राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सत्ता की अंधी हवस में अपने ही मूल सिद्धांतो से जो पलटी मारी है, वो हर सच्चे राष्ट्रवादी और ईमानदारी से टैक्स चुकाने वाले हिंदू के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
जिस छगन भुजबल को कभी भाजपा के ही शीर्ष नेता ‘महाभ्रष्ट’, ‘लुटेरा’ और ‘राष्ट्र की संपत्ति का भक्षक’ कहकर कोसते थे, आज वही भुजबल भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ में धुलकर एक ‘पवित्र संत’ बन चुके हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति में छगन भुजबल के अनगिनत पापों पर भगवा चादर ओढ़ाकर भाजपा ने यह साबित कर दिया है की उसके लिए सत्ता लोभ के आगे राष्ट्रहित और भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का संकल्प मात्र एक चुनावी जुमला है। राष्ट्रवादी विकास-प्रेमी हिंदुओं को मूर्ख समझने की यह घटिया क्षुद्र घटिया राजनीति अब बर्दाश्त के बाहर है।
भाजपा दाग धोने वाली नई ज़माने की वाशिंग मशीन, Episode 3: छगन भुजबल (पूर्व उप-मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य)
भाजपा की ‘अब हर घोटालेबाज़ बनेगा राष्ट्रवादी’ योजना
अब जो लोग भूल गए हैं, उन्हें याद दिलाना बहुत ज़रूरी है की आखिर इस ‘वाशिंग मशीन’ में डालकर किस आदमी को चमकाया गया है। छगन भुजबल कोई छोटे-मोटे नेता नहीं हैं। इनका तो पूरा का पूरा राजनीतिक करियर ही घोटालों, शेल कंपनियों और आम जनता की जेब काटने के किस्सों से भरा पड़ा है।
ज़रा इनके इन काले कारनामों पर एक नज़र डालिए, जिन्हें आज बड़ी सफाई से कालीन के नीचे सरकाया जा रहा है।
महाराष्ट्र सदन घोटाला- 870 करोड़ की लूट
बात 2005-06 के आसपास की है। भुजबल साहब तब महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग (PWD) के मंत्री हुआ करते थे। दिल्ली में नया ‘महाराष्ट्र सदन’ बनना था। कायदे से तो टेंडर निकलता है, बोलियां लगती हैं, पर यहाँ तो बिना कोई टेंडर-वेंडर निकाले सीधे ‘चमनकर बिल्डर्स’ को ठेका पकड़ा दिया गया।
ED की ही रिपोर्ट चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी की 13.5 करोड़ का जो प्रोजेक्ट था, उसकी लागत कागज़ों पर बढ़ाकर सीधे 50 करोड़ कर दी गई।
बिल्डर ने मज़े से इस पूरे प्रोजेक्ट के खत्म होते-होते 190 करोड़ छापे और बदले में भुजबल परिवार को भर-भरकर रिश्वत पहुंचाई।
यह पैसा सीधे छगन भुजबल, उनके बेटे पंकज भुजबल और भतीजे समीर भुजबल द्वारा नियंत्रित शेल (फर्जी) कंपनियों में भेजा गया। इस घोटाले ने राज्य के खजाने को लगभग 870 करोड़ रुपये का चूना लगाया।
यह वही मामला है जिसके चलते मार्च 2016 में ईडी ने छगन भुजबल को गिरफ्तार किया था और उन्हें लगभग ढाई साल आर्थर रोड जेल की सलाखों के पीछे काटने पड़े थे। आज उसी व्यक्ति को कैबिनेट में बिठाकर भाजपा ‘सुशासन’ का ढोंग रच रही है।
कलीना लाइब्रेरी घोटाला और शेल कंपनियों का मायाजाल
और ये तो बस शुरुआत थी भाई! शिक्षा के मंदिरों को भी कहाँ छोड़ा इन लोगों ने। बात 2009 की है। मुंबई यूनिवर्सिटी के कलीना कैंपस में एक शानदार सेंट्रल लाइब्रेरी बननी थी। यूनिवर्सिटी ने खुशी-खुशी अपनी बेशकीमती चार एकड़ ज़मीन (लगभग 24,000 स्क्वायर मीटर) राज्य सरकार को दे दी, की भाई, यहाँ बच्चों के पढ़ने के लिए एक बढ़िया लाइब्रेरी बना दो।
लेकिन भुजबल साहब के दिमाग में तो कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। कायदे से इतनी बड़ी ज़मीन का टेंडर पूरी पारदर्शिता के साथ निकलना चाहिए था, पर इन्होंने सारे नियम ताक पर रखकर 124 करोड़ का सीधा ठेका ‘इंडियाबुल्स रियल एस्टेट लिमिटेड’ को थमा दिया।
अब ज़रा इस ‘डील’ की बेशर्मी देखिए! बिल्डर से कहा गया की तुम एक हिस्से में लाइब्रेरी बनाओ, और बदले में बची हुई जो प्राइम लोकेशन की ज़मीन (लगभग 7,000 स्क्वायर मीटर) है, उस पर तुम अपने लक्ज़री फ्लैट्स बनाकर बेचो।
कैंपस की बेशकीमती ज़मीन पर बिल्डर को कमर्शियल कंस्ट्रक्शन की छूट दे दी गई, और चमत्कार देखिए, इसके ठीक बाद उसी बिल्डर ने ‘भुजबल फाउंडेशन’ के खाते में चुपचाप 2.5 करोड़ का “चंदा” डाल दिया!
इस काले धन को सफेद करने के लिए कलकत्ता की बोगस शेल कंपनियों का ऐसा जाल बुना गया की 100 रुपये के शेयर 9,900 रुपये के तगड़े प्रीमियम पर बेचे गए। यह मनी लॉन्ड्रिंग थी, जिसका उद्देश्य देश की संपत्ति को चूसकर निजी साम्राज्य खड़ा करना था।
हेक्स वर्ल्ड (Hex World) घोटाला- आम आदमी की गाढ़ी कमाई पर डाका
चलिए मान लिया की सरकारी ठेकों में कमीशनखोरी तो नेता करते ही हैं, लेकिन सबसे ज्यादा दुख तो इस ‘हेक्स वर्ल्ड’ घोटाले को देखकर होता है। नवी मुंबई के खारघर में घर देने के नाम पर 2300 मिडिल-क्लास परिवारों से पंकज और समीर भुजबल की कंपनी (‘देविशा इंफ्रास्ट्रक्चर’) ने 44 करोड़ रुपये वसूल लिए और प्रोजेक्ट हवा में ही लटका रह गया। उन लोगों को कभी घर नहीं मिले।
ज़रा सोचिए उस आम आदमी पर क्या गुज़री होगी, जिसने अपनी पाई-पाई जोड़कर, पेट काटकर अपने सपनों के घर के लिए पैसा दिया था! ये उन 2300 राष्ट्रवादी करदाताओं की खून-पसीने की कमाई पर सीधा डाका था। और आज? आज हमारे वही नेता, जो खुद को बहुत कट्टर हिंदू कहते हैं, इन्हीं भुजबल साहब के साथ बैठकर चाय-वाय सुड़क रहे हैं।
छगन भुजबल के खिलाफ BJP के किरीट सोमैया का फर्जी और खोखला गुस्सा
सच बताऊं तो सबसे ज़्यादा गुस्सा तब आता है जब पुराने वीडियो सामने आते हैं। याद है ना 2014-15 का वो दौर? 2014 में भाजपा नेता किरीट सोमैया ट्रकों में भर-भरकर सुबूत लाते थे और प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भुजबल के घोटालों की फाइलें लहराते थे।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जनसभाओं में गरजते हुए कहते थे, “हम इन भ्रष्टाचारियों को नहीं छोड़ेंगे, इन्हें जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी।”
मार्च 2016 में जब भुजबल गिरफ्तार हुए थे, तो भाजपा ने इसे अपनी ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐतिहासिक जीत’ बताया था।
लेकिन आज? आज राजनीति में बेशर्मी की कोई सीमा नहीं बची है। वही देवेंद्र फडणवीस और किरीट सोमैया आज उसी छगन भुजबल के साथ एक ही मंच पर बैठकर मुस्कुरा रहे हैं।
यह सिर्फ जनता का अपमान नहीं है, यह उन लाखों कार्यकर्ताओं के मुंह पर सीधा तमाचा है जिन्होंने इन घोटालों का पर्दाफाश करने के लिए सड़कों पर लाठियां खाई थीं, पुलिस के डंडे सहे थे। भाजपा ने अपने ही कार्यकर्ताओं की निष्ठा को चंद सत्ता की कुर्सियों के लिए नीलाम कर दिया है।
जुलाई 2023- जब BJP में शामिल हुए छगन भुजबल और शुरू हुआ ‘वाशिंग मशीन’ का जादू
जुलाई 2023 का वह मनहूस दिन महाराष्ट्र की राजनीति का एक काला अध्याय है। अजित पवार के साथ छगन भुजबल ने भाजपा नीत एनडीए (NDA/महायुति) सरकार को समर्थन दिया और बेशर्मी की हद देखिए, करोड़ों के घोटालों के आरोपी छगन भुजबल को रातों-रात कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिला दी गई।
हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से यह एक सीधा सवाल है: क्या सत्ता के लालच में देश को लूटने वालों को गले लगाना चाणक्य नीति है या राष्ट्रवाद की पीठ में छुरा घोंपना? यह नीति नहीं, बल्कि भाजपा की वैचारिक आत्महत्या है।
नवंबर 2023- जब BJP की वाशिंग मशीन में छगन भुजबल की ED फाइल ही परमानेंट गायब हो गई
जैसे ही भुजबल ने भाजपा का पट्टा पहना, सरकारी एजेंसियों का ‘जादू’ शुरू हो गया। जुलाई 2023 में भुजबल के कैबिनेट मंत्री बनने के ठीक चार महीने बाद, न्यायपालिका के सामने एक ऐसा भद्दा मजाक हुआ जिसने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को तार-तार कर दिया।
नवंबर 2023 में, प्रवर्तन निदेशालय (ED)- वह एजेंसी जो आम आदमी और विरोधियों के दस-दस रुपये का हिसाब निकाल लेती है- ने बॉम्बे हाईकोर्ट में बेशर्मी से यह बयान दिया की उसे छगन भुजबल के खिलाफ दायर अपनी ही याचिका की “फाइल नहीं मिल रही है”। यह याचिका भुजबल की जमानत को चुनौती देने के लिए खुद ED ने दायर की थी।
इसके बाद 29 नवंबर 2023 को ED ने अपनी याचिका वापस ले ली और बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस आर.एन. लड्ढा ने इसे आधिकारिक रूप से खारिज कर दिया। दिसंबर 2023 आते-आते बेनामी संपत्ति से जुड़ा एक और मामला ‘तकनीकी आधार’ पर रफा-दफा कर दिया गया।
यह कैसी राजनीति है? क्या भाजपा सरकार यह मानती है की इस देश का हिंदू करदाता इतना मूर्ख है की वह इस ‘फाइल गुम होने’ के नाटक को नहीं समझेगा? यह स्पष्ट है की फाइल गुम नहीं हुई है, बल्कि उसे ‘वाशिंग मशीन’ में डालकर गला दिया गया है।
जनवरी 2026 का घिनौना ड्रामा जहाँ BJP सरकार ने अपना पूरा सिस्टम लगाकर छगन भुजबल को थमा दी पक्की क्लीन चिट
खैर, पिक्चर तो अभी बाकी थी! वाशिंग मशीन के इस पूरे ‘वाइटवॉश’ ऑपरेशन का सबसे तगड़ा क्लाइमैक्स तो जनवरी 2026 में देखने को मिला। 23 जनवरी 2026 को मुंबई की एक स्पेशल PMLA (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) कोर्ट ने छगन भुजबल, उनके बेटे पंकज और भतीजे समीर को महाराष्ट्र सदन मनी लॉन्ड्रिंग केस से पूरी तरह बरी कर दिया। एकदम साफ़-सुथरी क्लीन चिट थमा दी गई!
अब कोर्ट का तर्क सुनिए। जज साहब ने कहा की चूंकि एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) वाले मूल केस से ये लोग पहले ही बरी हो चुके हैं, इसलिए ये मनी लॉन्ड्रिंग वाला केस “बिना जड़ के पेड़” जैसा है। अब आप ही बताइए, वो ACB वाला मेन केस क्यों और कैसे खत्म हुआ? जवाब बहुत सीधा है- जड़ तो खुद सरकार ने ही कुल्हाड़ी मारकर काट दी थी!
जब से ये नेता जी सत्ता पक्ष के दामाद बने, सरकारी वकीलों ने जानबूझकर पैरवी ढीली कर दी। गवाह सब मैनेज कर लिए गए, सुबूतों को कभी अदालत में ढंग से पेश ही नहीं किया गया। जब केस फाइल करने वाला ही मुज़रिम को बचाने में लग जाए, तो बेचारी अदालतें भी क्या करेंगी? ये सीधे-सीधे सत्ता की ताकत से मैनेज किया हुआ गेम था। राष्ट्र की संपत्ति लुट गई और सिस्टम तमाशा देखता रह गया।
जेल की सलाखों के खौफ से छगन भुजबल ने टेके BJP के आगे घुटने और बन गए सत्ता के नए दामाद
हाल ही में प्रकाशित राजनीतिक पुस्तकों से यह साफ़ हो चुका है की छगन भुजबल का भाजपा नीत गठबंधन में शामिल होना किसी हृदय परिवर्तन का परिणाम नहीं था। कथित तौर पर उन्होंने खुद अपनी कोर टीम के सामने यह स्वीकार किया था की बुढ़ापे में दोबारा जेल जाने का डर और केंद्रीय एजेंसियों (ED) का खौफ ही उन्हें इस गठबंधन में खींच लाया।
तो क्या अब ये मान लिया जाए की भाजपा का मकसद भ्रष्टाचार खत्म करना नहीं है, बल्कि वो ED और CBI को सिर्फ एक टूल की तरह इस्तेमाल कर रही है ताकि दूसरों के पाले से दागी नेताओं को डरा-धमकाकर अपनी पार्टी में शामिल किया जा सके? अगर यही सच है, तो फिर कांग्रेस और इनमें फर्क ही क्या रह गया।
