भाजपा शासित राज्यों में बढ़ता धर्मांतरण का षड़यंत्र और नेताओं का 'जांच' का ढोंग- TCS के बाद अब नागपुर के जिहादी NGO का भंडाफोड़

भाजपा शासित राज्यों में बढ़ता धर्मांतरण का षड़यंत्र और नेताओं का ‘जांच’ का ढोंग- TCS के बाद अब नागपुर के जिहादी NGO का भंडाफोड़

सच कहूं तो अब गुस्सा भी आना बंद हो गया है, और बेबसी महसूस होती है। हम वोट किसे देते हैं? उन्हें जो छाती ठोककर कहते हैं की हम हिंदुओं के इकलौते तारणहार हैं। पर ज़मीनी हकीकत देखकर तो मन करता है सिर पीट लें अपना। सत्ता की कुर्सी का सुख भोग रहे हमारे ये भाजपा नेता सिर्फ AC कमरों में बैठकर ‘जांच और कार्रवाई’ की भाषणबाजी करते हैं, और उधर ज़मीन पर जिहादियों द्वारा हमारी बहन-बेटियों का रोज़ शिकार हो रहा है।

अभी TCS नासिक के उस इस्लामिक धर्मांतरण एजेंडा की आग ठंडी भी नहीं हुई थी की महाराष्ट्र की उसी ज़मीन से- नागपुर से, जो की संघ और हिंदुत्व का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है- रियाज़ काज़ी नाम के एक नए जिहादी दरिंदे का खौफनाक सच सामने आया है। ये रियाज़ काज़ी गरीब हिन्दू (जिनमें खासकर महिलाएं शामिल थी) को NGO में नौकरी की आड़ में ब्रेनवॉश करता था और उनको हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव बनाता था।

वैसे तो रियाज़ गिरफ्तार हो गया है, लेकिन इसके पकड़े जाने के बाद भी क्या होगा? ये नेता लोग आएंगे और वही रटा-रटाया डायलॉग चिपका देंगे- “SIT बना दी गई है, हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे।” 

अरे भाई, ये ‘कड़ी कार्रवाई’ आखिर होगी कब? जब पूरे राज्य की डेमोग्राफी बदल जाएगी तब? जब हर हिंदू घर से एक लड़की बुर्के में नज़र आने लगेगी तब? सत्ता हमारी, पुलिस हमारी, सिस्टम अपना, फिर भी रियाज़ काज़ी जैसे दो कौड़ी के जिहादी इतनी हिम्मत कहाँ से लाते हैं की वो डंके की चोट पर हमारी बच्चियों का धर्म भ्रष्ट कर सकें?

हालत ये है की अपनी ही चुनी हुई ‘हिंदूवादी’ सरकारों के राज में हिंदू सिर्फ एक ‘वोट बैंक’ बनकर कट रहा है। इलेक्शन आएगा तो यही नेता भगवा गमछा डालकर आपके दरवाज़े पर आ जाएंगे, लेकिन जब नागपुर की झुग्गियों में एक बेबस हिंदू औरत को नौकरी और राशन के नाम पर रियाज़ काज़ी जैसे भेड़िये नोच रहे होते हैं, तब इनका कोई ‘हिंदुत्व’ काम नहीं आता। 

हिन्दू महिलाओं के शिकार का नया हथियार- ‘चैरिटी’ और NGO

खैर, छोड़ो इन नेताओं की बात। अब ज़रा गेम समझो की ज़मीनी स्तर पर ये पूरा धंधा चल कैसे रहा है। वो ज़माना गया जब सड़क किनारे खड़े होकर कोई छपरी रोमियो हमारी लड़कियों को फंसाता था। आज के इन मुस्लिम शिकारियों ने अपना तरीका पूरी तरह से अपग्रेड कर लिया है। अब ये सिर्फ ‘लव जिहाद’ नहीं रहा, ये सीधे-सीधे ‘इंस्टीट्यूशनल जिहाद’  बन चुका है।

रियाज़ काज़ी (या रियाज़ फ़ाज़िल क़ाज़ी) कोई सड़क छाप गुंडा नहीं था। ये जनाब ‘फिकर फाउंडेशन’, ‘पढ़ें हम, पढ़ाएं हम’ और ‘यूनिवर्सल मल्टीपर्पस सोसाइटी (UMS)’ जैसे भारी-भरकम और नेक लगने वाले नामों से NGO चलाता था।

बाहर से देखने में एकदम समाज सेवक! गरीब बच्चों को पढ़ा रहा है, ज़रूरतमंद औरतों को सिलाई-कढ़ाई सिखा रहा है, उन्हें रोज़गार दे रहा है। कितनी ‘पवित्र’ तस्वीर है ना? लेकिन इस सफेदपोश चैरिटी के पीछे जो गंदगी उबल रही थी, उसकी बदबू अब पूरे महाराष्ट्र से उठकर देश भर में फैल चुकी है।

ये लोग ऐसे ही किसी पर भी हाथ नहीं डालते। इनकी पूरी बाकायदा एक रेकी होती है। ये सबसे पहले उन हिंदू महिलाओं और परिवारों को अपना सॉफ्ट टारगेट बनाते हैं जो बेबस हैं। जिनके घर में दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं है, या वो लड़कियां जो अपने घर-परिवार से दूर अकेली रहकर शहर में छोटी-मोटी नौकरी तलाश रही हैं।

रियाज़ काज़ी और उसके गुर्गे पहले तो ऐसे परिवारों के मसीहा बनकर जाते हैं। कभी घर में राशन-वाशन डलवा दिया, कभी किसी बीमार की दवा ला दी, या बच्चों की स्कूल फीस भर दी। फिर धीरे-धीरे इन गरीबों को एहसान के ऐसे बोझ तले दबा दिया जाता है की वो चाहकर भी इनके खिलाफ चूं तक नहीं कर पाते। और बस, यहीं से शुरू होता है असली माइंडगेम!

जब ये मजबूर हिंदू महिलाएं इनके NGO में काम करने लगती हैं, तो शुरू-शुरू में मीठी-मीठी बातें होती हैं। “अरे बहन, आप लोग हमारे मज़हब के बारे में कितना गलत सोचते हैं” वाली स्क्रिप्ट बहुत ही चालाकी से रटी जाती है।

धीरे-धीरे ये ज़हर इनकी नसों में उतारा जाता है। रियाज़ काज़ी ने बिल्कुल यही ब्लूप्रिंट फॉलो किया। उसने अपनी हिंदू महिला स्टाफ को साफ-साफ कह दिया की अगर यहां काम करना है, तो बुर्का और हिजाब तो पहनना ही पड़ेगा!

ज़रा सोचिए… नागपुर के बीचों-बीच, जहां देश का संविधान लागू है, जहां गृहमंत्री बैठते हैं, वहां एक दाढ़ी वाला आदमी खुलेआम हिंदू औरतों पर शरिया कानून थोप रहा था और हमारी पुलिस कान में तेल डाले सो रही थी!

नौकरी बचाने की मजबूरी और घर की भुखमरी इंसान से क्या-क्या नहीं करवाती। जो हिंदू महिलाएं कल तक माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर लगाकर खुशी-खुशी निकलती थीं, उन्हें इस दरिंदे ने अपनी ‘चैरिटी’ के नाम पर रोज़ा रखने, नमाज़ पढ़ने और इस्लामिक तौर-तरीके अपनाने पर मजबूर कर दिया।

ये कोई हवा-हवाई बातें नहीं हैं। एफआईआर में साफ-साफ दर्ज है की कैसे ये शख्स उन्हें मानसिक रूप से तोड़ रहा था। जो महिला इसका विरोध करती, उसे वो सीधे नौकरी से निकालने और समाज में बदनाम करने की धमकी देता।

ये सिर्फ एक-दो लड़कियों की या एक अकेले रियाज़ काज़ी की कहानी नहीं है। ये पूरा का पूरा एक नेक्सस है जो गांव-गांव, गली-गली फैल चुका है। इन्हें पता है की हिंदू बहुत जल्दी पिघल जाता है।

उसे थोड़ा सा पैसा या मदद दिखाओ, वो तुम्हारे गुण गाने लगेगा और सेक्युलरिज्म के नशे में झूमने लगेगा। इसी भोलेपन (या सच कहूं तो हमारी मूर्खता) का फायदा उठाकर ये सफेदपोश जिहादी एक पूरी नस्ल को ख़त्म करने में लगे हुए हैं।

नागपुर का रियाज़ काज़ी: मदद के जाल में फंसाकर हिन्दू बच्चियों का ईमान और जिस्म नोचने वाला सौदागर 

बात सिर्फ बुर्का या हिजाब पहनाने तक ही रुकी होती, तो शायद सेक्युलरिज्म के नशे में चूर हमारा हिंदू समाज इसे भी ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ का नाम देकर इग्नोर कर देता। लेकिन जब रियाज़ काज़ी के काले कारनामों की पूरी फाइल खुलनी शुरू हुई, तो ऐसी-ऐसी खौफनाक सच्चाइयां बाहर आईं की किसी भी आम आदमी का खून खौल जाए।

तुम खुद सोचो, जो मजबूर औरतें और बच्चियां इस दरिंदे के पास नौकरी या थोड़ी सी मदद की आस लेकर आती थीं, उन्हें ये सिर्फ अपने मज़हब का गुलाम नहीं बना रहा था, बल्कि अपनी गंदी हवस का शिकार भी बना रहा था।

एफआईआर (FIR) उठाकर पढ़ लो, रोंगटे खड़े हो जाएंगे। उसमें साफ-साफ लिखा है की कैसे इस आदमी ने अपनी ही महिला स्टाफ के साथ यौन उत्पीड़न किया और उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से टॉर्चर किया।

ये कोई ‘चैरिटी’ नहीं चल रही थी, ये सीधे-सीधे हिंदू लड़कियों के जिस्म और ईमान की बोली लगाई जा रही थी। जो महिला इसकी ज़्यादतियों का विरोध करती या इसके बिछाए हुए जाल से बाहर निकलने की कोशिश करती, उसे ये ऐसी धमकियां देता की बेचारी डर के मारे अंदर ही अंदर घुटती रहती।

और इसका तरीका देखो कितना शातिर था! ये रियाज़ काज़ी कोई अनपढ़, सड़कछाप गुंडा नहीं है जिसे पुलिस दो डंडे मारकर सुधार दे। ये बकायदा एक ‘टेक्नो-क्रिमिनल’ की तरह काम कर रहा था। पुलिस की जांच में सामने आया है की ये आदमी फेसबुक और इंस्टाग्राम पर दर्जनों फेक अकाउंट बनाकर रखता था।

अपनी ही स्टाफ की हिंदू लड़कियों की हर एक हरकत पर छुप-छुपकर नज़र रखता था। कौन लड़की किससे चैट कर रही है, वीकेंड पर कहाँ जा रही है, किससे मिल रही है- सब कुछ इसकी रडार पर था। एक तरह की ‘साइबर स्टॉकिंग का पूरा नेक्सस बना रखा था इसने।

हद तो तब हो गई जब लड़कियों को ब्लैकमेल करने का खेल शुरू हुआ। “अगर तुमने नमाज़ पढ़ने से मना किया, या किसी को मेरे बारे में कुछ भी बताया, तो तुम्हारी ऐसी मॉर्फ्ड तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल कर दूंगा की समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी।”

अब बताओ, एक गरीब और बेबस लड़की, जिसके पीछे कोई गॉडफादर नहीं है, वो बेचारी ऐसी धमकियों के आगे कैसे टिक पाएगी? वो तो घुटने टेकने पर मजबूर हो ही जाएगी ना!

और सबसे दर्दनाक बात तो ये है की इसका एक NGO है- ‘पढ़ें हम, पढ़ाएं हम’। नाम सुनकर लगता है की क्या नोबल काम कर रहा है बंदा! लेकिन असल में ये एजुकेशन के नाम पर छोटे-छोटे मासूम हिंदू बच्चों का ब्रेनवाश कर रहा था। गरीब बस्तियों के बच्चों को मुफ्त पढ़ाई और कॉपी-किताब का लालच देकर अपने सेंटर पर बुलाना और फिर वहां उनसे कलमा पढ़वाना, इस्लामी दुआएं याद करवाना… ये सब धड़ल्ले से चल रहा था।

बचपन से ही उन बच्चों के दिमाग में हिंदू धर्म के खिलाफ ज़हर भरा जा रहा था, ताकि बड़े होकर वो खुद-ब-खुद अपनी जड़ें काट लें। और हमारी सरकारें? वो तो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के होर्डिंग लगाने में ही बिज़ी हैं। ज़मीन पर इन बेटियों और बच्चों को कौन ‘रियाज़ काज़ियों’ से बचाएगा, इसका जवाब किसी नेता के पास नहीं है।

‘हिन्दू’ डेमोग्राफी मिटाने के लिए PFI और इस्लामिक देशों की फंडिंग 

अब यहाँ एक सबसे बड़ा सवाल उठता है। ज़रा ठंडे दिमाग से सोचना। एक मामूली सा आदमी, जो नागपुर की एक छोटी सी कॉलोनी से बैठकर दो-तीन NGO चला रहा है… वो इतने सारे लोगों को मुफ्त राशन बांट रहा है, स्टाफ को सैलरी दे रहा है, बुर्के-हिजाब खरीदकर बांट रहा है और पूरे सिस्टम को ठेंगे पर रखकर अपना एजेंडा चला रहा है। भाई, इसके पास इतना अंधा पैसा-वैसा आखिर आ कहाँ से रहा है?

सीधी सी बात है, बिना किसी तगड़ी ‘फंडिंग’ और ‘पॉलिटिकल बैकिंग’ के इतना बड़ा सिंडिकेट चलाना किसी एक आदमी के बस की बात नहीं है। दाल में कुछ काला नहीं, पूरी की पूरी दाल ही सड़ी हुई है।

जब मामला बहुत ज़्यादा गरमा गया और हिंदू संगठनों ने पुलिस स्टेशन के बाहर हंगामा खड़ा कर दिया, तब जाकर कहीं प्रशासन की नींद टूटी। और शुक्र है की मामले की गंभीरता को देखते हुए अब महाराष्ट्र ATS को इस जांच में उतारना पड़ा है।

ATS की एंट्री का सीधा सा मतलब समझते हो? इसका मतलब है की पुलिस को भी कहीं न कहीं भनक लग चुकी है की ये कोई लोकल ‘लव जिहाद’ का मामला नहीं है। इसके तार बहुत गहरे और बहुत दूर तक जुड़े हुए हैं।

खुफिया एजेंसियों को शक है की रियाज़ काज़ी जैसे मोहरों के पीछे PFI (Popular Front of India) जैसे बैन हो चुके खूंखार जिहादी संगठनों का स्लीपर सेल काम कर रहा है। सरकार ने PFI को कागज़ों पर बैन तो कर दिया, लेकिन उनके पाले हुए ये सपोले आज भी अलग-अलग NGOs का चोला ओढ़कर ज़मीन पर रेंग रहे हैं।

ये जो मिडिल-ईस्ट के देशों से जकात, खैरात और ‘हलाल इकॉनमी’ के नाम पर करोड़ों-अरबों की विदेशी फंडिंग भारत में आ रही है, तुम्हें क्या लगता है वो कहाँ इस्तेमाल हो रही है? वो पैसा इन्हीं रियाज़ काज़ियों की जेबों में डाला जा रहा है, ताकि भारत की डेमोग्राफी को पूरी तरह से पलट दिया जाए। इनका एक ही अल्टीमेट टारगेट है- ‘गज़वा-ए-हिंद’।

और इसका सबसे आसान तरीका यही है की बहुसंख्यक हिंदू समाज की औरतों और बच्चों को सॉफ्ट टारगेट बनाओ। उन्हें पैसे और नौकरी का लालच देकर कन्वर्ट करो। एक महिला कन्वर्ट होती है, तो आने वाली पूरी की पूरी नस्ल उनके कब्ज़े में आ जाती है।

लेकिन सवाल फिर घूम-फिरकर वहीं आ जाता है। हमारी स्टेट इंटेलिजेंस क्या झक मार रही थी? क्या खूफिया विभाग वालों को इतने सालों से चल रहे इस खेल की भनक तक नहीं लगी? या फिर जानबूझकर आंखें बंद रखी गईं ताकि ‘सेक्युलरिज्म’ का चोला मैला न हो जाए?

नागपुर में बैठकर कोई तुम्हारे धर्म की जड़ें खोद रहा है, हवाला के ज़रिए विदेशों से करोड़ों का फंड मंगा रहा है और सिस्टम आराम से खर्राटे ले रहा है! ये नाकामी नहीं है यार, ये तो सीधा-सीधा हमारे साथ धोखा है।

‘जांच-जांच’ का झुनझुना- सत्ता में भाजपा, फिर भी कट रहा हिन्दू

अब बात करते हैं इस पूरे खेल के सबसे घिनौने हिस्से की। रियाज़ काज़ी तो खैर एक इस्लामिक सपेरा है, उसका तो काम ही डसना है। उससे तो हम और आप किसी रहम की उम्मीद कर भी नहीं सकते। लेकिन सबसे ज़्यादा खून तब खौलता है, जब अपने ही डसने लगें! ज़रा ठंडे दिमाग से सोचो… महाराष्ट्र में सरकार किसकी है?

भाजपा और उसके सहयोगियों की। राज्य का गृह मंत्रालय किसके पास है? उसी पार्टी के पास जो दिन-रात ‘हिंदुत्व’ का ढोल पीटती है। नागपुर तो वैसे भी संघ (RSS) का हेडक्वार्टर है, हिंदुत्व का सबसे बड़ा और पवित्र गढ़ माना जाता है। तो फिर उसी नागपुर की नाक के नीचे एक जिहादी, हिंदू लड़कियों को सरेआम बुर्का पहना रहा है और पुलिस कान में तेल डाले सो रही है? ये कैसे मुमकिन है भाई?

सच कहूं तो अब इन नेताओं की कायरता देखकर शर्म आने लगी है। जब इलेक्शन का टाइम आता है, तो ये सब भगवा गमछा गले में डालकर, माथे पर बड़ा सा तिलक लगाकर आपके घर वोट मांगने आ जाते हैं।

बड़े-बड़े मंचों से चीख-चीख कर कहते हैं, “हिंदुओं खतरे में हो, हमें वोट दो, हम बचाएंगे!” बेचारा आम हिंदू भी अपनी दिन-भर की दिहाड़ी छोड़कर, चिलचिलाती धूप में लाइन में लगकर कमल के बटन पर वोट दबा आता है। वो सोचता है की चलो, महंगाई-बेरोजगारी तो सह लेंगे, कम से कम अपना धर्म तो बचा रहेगा, हमारी बहन-बेटियां तो महफूज़ रहेंगी।

लेकिन होता क्या है? जब उसी हिंदू की बेटी को रियाज़ काज़ी जैसे भेड़िये किसी NGO के अंदर बंधक बनाकर नमाज़ पढ़वाते हैं, उसका यौन शोषण करते हैं, तो ये ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाले नेता एकदम से सेक्युलर बन जाते हैं! इनके मुंह में जैसे दही जम जाता है।

मामला जब सोशल मीडिया पर तूल पकड़ता है और हिंदू संगठन सड़कों पर उतरते हैं, तब जाकर कहीं ये अपने AC कमरों से बाहर निकलते हैं और कैमरे के सामने आकर वही पुराना, रटा-रटाया कैसेट प्ले कर देते हैं- “हम इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं… हमने SIT का गठन कर दिया है… दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”

अरे भाई, ये SIT-SIT का झुनझुना हमें कब तक थमाते रहोगे? नासिक वाले TCS कांड में भी तो यही ‘जांच-वांच’ का नाटक हुआ था ना? क्या उखाड़ लिया उस जांच ने? क्या उन हिंदू बच्चियों की वापस लौटी हुई इज़्ज़त और उनका मानसिक सुकून कोई SIT वापस ला सकती है? जब पुलिस तुम्हारी, इंटेलिजेंस तुम्हारी, पूरा का पूरा सिस्टम तुम्हारा, तो फिर ये नौबत आ ही क्यों रही है की कोई रियाज़ काज़ी इतनी हिम्मत जुटा सके?

हकीकत तो ये है की इन नेताओं ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ नाम की सेक्युलर अफीम चाट रखी है। इन्हें बस अपनी कुर्सी प्यारी है और इंटरनेशनल मीडिया में अपनी ‘गुड बॉय’ वाली इमेज बचानी है। इन्हें लगता है की मुसलमानों पर ज़्यादा कड़ा एक्शन लेंगे तो इनका ‘माइनॉरिटी वोट बैंक’ खिसक जाएगा और विदेशी अख़बार इन्हें ‘फासीवादी’ लिख देंगे। 

इसी सेक्युलर सिंड्रोम के चक्कर में आज हिंदू अनाथ हो गया है। उसे समझ नहीं आ रहा की वो जाए तो जाए कहाँ! अगर अपने ही सिस्टम में हमारी बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, तो धिक्कार है ऐसी सत्ता पर और ऐसे पावर पर। साफ दिख रहा है की ये सिर्फ ‘मैनेजमेंट’ की सरकारें हैं, ‘रक्षण’ की नहीं।

‘हिन्दू’ लड़कियों पर मुस्लिम अत्याचार और मीडिया की बेशर्म चुप्पी- कहाँ मर गईं वो हिजाब पर छाती पीटने वाली लिबरल आंटियां 

खैर, नेताओं का दोगलापन तो हमने देख लिया। अब ज़रा नज़र डालिए हमारे देश के उस ‘बुद्धिजीवी’ और ‘लिबरल’ इकोसिस्टम पर, जो हर वक्त महिलाओं के हक और आज़ादी का झंडा उठाए घूमता रहता है।

याद है ना कर्नाटक का हिजाब विवाद? जब स्कूलों ने कहा की क्लास में हिजाब की जगह यूनिफॉर्म पहनकर आना पड़ेगा, तो इस पूरे लिबरल गिरोह ने आसमान सिर पर उठा लिया था। वाशिंगटन पोस्ट से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स तक में बड़े-बड़े आर्टिकल छप गए की “भारत में माइनॉरिटी खतरे में है”, “लड़कियों से उनके कपड़े पहनने की आज़ादी छीनी जा रही है।”

सुप्रीम कोर्ट के बड़े-बड़े वकील खड़े हो गए थे ये साबित करने के लिए की हिजाब पहनना तो ‘चॉइस’ है। बॉलीवुड के भांडों ने ट्वीट पर ट्वीट पेल दिए थे। लेकिन आज जब नागपुर में रियाज़ काज़ी हिंदू महिलाओं को नौकरी से निकालने की धमकी देकर ज़बरदस्ती हिजाब और बुर्का पहना रहा था, तब इन ‘चॉइस’ गैंग वालों को सांप क्यों सूंघ गया है?

कहाँ गए वो सारे यूट्यूबर, वो सारे सो-कॉल्ड सेक्युलर पत्रकार जो दिन-रात मानवाधिकार का रोना रोते हैं? किसी ने एक शब्द तक नहीं कहा! किसी स्वरा भास्कर या किसी अल्ट न्यूज़ वाले ने कोई थ्रेड नहीं बनाया। क्यों? क्योंकि यहाँ शिकार होने वाली लड़कियां हिंदू हैं और शिकार करने वाला एक मुस्लिम ‘अल्पसंख्यक’।

इनके एजेंडे में हिंदू कभी ‘विक्टिम’ (पीड़ित) हो ही नहीं सकता। अगर ये रियाज़ काज़ी की करतूतों पर बोलेंगे, तो इनकी वो थ्योरी ही क्रैश हो जाएगी जिसमें ये दिन-रात मुसलमानों को ‘डरा हुआ’ बताते हैं।

इस इकोसिस्टम की बेशर्मी का आलम ये है की अगर रियाज़ काज़ी पर पुलिस थोड़ा सा भी डंडा चला दे, तो ये तुरंत उसे ‘पुलिस ब्रूटैलिटी’ बताकर उसे ही पीड़ित साबित करने में लग जाएंगे। नासिक केस में भी यही ड्रामा रचा गया था। निदा खान जैसी HR मैनेजर, जो हिंदू लड़कियों के शोषण को ‘कॉर्पोरेट कल्चर’ बता रही थी, उसे बचाने के लिए उसके प्रेगनेंट होने का विक्टिम कार्ड खेला जाने लगा!

बिल्कुल वैसे ही जैसे दिल्ली दंगों के वक्त सफूरा ज़रगर के मामले में किया गया था। इनका पैटर्न फिक्स है- पहले हिंदुओं को मारो, उन्हें कन्वर्ट करो, और जब पकड़े जाओ तो ‘इस्लामोफोबिया’ का रोना शुरू कर दो।

हिन्दुओं को मुस्लिम जिहाद से अपनी नस्लें बचानी हैं, तो ‘सेक्युलरिज्म’ का चश्मा फेंककर खुद कट्टर बनना होगा 

अब सबसे बड़ा सवाल ये है की हम क्या करें? क्या ऐसे ही हर रोज़ अखबारों में अपनी बेटियों के धर्म परिवर्तन और शोषण की खबरें पढ़ते रहें और खून का घूंट पीकर सो जाएं?

सच कहूं तो अब वक्त आ गया है की हम इन नेताओं के भरोसे बैठना बंद कर दें। सरकारें सिर्फ कुर्सी देखती हैं, धर्म नहीं। जब तक आप पुलिस और नेताओं के मुंह ताकते रहोगे, ये रियाज़ काज़ी और दानिश शेख आपकी पीढ़ियों को दीमक की तरह चाटते रहेंगे। आपको खुद अपनी लड़ाई लड़नी होगी।

सबसे पहले अपने घर से शुरुआत करो। हमने अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर और मैनेजर तो बना दिया, लेकिन उन्हें उनका ‘धर्म’ सिखाना भूल गए। एक मुस्लिम बच्चा 5 साल की उम्र से ही मदरसे में जाकर अपना कलमा और मज़हब पक्का कर लेता है, और हमारा हिंदू युवा 25 साल की उम्र में भी ‘सब धर्म समान हैं’ के नशे में झूमता रहता है।

अपने बच्चों को कट्टर बनाओ भाई! उन्हें बताओ की उनका इतिहास क्या है और उनके सामने असल दुश्मन कौन है। अगर आपने उन्हें उनके धर्म की ताकत और खतरे के बारे में नहीं बताया, तो कोई रियाज़ काज़ी उन्हें बुर्का पहनाकर कलमा पढ़ा देगा और आपको भनक तक नहीं लगेगी।

दूसरा काम- ये जो सेक्युलरिज्म का चश्मा पहनकर हम ‘भाई-चारा’ निभाने निकलते हैं, इसे उतार कर फेंक दो। ये ‘भाई-चारा’ नहीं है, इसमें हम हमेशा ‘चारा’ ही बनते हैं और वो हमेशा ‘भाई’ ही बने रहते हैं। अपने आस-पास के माहौल को पहचानो। ऐसे NGOs, ऐसी संस्थाओं और ऐसे कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर का बॉयकॉट करना सीखो जहां तुम्हारे धर्म का मज़ाक उड़ाया जाता है या तुम्हें सॉफ्ट टारगेट बनाया जाता है।

अब बात पानी के सिर से ऊपर जाने की नहीं रही, पानी अब गले में उतरने लगा है। अगर नागपुर जैसी जगह पर, जहां कदम-कदम पर हिंदू संगठन बैठे हैं, वहां एक जिहादी हमारी औरतों को बंधक बना सकता है, तो समझ लो की तुम्हारी कॉलोनी और तुम्हारे घर तक पहुंचने में उसे ज़्यादा वक्त नहीं लगेगा।

नेताओं का काम सिर्फ जांच कमेटी बिठाना है, लेकिन अपनी नस्लों को बचाना हमारा काम है। जागो और लड़ना सीखो। आवाज़ उठाओ। सिस्टम में बैठे इन गद्दारों का गिरेबान पकड़ना सीखो और जो तुम्हारी आस्था पर हमला करे, उसका उसी की भाषा में इलाज करना सीखो। वरना इतिहास गवाह है, जो कौम अपने धर्म और अपनी औरतों की रक्षा नहीं कर सकती, उसका धरती से नाम-ओ-निशान मिटने में देर नहीं लगती।

अगर आज भी तुम्हारी आंखें नहीं खुलीं, तो याद रखना- कल का रियाज़ काज़ी तुम्हारे ही घर के दरवाज़े पर खड़ा मिलेगा!

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