ज़रा सोचिए, आप अपने घर में बैठे हैं, और अचानक कोई इस्लामिक जिहादी बाहर से आकर न सिर्फ आपका घर छीन ले, बल्कि आपकी आस्था, आपके देवी-देवताओं और आपके मंदिर को भी जूतों तले रौंद दे। क्या करेंगे आप? आज आप और हम ज्यादा से ज्यादा कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटेंगे, लेकिन हमारे पुरखे ऐसे नपुंसक नहीं थे।
जब बात धर्म और जन्मभूमि पर आती थी, तो वे सीधा तलवार उठाते थे और दुश्मनों का सिर धड़ से अलग कर देते थे।
अयोध्या… ये कोई मामूली शहर तो है नहीं! ये करोड़ों हिंदुओं की आत्मा है, हमारी रगों में बहने वाले खून का वो हिस्सा है जिसके बिना सनातन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन सच कहूं तो, इस पावन नगरी ने सदियों तक जो ज़ुल्म सहा है, वो रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
भारत का इतिहास सिर्फ वो नहीं है जो हमें वामपंथी इतिहासकारों ने रटाया है- की मुगलों ने हमें तहज़ीब सिखाई, बिरयानी दी और इमारतें बनवाईं।
असलियत ये है की ये इतिहास खून-खराबे, चीख-पुकार और बर्बरता से भरा पड़ा है। इन इस्लामिक आक्रांताओं का मकसद सिर्फ सत्ता लूटना नहीं था। उनका सीधा सा एजेंडा था- ‘गज़वा-ए-हिंद’। वो हम हिन्दुओं और हमारी संस्कृति को जड़ से मिटाना चाहते थे।
इसी इस्लामिक खूनी इरादे के साथ 1528 में मुगल लुटेरे बाबर की सेना ने अयोध्या की तरफ रुख किया। उसका सेनापति था मीर बाक़ी, एक बेहद क्रूर और ज़ालिम जिहादी।
लेकिन उसे शायद इस बात का अंदाज़ा नहीं था की राम जी की इस धरती पर कोई ऐसा भी बैठा है जो उसकी इस घमंड से भरी सेना को शमशान की राख में बदल देगा। वो कोई बहुत बड़ा राजा-महाराजा या सेनापति नहीं था… वो एक सीधा-साधा सा ब्राह्मण था- पंडित देवीदीन पांडेय।
वामपंथी और सेक्युलर गिरोह ने बड़ी ही चालाकी से इस शूरवीर का नाम हमारी किताबों से गायब कर दिया।
दिमाग खराब हो जाता है ये देखकर की हमें अकबर महान तो पढ़ाया गया, लेकिन उस अकेले ब्राह्मण की कहानी किसी ने नहीं बताई जिसने अपनी जन्मभूमि के लिए 700 मुगलों को गाजर-मूली की तरह काट डाला था। तो चलिए, आज उसी दबे हुए इतिहास के पन्ने पलटते हैं।
1528 का वो खूनी दौर जब इस्लामिक आक्रांताओं ने श्री राम जन्मभूमि अयोध्या में बेगुनाह हिन्दुओं का बर्बर कत्लेआम मचाया
खैर, इतिहास गवाह है की इस्लामिक आक्रमणकारियों का तौर-तरीका हमेशा से एक जैसा ही रहा है। महमूद गज़नवी से लेकर गौरी, खिलजी और मुगलों तक… इन सबका एक ही काम था- काफिरों (हिंदुओं) को मारो और उनके मंदिरों को तोड़ो। साल 1528 का वो मनहूस वक़्त था।
बाबर के इशारे पर मीर बाक़ी अपनी पूरी फौज-फाटे के साथ अयोध्या में घुस गया। उसके पास उस ज़माने के सबसे खतरनाक हथियार थे। बड़ी-बड़ी तोपें, बंदूकें, बारूद और एक ऐसी फौज जो रहम करना जानती ही नहीं थी।
मुगलों की सेना ने अयोध्या में घुसते ही जो नंगा नाच किया, उसे सुनकर ही खून खौल उठता है। रास्ते में जो भी आया, उसे काट डाला गया। निहत्थे लोग, भजन-कीर्तन करते हुए संत-साधु, मंदिरों के पुजारी… किसी को नहीं बख्शा इन दरिंदों ने। कहते हैं की सरयू नदी का पानी तक हमारे निर्दोष लोगों के खून से लाल हो गया था।
घर-घर में आग लगा दी गई, हिन्दू महिलाओं की इज़्ज़त पर हमले हुए। पूरे अवध में एक ऐसा हाहाकार मच गया था की आसमान भी रो पड़े।
मीर बाक़ी का असली निशाना तो भगवान राम का वो भव्य जन्मभूमि मंदिर था। उसे लगता था की तोपों की गड़गड़ाहट और तलवारों की चमक देखकर हिंदू समाज डर के मारे दुबक जाएगा और जन्मभूमि उनके हवाले कर देगा। पर मुगलों को सनातन की ताक़त का अंदाज़ा कहाँ था!
उनके नापाक कदम मंदिर के प्रांगण तक पहुँचने ही वाले थे की अचानक हालात पलट गए। जब लग रहा था की अब कोई उम्मीद नहीं बची, तब एक कर्मकांडी ब्राह्मण ने अपनी चोटी कसी और ऐसा रौद्र रूप धरा की मुगलों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
पंडित देवीदीन पांडेय- मुगलों का समूल नाश करने के लिए जब एक हिन्दू ब्राह्मण ने वेद-पुराण छोड़कर सीधे तलवार उठा ली
अब बात करते हैं उस महामानव की, जिसने इतिहास का रुख मोड़ दिया। पंडित देवीदीन पांडेय जी का जन्म अयोध्या के पास ही एक छोटे से गांव ‘सनेथू’ में हुआ था। घर में पूरी तरह से कर्मकांडी और धार्मिक माहौल था।
सुबह-शाम पूजा-पाठ, वेदों का उच्चारण और भगवान राम की भक्ति ही उनके परिवार का पेशा था। पर पांडेय जी महज़ घंटी बजाने वाले पुजारी नहीं थे। उनके अंदर परशुराम जी वाला वो तेज़ था, जो अन्याय देखते ही भड़क उठता था।
बचपन से ही उन्हें ये बात समझ आ गई थी की सिर्फ श्लोक पढ़ने से जिहादी लुटेरों को नहीं भगाया जा सकता। जब दुश्मन तलवार लेकर खड़ा हो, तो उसे गीता का ज्ञान नहीं, शमशीर की धार ही समझ आती है। शरीर से भी वो एकदम हट्टे-कट्टे थे।
चौड़ी छाती, फौलाद जैसी भुजाएं और चेहरे पर एक अलग ही ब्रह्म तेज़। उनकी बड़ी-बड़ी मूंछें उन्हें एकदम काल भैरव जैसा लुक देती थीं। रोज़ अखाड़े में जाना, घंटों मल्लखंभ करना, कुश्ती लड़ना और तलवारबाज़ी का अभ्यास करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था।
आस-पास के गांव वाले, खासकर सूर्यवंशी क्षत्रिय (ठाकुर), उनकी इसी ताक़त और धर्म के प्रति निष्ठा के कायल थे। इसीलिए उन्होंने पांडेय जी को अपना ‘कुल पुरोहित’ मान लिया था। वो क्षत्रियों को सिर्फ कथा-कहानी नहीं सुनाते थे, बल्कि उन्हें युद्ध के दांव-पेंच और मातृभूमि की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहने को कहते थे।
उनका बड़ा सीधा सा उसूल था- “जब धर्म पर संकट आए और कोई म्लेच्छ मुसलमान तुम्हारे मंदिरों को तोड़ने आ जाए, तो ब्राह्मण का चुप बैठना या सिर्फ माला जपना सबसे बड़ा पाप है।
ऐसे वक़्त में पूजा की थाली फेंको और तलवार उठा लो।” और जब मीर बाक़ी ने अयोध्या को रौंदना शुरू किया, तो पांडेय जी को समझते देर न लगी की अब शास्त्र का नहीं, शस्त्र का वक़्त आ गया है।
पंडित देवीदीन पांडेय के नेतृत्व में इस्लामिक दरिंदों के खिलाफ हिन्दू नौजवानों का वो भयानक धर्म युद्ध जिसने मुगलों की कब्र खोद दी
आगे बढ़ने से पहले एक और महान योद्धा का ज़िक्र करना ज़रूरी है। मीर बाक़ी के अयोध्या पहुँचने पर सबसे पहली टक्कर भीटी के राजा महताब सिंह ने ली थी। राजा साहब बद्रीनाथ की यात्रा पर निकले थे, लेकिन जैसे ही उन्हें इस हमले की खबर मिली, वो अपनी पूरी सेना के साथ मुगलों पर टूट पड़े।
लगातार 17 दिनों तक जो भयानक युद्ध हुआ, उसमें राजा महताब सिंह और उनके करीब 1 लाख 74 हज़ार वीर हिंदू सैनिकों ने अपना बलिदान दे दिया। मुगलों के तो दांत खट्टे कर दिए थे उन्होंने, पर तोपों और बारूद के आगे आखिर निहत्थे कब तक टिकते। उनके वीरगति प्राप्त करते ही अयोध्या में एक सन्नाटा सा छा गया।
मुगलों को लगा की बस, अब तो मैदान साफ है। हिंदुओं की कमर टूट गई है। पर यही तो मुगलों की सबसे बड़ी भूल थी! राजा महताब सिंह के बलिदान की खबर ने पंडित देवीदीन पांडेय के खून में ऐसा उबाल ला दिया की वो सीधे अपने गांव सनेथू और आस-पास के ठाकुरों के गांवों में निकल पड़े।
उन्होंने नौजवानों को इकट्ठा किया और ऐसा ओजस्वी भाषण दिया की मुर्दे में भी जान आ जाए। उन्होंने सूर्यवंशी ठाकुरों (जिनकी कमान गजराज सिंह के हाथों में थी) को ललकारते हुए कहा- “तुम्हारे पुरखों के बनाए राम मंदिर को ये मुगलों के सूअर रौंद रहे हैं, और तुम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठे हो? शर्म आनी चाहिए! उठो, अपनी तलवारें निकालो। अगर आज जन्मभूमि नहीं बची, तो आने वाली नस्लें हमारे नाम पर थूकेंगी!”
पंडित जी की इस ललकार ने तो मानो जादू कर दिया। कुछ ही घंटों में हज़ारों की तादाद में हिंदू नौजवान मरने-मारने पर उतारू हो गए। ज़रा सोचिए उस वक़्त के मंज़र को। इन युवाओं के पास कोई तोपें नहीं थीं, मुगलों जैसे लोहे के मोटे कवच नहीं थे।
इनके हाथों में तो बस घर में रखी पुरानी तलवारें, भाले, बरछे और कुल्हाड़ियां थीं। पर इनके सीने में जो ‘जय श्री राम’ की आग धधक रही थी न, वो दुनिया के किसी भी बारूद से ज़्यादा खतरनाक थी।
युद्ध भूमि की तरफ कूच करने से पहले पंडित जी ने अपनी शिखा (चोटी) खोल दी और एक भीषण कसम खाई- “जब तक मेरे जिस्म में खून की आखिरी बूंद भी बाकी है, मुगलों का एक भी नापाक कदम जन्मभूमि के गर्भगृह में नहीं पड़ने दूंगा।”
ये कोई आम लड़ाई नहीं थी जनाब, ये एक धर्म युद्ध था, और एक ब्राह्मण पूरे हिंदू समाज का सेनापति बनकर रणभूमि में उतर चुका था।
राम जन्मभूमि पर पंडित देवीदीन पांडेय का वो काल भैरव रूप जिसने 700 मुस्लिम सैनिकों को सीधा जहन्नुम भेज दिया
मैदान सज चुका था। एक तरफ मीर बाक़ी की वो विशाल, खूंखार और हथियारों से लैस फौज थी, और दूसरी तरफ पंडित देवीदीन पांडेय के पीछे खड़ी आस्था और जुनून की आंधी। लड़ाई शुरू होते ही मुगलों ने अपनी तोपों के मुंह खोल दिए।
चारों तरफ धुएं का गुबार, बारूद की वो दमघोंटू गंध, और गोलियों की आवाज़! तोप के गोलों से हमारे हिंदू वीर कट-कट कर ज़मीन पर गिरने लगे। पर क्या वो पीछे हटे? बिल्कुल नहीं! वे तो मुगलों की तोपों की परवाह किए बिना ‘हर हर महादेव’ और ‘जय श्री राम’ के नारों के साथ सीधे मुगलों की छाती पर चढ़ दौड़े।
इस पूरे महासंग्राम के बीचों-बीच खड़े थे हमारे पंडित देवीदीन पांडेय। देखने वालों की मानें (और स्थानीय किस्से-कहानियों में भी यही दर्ज़ है), उस दिन रणभूमि में पांडेय जी का रूप देखकर मुगलों के पसीने छूट गए थे।
उनके दोनों हाथों में भारी-भरकम तलवारें थीं और वो ऐसे बिजली की तेज़ी से चल रही थीं की जिधर से वो गुज़रते, वहाँ मुगलों की लाशों के ढेर लग जाते। चीरते-फाड़ते वो सीधे मुगलों की सेना के बीच घुस गए। मुगलों के वो मोटे-तगड़े लड़ाके इस ब्राह्मण के क्रोध के आगे तिनके की तरह उड़ रहे थे। एक-एक वार इतना अचूक था की सीधे धड़ दो हिस्सों में बंट जाता।
पांडेय जी की तलवार ने मुगलों के दिलों में ऐसा खौफ भर दिया था की वे उन्हें देखते ही उलटे पैर भागने लगे। सच पूछिए तो इतिहास के पन्नों में (जिसे वामपंथियों ने बड़ी होशियारी से दबा दिया) ये साफ-साफ दर्ज़ है की उस दिन महज़ तीन घंटे के अंदर, अकेले पंडित देवीदीन पांडेय ने 700 से ज़्यादा मुगलों को मौत के घाट उतार दिया था!
आखिर 700 मुगलों को मारना कोई हंसी-खेल है क्या भाई? उनका पूरा शरीर मुगलों के खून से सना हुआ था, आंखें एकदम लाल अंगारे जैसी और चेहरे पर काल का भाव।
मीर बाक़ी के खेमे में तो बुरी तरह से हाहाकार मच गया। मुगलों को लगने लगा की अगर इस ब्राह्मण को आज नहीं रोका गया, तो कल का सूरज देखना नसीब नहीं होगा। वो हिंदू शौर्य का ऐसा नज़ारा था, जिसने मुगलों के उस झूठे गुरूर को उन्हीं के खून में डुबो दिया था।
पंडित देवीदीन पांडेय से आमने-सामने हारते देख मुस्लिम सेनापति मीर बाक़ी की जन्मजात कायरता और पीछे से किया गया धोखेबाज़ वार
इस्लामिक आक्रांताओं का तो इतिहास ही यही रहा है की जब भी वो आमने-सामने की टक्कर में हिंदू वीरों से पिटने लगते थे, तो फौरन धोखेबाज़ी और कायरता पर उतर आते थे। मीर बाक़ी ने भी अपनी वही पुरानी फितरत दिखाई।
जब उसे समझ आ गया की पंडित देवीदीन पांडेय को सामने से हराना या मारना मुमकिन ही नहीं है, तो उसने अपने सैनिकों को दूर से छुपकर वार करने का हुक्म दे दिया। मुगलों ने पंडित जी को छुपकर चारों तरफ से घेर लिया और उन पर बड़ी-बड़ी लखौरी ईंटों और पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। आमने-सामने लड़ने की हिम्मत तो थी नहीं इन कायरों में!
इसी पत्थरबाज़ी के बीच एक भारी-भरकम ईंट आकर सीधे पंडित जी के सिर पर लगी। वार इतना तेज़ था की सिर बुरी तरह से फट गया और खोपड़ी से खून का फव्वारा फूट पड़ा। खून बहकर सीधे उनकी आंखों में जा रहा था, जिससे उन्हें सामने का कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। मुगलों को लगा की चलो, अब तो ये ब्राह्मण गिर जाएगा और मर जाएगा।
पर उन्होंने हमारे सनातन के जज़्बे को बहुत कम आंक लिया था। पांडेय जी डगमगाए ज़रूर, पर गिरे नहीं। उन्होंने झटके से अपना सिर साफ किया, कंधे पर रखा हुआ अपना ‘गमछा’ उठाया और उसे कसकर अपने फटे हुए सिर पर बांध लिया ताकि खून रुक जाए।
और फिर एक ऐसी भयानक दहाड़ मारी- “जय श्री राम!”- की मुगलों के कलेजे कांप गए। वो पहले से भी दोगुनी ताक़त के साथ मुगलों पर टूट पड़े।
अबकी बार उनका सीधा निशाना वो मीर बाक़ी था, जो दूर एक बड़े से हाथी पर बैठा मज़ा ले रहा था। पांडेय जी मुगलों की भीड़ को गाजर-मूली की तरह काटते हुए सीधे उस हाथी के पास पहुँच गए। उन्होंने ज़ोरदार छलांग लगाई और अपने भाले से सीधे हाथी के महावत पर ऐसा वार किया की वो वहीं ढेर हो गया।
हाथी घबराकर बुरी तरह चिंघाड़ने लगा और बेकाबू होकर ज़मीन पर बैठ गया। मीर बाक़ी अब सीधे पंडित जी के रडार पर था। अपनी मौत को इतना करीब देखकर उस ज़ालिम की भी रूह कांप गई। वो कायरों की तरह फौरन अपने सैनिकों के पीछे छुप गया और वहीं से बुज़दिलों की तरह अपनी बंदूक से एक फायर कर दिया।
वो गोली सीधे पंडित देवीदीन पांडेय के सीने में जा लगी। वो बुरी तरह घायल होकर ज़मीन पर गिर पड़े। तारीख थी 9 जून 1528, और वक़्त था दोपहर के करीब 2 बजे। जन्मभूमि की रक्षा करते-करते इस महान पुरोहित ने अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया और वीरगति को प्राप्त हुए।
जान तो दे दी उन्होंने, पर मुगलों के सामने सिर नहीं झुकाया। ये कायर मुसलमानों की हार थी और हमारे वीर की अमरता का प्रमाण।
वामपंथी गद्दारों ने इस्लामिक लुटेरों को महान बताने के लिए कैसे मिटा दिया महान हिन्दू शूरवीर पंडित देवीदीन पांडेय का इतिहास
अब यहाँ एक बहुत बड़ा सवाल उठता है। इतना बड़ा महापराक्रमी योद्धा, जिसने अपने धर्म और जन्मभूमि के लिए मुगलों की ईंट से ईंट बजा दी, उसका नाम आज के युवाओं को क्यों नहीं पता? हमारे स्कूलों की किताबों में, इतिहास के सिलेबस में पंडित देवीदीन पांडेय का ज़िक्र तक क्यों नहीं है? बात बड़ी सीधी सी है।
आज़ादी के बाद हमारे देश के इतिहास लेखन पर रोमिला थापर, इरफान हबीब जैसे वामपंथी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने कब्ज़ा कर लिया था। ये वो ‘बौद्धिक आतंकवाद’ था, जिसने ‘सेक्युलरिज्म’ की आड़ में हमारे इतिहास के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ किया।
इन तथाकथित इतिहासकारों का तो एक ही एजेंडा था- इस्लामिक आक्रांताओं का महिमामंडन करो और हिंदू शूरवीरों के नाम को पन्नों से मिटा दो। इन्होंने बहुत ही चालाकी से हमारी किताबों में बाबर, अकबर और औरंगज़ेब जैसे क्रूर और हत्यारे लुटेरों को ‘महान’ और ‘सहिष्णु’ बताकर पेश किया।
अकबर महान कैसे हो गया भाई? इन वामपंथियों ने ये नैरेटिव सेट कर दिया की मुगलों ने तो भारत को बहुत अमीर बना दिया। पर ये सच्चाई चालाकी से छुपा ले गए की इन्हीं मुगलों ने राम जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और मथुरा समेत लाखों मंदिरों को मिट्टी में मिला दिया था।
1528 से लेकर 1992 तक राम जन्मभूमि को बचाने के लिए 76 से ज़्यादा भयानक युद्ध लड़े गए, जिनमें लगभग 3 लाख हिंदुओं ने अपना बलिदान दिया। पर इन मार्क्सवादी इकोसिस्टम वालों ने इस पूरे संघर्ष को महज़ एक “ज़मीनी विवाद” बताकर पल्ला झाड़ लिया।
पंडित देवीदीन पांडेय जैसे योद्धाओं की कहानियों को उन्होंने ‘मनगढ़ंत’ और ‘मिथक’ कहकर रद्दी में डाल दिया। सच तो ये है की किसी भी समाज को गुलाम बनाने का सबसे आसान तरीका यही होता है की उसके असली नायकों को इतिहास से मिटा दो।
वामपंथियों ने हिंदुओं को यही जताने की कोशिश की की हम तो हमेशा पिटने और हारने वाले लोग रहे हैं। पर आज जब देश जाग रहा है, राष्ट्रवाद का नया दौर आ रहा है, तो इस मानसिक आतंकवाद की भी पोल खुल गई है।
अब वक़्त आ गया है की हम अपना इतिहास खुद लिखें और इन वामपंथियों द्वारा छुपाए गए देवीदीन पांडेय जैसे वीरों को उनका असली सम्मान दिलाएं।
पंडित देवीदीन पांडेय के बलिदान के बाद 500 सालों तक नंगे पैर रहे सूर्यवंशी हिन्दू ठाकुर और राम मंदिर बनने पर ही पूरा हुआ उनका अखंड प्रण
पंडित देवीदीन पांडेय का वो बलिदान बेकार नहीं गया। उनकी शहादत ने अयोध्या और आस-पास के इलाकों में हिंदुत्व की एक ऐसी आग लगा दी जो अगले 500 सालों तक बुझने वाली नहीं थी। जब पंडित जी वीरगति को प्राप्त हुए, तो उनका वो अधूरा काम सूर्यवंशी ठाकुरों ने अपने हाथों में ले लिया।
सरयू पार सरायसी इलाके के 105 गांवों में रहने वाले गजराज सिंह के वंशज और सूर्यवंशी ठाकुरों ने इकट्ठा होकर एक ऐसी खौफनाक कसम खाई, जिसकी मिसाल आपको पूरी दुनिया में कहीं और नहीं मिलेगी।
उन्होंने प्रण लिया- “जब तक हम मुगलों और इन जिहादियों से अपनी जन्मभूमि वापस नहीं छीन लेते और रामलला का भव्य मंदिर फिर से नहीं बन जाता, तब तक हम सिर पर पगड़ी नहीं बांधेंगे, धूप या बारिश में छाता नहीं लगाएंगे और पैरों में चमड़े के जूते नहीं पहनेंगे।”
ये सिर्फ जोश में बोली गई बात नहीं थी। ये 5 शताब्दियों तक चलने वाली एक ऐसी तपस्या थी जिसने पीढ़ियां दर पीढ़ियां खपा दीं। मुगलों का राज खत्म हुआ, नवाब आए, फिर अंग्रेज़ आए, और आज़ादी के बाद हमारी अपनी ही सेक्युलर सरकारें आईं, पर इन सूर्यवंशी ठाकुरों ने अपना प्रण नहीं तोड़ा। वो नंगे पैर ही रहे।
76 बार खूनी संघर्ष हुए। 1990 का वो दौर भी आया जब मुलायम सिंह की सरकार ने निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चलवा दीं। पर हिंदू समाज कभी पीछे नहीं हटा।
आखिरकार 500 साल का वो इंतज़ार खत्म हुआ! 22 जनवरी 2024 को जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हुआ और रामलला अपने दिव्य गर्भगृह में विराजे, तब जाकर इस 500 साल लंबे महायज्ञ की पूर्णाहूति हुई।
सीना चौड़ा हो जाता है ये सोचकर की उसी दिन, 500 साल बाद सूर्यवंशी क्षत्रियों ने अपने सिर पर साफा (पगड़ी) बांधा और पैरों में जूते पहने। ये जीत कोई सिर्फ कोर्ट का फैसला नहीं थी, ये उन लाखों बलिदानियों के संकल्प की जीत थी, जिसकी नींव पंडित देवीदीन पांडेय ने अपना खून बहाकर रखी थी।
आप आज भी अयोध्या जाएंगे, तो हनुमानगढ़ी में आपको पंडित देवीदीन पांडेय का वो ऐतिहासिक भाला रखा हुआ मिल जाएगा। वो भाला महज़ कोई हथियार नहीं है, वो सुबूत है हमारे उस अदम्य साहस का, जिसने मुगलों के घमंड को खाक में मिला दिया था।
आज के हर सच्चे हिन्दू के लिए पंडित देवीदीन पांडेय का वो कड़क संदेश जिसे इस्लामिक खतरे के खिलाफ हथियार की तरह याद रखना ज़रूरी है
कुल मिलाकर बात बड़ी साफ़ है। पंडित देवीदीन पांडेय की ज़िंदगी और उनका वो सर्वोच्च बलिदान आज के हमारे हिंदू समाज, खासकर नौजवानों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। उनका ये इतिहास कोई पुरानी कहानी नहीं है जिसे सुनकर भूल जाओ, बल्कि ये आने वाले वक़्त के लिए एक चेतावनी है।
जो कौम अपना इतिहास भूल जाती है न, वो अपना भविष्य कभी नहीं बचा सकती। मुगलों और इस्लामिक आक्रांताओं की वो ज़हरीली मानसिकता आज भी खत्म नहीं हुई है, बस उनके तरीके बदल गए हैं।
ऐसे में अगर सनातन धर्म को बचाए रखना है, तो हमें वही जज़्बा अपने अंदर लाना होगा जो देवीदीन पांडेय ने हमें सिखाया था- “सिर्फ शास्त्र पढ़ने से काम नहीं चलेगा, शस्त्र उठाने की ताक़त भी होनी चाहिए।”
हमें उस वामपंथी और सेक्युलर इकोसिस्टम को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा जिसने हमें डरपोक और कमज़ोर बनाने की कोशिश की। देवीदीन पांडेय का वो शौर्य आज भी चीख-चीख कर कह रहा है की ब्राह्मण सिर्फ दान-दक्षिणा लेने वाला नहीं होता; जब धर्म पर संकट आए, तो वो परशुराम बनकर दुष्टों का संहार करना भी बखूबी जानता है।
इस लेख को पढ़ने वाले हर एक राष्ट्रवादी और हिंदू भाई का ये फर्ज़ बनता है की वो पंडित देवीदीन पांडेय के इस भूले-बिसरे इतिहास को घर-घर तक पहुँचाए। वामपंथियों ने किताबों के पन्नों से तो उनका नाम मिटा दिया, पर वो हमारे दिलों से उनका नाम कभी नहीं मिटा सकते।
जब भी अयोध्या में राम मंदिर के शिखरों पर सूरज की पहली किरण पड़ेगी, वो देवीदीन पांडेय जैसे अमर योद्धाओं की ही गाथा गाएगी। भूलना मत अपने इन पुरखों को, क्योंकि धर्म की रक्षा बिना शस्त्र और बिना शौर्य के कभी नहीं होती।
जय श्री राम! सनातन धर्म की जय! वीर पंडित देवीदीन पांडेय अमर रहें!
