मौत सामने थी, पर भगवाधारी अडिग रहा: जब योगी आदित्यनाथ ने आतंकियों और SP के माफिया मुख़्तार अंसारी के बिछाए मौत के जाल को अपनी रणनीति से किया नेस्तनाबूद

बात 7 सितंबर 2008 की है। यूपी के पूर्वांचल में करीब 40 से ज़्यादा गाड़ियों का एक काफ़िला जा रहा था- जिसमें कारें, एसयूवी (SUVs), और मोटरसाइकिलें थी। हवा में हिंदू युवा वाहिनी के नारों की गूंज थी।

और इस पूरे हुजूम के केंद्र में थे सिर्फ एक शख्स: योगी आदित्यनाथ। गोरखपुर से पांच बार के सांसद, गोरखनाथ मठ के महन्त, और पूर्वांचल को पिछले एक दशक से बंधक बनाकर रखने वाले उस आपराधिक-पॉलिटिकल गुर्गे के सबसे बड़े और खौफनाक दुश्मन।

काफ़िले की मंज़िल थी आज़मगढ़ का डीएवी डिग्री कॉलेज मैदान, जहाँ योगी जी ने इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ एक बड़ी रैली बुलाई थी। मौका था मुफ्ती अबू बशर की गिरफ़्तारी का, जो 26 जुलाई के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट का मास्टरमाइंड था। उन धमाकों में 56 बेगुनाह भारतीय मारे गए थे और 200 से ज़्यादा घायल हुए थे। 

यह रैली एक सीधी चुनौती थी… एक खुला ऐलान। क्योंकि उन धमाकों के पीछे जिस आदमी का हाथ था, वह आज़मगढ़ का ही रहने वाला था। और तो और, इसी इलाके के कुछ मुस्लिम SP नेताओं ने उस आतंकी के समर्थन में एक जनसभा तक बुला ली थी।

दोपहर के 1:20 बज रहे थे। योगी जी का काफ़िला जैसे ही आज़मगढ़ के बाहरी इलाके ‘कटिया’ गाँव में घुसता है, माहौल अचानक खौफनाक हो जाता है। बिना किसी चेतावनी के गाड़ियों पर पत्थरों की बारिश होने लगती है। फिर आते हैं पेट्रोल बम-  जिसे आग लगाकर चलती गाड़ियों पर फेंका जा रहा था। और उसके बाद वो आवाज़ आती है, जो बाकी सब कुछ सुन्न कर देती है: गोलियों की तड़तड़ाहट।

सैकड़ों की तादाद में वो हथियारबंद मुसलमानों की भीड़ पूरी तैयारी के साथ घात लगाए बैठी थी। यह कोई अचानक भड़का गुस्सा या छिटपुट बवाल नहीं था। यह पूरी तरह से मिलिट्री-स्टाइल में रची गई एक साज़िश थी, जिसे बहुत बारीकी से प्लान किया गया था। और इसका सिर्फ एक ही मकसद था: योगी आदित्यनाथ की हत्या

हमले में एक समर्थक की जान चली जाती है। छह लोग बुरी तरह ज़ख्मी होते हैं। गाड़ियां धू-धू कर जलने लगती हैं। समर्थक अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागते हैं। चारों तरफ बस अफरा-तफरी।

लेकिन… योगी उस गाड़ी में थे ही नहीं जिसकी उन हमलावरों को तलाश थी। काफ़िले में सातवें नंबर पर चल रही वो लाल एसयूवी (SUV)- जिसे सब योगी की गाड़ी मानते थे- उसी पर सबसे ज़्यादा और सबसे घातक हमले किए गए। पर योगी उसमें नहीं थे। कुछ घंटे पहले ही, शहर के बाहर एक पीडब्ल्यूडी (PWD) गेस्ट हाउस में उन्होंने बहुत ही चुपचाप और सोच-समझकर सबसे आगे वाली गाड़ी में बैठने का फैसला कर लिया था।

उनकी अपनी खुफिया जानकारी पर लिए गए उस एक फैसले ने मौत के उस पूरे जाल को ही नाकाम कर दिया। हमलावरों को इस बात की भनक तक नहीं थी की योगी आदित्यनाथ पहले से ही जानते थे की वो आ रहे हैं।

पूर्वांचल की सड़न और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी, जिसने योगी जी पर इस जानलेवा हमले की ज़मीन तैयार की

2008 के आज़मगढ़ हमले की कहानी तब तक अधूरी है, जब तक की उस शख्स का ज़िक्र न हो जिसकी परछाई इस पूरी साज़िश के हर पन्ने पर मंडरा रही थी: मुख्तार अंसारी।

मुख्तार अंसारी मऊ सदर सीट से लगातार पांच बार विधायक चुना गया। लोकतंत्र के इस सफेदपोश नकाब के पीछे यूपी का अब तक का सबसे खूंखार क्रिमिनल एम्पायर पल रहा था। हत्या, रंगदारी, हथियारों की तस्करी और हिन्दुओं के खिलाफ सांप्रदायिक दंगे भड़काने जैसे 60 से ज़्यादा आपराधिक मामले। उसका खौफ मऊ, गाज़ीपुर, वाराणसी और आज़मगढ़ तक फैला हुआ था। एक ऐसा शिकंजा जो डर, सियासी रसूख और सांप्रदायिक पहचान के हथकंडों से बुना गया था।

इस सियासी रसूख की असली और घिनौनी तस्वीर अक्टूबर 2005 में सामने आई। मऊ दंगों की आग में जल रहा था। भरत मिलाप के जुलूस के दौरान- जो की सदियों पुरानी हिंदू परंपरा है- एक सोची-समझी साज़िश के तहत दंगे भड़काए गए। हिंदुओं के घर जलाए गए। दुकानें लूट ली गईं। करीब एक महीने तक पूरा ज़िला खून से नहाता रहा।

मऊ से ट्रेनों का चलना तक रोक दिया गया- ऐसा इस इलाके के इतिहास में पहली बार हुआ था। और उन जलती हुई सड़कों के बीच, मुख्तार अंसारी खुली जीप में बैठकर एके-47 लहराता हुआ घूम रहा था। यह उसका सीधा और बेखौफ शक्ति प्रदर्शन था।

और सरकार क्या कर रही थी? मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (SP), जो उस वक़्त लखनऊ की सत्ता पर काबिज़ थी, वही कर रही थी जो वो हमेशा अपने मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए करती थी: मुजरिमों को बचाना।

जब योगी आदित्यनाथ ने फौरन मऊ जाकर दंगा पीड़ित हिंदुओं के साथ खड़े होने का फैसला किया, तो मुलायम सरकार की मशीनरी ने उन्हें दोहरीघाट (गोरखपुर और मऊ का बॉर्डर) पर ही रोक दिया। एक बैठा हुआ सांसद, जो उन्हीं लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था जिनके घर जलाए जा रहे थे, उसे उन्हीं से मिलने से रोक दिया गया।

संदेश बिल्कुल साफ़ था: मुलायम के यूपी में माफिया सबसे पहले आते थे।

यह सियासी सरंक्षण इससे भी बड़े और खौफनाक जुर्मों तक फैला हुआ था। 29 नवंबर 2005 को बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय- जो मुख्तार के सबसे बड़े सियासी दुश्मन थे- उन पर बसनिया चट्टी के पास उनके छह साथियों समेत घात लगाकर हमला किया गया।

हमलावरों ने 500 से ज़्यादा गोलियां दागीं। सातों शवों से कुल 67 गोलियां निकाली गईं। यह एक सरेआम नरसंहार था। मुख्तार अंसारी का नाम इसमें सीधा उछला, लेकिन उसके गुर्गे आज़ाद घूमते रहे। समाजवादी पार्टी की सरकार आँखें मूंदे बैठी रही।

आने वाले सालों में, बीएसपी (BSP) चीफ मायावती- जो उसी मुस्लिम वोट बैंक की ताक में थीं- उन्होंने मुख्तार को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया और सरेआम उसे ‘रॉबिनहुड’ और ‘गरीबों का मसीहा’ तक कह डाला। 60 क्रिमिनल केस वाला आदमी: मसीहा।

यही वो सियासी कल्चर था जिससे योगी आदित्यनाथ लड़ रहे थे- बिल्कुल अकेले, बस अपने उसूलों और अपने उस ग्राउंड-लेवल नेटवर्क के भरोसे।

आतंकवादी हमले में जलते हुए अहमदाबाद से निकला आज़मगढ़ के आतंक का घिनौना चेहरा

26 जुलाई 2008। शनिवार की वो दोपहर। सिर्फ सत्तर मिनट के अंदर अहमदाबाद शहर में लगातार 22 बम धमाके हुए। अस्पताल, सरकारी बसें, भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों में खड़ी साइकिलें- कोई भी जगह सुरक्षित नहीं थी। 56 लोग मारे गए। 246 लोग घायल हुए। भारत ने आतंकी हमले पहले भी देखे थे, लेकिन इस हमले का स्केल, कोआर्डिनेशन और वो क्रूरता बता रही थी की भारतीय ज़मीन पर इस्लामी आतंकवाद एक नए और कहीं ज़्यादा खतरनाक दौर में घुस चुका है।

धमाकों से पहले मीडिया हाउस को भेजे गए ईमेल में ‘इंडियन मुजाहिदीन’ ने इसकी ज़िम्मेदारी ली थी- यह एक ऐसा नाम था जिसके बारे में उस वक़्त तक भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को भी ठीक से नहीं पता था। लेकिन बाद की जांच ने एक खौफनाक सच उगल दिया: इंडियन मुजाहिदीन कोई नया संगठन नहीं था।

यह ‘सिमी’ (SIMI) का ही ऑपरेशनल विंग था, जिसे सिमी पर बैन लगने के बाद नया नाम और नया रूप दे दिया गया था। अब ये हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी जैसे पाकिस्तानी आतंकी नेटवर्क्स के लॉजिस्टिक सपोर्ट से भारत में हमले कर रहे थे।

जांच की आंच पूर्वी यूपी के एक खास ज़िले तक पहुँची- आज़मगढ़। 15 अगस्त 2008 को, गुजरात पुलिस ने मुफ्ती अबू बशर को गिरफ्तार किया- जो आज़मगढ़ के बीनापारा गाँव का रहने वाला एक सिमी गुर्गा था- और उसे अहमदाबाद ब्लास्ट का मास्टरमाइंड घोषित कर दिया। इंडियन मुजाहिदीन के इसी ‘आज़मगढ़ मॉड्यूल’ ने हमले में इस्तेमाल हुए बम (IEDs) बनाए थे।

धमाकों के लिए अमोनियम नाइट्रेट कर्नाटक से मंगाया गया था। इस पूरी साज़िश की प्लानिंग कई राज्यों में फैली हुई थी और इसकी जड़ें उस इस्लामिक कट्टरपंथी सोच में थीं जो सालों से पनप रही थी।

मुफ्ती अबू बशर की गिरफ़्तारी पर तो पूरा देश एकजुट होना चाहिए था, लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में, खासकर आज़मगढ़ के आसपास, उस गिरफ्तार आतंकी के समर्थन में राजनीतिक सभाएं होने लगीं। समाजवादी पार्टी के ईकोसिस्टम से जुड़े मुस्लिम लोग अचानक ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगे। उनका मकसद साफ़ था: सांप्रदायिक भावनाओं की आड़ में असली मुजरिमों को बचाना और जवाबदेही से भागना।

यही वो माहौल था जब योगी आदित्यनाथ ने अपनी उस एंटी-टेरर रैली का ऐलान किया। वो आज़मगढ़ में कोई आग भड़काने नहीं जा रहे थे। वो तो वहां यह मांग करने जा रहे थे की देश अब आँखें न मूंदे- आज़मगढ़ को उन मुस्लिम कातिलों का सेफ हाउस न बनने दिया जाए जिन्होंने बेगुनाह भारतीयों का खून बहाया है।

उनकी इसी मांग की कीमत उनके एक समर्थक को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। और खुद योगी भी उस दिन बाल-बाल बचे थे।

7 सितंबर 2008 का वो खूनी मंसूबा जो हर हाल में उस हिंदू संन्यासी योगी आदित्यनाथ की जान लेना चाहता था

योगी आदित्यनाथ के काफ़िले पर हुआ वो हमला कोई दंगा-फसाद नहीं था। न ही वो कोई भड़का हुआ विरोध प्रदर्शन था। वह पूरी प्लानिंग के साथ की गई हत्या की एक सोची-समझी साज़िश थी। हमलावरों को तो यह तक पता था की काफ़िले में कौन सी गाड़ी कहाँ चल रही है, उसका रंग क्या है, और योगी किसमें बैठे हैं।

काफ़िला जिसमें 40 से ज़्यादा गाड़ियां थीं- और आज़मगढ़ पहुँचते-पहुँचते रास्ते में मोटरसाइकिल वाले समर्थकों के जुड़ने से यह गिनती 200 के पार पहुँच चुकी थी- जैसे ही कटिया गाँव के पास पहुँचा, हमलावर पहले से ही अपनी-अपनी पोज़ीशन लेकर बैठे थे। सब कुछ एक क्रम में हुआ- पहले पत्थर आए, जो काफ़िले का रिस्पॉन्स चेक करने के लिए खास गाड़ियों पर फेंके गए।

फिर आए पेट्रोल बम, जिनसे काफ़िले को आग के जाल में फंसाने का काम शुरू हुआ। और फिर आई गोलियां- अंधाधुंध और लगातार होने वाली फायरिंग, जिसका मकसद सिर्फ और सिर्फ गाड़ियों को रोकना और हिन्दुओं को जान से मारना था।

हमले में योगी आदित्यनाथ के एक समर्थक की जान चली गई। छह लोग बुरी तरह घायल हो गए। गाड़ियां जला दी गईं। मंज़र किसी खौफनाक नरसंहार जैसा था।

हमलावरों को पक्का यकीन था की योगी किस गाड़ी में हैं। वो लाल एसयूवी (SUV)- जो हमेशा काफ़िले में सातवें नंबर पर रहती थी- उसे खास तौर पर निशाना बनाया गया। उन्होंने पूरी रेकी कर रखी थी। उनके खबरी मौजूद थे। उनके हथियार पहले से ही जमा थे। लेकिन वो जिस एक चीज़ का हिसाब नहीं लगा पाए, वो यह था की योगी जी का खुद का खुफिया तंत्र उनसे एक कदम आगे निकल चुका था।

हमले के तुरंत बाद, योगी आदित्यनाथ ने खुद सीधे तौर पर इस हमले के लिए मुख्तार अंसारी के नेटवर्क को ज़िम्मेदार ठहराया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था की काफ़िले पर लगातार गोलियां बरसाई गईं, गाड़ियों को चुन-चुनकर तबाह किया गया, और रूट पर तैनात पुलिस बस मूकदर्शक बनी रही- चाहे वो डर की वजह से हो, मिलीभगत से, या ऊपर से मिले आदेशों के चलते।

लखनऊ में सत्ता पर बैठी मायावती की सरकार ने- जिसने मुलायम की एसपी (SP) की ही तरह उन मुस्लिम माफियाओं के सामने घुटने टेक रखे थे- आज़मगढ़ के डीआईजी (DIG) अभिमन्यु त्रिपाठी और एसपी (SP) वी.के. गर्ग को एक बैठे हुए सांसद को सुरक्षा न दे पाने के आरोप में सस्पेंड कर दिया। यह सस्पेंशन सिर्फ एक बात की मुहर था की राज्य का सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका था। और यह फेलियर कोई इत्तेफाक नहीं था।

सियासी तस्वीर बहुत ही खौफनाक थी। एक आतंकी का मास्टरमाइंड पकड़ा जाता है। उसके राजनीतिक मुस्लिम समर्थक सरेआम रैलियां करते हैं। आतंकवाद के खिलाफ जवाबदेही मांगने वाली रैली पर घात लगाकर हमला होता है।

और जिन अफसरों की ज़िम्मेदारी देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की थी, वो चुपचाप खड़े रहते हैं जबकि एक चुनी हुई सरकार के नुमाइंदे की हत्या की कोशिश की जा रही थी। यह कोई लॉ-एंड-ऑर्डर का फेलियर नहीं था। यह एक ऐसा सिस्टम था जो अंदर से पूरी तरह सड़ चुका था, जिसे दशकों की मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति और मुस्लिम माफियाओं के सरंक्षण ने खोखला कर दिया था।

हमले से ठीक एक साल पहले गोरखपुर का वो हिंदू युवक का सरेआम कत्ल जिसने योगी को इस सड़े हुए सिस्टम से आर-पार की लड़ाई लड़ने पर मजबूर कर दिया

योगी आदित्यनाथ की इस पूरी लड़ाई को गहराई से समझने के लिए हमें आज़मगढ़ हमले से ठीक एक साल पीछे जाना होगा। जनवरी 2007 की सर्दियां और गोरखपुर की सड़कें- जहाँ 20 साल के एक हिंदू लड़के, राजकुमार अग्रहरि का मुस्लिम युवकों द्वारा सरेआम कत्ल कर दिया गया। यह वारदात इतनी बेखौफ थी की खून-खराबे के आदी हो चुके इस इलाके के भी रोंगटे खड़े हो गए।

27 जनवरी 2007 को गोरखपुर के कोतवाली इलाके से मुहर्रम का जुलूस निकल रहा था। उसी दौरान 24 साल की एक हिंदू लड़की के साथ जुलूस में शामिल कुछ मुस्लिम युवकों ने छेड़खानी कर दी। उस लड़की को मुस्लिम युवा गोद में उठाने लगे।

इस बात का वहां मौजूद हिन्दुओं ने विरोध किया और दोनों समुदायों के बीच बवाल शुरू हो गया। पुलिस एक्शन में आई और राजकुमार अग्रहरि नाम के एक हिंदू युवक को अपनी कस्टडी में ले लिया- यह कहकर की ऐसा उसकी सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए किया जा रहा है। कानून की नज़रों में, वो अब राज्य की सुरक्षा में था।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उस पर यकीन करना मुश्किल है। हाथों में तलवारें और चाकू लिए एक हथियारबंद भीड़ ने राजकुमार अग्रहरि को पुलिस की गाड़ी से बहार खींचा और उसे सरेआम काट दिया। और पुलिस बस खड़े हो कर तमाशा देखती रह गयी। तलवारें चलाने वालों में मोहम्मद शमीम और उसके साथी थे। यह कत्ल दरिंदगी से भरा था और पूरी तरह से सांप्रदायिक था।

गोरखपुर सुलग उठा। योगी आदित्यनाथ, जो वहां के सांसद थे, तुरंत मौके पर पहुंचे और सख्त एक्शन की मांग की। उन्होंने कातिलों की गिरफ़्तारी और राजकुमार के परिवार के लिए इंसाफ़ की आवाज़ उठाई।

उन्होंने पुलिस और सरकार की उस नाकामी को चुनौती दी जो अपनी ही कस्टडी में एक हिंदू लड़के को नहीं बचा पाई। और इसके बदले में… इंसाफ़ मांगने के इस ‘जुर्म’ में… योगी आदित्यनाथ को ही गिरफ्तार कर लिया गया! उन्होंने लगभग दो हफ्ते जेल में बिताए, जबकि वो आदमी जिसने राजकुमार को अपनी तलवार से काटा था, वो आज़ादी से बेल पर बाहर घूम रहा था।

मोहम्मद शमीम और उसके पिता शफीकुल्लाह को शुरुआत में गिरफ्तार तो किया गया, लेकिन अगस्त 2007 में शमीम को ज़मानत मिल गई। और फिर उसने वही किया जो एसपी-राज के इस क्रिमिनल ईकोसिस्टम में बैठे लोग अक्सर करते थे: वह गायब हो गया। फरार। वह चेन्नई भाग गया, अपनी पहचान बदल ली, सारे कनेक्शन काट लिए। उसे पूरा यकीन था की जिस सिस्टम ने अब तक उसे बचाया है, वह आगे भी आँखें मूंदे रहेगा।

अदालत ने आख़िरकार सबूतों का संज्ञान लिया और 2012 में मोहम्मद शमीम और उसके पिता शफीकुल्लाह को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई। लेकिन मुजरिम के बिना सज़ा महज़ एक कागज़ का टुकड़ा है। शमीम खुलेआम घूम रहा था- एक हत्यारा जो दूसरे राज्य में नकली पहचान के साथ मज़े से जी रहा था, ऐसे सिस्टम की पहुँच से कोसों दूर, जिसने कभी उसे सच में ढूंढने की कोई गंभीर कोशिश की ही नहीं।

राजकुमार अग्रहरि का परिवार 16 साल तक इंतज़ार करता रहा। 16 साल तक वो इंसाफ़ सिर्फ एक फाइल में बंद रहा। 16 साल तक वो आदमी, जिसने पुलिस की कस्टडी में एक लड़के को तलवार से काटा था, चेन्नई की सड़कों पर बेखौफ घूमता रहा। यही थी मुलायम की एसपी (SP) की असली लिगेसी- जहाँ बेल (ज़मानत) कोई कानूनी हक़ नहीं बल्कि एक ‘एहसान’ हुआ करती थी, जहाँ मुजरिमों को भागने में मदद की जाती थी, और जहाँ हिंदुओं के लिए इंसाफ़ एक ऐसी ‘लग्ज़री’ थी जिसे देने की किसी को कोई जल्दी नहीं थी।

16 साल बाद 2023 में पूरा हुआ वो हिसाब जब एक भगोड़े कातिल मोहम्मद शमीम के सारे रास्ते योगी आदित्यनाथ ने हमेशा के लिए बंद कर दिए

उम्रकैद की सज़ा से बचकर भागने के लिए 16 साल का वक्त बहुत लंबा होता है। मोहम्मद शमीम अब तक इसमें कामयाब भी रहा था- शहर बदलता रहा, पहचान छुपाता रहा, और एक ऐसे सिस्टम के रडार से बचता रहा, जिसने सच कहूं तो उसे कभी पूरी शिद्दत से ढूँढने की कोशिश ही नहीं की थी।

2007 के गोरखपुर दंगों के बाद जो सरकारें आईं- चाहे एसपी हो, बीएसपी हो या फिर दोबारा एसपी- किसी ने भी बेल जंप कर चुके उस कातिल को पकड़ने की कोई कोशिश नहीं की।

लेकिन 2017 में बाज़ी पूरी तरह से पलट गई। जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो पूर्वांचल के उस क्रिमिनल-पॉलिटिकल ईकोसिस्टम को जो राजनीतिक सरंक्षण मिला हुआ था, उसे चुन-चुन कर तोड़ा जाने लगा। यूपी पुलिस, जो अब तक बाहुबलियों और उनके सियासी आकाओं की गुलामी करने को मजबूर थी, उसे आज़ाद कर दिया गया। वह अब एक राजनीतिक टूल के बजाय एक असली लॉ-एनफोर्समेंट एजेंसी की तरह काम करने लगी।

सितंबर 2023 में, पुलिस को ज़मीनी खुफिया सूत्रों से यह पक्की टिप मिली की मोहम्मद शमीम गोरखपुर लौट आया है। वो भगोड़ा, जो अब 16 साल बड़ा हो चुका था, शायद यह मान बैठा था की इतना वक्त गुज़र जाने और इतनी दूरियों ने सरकार की दिलचस्पी उसमें खत्म कर दी है। उसे गोरखपुर के निज़ामपुर इलाके से धर दबोचा गया, बिना किसी हंगामे के। 2012 में जो सज़ा उसे सुनाई गई थी- राजकुमार अग्रहरि के मर्डर में उम्रकैद- अब फाइनली वो सज़ा तामील होने जा रही थी।

इस गिरफ़्तारी की खबर ने नेशनल हेडलाइंस बटोरीं, लेकिन इसकी अहमियत महज़ एक केस तक सीमित नहीं थी। यह इस बात का सबूत था की योगी के यूपी में, इंसाफ़ से भागने वालों के लिए वक़्त कभी रुकता नहीं है। कानून के तहत जो सज़ा तय हो गई है, वह लागू होकर रहेगी- चाहे कितने भी साल क्यों न गुज़र जाएं, चाहे मुजरिम कहीं भी क्यों न छुप जाए।

यह योगी आदित्यनाथ के लिए एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत जीत भी थी- वो आदमी जिसे 2007 में इंसाफ़ मांगने के जुर्म में जेल में डाल दिया गया था, आज 2023 में राज्य का मुख्यमंत्री बनकर उसी इंसाफ़ को डिलीवर कर रहा था। इंसाफ़ का वो पहिया धीरे ही सही, लेकिन घूमा ज़रूर। और वो इसलिए घूमा क्योंकि एक आदमी ने 16 सालों की सियासी लड़ाइयों, हत्या की साज़िशों और सिस्टम की तमाम रुकावटों के बावजूद हार मानने से साफ इनकार कर दिया था।

मौत को चकमा देने वाली योगी जी की वो अदृश्य ढाल और उनका अपना अभेद्य ख़ुफ़िया तंत्र

इस पूरी कहानी में जो दो सबसे बड़े नतीजे निकले- 2008 में आज़मगढ़ में योगी की जान बचना और 2023 में मोहम्मद शमीम की गिरफ़्तारी- इन दोनों के पीछे एक ही सबसे अहम कड़ी थी: वो ख़ुफ़िया नेटवर्क जिसे योगी आदित्यनाथ ने ‘हिंदू युवा वाहिनी’ के ज़रिए खड़ा किया था।

एक ऐसा सियासी माहौल जहाँ पूरा सिस्टम ही सड़ चुका था, जहाँ पुलिस उसी सरकार को रिपोर्ट करती थी जिसके सीधे तार उन्हीं मुस्लिम क्रिमिनल नेटवर्क्स से जुड़े थे जिनसे योगी लड़ रहे थे, और जहाँ सरकारी खुफिया एजेंसियां या तो नकारा थीं या जानबूझकर आँखें मूंदे बैठी थीं… वहां योगी ने एक बहुत ही तार्किक और अचूक फैसला लिया: वे अपनी आँखें और कान खुद तैयार करेंगे।

बाहर से देखने पर हिंदू युवा वाहिनी (HYV) सिर्फ एक हिंदू राष्ट्रवादी सामाजिक संगठन लगता था- जो शाखाएं लगाता था, कम्युनिटी इवेंट करता था और युवाओं को जोड़ता था। लेकिन इस बाहरी परत के ठीक नीचे इंसानों का एक बहुत ही सॉलिड इंटेलिजेंस नेटवर्क काम कर रहा था।

HYV ने योगी के दुश्मनों और विरोधियों के सामाजिक और राजनीतिक दायरों में अपने भरोसेमंद लोग बिठा रखे थे। ये फिल्मों वाले जासूस नहीं थे। ये आम लोकल लड़के थे- कोई दुकानदार, कोई स्टूडेंट, कोई मोटरसाइकिल मैकेनिक तो कोई चायवाला। ये पूर्वांचल की हर गली, हर चौराहे की ज़िंदगी का हिस्सा थे, जो ज़मीनी खबरें सीधे ऊपर तक पहुंचाते थे और वो जानकारी आख़िरकार योगी तक पहुँचती थी।

इसी नेटवर्क ने 7 सितंबर 2008 को उनकी जान बचाई थी। HYV के चैनलों से यह खुफिया जानकारी पहले ही मिल गई थी की काफ़िले पर एक बहुत बड़े हमले की साज़िश रची जा रही है- और कटिया गाँव में मुस्लिम लोग एक खास पैसेंजर को ले जा रही ‘लाल एसयूवी’ का इंतज़ार कर रहे हैं।

सी जानकारी के दम पर तो योगी ने पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में चुपचाप अपनी गाड़ी बदल ली थी। उन्होंने राज्य की पुलिस को अलर्ट तक नहीं किया- क्योंकि 2008 के आज़मगढ़ में पुलिस को बताने का मतलब था सीधा उन लोगों को बता देना जो इस हमले की साज़िश रच रहे थे। उन्होंने सिर्फ अपने लोगों पर भरोसा किया। और उनके लोगों ने उन्हें निराश नहीं किया।

सोलह साल बाद, इसी नेटवर्क ने एक अलग तरह का इंसाफ़ दिलाया। 2017 में जब योगी मुख्यमंत्री बने, तो राज्य का खुफिया तंत्र अब कोई दुश्मन नहीं था- वह एक संसाधन बन चुका था। लेकिन ज़मीन पर बिछा एचवाईवी का वो नेटवर्क अब भी एक सप्लीमेंट्री लेयर की तरह काम कर रहा था, जो ऐसी ग्राउंड-लेवल खुफिया जानकारियां देता था जिन्हें बड़ी-बड़ी एजेंसियां अक्सर मिस कर देती थीं।

इसी नेटवर्क से मिली खबर थी जिसने सितंबर 2023 में मोहम्मद शमीम की लोकेशन गोरखपुर के निज़ामपुर इलाके में ट्रेस कर ली। यह कन्फर्म हो गया की वह भगोड़ा हत्यारा वापस अपने शहर लौट आया है, यह सोचकर कि 16 साल की इस लंबी खामोशी ने उसे अब पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया है।

पर वो गलत था। जिस नेटवर्क ने कभी उस संन्यासी की जान बचाई थी, उसी नेटवर्क ने अब राजकुमार अग्रहरि के उस कातिल को इंसाफ़ के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। ये दोनों ही नतीजे एक ही रणनीतिक दिमाग, सालों तक ज़मीनी जानकारी जुटाने के धैर्य, और इस ज़िद का नतीजा थे की सरकार की नाकामियां किसी के इंसाफ़ का आख़िरी फैसला नहीं हो सकतीं।

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