिर भी उनका एक तय रूट होता है, वे रूटीन सफर के लिए पूरे के पूरे शहर को बंधक नहीं बनाते।
लेकिन हमारे नेताओं ने तो अपनी मूवमेंट के इर्द-गिर्द वीआईपी अधिकारों का एक पूरा ईको-सिस्टम ही खड़ा कर लिया है। लाल बत्ती, हूटर, पायलट कार, एडवांस पुलिस एस्कॉर्ट, और 10 मिनट से लेकर घंटे भर तक चलने वाले रोड ब्लॉक- ये सब इसलिए नहीं की लोकतंत्र को इसकी ज़रूरत है, बल्कि इसलिए क्योंकि सत्ता को अपना रौब झाड़ना है।
एक नेता के पीछे दौड़ती बीस-बीस गाड़ियां- तुम्हारी जेब काटकर सजाया गया सत्ता का भौकाल
ये गाड़ियों का काफिला सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। इसका सीधा-सीधा आर्थिक बोझ हर टैक्सपेयर की कमर तोड़ रहा है।
हमारे यहां X-कैटेगरी (दो हथियारबंद जवान) से लेकर Z+ तक का सिस्टम है, जिसमें एडवांस सिक्योरिटी लायजन (ASL) के तहत 36 या उससे ज़्यादा कमांडो, पुलिस की गाड़ियां और जैमर वगैरह शामिल होते हैं।
प्रधानमंत्री की सुरक्षा में एसपीजी, आर्मर्ड मर्सिडीज-मेबैक S650, 12 फॉर्च्यूनर, एक मर्सिडीज-बेंज एंबुलेंस और जैमर गाड़ियां चलती हैं। देश के सबसे बड़े नेता के लिए ये बात समझ में आती है और संवैधानिक रूप से सही भी है।
लेकिन सवाल ये है की किसी शांत इलाके के राज्य मंत्री को 8-12 गाड़ियों की क्या ज़रूरत है? एक लोकल MLA चार SUV और पायलट कार लेकर क्यों घूमता है? एक VIP “शायद” गुज़रेगा, बस इसी अंदेशे में ट्रैफिक पुलिस घंटों तक चौराहे ब्लॉक करके रखती है (और कई बार तो वो गुज़रता भी नहीं है)- इस बात का क्या तुक है?
अकेले CRPF देश के 56 खास लोगों की सुरक्षा में लगी है। राज्यों में तो अनगिनत नेताओं को Y से लेकर Z+ सिक्योरिटी मिली हुई है। इन सब पर हर साल करोड़ों रुपये फूंके जाते हैं- चाहे वो सैलरी हो, पेट्रोल हो या गाड़ियों का मेंटेनेंस। ये सारा पैसा उसी खज़ाने से जाता है जो गांव के अस्पतालों, सरकारी स्कूलों और छोटे शहरों की सड़कों के नाम पर हमेशा खाली रहता है।
राज्यों के स्तर पर तो ये घमंड और भी खतरनाक हो जाता है। यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मंत्री ऐसे काफिले लेकर आते हैं की कोई छोटी-मोटी सेना भी शरमा जाए। आंध्र प्रदेश के पूर्व सीएम वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी उस वक्त कुख्यात हो गए जब उनकी पदयात्रा में लगभग 50 गाड़ियों का काफिला चलता था, जबकि पुलिस ने सिर्फ तीन की इजाज़त दी थी।
जानबूझकर नियम तोड़ने का नतीजा? इन काफिलों के चक्कर में कम से कम तीन लोगों की जान चली गई, जिनमें एक नौजवान भी था जिसकी एंबुलेंस फंसी रह गई और समय पर इलाज न मिलने से उसकी मौत हो गई।
एक आदमी के लिए पचास गाड़ियां। और वो भी उन लोगों के टैक्स के पैसों पर, जो एक बस का टिकट तक मुश्किल से खरीद पाते हैं।
जब VIP काफिले बेगुनाहों की जान ले लेते हैं
ये कोई कोरी कल्पना नहीं है। कोई कहावत नहीं है। भारत में वीआईपी काफिलों ने सच में लोगों की जान ली है।
बेंगलुरु के जेसी रोड पर टाउन हॉल जंक्शन के पास एक 108 एंबुलेंस को रोक कर रखा गया क्योंकि सीएम सिद्धारमैया का काफिला गुज़र रहा था। चश्मदीदों ने बताया की काफिला गुज़रने में पूरे दस मिनट लगे और तब तक सारा ट्रैफिक ब्लॉक था। एंबुलेंस का सायरन बज रहा था, लाइटें जल रही थीं, लेकिन किसी ने बैरिकेड नहीं हटाया। मरीज को इमरजेंसी में रेफर किया गया था। बाद में सरकार ने बेशर्मी से कह दिया की मरीज ‘स्टेबल’ था।
केरल में तो हद ही हो गई। कोट्टारक्कारा के पास शिक्षा मंत्री वी. शिवनकुट्टी की पायलट गाड़ी रॉन्ग साइड से तेज़ रफ्तार में आई और एक एंबुलेंस से सीधे जा भिड़ी। एंबुलेंस पलट गई, मरीज समेत तीन लोग घायल हो गए। और पता है पुलिस ने केस किस पर दर्ज किया? मंत्री पर नहीं। एंबुलेंस ड्राइवर पर! ऐसा भद्दा मज़ाक तो कोई सोच भी नहीं सकता।
बिहार में सीएम नीतीश कुमार के काफिले के लिए एक एंबुलेंस को रोके जाने का वीडियो सामने आया। मरीज पटना के अस्पताल जा रहा था, उसकी हालत गंभीर थी, लेकिन वहां प्रोटोकॉल निभाया जा रहा था और राज्य के मुखिया गुज़र रहे थे।
उधर जोधपुर में स्वतंत्रता दिवस के दिन एक बच्चा वीआईपी ट्रैफिक में फंसी एंबुलेंस में दम तोड़ गया। आज़ादी का जश्न मनाते हुए एक आम भारतीय बच्चे ने ताकतवर लोगों के घमंड की कीमत अपनी जान देकर चुकाई।
नेपाल के उस 35 साल के रैपर-प्रधानमंत्री ने 72 घंटे में वो कर दिखाया जो हमारे ‘अनुभवी’ नेता दशकों में न कर पाए
27 मार्च 2026 की दोपहर 12:34 बजे.. 35 साल के बालेन्द्र ‘बालेन’ शाह नेपाल के पीएम बने। एक सिविल इंजीनियर। रैपर। काठमांडू का पूर्व मेयर जिसने रसूखदारों के अवैध कब्ज़े बुलडोज़र से गिरा दिए थे और एक दबी हुई नदी को वापस ज़िंदा किया था। नेपाल के इतिहास में सबसे कम उम्र का पीएम।
एक ऐसा इंसान जिसने पहले कभी कोई राष्ट्रीय पद नहीं संभाला था। उसकी पार्टी (राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी) ने 275 में से 182 सीटें जीतकर लगभग सुपरमैजॉरिटी हासिल की थी। ये सब सितंबर 2025 में हुए जेन ज़ी (Gen Z) के उस विद्रोह की वजह से हुआ था, जिसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले 76 युवाओं को पुरानी सरकार की फोर्स ने मार डाला था।
अब ज़रा देखिए की सत्ता में आने के शुरुआती 72 घंटों के भीतर इस नई सरकार ने किया क्या:
27 मार्च की उसी शाम, पहली ही कैबिनेट मीटिंग में सितंबर की मौतों पर आई कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का आदेश दे दिया गया, और 100-टास्क का गवर्नेंस एजेंडा पब्लिक के लिए जारी कर दिया गया। अगली सुबह, नेपाल के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक और चार बार के पीएम रहे के.पी. शर्मा ओली को क्रिमिनल नेग्लिजेंस के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
उसी दिन पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक भी अरेस्ट हुए। कुछ ही दिनों के भीतर, तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू हो गई। एक और पूर्व मंत्री करप्शन के चार्ज में धरा गया। सालों से धूल खा रही भ्रष्टाचार की फाइलें सरकारी एजेंसियों ने दोबारा खोल दीं।
वीआईपी कल्चर पर तो सीधे चोट की गई: नेपाल के गृह मंत्री सूदन गुरुंग ने आदेश दे दिया की वीआईपी काफिलों के लिए अब कोई सड़क ब्लॉक नहीं होगी।
उन्होंने सबसे तगड़ा लॉजिक दिया- की एंबुलेंस रोकी गई हैं, गर्भवती महिलाओं ने तकलीफ झेली है- और उन्होंने इसे लोकतंत्र का मज़ाक करार दिया। पुलिस को आदेश दे दिया गया की सरकारी गाड़ियों की चेकिंग भी वैसे ही होगी जैसे आम जनता की गाड़ियों की होती है। कोई छूट नहीं। कोई प्रोटोकॉल नहीं चलेगा।
1990 से लेकर अब तक के हर नेता, मंत्री और सरकारी अधिकारी की संपत्ति की जांच के लिए हाई-लेवल कमेटियां बना दी गईं। सिर्फ पिछले चुनाव या पिछले पांच साल का हिसाब नहीं… पूरे तीन दशक की पब्लिक वेल्थ खंगाली जाएगी।
इतना ही नहीं, नागरिकों के लिए ये 100-टास्क का एक्शन प्लान ऑनलाइन भी डाल दिया गया ताकि हर कोई रियल-टाइम में ट्रैक कर सके की सरकार कितना काम कर रही है।
एक ऐसा देश जिसकी जीडीपी पर कैपिटा महज़ $1400 है, जहां आबादी का पांचवां हिस्सा भयंकर गरीबी में जीता है, और जहां 1990 से लेकर अब तक 32 सरकारें बदल चुकी हैं- और किसी एक ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया- उस देश ने ये सब सिर्फ 72 घंटे में कर दिया।
और हम? दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत से एक राज्य मंत्री का काफिला 5 गाड़ियों तक सीमित नहीं किया जाता!
चुनाव में फकीर और जीतते ही कुबेर- जनता की आंखों में धूल झोंककर जमा की गई नेताओं की संपत्ति
सड़कों पर दिखने वाला वीआईपी कल्चर अगर सामने दिखने वाला कैंसर है, तो नेताओं की छुपायी गई दौलत वो अदृश्य बीमारी है जो शायद और भी ज़्यादा जानलेवा है।
ADR (Association for Democratic Reforms) के आंकड़े दिमाग हिला देने वाले हैं। चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामों के आधार पर ADR ने 102 ऐसे सांसदों का एनालिसिस किया जो 2014, 2019 और 2024 में चुनाव जीते थे। उनकी औसत घोषित संपत्ति 10 सालों में ₹15.76 करोड़ से बढ़कर ₹33.13 करोड़ हो गई (यानी 110% का इज़ाफा)।
2024 के लोकसभा चुनावों में 543 में से 504 जीतने वाले उम्मीदवार (यानी 93%) करोड़पति निकले। 2009 में ये आंकड़ा 58% था, 2014 में 82% और 2019 में 88%। पिछले पंद्रह सालों में भारत की संसद लोकतांत्रिक दुनिया के सबसे ‘अमीर और एक्सक्लूसिव’ क्लबों में से एक बन चुकी है।
कुछ नेताओं का हिसाब तो और भी डरावना है। एक बीजेपी सांसद की घोषित संपत्ति 2014 से 2024 के बीच ₹60.60 करोड़ से बढ़कर ₹223.12 करोड़ हो गई (यानी दस साल में ₹162.51 करोड़ की बढ़ोतरी)। एक और सांसद की दौलत तो इसी दौरान 747% बढ़ गई। ADR का डेटा बताता है कि 2024 में चुने गए सांसद आम शहरी भारतीय परिवार से औसतन 27 गुना ज़्यादा अमीर हैं।
और याद रखिए, ये तो बस वो है जो वो खुद बताते हैं! असली झोल तो भारत के डिस्क्लोज़र सिस्टम में है: ये हलफनामे खुद नेता भरते हैं। चुनाव आयोग के पास इन्हें लगातार क्रॉस-चेक करने का कोई पुख्ता तरीका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट तक ने फैसला सुनाया है की हर एसेट बताना ज़रूरी नहीं- सिर्फ वही बताएं जो उनके सार्वजनिक पद से जुड़ा हो।
ऐसे में नेता अपनी प्रॉपर्टीज़ ये कहकर बड़ी आसानी से छुपा ले जाते हैं की इसका उनकी “पब्लिक इमेज” से कोई लेना-देना नहीं है। कोई ऑडिट नहीं होता। इनकम टैक्स रिटर्न से रियल-टाइम मैचिंग नहीं होती। कोई ऐसा पब्लिक पोर्टल नहीं है जहां आम नागरिक साल-दर-साल, एक-एक प्रॉपर्टी का कच्चा-चिट्ठा देख सके।
सज़ा के नाम पर तकनीकी रूप से बस जुर्माना और 6 महीने की जेल का प्रावधान है। लेकिन असल ज़िंदगी में, किसी बैठे हुए नेता पर इस सिस्टम का ढंग से कभी इस्तेमाल नहीं हुआ। नतीजा ये है की नेताजी ₹2 करोड़ की संपत्ति बताकर ऑफिस में घुसते हैं और दस साल बाद जब ₹50 करोड़ लेकर निकलते हैं, तो सरकारी जवाब मिलता है- “प्रॉपर्टी के रेट बढ़ गए होंगे।”
नेपाल 1990 से जमा की गई संपत्ति की जांच कर रहा है, और हमारे यहां पिछले साल का डिक्लेरेशन ही ढंग से वेरीफाई नहीं हो पाता।
RTI और नेताओं की संपत्ति पर सवाल पूछने वालों की लाशें
RTI (सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005) भारत का अब तक का सबसे दमदार हथियार था। सालों से एक्टिविस्ट्स ने इसका इस्तेमाल करके काफिलों का खर्चा, सिक्योरिटी का दुरुपयोग और नेताओं की संपत्ति की पोल खोली है।
लेकिन इसकी उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है। RTI कार्यकर्ताओं को डराया गया, पीटा गया, और कई मामलों में उनका मर्डर तक कर दिया गया। डेटा के मुताबिक, जब से ये कानून लागू हुआ है तब से अब तक 100 से ज़्यादा RTI एक्टिविस्ट मारे जा चुके हैं।
जानकारी तो है, और मांगने की हिम्मत भी है। लेकिन हमारे यहां ऐसा कोई सिस्टम ही नहीं है जो पारदर्शिता को अपवाद की जगह ‘डिफ़ॉल्ट’ बना दे। नेपाल ने जो पब्लिक प्रॉपर्टी पोर्टल अनाउंस किया है, भारत में वैसी कोई चीज़ नहीं है- एक ऐसा लाइव और अपडेटेड इंडिपेंडेंट डेटाबेस जहां हर पब्लिक अधिकारी की पूरी दौलत हमेशा मौजूद हो, सिर्फ चुनाव के वक़्त नहीं, बल्कि उनके पूरे कार्यकाल के दौरान।
हमारा मौजूदा सिस्टम नेताओं पर भरोसा करता है की वो चुनाव के वक्त हलफनामा भरेंगे और सच बोलेंगे। जिस देश में 2024 के 46% जीते हुए सांसदों पर खुद के बताए क्रिमिनल केस चल रहे हों (जो 2009 में 30% थे), वहां राजनेताओं की ईमानदारी पर भरोसा करना, हर चुनाव और हर साल गलत साबित हुआ है।
भारत को क्या करना चाहिए- वो सात कड़क मांगें जिन पर रत्ती भर भी कोई समझौता नहीं होगा
अब यहां शिष्टाचार से सुझाव देने का वक़्त जा चुका है। इस देश के आम आदमी ने बहुत सब्र कर लिया। अब सीधी-सीधी मांगें ये हैं:
एक- कानून से तय हो काफिले की लिमिट: कोई मनमर्जी नहीं। कानून बनाकर तय किया जाए की हर संवैधानिक पद के लिए कितनी गाड़ियां मिलेंगी, और नियम टूटा तो क्रिमिनल केस हो। राज्य मंत्री को 3 से ज़्यादा और सीएम को 5 से ज़्यादा गाड़ियां नहीं मिलेंगी। उल्लंघन होने पर जब तक जांच चले, सिक्योरिटी सस्पेंड हो।
दो- हर सरकारी पद वाले का रियल-टाइम पब्लिक एसेट पोर्टल: चुनाव के वक्त वाला हलफनामा नहीं। एक लाइव, लगातार अपडेट होने वाला पोर्टल- जिसे हर नागरिक देख सके- जहां हर सांसद, विधायक और बड़े अफसर की प्रॉपर्टी, बैंक अकाउंट, बिज़नेस और कमाई का ज़रिया साफ लिखा हो। हर साल अपडेट हो, इंडिपेंडेंट ऑडिट हो, और इनकम टैक्स फाइलिंग से क्रॉस-चेक हो।
तीन- सरकारी गाड़ियों की चेकिंग का पुलिस को अधिकार: बिल्कुल नेपाल की तरह। सरकारी नंबर प्लेट मतलब ‘ऑटोमैटिक पास’ नहीं। ट्रैफिक पुलिस को पूरा हक और बैकअप होना चाहिए की वो किसी भी सरकारी गाड़ी को रोक सके, चेक कर सके और मंत्री की गाड़ी का भी चालान काट सके। रेड लाइट जंप की तो चालान कटेगा। बात ख़त्म।
चार- काफिले से हुई मौत पर क्रिमिनल केस: वीआईपी मूवमेंट से रुकी एंबुलेंस या काफिले की टक्कर से अगर किसी की जान जाती है, तो कोई इंटरनल जांच या डिपार्टमेंटल इन्क्वायरी नहीं चलेगी। बाकायदा FIR हो और क्रिमिनल ट्रायल चले, जिसमें उस काफिले को मंज़ूरी देने वाला सबसे सीनियर अफसर मुख्य आरोपी बने।
पांच- रूटीन सफ़र के लिए पहले से सड़कें बंद करना फौरन रुके: एडवांस सिक्योरिटी लायजन के नियमों में ऐसा बदलाव हो की राजनेताओं के रोज़मर्रा के सफर के लिए सड़कें बंधक न बनाई जाएं। हां, कोई इमरजेंसी हो, बड़ा सरकारी कार्यक्रम हो या कोई तय हाई-सिक्योरिटी मूवमेंट हो, तो बात अलग है- लेकिन किसी मंदिर, शादी-ब्याह या पब्लिक इवेंट में जाने के लिए सड़क रोकना बिल्कुल बंद होना चाहिए।
छह- नेपाल की तरह पिछली संपत्तियों की जांच: सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन हो, जो कम से कम पिछले 15 सालों के सभी मौजूदा और पूर्व सांसदों/विधायकों की संपत्ति की जांच करे। एक स्वतंत्र अथॉरिटी (जिसके पास इनकम टैक्स का एक्सेस हो) बिना किसी राजनीतिक दबाव के जांच करे और रिपोर्ट पब्लिक करे।
ये कोई बहुत क्रांतिकारी मांगें नहीं हैं। एक ऐसे लोकतंत्र में ये तो सबसे बेसिक चीज़ें हैं, जो अपने नागरिकों को प्रजा नहीं, बल्कि मालिक समझता हो।
सड़कें हमारे टैक्स से बनी हैं, तो फिर ये नेता किस बात के सामंती राजा बनकर हमारी छाती पर नांच रहे हैं
नेपाल ने ये बहुत कड़वे तरीके से सीखा की जब सरकारें अपने ही नागरिकों को ‘बोझ’ या ‘अड़चन’ समझने लगती हैं, तो क्या होता है। काठमांडू की सड़कों पर 76 युवाओं की जान गई, तब जाकर वो पुराना सड़ा हुआ सिस्टम उखड़ा। आज वहां एक 35 साल का रैप लिखने और स्ट्रक्चरल लोड नापने वाला इंसान सरकार चला रहा है, क्योंकि दूसरा विकल्प वही था- दशकों तक सड़कों पर जाम लगाना और करोड़ों का घपला करना।
भारत में अभी हमारा ‘सितंबर 2025’ नहीं आया है। लेकिन गुस्सा तो वही है न। उस आम आदमी की हताशा वही है जो चिलचिलाती धूप में अपने बच्चे के साथ फुटपाथ पर खड़ा होकर किसी वीआईपी का काफिला गुज़रने का इंतज़ार करता है। उस परिवार का गुस्सा वही है जिसके अपने ने ट्रैफिक में फंसी एंबुलेंस में दम तोड़ दिया। और उस टैक्सपेयर की घुटन भी वही है जो अपने ही पैसों से उन नेताओं की आर्मर्ड गाड़ियों और Z+ कमांडोज़ का खर्चा उठा रहा है, जिन्हें असल में अपने ही साये के अलावा किसी से कोई खतरा नहीं है।
ये सड़कें उन लोगों की हैं जिन्होंने इन्हें बनाया है। उनके पैसे से, उनकी मेहनत से, उनके टैक्स से बनी हैं ये। एक नेता को उन लोगों की सेवा के लिए चुना जाता है – न कि किसी मध्यकालीन सामंती राजा की तरह ताकत के दम पर खाली कराई गई सड़कों पर छाती चौड़ी करके चलने के लिए।
नेपाल के सबसे कम उम्र के पीएम को ये बात समझ आ गई। और उन्होंने भाषण देकर नहीं, बल्कि कुर्सी पर बैठने के कुछ घंटों के भीतर अपने एक्शन से ये साबित किया। भारत की राजनीतिक क्लास (चाहे वो किसी भी पार्टी की हो, कोई भी विचारधारा मानती हो) ने तो दशकों से अपने बर्ताव से यही साबित किया है की सड़कें उनके बाप की जागीर हैं, और बची-खुची जो भी जगह मिल जाए, आम आदमी को उसी में खुश रहना चाहिए।
ये सोच बदलनी ही होगी। इसलिए नहीं की नेपाल ने हमें शर्मिंदा किया है- हालाँकि वो तो किया ही है। इसलिए नहीं की दुनिया हमें देख रही है- हालाँकि वो देख तो रही है। बल्कि इसलिए क्योंकि लोकतंत्र का सबसे बुनियादी उसूल यही है की चुने हुए सेवक कभी सम्राट नहीं बन सकते।
2017 में कहा गया था- “हर भारतीय VIP है।” अब वक़्त आ गया है, की आखिरकार सरकारें सच में वैसा ही बर्ताव भी करें।
