वोट बैंक के लिए ‘बटेंगे तो कटेंगे’, सत्ता मिलते ही सवर्णों को कूड़ेदान में फेंकने वाली भाजपा, बंगाल में दिलीप मंडल के जरिए हिंदुओं को बाटने का ब्लूप्रिंट तैयार

सदियों से हम सब बस एक ही सपना तो देखते आ रहे थे- रामराज्य का। हमने जातियों के इस गंदे नाले से निकलकर, अपने गोत्र और बिरादरी का चोला उतारकर बस एक ‘कट्टर हिंदू’ की तरह सीना तानना सीखा था। इसी एक दिन के लिए तो हमने वामपंथियों की सड़ी हुई गालियां खाईं, सेक्युलरिज्म के नाम पर अपना हक़ लुटते देखा! 

जब-जब जिहादियों द्वारा धर्म पर वार हुआ, तो सड़क पर उतरने वाले ने ये नहीं पूछा की सड़क पर कटने वाला ब्राह्मण है, राजपूत है, बनिया है या कोई दलित भाई। सबने अपना सनातनी खून एक साथ बहाया। हमने तो एक ऐसी सत्ता को अपने कंधों पर बिठाया था, जो भगवा झंडा लहराती थी। 

लगा था की अब ये जातियों में बांटने वाली नीच सियासत हमेशा के लिए दफ्न हो जाएगी। लेकिन आज? आज जो गंदा खेल चल रहा है ना, उसे देखकर लगता है की हमारे ही अपनों ने हमारी पीठ में खंजर उतार दिया है!

जिस भाजपा पार्टी को, जिस तथाकथित ‘हिंदुत्व’ के झंडे को सवर्णों ने अपनी पीढ़ियां खपा कर, अपना खून-पसीना एक करके फर्श से अर्श तक पहुंचाया, आज वही पार्टी सवर्णों को इस देश का सबसे बड़ा विलेन, सबसे बड़ा खलनायक साबित करने की घटिया साज़िश रच रही है।

जो सवर्ण हमेशा से हिंदुत्व की सबसे मजबूत रीढ़ रहा है, आज सत्ता के नशे में चूर ये नेता और इनके दरबारी उस सवर्ण को मुसलमानों के साथ एक ही कतार में खड़ा कर रहे हैं! जी हां, मुसलमानों के साथ! मतलब, हया-शर्म सब बेच खाई है क्या? 

भाजपा ने बंगाल में सत्ता हासिल करने के बाद ये मुहिम छेड़ दी है की अब ‘हिंदू एकता’ भाड़ में जाए, बस सवर्णों को खुलेआम गरियाओ, उन्हें दरकिनार करो और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के नाम पर ‘दलितों’ को अपना नया वोट बैंक के रूप में सेट करो। अरे, तुम्हें दलितों को गले लगाना है, शौक से लगाओ, वो हमारे ही अंग हैं! 

लेकिन एक को सिर पर बिठाने के लिए दूसरे को जूतों तले कुचलने की ये ओछी राजनीति कहाँ से आ गई? सवर्ण और दलित के बीच जो एक समरसता बन रही थी, जो हिंदू एक मुट्ठी की तरह एकजुट हो रहा था, उसे फिर से जातियों में फाड़ने की ये नीच हरकत ये भाजपा सोच भी कैसे सकती है?

ये जो वोटबैंक की भूख में अंधे होकर पीठ में छुरा घोंपा जा रहा है ना, इसकी आग आज हर उस आम सवर्ण हिंदू को जला रही है, जिसने कभी अपना घर-बार छोड़कर इस भाजपा के लिए अपनी जवानी खपा दी थी।

सवर्णों को मुसलमानों का सगा बताने वाले भाजपाई सलाहकारों की नीच और गंदी राजनीति 

अब ज़रा सीधे मुद्दे पर आते हैं। भाजपा के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में बैठे भारत सरकार के एक खास सलाहकार हैं- दिलीप मंडल। ये कोई आम ट्रोल नहीं हैं, बाकायदा सत्ता की छत्रछाया में पलने वाले रणनीतिकार हैं। इन्होंने सोशल मीडिया पर एक ऐसा पोस्ट लिखा जिसे पढ़कर किसी भी सवर्ण हिंदू का दिमाग भन्ना जाए।

भाई साहब लिखते हैं की “सवर्ण-मुसलमान गठबंधन से राज करने का एक नेहरूवादी मॉडल था, जिसमें ओबीसी (OBC) के लिए कोई जगह नहीं थी। इस मॉडल का आखिरी किला पश्चिम बंगाल था, जो कल ढह गया।” 

अरे भाई, ये हो क्या रहा है? “सवर्ण-मुसलमान गठबंधन”? मतलब आप उस सवर्ण समाज को, जिसने मुगलों की तलवारों के आगे अपनी गर्दनें कटवा दीं पर जनेऊ नहीं छोड़ा, जिसने इस देश की सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उसे आप उन मुसलमानों के साथ एक ही ब्रैकेट में रख रहे हो जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से इस देश में हिन्दुओं को काटा है और देश को बांटा है?

क्या सवर्णों की राजनीतिक औकात अब इतनी ही रह गई है की उन्हें अब इन ऐरे-गैरे मुसलमानों के साथ जोड़ा जा रहा है?

सवर्णों ने तो दशकों तक कांग्रेस की उस मुस्लिम-तुष्टिकरण वाली राजनीति का डटकर विरोध किया था। जब कश्मीर से पंडितों को रातों-रात निकाला जा रहा था, तब सवर्णों का ही तो खून सबसे ज़्यादा जला था।

जब राम जन्मभूमि का आंदोलन चला, तो गोलियां खाने वालों में सवर्ण सबसे आगे खड़े थे। और आज? आज भाजपा को सत्ता का नशा ऐसा सिर चढ़कर बोल रहा है की उसी सवर्ण को उठाकर मुसलमानों की कतार में खड़ा कर दिया गया है। 

ये जो ‘सवर्ण-मुसलमान’ नाम का गंदा शब्द उछाला गया है, ये सिर्फ दिलीप मंडल की भड़ास नहीं है। क्या आपको लगता है की शीर्ष नेतृत्व- हमारे प्रधानमंत्री जी या गृहमंत्री जी- की मूक सहमति के बिना कोई भी सरकारी सलाहकार इतनी बड़ी और ज़हरीली बात खुल्लम-खुल्ला कह सकता है? 

बिल्कुल नहीं! ये सब भाजपा की एक सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा है। ये लोग अब ये मान बैठे हैं की सवर्ण तो वैसे भी “मजबूर” वोटर है, वो जाएगा कहाँ? वो तो वोट हमें ही देगा।

इसलिए अब उसे जलील करो, उसे गरियाओ, और दलितों-पिछड़ों को ये दिखाओ की देखो, हम तुम्हारे लिए सवर्णों को कैसे जूतों की नोक पर रख रहे हैं। आज भाजपा के अंदर सवर्णों को एक ‘विलेन’ बनाकर एक नया नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है।

बंगाल के चुनावी आंकड़े और सवर्णों के खिलाफ भाजपा का नया नफरती इकोसिस्टम 

ये जो दिलीप मंडल जैसे भाजपा के सलाहकार दिन-रात सवर्णों के खिलाफ ज़हर उगल रहे हैं, इनके दावों में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है। ये बस अपने मनगढ़ंत किस्से गढ़ते हैं और उसे सच साबित करने के लिए झूठे आंकड़े पेश कर देते हैं।

ये कह रहे हैं की बंगाल में सवर्णों और मुसलमानों ने मिलकर एक अभेद्य किला बना रखा था जो अब टूट गया है। अब ज़रा कॉमन सेंस लगाइए। चुनाव आयोग के आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। 

अगर बंगाल में सवर्ण और मुस्लिम सच में एक हो गए थे और उन्होंने पूरी ताकत से भाजपा को हराने के लिए वोट किया था, तो भाई साहब, आपको वो ऐतिहासिक 207 सीटें और इतनी बंपर बढ़त कैसे मिल गई? पश्चिम बंगाल में जहां कुल 84 एसटी/एससी (ST/SC) सीटें हैं, वहां भाजपा 67 सीटों पर क्लीन स्वीप मार देती है। 

क्या ये 67 सीटें सिर्फ एक वर्ग के वोट से आ गईं? बिल्कुल नहीं! सच्चाई तो ये है की बंगाल की जनता ने, जिसमें सवर्ण भी थे, पिछड़े भी थे और दलित भी थे, सबने जातियों से ऊपर उठकर एक ‘हिंदू’ की तरह बंपर वोटिंग की थी। 

लेकिन इन AC वाले चाणक्यों को इस सच्चाई से क्या लेना-देना? इन्हें तो बस पार्टी के भीतर एक ‘हेट ग्रुप’ तैयार करना है। ये चाहते हैं की दलित और पिछड़े हमेशा सवर्णों से नफरत करते रहें, ताकि इनकी कुर्सी सलामत रहे।

ये जानबूझकर ऐसा दिखा रहे हैं जैसे भाजपा अब सिर्फ और सिर्फ दलितों और ओबीसी की पार्टी बन चुकी है, और सवर्ण तो बस एक बोझ हैं जिन्हें मजबूरी में ढोना पड़ रहा है। 

ज़मीनी हकीकत ये है की सवर्णों ने जितना एकमुश्त वोट इस पार्टी को दिया है, उतना शायद ही किसी और ने दिया हो। पर अब एक ऐसा ‘कृत्रिम दुश्मन’ तैयार किया जा रहा है जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं।

ये बिना बात के हवा में तलवारें भांज रहे हैं और सदियों से एक साथ रह रहे हिंदू समाज के बीच नफरत की एक ऐसी खाई खोद रहे हैं जिसे भरना शायद आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नामुमकिन हो जाएगा। 

बंगाल की पावन माटी में में दलित और सवर्ण को लड़ाने के लिए भाजपा ने घोल दिया जातिवाद का ज़हर 

खैर, बात सिर्फ सवर्ण-विरोध तक ही नहीं रुकी है। इनका एजेंडा इससे भी कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है। ज़रा पश्चिम बंगाल के मिज़ाज को समझिए। बंगाल वो पावन भूमि है जिसने भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण की नींव रखी थी।

राजा राममोहन रॉय से लेकर ईश्वर चंद्र विद्यासागर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और स्वामी विवेकानंद तक- इस मिट्टी ने ऐसे युगपुरुष दिए हैं जिन्होंने समाज को जातियों के चश्मे से नहीं, बल्कि इंसानियत और राष्ट्रवाद के नज़रिए से देखा। 

बंगाल के उस भद्रलोक और आम समाज में यूपी-बिहार वाली वो कटु जातिवादी राजनीति कभी चल ही नहीं पाई। वहां दुर्गा पूजा के पंडालों में ये नहीं पूछा जाता की कौन ब्राह्मण है और कौन दलित।

वहां लोग एक साथ रवींद्र संगीत सुनते हैं, एक साथ चाय की टपरी पर राजनीति-वाज़नीति की चर्चा करते हैं। लेकिन आज हमारी ये तथाकथित ‘हिंदूवादी’ सत्ता उस शांत और सुसंस्कृत समाज में जातिवाद का वो गंदा ज़हर घोलने पर तुली हुई है। 

ये भाजपाई चिलगोज़ा दिलीप मंडल खुल्लम-खुल्ला लिखता है की “कोलकाता अकेली राजधानी है जहाँ बाबा साहेब की दूर से दिखने वाली कोई भव्य मूर्ति या उनके नाम पर कोई बड़ा संस्थान नहीं है।”

अब इस बयान के पीछे की क्रोनोलॉजी समझिए। मुझे या किसी भी सवर्ण हिंदू को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की मूर्ति से कोई दिक्कत नहीं है। आप एक नहीं, दस भव्य मूर्तियां लगाइए। चौराहे-चौराहे पर लगाइए। लेकिन उन मूर्तियों की आड़ में आप जो ये जातिवाद का बीज बोना चाह रहे हैं ना, दिक़्क़त उससे है। 

अगर कोलकाता में कोई बड़ी मूर्ति नहीं है, तो इसका मतलब ये थोड़ी है की पूरा बंगाल दलित-विरोधी है?! इसका सीधा सा मतलब बस ये है की उस समाज की प्राथमिकताएं अलग रही हैं। उनका कल्चर अलग है। लेकिन नहीं! ये सत्ताधारी और इनके चमचे तो वहां भी जबरदस्ती का एजेंडा घुसेड़ना चाहते हैं।

ये वहां के दलितों के दिमाग में ये डालना चाहते हैं की “तुम्हारे साथ तो सदियों से अन्याय हुआ है, देखो तुम्हारी तो कोई मूर्ति ही नहीं है, ये सवर्ण तुम्हारे सबसे बड़े दुश्मन हैं।” 

मतलब जहाँ समाज शांति से रह रहा है, जहाँ लोग एकजुट हैं, वहाँ भी ये लोग ‘जाति’ का हथियार लेकर पहुँच जाते हैं। स्वामी विवेकानंद के वेदांत को मानने वाले बंगाल पर ये आयातित जातिवादी नफरत थोपी जा रही है। क्या हम यही हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे? जहाँ हिंदू एक-दूसरे का खून का प्यासा हो जाए? जहाँ हर गली-नुक्कड़ पर सिर्फ जाति की बात हो? ये राष्ट्रघात नहीं तो और क्या है? 

दलितों को कट्टर हिंदू समाज से काटकर भाजपा खड़ी कर रही है अपना नया एंटी-हिंदू वोटबैंक 

वैसे, अगर आप इस पूरी पिक्चर को थोड़ा ज़ूम आउट करके देखेंगे, तो एक और भी खौफनाक सच सामने आएगा। ये सिर्फ सवर्णों को गाली देने का प्रोजेक्ट नहीं है।

इसका असली और अल्टीमेट टारगेट भारत के दलित समाज को समग्र हिंदू समाज से पूरी तरह से काटकर अलग कर देना है। अंग्रेजों ने जो ‘फूट डालो और राज करो’ का खेल खेला था, जिसे बाद में लेफ्टिस्टों और मिशनरियों ने आगे बढ़ाया, आज अफसोस की बात है की हमारी अपनी ‘हिंदूवादी’ सरकार उसी एजेंडे को सबसे बेहतरीन तरीके से लागू कर रही है। 

दिलीप मंडल जैसे लोगों को आगे करके भाजपा एक बहुत ही सुनियोजित तरीके से एक नया ‘बुद्धिस्ट वोट बैंक’ तैयार कर रही है। दलितों के दिमाग में दिन-रात ये भरा जा रहा है की “तुम तो हिंदू हो ही नहीं! तुम तो मूल रूप से बौद्ध हो। ये हिंदू धर्म तो सवर्णों का है जिन्होंने तुम पर अत्याचार किए हैं।” 

ज़रा सोचिए, भगवान बुद्ध तो हमारे सनातन धर्म के ही एक महान अंग हैं। हमारे यहाँ तो दशावतार में उन्हें गिना जाता है। हमें उनसे अगाध प्रेम है। लेकिन आज जिस ‘नव-बौद्धवाद’ को हवा दी जा रही है, उसका बुद्ध के शांति और करुणा वाले संदेश से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरी की पूरी पॉलिटिकल मूवमेंट का बेस ही ‘हिंदू-विरोध’ है। 

आज अंबेडकर की पोजिशनिंग इस तरीके से की जा रही है कि उसमें ‘हिंदू’ शब्द गलती से भी ना आ जाए। जब आप किसी दलित युवा को बार-बार ये बताएंगे की वो हिंदू नहीं है, जब आप उसे उसके आराध्यों से, उसके गांव के मंदिरों से, उसके पूर्वजों की सनातन परंपराओं से एकदम काट देंगे, तो आप दरअसल क्या कर रहे हैं? आप सनातन धर्म की जड़ें काट रहे हैं! 

भाजपा को शायद ये लग रहा होगा की ये उनका कोई मास्टरस्ट्रोक है। उन्हें लगता है की ऐसा करके वो एक ऐसा ‘कोर वोटर बेस’ बना लेंगे जो कभी उन्हें छोड़कर जाएगा ही नहीं। लेकिन ये खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है भाई। आप चुनाव जीतने के लिए भारत के हज़ारों साल पुराने सामाजिक ताने-बाने को आग लगा रहे हो। 

जब दलित पूरी तरह से खुद को हिंदुओं से अलग मान लेगा और उसे एक कट्टर एंटी-हिंदू पहचान मिल जाएगी, तो इस बात की क्या गारंटी है की वो कल को किसी वामपंथी या इस्लामी गठजोड़ का मोहरा नहीं बन जाएगा? ये जो क्षणिक सियासी फायदे के लिए आग लगाई जा रही है, ये कल को पूरे देश को जलाकर राख कर देगी।

चुनाव से पहले बंटेंगे तो कटेंगे का खौफ और जीतते ही सवर्ण दलित में बांटने का भाजपाई धोखा 

ये जो भाजपा की दोमुंही राजनीति है ना, इसका सबसे बड़ा सुबूत इनके चुनावी नारों और चुनाव के बाद के चाल-ढाल में साफ दिखाई देता है। जब चुनाव सिर पर आते हैं और इन्हें लगता है की अब कुर्सी खिसकने वाली है, तब इन्हें अचानक से ‘हिंदू’ याद आ जाता है।

तब कोई सवर्ण नहीं होता, कोई दलित नहीं होता। तब देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के सबसे बड़े नेता तक, सब के सब रैलियों में माइक फाड़-फाड़ कर गरजते हैं- “बंटेंगे तो कटेंगे, एक हैं तो सेफ हैं!”

उस वक़्त पूरे इकोसिस्टम में हिंदुत्व का ऐसा खौफ और राष्ट्रवाद का ऐसा छौंक लगाया जाता है की आम हिंदू डर जाता है। गली-गली में राम नाम के नारे गूंजने लगते हैं। उस वक़्त दिलीप मंडल जैसे लोग किसी बिल में छुप जाते हैं, तब वो नहीं कहते की सवर्ण और मुस्लिम एक जैसे हैं।

उस वक़्त वो आम हिंदू, जो रोज़मर्रा की महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रहा होता है, अपने सारे दर्द भुलाकर, अपनी सारी शिकायतें ताक पर रखकर, सिर्फ और सिर्फ धर्म और राष्ट्र के नाम पर इस पार्टी को छप्पर फाड़ कर वोट दे आता है। 

लेकिन भाई साहब, पिक्चर तो वोटिंग के बाद बदलती है! जैसे ही ईवीएम (EVM) खुलती है और सत्ता की चाबी इनके हाथ में आती है, वैसे ही वो “बंटेंगे तो कटेंगे” वाला बैनर फाड़ कर कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है। चुनाव जीतते ही हिंदुत्व का वो चोला उतारकर खूंटी पर टांग दिया जाता है और शुरू होता है “नमो बुद्धाय” का खेल! 

चुनाव के बाद फिर से वही ‘सोशल इंजीनियरिंग’ चालू हो जाती है। जय श्री राम बोलने वाले कार्यकर्ताओं को पुलिस के डंडे खाने के लिए छोड़ दिया जाता है और सत्ता के केंद्र में उन लोगों को बिठा दिया जाता है जो अंबेडकर की मूर्तियों के नाम पर सवर्णों को गालियां बकते हैं।

चुनाव जीतने के बाद हमसे कहा जाता है की “अरे राम मंदिर तो बन गया ना, अब क्या जान लोगे? अब तो हम जातियों की ही राजनीति करेंगे।” 

ये कैसा घटिया छलावा है? मतलब चुनाव के वक़्त वोट लेने के लिए हम सब ‘एक अखंड हिंदू’ हैं, और चुनाव जीतते ही हम फिर से सवर्ण, ओबीसी और दलित बन जाते हैं? ये जो नारों का खोखलापन है, ये अब बर्दाश्त के बाहर जा रहा है। आप हमें बेवकूफ समझना बंद कर दीजिए।

सवर्णों का सरेआम अपमान और दलितों से ये गंदी सियासत बंद नहीं हुई तो भाजपा का अंत निश्चित

अब बहुत हो गया। मैं इस लेख के ज़रिए उन सत्ताधीशों, उनके पीछे आंख बंद करके चलने वाले अंधभक्तों और AC कमरों में बैठे उन भाजपाई जातिवादी सलाहकारों को बहुत साफ-साफ चेतावनी देना चाहता हूँ।

आप जो ये मुगालता पाले बैठे हैं ना की सवर्णों को साइडलाइन करके, उन्हें जलील करके और मुसलमानों के बराबर खड़ा करके आप इस देश पर पचास साल राज कर लेंगे, तो इस गलतफहमी से जल्दी बाहर आ जाइए। 

हिंदू समाज कोई लेबोरेटरी का चूहा नहीं है जिस पर आप अपनी सोशल इंजीनियरिंग के गंदे प्रयोग करते रहेंगे और हम चुपचाप सहते रहेंगे।

हिंदुत्व की ताक़त ही उसकी वो एकता है जिसमें एक ब्राह्मण, एक राजपूत, एक दलित और एक पिछड़ा सब एक बराबर खड़े होते हैं। जिस दिन आपने इस धागे को तोड़कर सवर्णों को अलग-थलग कर दिया, उसी दिन आपका ये राजनीतिक महल भरभरा कर गिर पड़ेगा। 

दिलीप मंडल जैसों के ज़रिए आज जो नफरत का बीज बोया जा रहा है, वो कल एक ऐसा ज़हरीला पेड़ बनेगा जिसकी छांव में न तो आपका ये ‘हिंदू राष्ट्र’ बचेगा और न ही आपकी ये कुर्सी। सवर्णों को राजनीतिक अछूत बनाकर आप कभी परम वैभवशाली भारत नहीं बना सकते।

हमारी आस्थाओं को, हमारे राम और कृष्ण को नकारने वालों को अगर आप यूं ही सिर-आंखों पर बिठाते रहे, और बंगाल से लेकर पूरे देश में जातिवाद की ये आग लगाते रहे, तो याद रखिए, हिंदू समाज अपना विकल्प खुद ढूंढ लेगा। 

हम आज भी एक मज़बूत, अखंड और जाति-मुक्त हिंदू समाज चाहते हैं। सारे दलित या दूसरे पिछड़े भाई हमारे अपने हैं। हम अपने स्वाभिमान, अपने पुरखों के बलिदान और अपनी सनातन पहचान को यूं नेताओं के जूतों तले कुचले जाने के लिए नहीं छोड़ सकते। वक़्त रहते जाग जाइए। अपने उन ज़हरीले सलाहकारों को बाहर का रास्ता दिखाइए जो हिंदू समाज की पीठ में छुरा घोंप रहे हैं।

अगर ये हिंदू एकता एक बार टूट गई, तो फिर लाख ‘जय श्री राम’ चिल्ला लेना, बचाने कोई नहीं आएगा। पिक्चर अभी बाकी है, और इसका क्लाइमैक्स बहुत भारी पड़ने वाला है- याद रख लो भाजपाइयों!

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