वामपंथी लाल आतंक का नग्न चेहरा- जब आदित्य बिरला का चीरहरण कर बंगाल के औद्योगिक भविष्य को ही दफन कर दिया गया

सच कहूं तो, वामपंथ कोई मामूली राजनीतिक विचारधारा या पार्टी नहीं है। इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए, ये एक ऐसी वैचारिक बीमारी है, एक ऐसा वायरस है, जो जिस भी देश, राज्य या समाज में घुसता है, उसे अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट जाता है। 

हमारे यहाँ सनातन धर्म में तो हमेशा से मेहनत, व्यापार और कर्मयोग की पूजा होती आई है। हमारे लिए तो धन का मतलब सीधा ‘माता लक्ष्मी’ का आशीर्वाद है, और कारखाने लगाने वाले, रोज़गार देने वाले उद्यमी ‘विश्वकर्मा’ के ही रूप माने जाते हैं। 

लेकिन ये कम्युनिस्ट? इन्होंने तो हमेशा कार्ल मार्क्स नाम के एक विदेशी की सड़ी-गली थ्योरी को हमारे ऊपर थोपने की ही कोशिश की है। इनके यहाँ पैसा कमाने वाला, फैक्टरी लगाकर हज़ारों घरों का चूल्हा-चौका चलाने वाला इंसान हमेशा “क्लास एनिमी” (वर्ग शत्रु) होता है।

अब ज़रा सोचिए, बंगाल जो कभी पूरे भारत का माथा हुआ करता था, जो हमारी सांस्कृतिक और औद्योगिक राजधानी था… उसे इन लाल झंडे वालों ने अपनी इसी नफरत और खूनी राजनीति की भट्टी में कैसे झोंक दिया।

जिस पवित्र धरती ने हमें स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे धाकड़ सनातनी और राष्ट्रवादी नायक दिए, उसी ज़मीन को इन वामपंथियों ने मार-काट, हड़तालों और जंग खाती फैक्टरियों के श्मशान में बदल दिया। 

आज मैं आपको इसी वामपंथी ‘लाल आतंक’ के उस खौफनाक और काले अध्याय के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिस पर आज तक हमारे देश का ये वामपंथी और लिबरल मीडिया पर्दा डालता आया है। 

ये कहानी है हमारे देश के महान उद्योगपति ‘आदित्य विक्रम बिरला’ (बिरला ग्रुप के चेयरमैन) के सरेआम चीरहरण की। एक ऐसी घटना, जिसने ना सिर्फ बंगाल में भारतीय व्यापार की रीढ़ तोड़ दी, बल्कि जिसके खौफ से बाकी के तमाम सेठ-साहूकार और बड़े-बड़े घराने सचमुच अपनी धोती पकड़ कर रातों-रात बंगाल से भाग खड़े हुए।

वो काला दिन जब वामपंथी दरिंदों ने आदित्य बिरला को बीच सड़क पे नंगा कर बंगाल की आबरू लूट ली 

चलिए आपको बताते हैं उस रूह कंपा देने वाले दिन के बारे में। ये 1990 के दशक की शुरुआत की बात है, 1993 के आस-पास का समय था। आदित्य विक्रम बिरला (बिरला ग्रुप के चेयरमैन)… ये कोई छोटा-मोटा नाम नहीं है।

ये भारत के वो दिग्गज उद्योगपति थे जिनके परिवार ने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी और सरदार पटेल तक की आर्थिक मदद की थी। वो सही मायनों में इस देश की अर्थव्यस्था के आधार थे।

वो अपनी कार से कलकत्ता के एक वीवीआईपी इलाके से गुज़र रहे थे। जगह कौन सी थी? मुख्यमंत्री का कार्यालय ‘राइटर्स बिल्डिंग’। ये बंगाल की सत्ता का सबसे सुरक्षित और पावरफुल इलाका माना जाता था।

इसके ठीक सामने जनरल पोस्ट ऑफिस (GPO) और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) है। मतलब समझ रहे हैं ना? यहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता।

आदित्य बिरला की गाड़ी जैसे ही यहाँ पहुंची, लाल झंडे उठाए वामपंथी यूनियन के गुंडों की एक पूरी फौज ने उन्हें घेर लिया। ये कोई अचानक हुआ विरोध नहीं था; पूरी प्लानिंग के साथ सत्ता के नशे में चूर गुंडों ने हमला किया था।

गाड़ी के शीशे तोड़े गए, दरवाज़े झटके से खोले गए और इतने बड़े, इतने सम्मानित इंसान को कॉलर से पकड़कर बीच सड़क पर घसीट लिया गया।

इसके बाद जो हुआ, उसे लिखते हुए भी खून खौलता है। उन वामपंथी दरिंदों ने बीच सड़क पर आदित्य बिरला के कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए। पैंट, शर्ट सब फाड़-फूड़ कर उन्हें सिर्फ कच्छे-बनियान (अंडरगार्मेंट्स) में खड़ा कर दिया। ज़रा सोचिए इस भयानक मंज़र को! जिस इंसान की वजह से लाखों घरों में रोज़ी-रोटी जा रही थी, उसे सरेआम निर्वस्त्र कर दिया गया।

और बात यहीं खत्म नहीं हुई। इन खूंखार कॉमरेडों ने उसी नंगी और अपमानजनक हालत में, नंगे पैर, आदित्य बिरला को कलकत्ता की सड़कों पर पैदल हांका। राइटर्स बिल्डिंग से स्टॉक एक्सचेंज होते हुए 15 इंडिया एक्सचेंज प्लेस तक- जो करीब एक-डेढ़ किलोमीटर से ज्यादा का रास्ता था- उन्हें वैसे ही कच्छे-बनियान में चलाया गया। वहां खड़ी भीड़ तमाशा देख रही थी, हंस रही थी, सीटियां और तालियां बजा रही थी।

और राइटर्स बिल्डिंग में बैठे मंत्री? पुलिस वाले? सब चुपचाप तमाशा देख रहे थे। किसी एक माई के लाल ने आगे आकर उन्हें बचाने की हिम्मत नहीं की। ये सिर्फ आदित्य विक्रम बिरला के कपड़े नहीं उतरे थे, ये इस देश के पूरे उद्यमी वर्ग की इज़्ज़त सरेआम नीलाम हो रही थी।

ये हमारी उस सनातन परंपरा का चीरहरण था जो मेहनत करने वालों का सम्मान करती है। इन वामपंथियों ने साफ़ मैसेज दे दिया था- “यहाँ कोई टाटा-बिरला नहीं, सिर्फ हमारा खूनी लाल झंडा चलेगा!”

धोती पकड़ कर भागे उद्योगपति, वामपंथ के खौफ ने कैसे एक झटके में बंगाल को उद्योगों का शमशान बना दिया 

ज़ाहिर सी बात है, आदित्य विक्रम बिरला कोई सड़क छाप नेता तो थे नहीं जो इस अपमान के बाद वहीं धरने पर बैठ जाते। वो एक स्वाभिमानी इंसान थे। अपने दफ्तर पहुंचकर उन्होंने जो कुछ किया, उसने वामपंथियों की छाती पर ऐसा हथौड़ा मारा जिसकी गूंज आज तक सुनाई देती है।

बिरला जी ने कुछ ही घंटों में अपना ज़रूरी सामान समेटा, सीधा दमदम एयरपोर्ट पहुंचे और बॉम्बे की फ्लाइट पकड़ ली। और जाते-जाते कसम खा ली की अब अपनी ज़िंदगी में इस वामपंथी नर्क में एक फूटी कौड़ी भी इन्वेस्ट नहीं करेंगे। उन्होंने रातों-रात कलकत्ता से अपने सारे बड़े प्रोजेक्ट्स और पैसा वापस खींच लिया। और वो सच में फिर कभी उस तरह से कलकत्ता वापस नहीं लौटे।

अब आप खुद सोचकर देखिए, जब देश के इतने बड़े आदमी का ये हाल हो सकता है, तो बाकी के सेठ-साहूकारों की तो हवा ही टाइट हो गई ना! पूरे कॉर्पोरेट जगत में ऐसी दहशत फैली की पूछिए मत। सबको समझ आ गया की जिस राज्य में गुंडे ही सरकार चला रहे हों, वहाँ धंधा करना मतलब अपनी मौत और बेइज़्ज़ती को दावत देना है।

इसके बाद जो हुआ, वो इतिहास है। जेके (JK), थापर, फिलिप्स, मेटल बॉक्स, जीकेडब्ल्यू (GKW) जैसी दिग्गज कंपनियों ने रातों-रात अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और बंगाल से भाग खड़े हुए। सही मायनों में “धोती पकड़ कर भागे” ये सारे उद्योगपति।

विदेशी कंपनियों ने तो देखते ही देखते अपने हेडक्वार्टर दिल्ली और बॉम्बे शिफ्ट कर लिए। वामपंथियों ने चिल्ला-चिल्ला कर पूंजीपतियों को भगा तो दिया, लेकिन इसका नतीजा क्या निकला? हुगली किनारे की वो सारी शानदार फैक्टरियां जो कभी रात-दिन चलती थीं, उनमें ताले लटक गए। मशीनों पर जंग लग गया। 

कलकत्ता जो कभी ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ था, वो एक बहुत बड़े इंडस्ट्रियल श्मशान में बदल गया। और लाखों मज़दूर? वो बेचारे रातों-रात सड़क पर आ गए, भूखे मरने लगे। वामपंथी अपना लाल झंडा लहराते रह गए और बंगाल पूरी तरह बर्बाद हो गया।

बिरला के चीरहरण का असली कारण थी वामपंथियों की वो नफरत जिसने बंगाल के नौजवानों को हिंसक गुंडा बना दिया

60 और 70 के दशक में बंगाल की आबोहवा में अचानक एक ज़हर सा घुलने लगा था। कम्युनिस्टों (खासकर सीपीएम और उनके ट्रेड यूनियनों) ने कॉलेजों और फैक्टरियों में लड़कों का ऐसा ब्रेनवॉश किया की पूछिए मत। जो नौजवान कल तक गीता और वेदांत पढ़ता था, उसके हाथ में रातों-रात माओ और मार्क्स की लाल किताब थमा दी गई। ‘इंकलाब’, ‘पूंजीवाद मुर्दाबाद’ और ‘बुर्जुआ’ जैसे भारी-भरकम शब्द हवा में तैरने लगे।

कारखानों के अंदर ‘क्लास स्ट्रगल’ यानी वर्ग-संघर्ष के नाम पर सीधा-सीधा आतंक फैलाया जाने लगा। सीपीएम के नेता और उनका खूंखार ट्रेड यूनियन सीआईटीयू (CITU) खुलेआम मालिकों और मैनेजरों को “खून चूसने वाली जोंक” बताकर मजदूरों को भड़काने लगे।

हिंदू संस्कृति तो हमें काम को पूजा मानना सिखाती है, लेकिन इन कॉमरेडों ने पूरा वर्क कल्चर ही बर्बाद कर दिया। मेहनत-मज़दूरी की जगह ले ली हड़तालों ने, ‘चोलबे ना, चोलबे ना’ (नहीं चलेगा) के नारों ने और कामचोरी ने।

आपको पता है उस समय बंगाल में ‘घेराव’ नाम की कैसी गुंडागर्दी चलती थी? लोकल गुंडे और यूनियन वाले फैक्टरियों के गेट पर लाल झंडे गाड़ देते थे। अगर कोई ईमानदार मैनेजर काम करवाना चाहे, तो उसे उसी के केबिन में 48-48 घंटे तक बंधक बना लिया जाता था। ना खाना, ना पानी और ना ही टॉयलेट जाने की इजाज़त।

कई अधिकारियों को तो मार-मार कर अधमरा कर दिया गया, उनकी गाड़ियां फूंक दी गईं और तो और, उनके बीवी-बच्चों तक को सरेआम धमकियां दी जाने लगीं।

पुलिस को ऊपर से सीधा ऑर्डर था कि कॉमरेडों के खिलाफ कोई एफआईआर (FIR) नहीं लिखी जाएगी। वामपंथी सरकार के इस खुले सपोर्ट ने इन गुंडों के हौसले इतने बढ़ा दिए कि ये खुद को ही कानून समझने लगे थे। और इसी ज़हरीले माहौल ने आदित्य बिरला के साथ हुई उस घटना की पटकथा लिखी, जिसकी आग में आज तक बंगाल सुलग रहा है।

कैसे लेफ्ट-लिबरल मीडिया ने आदित्य बिरला के चीरहरण की खबर को बाहर आने से रोका

अब ज़रा आज के हालात से इसकी तुलना करके देखिए। आज अगर किसी बीजेपी शासित राज्य में, यूपी या गुजरात में, किसी छोटे-मोटे व्यापारी या आम आदमी के साथ इसका दसवां हिस्सा भी हो जाए, तो क्या होगा? ये जितने भी लिबरल पत्रकार और टुकड़े-टुकड़े गैंग वाले हैं ना, ये पूरा आसमान सिर पर उठा लेंगे।

रवीश कुमार जैसों का प्राइम टाइम शुरू हो जाएगा, वाशिंगटन पोस्ट में बड़े-बड़े आर्टिकल छपने लगेंगे और यूएन (UN) में भारत के खिलाफ मानवाधिकार के रोने-धोने शुरू हो जाएंगे। “फासीवाद आ गया”, “लोकतंत्र मर गया” चिल्लाते-चिल्लाते ये लोग पागल हो जाएंगे।

लेकिन जब बंगाल में इतने बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट को दिन-दहाड़े नंगा कर सड़क पर घुमाया गया, तब इस पूरे वामपंथी ईकोसिस्टम की जुबान को लकवा मार गया था। क्या मज़ाक है!

उस वक्त के किसी भी बड़े हिंदी या अंग्रेजी अखबार ने इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं छापा। किसी बड़े संपादक ने इसके खिलाफ एक लाइन तक नहीं लिखी। मानवाधिकार वालों को तो जैसे सांप ही सूंघ गया था।

इस घटना को जान-बूझकर ऐसे दबाया गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। ये पूरी की पूरी लिबरल मीडिया कम्युनिस्टों की गोद में बैठकर उनकी चाटुकारिता कर रही थी।

बंगाल के हर गली-मोहल्ले में, हर चाय की टपरी पर लोग कानाफूसी कर रहे थे की बिरला बाबू के साथ क्या हुआ, लेकिन अखबारों में इस काले सच को पूरी तरह दफना दिया गया ताकि ‘लाल सलाम’ का वो झूठा गरीब-परवर वाला मुखौटा दुनिया के सामने बचा रहे।

वामपंथ की नज़रों का शिकार होने से पहले कैसा था हमारा वैभवशाली बंगाल 

आज जब भी टीवी पर बंगाल की न्यूज़ आती है, तो क्या दिखता है? बस देसी बम-धमाके, मार-काट, टीएमसी-लेफ्ट की गुंडागर्दी और गरीबी, है ना? लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था।

आज का ये वीरान और खून-खराबे वाला बंगाल कभी भारत की धड़कन हुआ करता था। 1960 के दशक तक, कलकत्ता पूरे एशिया की निर्विवाद इंडस्ट्रियल कैपिटल था। सच पूछिए तो, उस दौर में हमारा बंबई (मुंबई) भी कलकत्ता के आगे पानी भरता था।

ये वो दौर था जब मारवाड़ी, गुजराती और सिंधी घरानों ने बंगाल के दिमाग के साथ मिलकर एक गज़ब का ईकोसिस्टम बनाया हुआ था। टाटा, बिरला, जेके (JK Group), थापर, बांगुर और डालमिया जैसे महान राष्ट्रवादी और सनातनी घरानों का हेडक्वार्टर कलकत्ता ही हुआ करता था।

ये लोग सिर्फ व्यापारी नहीं थे, राष्ट्र-निर्माता थे। कलकत्ता की डलहौजी स्क्वायर को देखकर लंदन की याद आती थी। ‘टाटा सेंटर’ और ‘बिरला बिल्डिंग’ जैसी विशाल इमारतें इसी शानदार विज़न का सुबूत थीं।

अरे, आपको शायद पता ना हो, उस ज़माने में जितनी इंटरनेशनल फ्लाइट्स कलकत्ता के दमदम एयरपोर्ट से उड़ती थीं ना, उतनी बॉम्बे से भी नहीं उड़ती थीं। विदेशी कंपनियों के बड़े-बड़े दफ्तर यहीं थे।

हुगली नदी के किनारे जूट मिलों की लाइन लगी रहती थी, हावड़ा में इतनी बड़ी-बड़ी इंजीनियरिंग फैक्टरियां थीं कि दुनिया भर से लोग देखने आते थे। बंगाल के नौजवानों को कहीं बाहर धक्के खाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी; हर हाथ को काम मिलता था और शाम को बाबू मोशाय लोग बेफिक्र होकर चाय-वाय पीते थे।

लेकिन यही बात इन वामपंथियों को हज़म नहीं हुई। इनके आकाओं ने इन्हें समझा रखा था की जहाँ समृद्धि होगी, खुशहाली होगी, वहाँ ‘क्रांति’ कैसे बेचोगे? बस, यहीं से शुरू हुआ बंगाल को खंडहर बनाने का खौफनाक खेल।

वामपंथ का वो श्राप जो आज तक बंगाल को खा रहा है

आज का बंगाल देख लीजिए। ये जो आज हम TMC के राज में ‘कट-मनी’, ‘सिंडिकेट राज’, और ‘तोलाबाजी’ सुनते हैं ना, ये कोई रातों-रात आसमान से नहीं टपका है। ये उसी वामपंथी गुंडागर्दी का ही अपडेटेड वर्ज़न है, जो सीआईटीयू वाले 70 और 80 के दशक में करते थे। इन कम्युनिस्टों ने जो नफरत और कामचोरी का ज़हर बोया था, उसकी कड़वी फसल आज बंगाल का बच्चा-बच्चा काट रहा है।

कारखाने तो रहे नहीं, धंधे-पानी सब चौपट हो गए, तो सबसे ज्यादा नुकसान किसका हुआ? हमारे उन होनहार और मेहनती हिंदू नौजवानों का, जिन्हें अपने ही घर में नौकरी मिलनी चाहिए थी। आज वही बंगाल का मेधावी युवा अपना घर-बार छोड़कर पुणे, बैंगलोर, नोएडा और गुजरात में धक्के खाने को मजबूर है। जो बंगाल कभी पूरे देश को पालता था, आज वही रोज़गार के लिए दूसरों के आगे हाथ फैलाए खड़ा है।

सालों बाद जब टाटा ने सिंगूर में नैनो कार (Tata Nano) का प्लांट लगाकर बंगाल को दोबारा ज़िंदा करने की एक कोशिश की थी, तब भी ममता बनर्जी की इसी खूनी वामपंथी और हिंसक ईकोसिस्टम ने आग में घी डालने का काम किया और टाटा को वहां से भी भगा दिया।

मजबूरन रतन टाटा जी को अपना प्लांट गुजरात लेकर जाना पड़ा, जहाँ नरेंद्र मोदी जी ने एक सच्चे राष्ट्रवादी की तरह उनका रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत किया। आज आप खुद फर्क देख लीजिए! एक तरफ गुजरात और यूपी जैसे हिंदुत्व और विकास को मानने वाले राज्य हैं जो आसमान छू रहे हैं, और दूसरी तरफ वामपंथियों का डसा हुआ बंगाल है, जो आज तक रसातल से बाहर नहीं आ पाया है।

भारत को शक्तिशाली हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए वामपंथ का जड़ से खात्मा बेहद ज़रूरी है

इतिहास यार सिर्फ किताबें भरने या रट्टा मारने के लिए नहीं होता; ये एक वॉर्निंग होती है, जिससे ज़िंदा कौमें बहुत कुछ सीखती हैं। आदित्य विक्रम बिरला का वो चीरहरण सिर्फ एक आदमी का अपमान नहीं था।

वो बंगाल के सुनहरे भविष्य, वहां के युवाओं की उम्मीदों और हमारे देश की आर्थिक तरक्की का चीरहरण था। उन लाल झंडे वाले गुंडों ने सिर्फ बिरला जी के कपड़े नहीं फाड़े थे, उन्होंने दरअसल बंगाल की तकदीर को नंगा कर दिया था।

आज हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदुओं, युवाओं और राष्ट्रवादियों को ये बात अपने दिमाग में अच्छे से बैठा लेनी चाहिए की ये कम्युनिस्ट, ये वामपंथी कोई विपक्ष या मामूली राजनीतिक दल नहीं हैं।

ये एक ऐसी विदेशी दीमक हैं जो भारत माता की जड़ों से ही नफरत करती है। जहाँ-जहाँ ये खूनी लाल झंडा गाड़ा जाता है, वहाँ से विकास, धर्म, संस्कृति और इज़्ज़त का जनाज़ा निकलना तय है। इनका पूरा इतिहास ही खून-खराबे, गरीबी और देश-विरोध से सना हुआ है।

हमें इतिहास के इस काले पन्ने को भूलना नहीं चाहिए। ये हमारी ज़िम्मेदारी है की हम इस दरबारी लिबरल इकोसिस्टम का पर्दाफाश करें और अपनी आने वाली पीढ़ियों को बताएं की कैसे एक विदेशी ज़हर ने हमारे सबसे शानदार राज्य को बर्बाद कर दिया।

अगर हमें सही मायनों में एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर और विकसित ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाना है, तो हमें अपने इन राष्ट्र-निर्माता उद्यमियों का सम्मान करना ही होगा। जो समाज मेहनत करने वालों की इज़्ज़त नहीं करता, वो कभी विश्वगुरु नहीं बन सकता।

वामपंथ के इस वैचारिक ज़हर को पूरी तरह से उखाड़ फेंकना ही अब हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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