सच कहूं तो एक वक्त था जब हम हिंदू सोचते थे की कॉरपोरेट दुनिया का धर्म सिर्फ एक होता है- पैसा और मुनाफा। हम किसी भी ब्रांड का सामान खरीदते वक्त ये नहीं सोचते थे की इस कंपनी का मालिक कौन है, उसकी विचारधारा क्या है या वो हमारे ही दिए पैसों का इस्तेमाल किस ईकोसिस्टम को पालने-पोसने में कर रहा है। एक आम हिंदू हमेशा यही सोचकर अपनी ज़िंदगी काटता रहा की भई, हमें किसी के एजेंडे से क्या लेना-देना, अपना काम-वाम करो और मस्त रहो। लेकिन वही हमारी सबसे बड़ी भूल थी।
ज़रा सोचिए, आप अपनी खून-पसीने की कमाई से उन कंपनियों के प्रोडक्ट खरीदते हैं जो बाहर से तो ‘सेक्युलर’ और ‘प्रोग्रेसिव’ होने का चोला पहने रहती हैं, लेकिन अंदर ही अंदर उनके दफ्तरों में, उनकी नीतियों में और उनके एजेंडे में हिंदू विरोधी और चरमपंथी सोच को सीधा-सीधा बढ़ावा दिया जा रहा है।
बात सिर्फ एक-दो घटनाओं की नहीं है, लेंसकार्ट और TCS के हिंदू विरोधी एजेंडा के बाद अब भारत की जानी मानी बिज़नेस लेडी नमिता थापर सवालों के घेरे में आ गयी है। नमिता ने पहले एक ऐसी मुस्लिम व्यवसायी महिला की कंपनी में निवेश किया, जिस महिला पे एक दलित हिंदू युवक का जबरन धर्मांतरण करके खतना करने के संगीन आरोप लगे हैं। और नमिता आजकल अपनी इंस्टाग्राम रील्स में नमाज़ पढ़ने के फायदे भी जोरों शोरों से बता रही है- वो भी पूरे देश के हिन्दुओं को!
तो चलिए, बिना किसी लाग-लपेट के, आज हम नमिता थापर जैसे बिज़नेस लीडर्स और कॉरपोरेट पाखंड की परतें उधेड़ने वाले हैं, जिन्होंने सालों तक हिंदू समाज के भरोसे ऐश की, पैसा कमाया, पर अब चुपके-चुपके उसी समाज के हितों के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं।
शार्क टैंक की ‘इंवेस्टर’ या इस्लामिक एजेंडे की स्पॉन्सर? नमिता थापर का ड्रामा
शार्क टैंक इंडिया तो आप सबने देखा ही होगा। वहां बड़े-बड़े बिज़नेसमैन आते हैं, ज्ञान देते हैं और बताते हैं कि भारत का फ्यूचर कैसा होना चाहिए, बिज़नेस कैसे करना चाहिए। इन्हीं में से एक हैं एमक्योर फार्मास्युटिकल्स की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नमिता थापर।
टीवी पर दीदी खुद को बहुत बड़ी फेमिनिस्ट बताती हैं, औरतों की आज़ादी, उनकी चॉइस और उनके हकों पर लंबे-लंबे लेक्चर देती हैं। लेकिन कैमरे के पीछे इनकी असलियत क्या है, ये हाल ही में तब खुलकर सामने आ गया जब इन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया।
इस वीडियो में नमिता क्या कर रही थीं? वो पूरी दुनिया को ‘नमाज़ पढ़ने के हेल्थ बेनिफिट्स’ (स्वास्थ्य लाभ) गिना रही थीं! जी हाँ, जो कॉरपोरेट जगत हिंदू त्योहारों पर ज्ञान देने से बाज नहीं आता, होली के रंगों को खतरनाक बताता है, दीवाली के पटाखों से जिन्हें अस्थमा होने लगता है और करवा चौथ जिन्हें पितृसत्ता का सबसे बड़ा प्रतीक लगता है… वही लोग अचानक से इस्लामिक इबादत के तरीकों में विज्ञान और हेल्थ बेनिफिट्स ढूंढने लगते हैं।
जैसे ही ये वीडियो इंटरनेट पर आया, पब्लिक का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। हिंदू यूजर्स ने सीधे-सीधे नमिता से सवाल पूछना शुरू कर दिया की आखिर ये कैसा सेक्युलरिज्म है? जब हिंदू धर्म की बात आती है तो आप लोग उसे अंधविश्वास बताकर सिरे से खारिज कर देते हो, लेकिन दूसरी तरफ आप मुस्लिम समुदाय के धार्मिक रिवाज़ों को प्रमोट करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हो। पब्लिक को समझ आ गया की दाल में कुछ तो काला है!
अब ज़ाहिर सी बात है, जब आम जनता ने आईना दिखाया तो नमिता को मिर्ची तो लगनी ही थी। और फिर वही हुआ जो ऐसे मामलों में हमेशा होता है- दीदी ने तुरंत अपना ‘विक्टिम कार्ड’ खेल दिया। कुछ ही दिनों बाद उनका एक और वीडियो आया जिसमें वो अपनी कार में बैठी नज़र आ रही थीं और बड़ी सी रोनी सूरत बनाकर कह रही थीं की पिछले तीन हफ्तों से लोग उन्हें नॉन-स्टॉप भद्दी बातें बोल रहे हैं, और ये सब सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने नमाज़ के फायदे गिनाए थे।
कमाल का दोगलापन है ना! जब आप अपनी मर्ज़ी से किसी खास विचारधारा को प्रमोट करेंगी तो क्या उम्मीद करती हैं? की लोग आपको फूल-माला पहनाएंगे? एक तरफ आप एक ऐसी संस्कृति की वकालत कर रही हैं जिसका महिलाओं की आज़ादी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है, और दूसरी तरफ जब लोग आपसे कड़े सवाल पूछते हैं तो आप बेचारी बन जाती हैं।
लेकिन बात सिर्फ एक नमाज़ वाले वीडियो तक सीमित होती तो शायद लोग दो दिन गाली देकर भूल भी जाते। असली खेल तो इसके पीछे चल रहा था, जिसका कनेक्शन सीधे तौर पर शार्क टैंक इंडिया के मंच और एक बहुत ही डार्क रियलिटी से जुड़ा है।
‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ के पीछे का कट्टरपंथी इस्लामिक सच- एक हिन्दू दलित युवक का जबरन खतना और नमिता थापर की ‘शार्क’ फंडिंग
अगर आप सोच रहे हैं की नमिता थापर का नमाज़ वाला वीडियो सिर्फ एक इत्तेफाक था, तो ज़रा इस कहानी को ध्यान से पढ़िए। कुछ समय पहले शार्क टैंक के सेट पर सना शेख नाम की एक महिला आती है। उसका ब्रांड है ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ (Forever Modest), जो हिजाब और अबाया (बुर्का) बनाता है। नमिता थापर को ये बिज़नेस इतना पसंद आया की उन्होंने बिना पलक झपकाए इसमें करोड़ों रुपये इन्वेस्ट कर दिए।
यहाँ फेमिनिज़्म का वो सारा ज्ञान हवा हो गया जो टीवी पर अक्सर बांटा जाता है। जो औरतें 24 घंटे हिजाब और बुर्के में कैद रहने को मजबूर हैं, जो इसे पितृसत्ता और गुलामी का प्रतीक मानकर इसके खिलाफ ईरान से लेकर पूरी दुनिया में अपनी जान दे रही हैं, उसी हिजाब को ‘मॉडेस्ट फैशन’ का नाम देकर भारत में ग्लोरिफाई किया जा रहा है। और हमारी ‘प्रोग्रेसिव कॉरपोरेट शार्क’ नमिता थापर उसे खुलेआम फंड कर रही हैं।
लेकिन पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त! सना शेख और उनके इस ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ ब्रांड के पीछे एक ऐसी खौफनाक स्टोरी छिपी है जिसे सुनकर किसी भी सच्चे हिंदू का खून खौल उठेगा। ये कोई हवा-हवाई बात या सोशल मीडिया की गॉसिप नहीं है, बल्कि पुलिस रिकॉर्ड्स में दर्ज़ एक दलित हिंदू युवक की आपबीती है जिसे कॉरपोरेट के शोर-शराबे में दबा दिया गया।
महाराष्ट्र के संभाजीनगर का रहने वाला एक दलित युवक है दीपक सोनवणे। दीपक की कहानी सिर्फ एक कॉलेज रोमांस नहीं है, बल्कि ‘लव जिहाद’ और चरमपंथी इस्लामिक कन्वर्जन का वो खौफनाक चेहरा है जिसे सना शेख जैसी ‘मॉडर्न’ आंत्रप्रेन्योर्स अपने ‘मॉडेस्ट’ लिबास के पीछे छिपाकर रखती हैं।
दीपक के मुताबिक, साल 2018 में उसकी मुलाकात सना शेख से एमआईटी (MIT) कॉलेज में हुई थी। दोनों एक ही क्लास में थे। धीरे-धीरे दोनों में बातचीत शुरू हुई और ये बातचीत एक रिलेशनशिप में बदल गई। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन जैसे ही सना को लगा की दीपक पूरी तरह से उसके जाल में फंस चुका है, उसने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। प्यार-व्यार सब साइड में रख दिया गया और सना ने दीपक पर सीधा दबाव डालना शुरू किया की अगर उसे शादी करनी है, तो उसे इस्लाम कबूल करना ही पड़ेगा।
सना ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया की अगर मुझसे निकाह करना है तो तुम्हें कुरान पढ़नी होगी, कलमा पढ़ना होगा और नमाज़ अदा करनी होगी। शुरुआत में दीपक को लगा की शायद ये सिर्फ एक छोटी-सी शर्त है, लेकिन उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था की सना और उसका परिवार कट्टरपंथ की किस हद तक जाने वाले हैं।
मार्च 2021 की बात है। सना ने दीपक को गुलमंडी इलाके में मिलने के लिए बुलाया। दीपक जब वहाँ पहुँचा, तो सना के पिता, उसके चाचा और परिवार के बाकी लोग वहाँ पहले से मौजूद थे। दीपक ने पुलिस कंप्लेंट में जो बताया, वो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। उसने बताया की सना के पिता और घरवाले उसे ज़बरदस्ती पकड़कर अपने घर ले गए।
वहां उन्होंने उसे एक कमरे में बंद कर दिया। दीपक के हाथ-पैर बुरी तरह बांध दिए गए। उसे बेरहमी से पीटा गया और जब दीपक दर्द से तड़प रहा था, तब उन लोगों ने उसके ऊपर पेशाब तक किया! ज़रा सोचिए उस मानसिकता के बारे में जो एक सीधे-सादे इंसान के साथ ऐसा जानवरों वाला सुलूक कर सकती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो किसी दूसरे धर्म का है।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। जुल्म की इंतहा तो अभी बाकी थी। दीपक ने आरोप लगाया की बाद में सना की माँ उसे ज़बरदस्ती एक अस्पताल लेकर गई (जो सिटी चौक पुलिस स्टेशन के पीछे स्थित था) और वहां मुस्लिम डॉक्टरों की मिलीभगत से उसका ज़बरन खतना करवा दिया गया। एक हिंदू युवक के शरीर के साथ उसकी मर्जी के बिना ये भयानक खिलवाड़ किया गया।
खतने के बाद दीपक को नमाज़ पढ़ने के लिए मजबूर किया गया। उसे ज़ाकिर नाइक जैसे कट्टरपंथी और विवादित इस्लामी उपदेशक के वीडियो ज़बरदस्ती दिखाए गए ताकि उसका पूरी तरह से ब्रेनवाश किया जा सके।
और जब दीपक ने इन सब चीज़ों का डटकर विरोध किया, जब उसने इस्लाम कबूलने से मना कर दिया, तो उसे मारा-पीटा गया और सबसे गंदी जातिसूचक गालियां दी गईं। क्योंकि दीपक दलित समाज से आता है, इसलिए सना के परिवार ने उसे नीची जाति का होने का ताना दिया। उन्होंने कहा, “तुम लोग नीच जाति के हो, तुम महार नहीं बल्कि प्रॉस्टीट्यूट कम्युनिटी से हो।” ये है इनका असली चेहरा! बाहर से ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ और अंदर से जातिवाद और कट्टरपंथ का ज़हर।
अब आते हैं वसूली और ब्लैकमेलिंग वाले एंगल पर। दीपक के मुताबिक, सना के घरवालों ने इस पूरे टॉर्चर के बाद उससे पैसों की भारी डिमांड शुरू कर दी। उन्होंने कुल 25 लाख रुपये की रंगदारी मांगी। दीपक बुरी तरह डरा हुआ था, उसे अपनी और अपने परिवार की जान का खतरा था। उन्होंने दीपक को धमकी दी की अगर पैसे नहीं दिए तो उसका खतने वाला वीडियो लीक कर देंगे।
बदनामी के डर से दीपक ने किसी तरह 11 लाख रुपये जुगाड़ कर सना के परिवार को दिए। इसमें से 7 लाख कैश दिए गए और 4 लाख रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर किए गए (जिसका पूरा रिकॉर्ड मौजूद है)।
लेकिन ब्लैकमेलर्स का पेट कहाँ भरता है। जब दीपक बाकी के 14 लाख रुपये नहीं दे पाया, तो इन लोगों ने एक बहुत ही शातिर चाल चली। बचाव के तौर पर सना के परिवार ने उल्टा दीपक के ही खिलाफ IPC की धारा 354 (छेड़छाड़ और महिला की गरिमा भंग करना) के तहत एक झूठा केस दर्ज करवा दिया, ताकि वो डर के मारे अपना मुंह न खोल सके।
आख़िरकार जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब दीपक ने हिम्मत जुटाई और सना और उसके परिवार के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाया। इसमें ज़बरन धर्मांतरण, टॉर्चर, एक्सटॉर्शन और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ। मामला इतना संगीन था की सना शेख को एंटीसिपेटरी बेल (अग्रिम ज़मानत) के लिए कोर्ट के चक्कर काटने पड़े।
अब सबसे बड़ा सवाल यहाँ ये उठता है की ये सारा बवाल, ये ज़बरन खतना, धर्मांतरण का दबाव, ब्लैकमेलिंग और पुलिस केस… ये सब कुछ शार्क टैंक में सना शेख के आने से पहले हो चुका था। तो क्या नमिता थापर जैसी इतनी बड़ी कॉरपोरेट लीडर ने ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ में इन्वेस्ट करने से पहले कोई चेक नहीं किया? क्या उनकी लीगल टीम इतनी नाकाबिल है? या फिर सीधा सा सच ये है की उन्हें सब पता था, लेकिन अपने इस्लामिक एजेंडे और ‘हिजाब’ के महिमामंडन के आगे एक दलित हिंदू युवक की चीखें उन्हें कोई मायने नहीं रखतीं?
पब्लिक को तो अब ये साफ-साफ दिख रहा है की ये सिर्फ एक बिज़नेस डील नहीं है। ये उस इकोसिस्टम को पालने-पोसने का काम है जहाँ एक तरफ आप हिंदू धर्म को नीचा दिखाते हैं, और दूसरी तरफ उन लोगों को नेशनल टीवी पर हीरो बनाकर पेश करते हैं जिन पर धर्मांतरण और टॉर्चर के इतने खौफनाक आरोप लगे हैं।
शार्क टैंक पर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’- हिजाब को प्रमोट करने के लिए क्या नमिता थापर ने एक हिन्दू दलित का दर्द जानबूझकर छिपाया?
आगे बढ़ने से पहले एक बात समझना बहुत ज़रूरी है। शार्क टैंक या सोनी टीवी जैसे बड़े नेशनल प्लैटफॉर्म्स पर कोई भी सड़क से उठकर ऐसे ही नहीं आ जाता। वहां पहुँचने से पहले कई राउंड के ऑडिशन होते हैं। महीनों तक बैकग्राउंड वेरिफिकेशन चलता है। कंपनी की बैलेंस शीट से लेकर फाउंडर्स की लीगल हिस्ट्री तक का पूरा कच्चा-चिट्ठा खंगाला जाता है।
तो क्या शार्क टैंक के मेकर्स, उनकी रिसर्च टीम और खुद नमिता थापर को ये नहीं पता था की वो जिस ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ नाम के हिजाब ब्रांड को नेशनल टीवी पर प्रमोट करने जा रही हैं, उसकी फाउंडर सना शेख पर धर्मांतरण, खतना और SC/ST एक्ट के तहत कितनी गंभीर FIR दर्ज हैं?
ये कोई छुपी हुई बात नहीं थी। पुलिस रिकॉर्ड में सारी चीज़ें दर्ज थीं। सना शेख को इस मामले में अग्रिम ज़मानत तक लेनी पड़ी थी। फिर भी इन सारी बातों को टीवी पर पूरी तरह से गोल कर दिया गया। क्यों? क्योंकि अगर सच सामने आ जाता, तो एक ‘हिजाबी आंत्रप्रेन्योर’ को प्रमोट करने का जो लिबरल और सेक्युलर एजेंडा था, वो धराशायी हो जाता। एक दलित हिंदू युवक के दर्द और उसकी चीखों को नेशनल टीवी की TRP और एक खास समुदाय को खुश करने के एजेंडे के नीचे जानबूझकर कुचल दिया गया।
ज़रा सोचिए, अगर कहानी उल्टी होती। अगर किसी हिंदू लड़की ने अपने मुस्लिम बॉयफ्रेंड का ज़बरदस्ती धर्मांतरण करवाया होता, उसे पीटा होता, जातिसूचक गालियां दी होतीं और उस पर पेशाब किया होता… तो क्या देश का मेनस्ट्रीम मीडिया चुप बैठता? देश के सारे न्यूज़ चैनल आसमान सिर पर उठा लेते।
“भारत में अल्पसंख्यक खतरे में हैं” का नैरेटिव पूरी दुनिया में चलाया जाता। लेकिन यहाँ पीड़ित दीपक सोनवणे एक हिंदू दलित है और आरोपी सना शेख मुस्लिम, तो पूरा मीडिया और कॉरपोरेट इकोसिस्टम चुप है। ये सन्नाटा डराने वाला है।
कॉरपोरेट ऑफिस या इस्लामिक मदरसे? HR डिपार्टमेंट्स में मुस्लिम कर्मचारियों को खुली छूट और हिन्दू प्रतीकों पर बैन!
ये सब अचानक से नहीं हुआ है। इसके पीछे एक बहुत बड़ी प्लानिंग है। अगर आप आज के कॉरपोरेट स्ट्रक्चर को देखेंगे, तो पाएंगे की हर बड़ी कंपनी के HR (Human Resources) डिपार्टमेंट्स पर ‘वोक’ (Woke), लेफ्ट-लिबरल, और इस्लामिक कट्टरपंथियों का पूरी तरह से कब्ज़ा हो चुका है।
‘डाइवर्सिटी और इन्क्लूज़न’ (Diversity and Inclusion) के नाम पर आजकल कंपनियों में एकतरफा नीतियां थोपी जाती हैं। आप किसी भी मल्टीनेशनल कंपनी में चले जाइए, वहाँ दीवाली पर ‘ग्रीन दीवाली’ का मेल आएगा, होली पर पानी बचाने का ज्ञान दिया जाएगा, लेकिन रमज़ान के वक्त इनके दफ्तरों में अलग से इफ्तार पार्टियां होती हैं और नमाज़ के लिए अलग कमरे अलॉट कर दिए जाते हैं।
HR डिपार्टमेंट्स का दोगलापन तो देखिए! अगर कोई हिंदू लड़का माथे पर तिलक लगाकर या कलावा बांधकर ऑफिस चला जाए, तो उसे अनप्रोफेशनल बोलकर HR की केबिन में बुला लिया जाता है। उसे सस्पेंड करने तक की धमकियां दी जाती हैं। लेकिन उसी ऑफिस में अगर मुस्लिम कर्मचारी हिजाब पहनकर या टोपी लगाकर आए, तो वो ‘माइनॉरिटी राइट्स’ और ‘डाइवर्सिटी’ का हिस्सा बन जाता है।
अगर कोई हिंदू कर्मचारी किसी मुस्लिम की कट्टरपंथी हरकतों की शिकायत HR से करे, तो उसे ही ‘सहिष्णु’ बनने की सलाह दी जाती है और मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। कॉरपोरेट इंडिया का ये ‘वोक कल्चर’ दरअसल हिंदुओं का धीमा ब्रेनवॉश कर रहा है।
नमिता थापर का ‘फेक फेमिनिज़्म’- बुर्के और कट्टरपंथी इस्लाम का महिमामंडन
अब वापस आते हैं नमिता थापर जैसी ‘फेमिनिस्ट्स’ और उनके इकोसिस्टम पर। इस आर्टिकल का सबसे ज़रूरी हिस्सा यही है की हम उस पाखंड को समझें जो इस पूरे कॉरपोरेट ड्रामे के पीछे काम कर रहा है। जब कोई भी पब्लिक फिगर ऐसे हिजाब ब्रांड्स को प्रमोट करती है या नमाज़ जैसे इस्लामिक रिवाज़ों का सरेआम गुणगान करती है, तो हमें उस मानसिकता की गहराई में जाना चाहिए जिसका वो समर्थन कर रही हैं।
नमिता जैसी महिलाएं सेमिनार्स में औरतों की आज़ादी की बात करती हैं। लेकिन क्या इन्होंने कभी उन कट्टरपंथी मौलानाओं के बयान सुने हैं जो खुलेआम टीवी पर बैठकर कुरान का हवाला देते हुए कहते हैं कि “औरतें तुम्हारी खेती हैं”, क्या फेमिनिज़्म यही सिखाता है की औरत को एक ‘खेती’ की तरह इस्तेमाल किया जाए?
क्या इन कॉरपोरेट शार्क ने कभी इतिहास के उन काले पन्नों को पलटा है जहाँ जंग के बाद गैर-मुस्लिम (काफिर) औरतों को ‘माल-ए-गनीमत’ (युद्ध की लूट का माल) समझा जाता था? इतिहास गवाह है की जंग जीतने के बाद हारी हुई रियासतों की हिंदू औरतों को ‘लौंडी’ (या सेक्स स्लेव) बनाकर ज़नानखाने में धकेल दिया जाता था।
उस क्रूर और अमानवीय संस्कृति को, उस हिजाब और बुर्के की प्रथा को जो महिलाओं को इंसान नहीं बल्कि सिर्फ एक वस्तु या प्रॉपर्टी समझती है, आज ये कॉरपोरेट की ‘पावर वुमन’ फेमिनिज़्म के नाम पर जस्टिफाई कर रही हैं!
अगर आप सही मायनों में महिलाओं के हकों की बात करती हैं, तो आपको इस दकियानूसी सोच का सबसे पहले विरोध करना चाहिए था। लेकिन नहीं, आपको तो अपना बिज़नेस चमकाना है। आपको तो अपनी एक खास ‘लिबरल’ इमेज बनानी है ताकि आपको इंटरनेशनल मैगज़ीन्स के कवर पेज पर जगह मिल सके।
और जब कोई हिंदू युवक (जैसे दीपक सोनवणे) इनकी इसी कट्टरपंथी सोच का शिकार होकर अपनी दर्दनाक दास्तां लेकर आता है, तो ये कॉरपोरेट शार्क उसे पूरी तरह से इग्नोर कर देती हैं और उन्हीं आरोपियों के ब्रांड को नेशनल टीवी पर फंडिंग दे डालती हैं।
‘हलाल इकॉनमी’ का बिछाया जाल- इस्लामिक बाज़ार को खुश करने के लिए क्या नमिता जैसी शार्क हिन्दुओं का सौदा कर रही हैं?
अब आप सोचेंगे की आखिर इतनी बड़ी कंपनियां और नमिता थापर जैसे स्मार्ट इन्वेस्टर्स ऐसा करते क्यों हैं? क्या उन्हें नहीं पता की देश में बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की है?
पता है, उन्हें सब पता है। लेकिन असली खेल ‘हलाल इकॉनमी’ का है। ये सिर्फ सेक्युलर दिखने की चाहत नहीं है, बल्कि ग्लोबल इस्लामिक बाज़ार को खुश करने का एक बहुत बड़ा बिज़नेस मॉडल है।
आज पूरी दुनिया में हलाल सर्टिफिकेशन के नाम पर अरबों डॉलर की इकॉनमी खड़ी कर दी गई है। कॉरपोरेट कंपनियों को लगता है की हिंदू तो बंटा हुआ है। वो जाति में, भाषा में, प्रांत में बंटा हुआ है। हिंदू तो हमारा सामान खरीद ही लेगा, उसे दो दिन डिस्काउंट दो, वो पुरानी सारी बातें भूल जाएगा।
इसलिए कॉरपोरेट का पूरा फोकस उस वर्ग को खुश करने पर होता है जो अपने मज़हब के नाम पर एकमुश्त वोट और नोट दोनों देता है। ‘फॉरएवर मॉडेस्ट’ जैसे ब्रांड में इन्वेस्ट करके नमिता थापर सिर्फ भारत के मुसलमानों को नहीं, बल्कि मिडिल-ईस्ट (अरब) के एक बहुत बड़े मार्केट को टैप करने की कोशिश कर रही हैं।
उनके लिए दीपक सोनवणे जैसे हज़ारों दलित हिंदुओं का ज़बरन खतना हो जाए या उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाए, इससे उनके बिज़नेस मॉडल पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तक पैसा आ रहा है, तब तक इनके लिए ‘कॉरपोरेट जिहाद’ भी एक डाइवर्सिटी का हिस्सा है।
समाधान क्या है? ‘हिन्दू इकोसिस्टम’ और ‘हिन्दू इकॉनमी’ बनाने की ज़रूरत
एक कड़वा सच बोलूं? इन कंपनियों और इन कॉरपोरेट चेहरों की हिम्मत इसलिए बढ़ती है क्योंकि हम हिंदू अक्सर बहुत जल्दी सब कुछ भूल जाते हैं। हमारी इसी ‘सहिष्णुता’ को इन लोगों ने हमारी सबसे बड़ी कायरता मान लिया है।
उन्हें लगता है की वो कुछ भी करेंगे, हमारे ही धर्म का मज़ाक उड़ाएंगे, हमारे प्रतीकों (बिंदी, कलावा) पर बैन लगाएंगे, हमारे बच्चों का ब्रेनवॉश करके उनका धर्मांतरण करवाएंगे… और हम फिर भी चुपचाप उनके प्रोडक्ट खरीदते रहेंगे। वो हमारे ही पैसों से अमीर बनेंगे और फिर उसी पैसे से सना शेख जैसी ‘मॉडर्न आंत्रप्रेन्योर्स’ को फंड करेंगे जो सीधे तौर पर हमारे ही खिलाफ काम कर रहे हैं।
लेकिन ये स्थिति अब हर हाल में बदलनी चाहिए। और सच कहूं तो ग्राउंड पर ये बदल भी रही है। सोशल मीडिया के इस दौर में अब आप कोई भी एजेंडा छिपकर नहीं चला सकते। लेंसकार्ट के मामले में हिंदुओं ने दिखा दिया की जब वो एकजुट होकर अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल करते हैं, तो बड़े-बड़े CEO को भी घुटनों पर आकर माफी मांगनी पड़ती है।
नमिता थापर का विवाद भी कोई मामूली विवाद नहीं है। ये एक वेक-अप कॉल है हर उस हिंदू के लिए जो सोचता है की कॉरपोरेट दुनिया में सब कुछ फेयर और न्यूट्रल चल रहा है। हमें ये तय करना होगा की हम अपना खून-पसीने का पैसा कहाँ खर्च कर रहे हैं।
सिर्फ ट्विटर पर दो दिन बॉयकॉट ट्रेंड कराने से लंबी जंग नहीं जीती जा सकती। हमें अपना खुद का ‘हिंदू इकोसिस्टम’ और ‘हिंदू इकॉनमी’ खड़ी करनी होगी।
अगर कोई ब्रांड, कोई सेलिब्रिटी या कोई बिज़नेसमैन हिंदू-विरोधी मानसिकता को पालता-पोसता है, अगर वो धर्मांतरण के आरोपियों को मंच और पैसा देता है, तो ऐसे ब्रांड्स का पूरी तरह से सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार होना ही चाहिए। हमें उन बिज़नेसमैन और उन स्टार्टअप्स को सपोर्ट करना होगा जो हमारी संस्कृति, हमारे प्रतीकों और हमारे लोगों का सम्मान करते हैं।
आखिर में बस इतना ही कहूंगा की अपनी आंखें हमेशा खुली रखिए। ये जो टीवी पर नमिता थापर जैसे बिज़नेस लीडर्स सूट-बूट पहनकर बड़ी-बड़ी प्रोग्रेसिव बातें करते हैं, कैमरे के पीछे इनके काले सच और डार्क सीक्रेट्स अब बाहर आ चुके हैं।
दीपक सोनवणे की चीखें भले ही कॉरपोरेट के एसी कमरों और शार्क टैंक के स्टूडियो तक ना पहुँची हों, लेकिन वो देश के हर सच्चे हिंदू तक पहुंचनी चाहिए। अब समय आ गया है की इन दोहरे मापदंड वालों को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाए- क्योंकि जब बिज़नेस और रेवेन्यू पर चोट पड़ती है ना, तब इनका सारा फेमिनिज़्म और सेक्युलरिज्म हवा हो जाता है।
हिंदू जाग रहा है, और ये तो बस शुरुआत है। पिक्चर तो अभी बाकी है!
