सच कहूं तो, जब भी हम भारत का इतिहास पढ़ते हैं तो गुस्से से दिमाग ख़राब हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे हमें सदियों से सिर्फ हारने और लुटने की ही कहानियां पढ़ाई गई हैं।
इतिहास की किताबों में बस यही भरा पड़ा है की फलां लूटेरा आया, उसने हमें लूटा, फलां जिहादी आया, उसने हमारे मंदिर तोड़े। लेकिन सवाल ये है की क्या सच में सनातन धर्म इतना कमज़ोर था? क्या हमारे पुरखे सिर्फ गर्दन झुकाकर कटने का इंतज़ार करते थे? बिलकुल नहीं!
वामपंथी इतिहासकारों ने एक बहुत बड़ी साज़िश के तहत हमारे असली शूरवीरों की कहानियों को किताबों के पन्नों से गायब कर दिया। आज हम उसी झूठ के परदे को चीरकर एक ऐसे सनातनी शेर की बात करेंगे, जिसके नाम से ही मुगलों की पैंट गीली हो जाती थी।
ज़रा उस 17वीं सदी के भारत की कल्पना कीजिए। दिल्ली के तख्त पर औरंगजेब नाम का एक ऐसा जिहादी और इस्लामिक दरिंदा बैठा था, जिसके सिर पर पूरे भारतवर्ष को ‘दारुल-इस्लाम’ (इस्लामिक राष्ट्र) बनाने का खूनी भूत सवार था।
उत्तर से लेकर दक्षिण तक हाहाकार मचा था। काशी का विश्वनाथ मंदिर हो या मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि, इस जिहादी दरिंदे ने हमारे आस्था के हर केंद्र को तोड़ने की कसम खा रखी थी।
बड़े-बड़े राजा-महाराजा, रजवाड़े या तो मुगलों के खौफ से कांप रहे थे, या फिर अपनी अस्मिता का सौदा कर उनके सामने घुटने टेक चुके थे। मुगलों की वो विशालकाय, खूंखार और खून की प्यासी फौज पूरे आर्यावर्त को रौंदती हुई आगे बढ़ रही थी।
लेकिन… रुकिए! भारत के पूर्वोत्तर में, जहाँ माँ कामाख्या का आशीर्वाद बरसता है और जहाँ माँ ब्रह्मपुत्र की उफनती लहरें सनातन शौर्य का गान करती हैं, वहाँ एक ऐसा साम्राज्य था जो मुगलों की इस खूनी आंधी के सामने हिमालय जैसी अडिग चट्टान बनकर सीना ताने खड़ा था। वो था अजेय ‘अहोम साम्राज्य’।
जब पूरा देश मुगलों की बर्बरता से कराह रहा था, तब अहोम वीरों ने साफ कह दिया था- “कट जाएंगे, मर जाएंगे, लेकिन इन म्लेच्छों के आगे कभी सिर नहीं झुकाएंगे!” और इसी पवित्र अहोम माटी ने जन्म दिया पूर्वोत्तर के ‘छत्रपति शिवाजी’ को।
एक ऐसा महामानव, एक ऐसा धधकता हुआ ज्वालामुखी, जिसने औरंगजेब के गुरूर को उसी की आग में जलाकर राख कर दिया। उस महान हिंदू रक्षक का नाम था- लाचित बोरफुकन।
आज हम उसी वीर की शौर्यगाथा आपको बताएँगे, जिसने ब्रह्मपुत्र की लहरों को मुगलों की सबसे खौफनाक कब्र बना डाला था।
जिहादी मुगल औरंगजेब की नीच दृष्टि और वो भयंकर अपमान जिसका हिन्दू वीरों द्वारा बदला जरुरी था
मुगलों की फितरत ही लुटेरों वाली थी। वे कभी भी किसी समृद्ध और खुशहाल हिंदू राज्य को चैन से नहीं देख सकते थे। असम और पूर्वोत्तर भारत अपनी प्राकृतिक संपदा, घने जंगलों, हाथियों, जड़ी-बूटियों और अपनी स्वतंत्र सनातन संस्कृति के लिए दूर-दूर तक विख्यात था।
औरंगजेब की गिद्ध जैसी नज़रें अहोमों की इस अपार दौलत और उनकी स्वतंत्रता पर गड़ी हुई थीं। उसे अच्छी तरह पता था की जब तक पूर्वोत्तर के इस अभेद्य किले पर इस्लाम का हरा झंडा नहीं लहराता, उसका पूरे भारत को निगलने का सपना अधूरा ही रहेगा।
इसी नापाक मंसूबे के साथ उसने 1662 ईस्वी में अपने सबसे खूंखार और निर्दयी सेनापतियों में से एक, मीर जुमला को अहोमों को कुचलने के लिए भेज दिया।
मीर जुमला कोई छोटी-मोटी टुकड़ी लेकर नहीं आया था। वो एक विशाल, भारी हथियारों से लैस और क्रूरता की सारी हदें पार कर चुकी मुगल फौज लेकर असम पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़ा।
जिहादी मुगलों ने गांव-गांव जला दिए, निर्दोष हिंदुओं का खून पानी की तरह बहाया और छल-कपट से अहोम राजधानी गड़गाँव पर अपना नापाक कब्ज़ा जमा लिया।
उस वक्त अहोम सेना भी एक भयंकर महामारी से जूझ रही थी, इसलिए वे इस अचानक हुए भीषण आक्रमण का तुरंत मुंहतोड़ जवाब नहीं दे पाए।
नतीजा क्या हुआ? अहोम स्वर्गदेव (राजा) जयध्वज सिंघा को अपनी मासूम प्रजा के नरसंहार को रोकने के लिए एक ऐसा समझौता करना पड़ा, जिसने पूरे अहोम राष्ट्र की आत्मा को छलनी कर दिया।
इतिहास में इसे 1663 की ‘घिलाझारीघाट की संधि’ कहते हैं। मुगलों ने अपनी नीचता की सारी हदें पार करते हुए राजा पर युद्ध हर्जाने के रूप में 3 लाख रुपये, 90 हाथी और ढेरों सोना-चांदी थोप दिया।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। सबसे बड़ा और दिल को तोड़ देने वाला आघात तो तब लगा, जब अहोम राजा को अपनी ही छह साल की मासूम फूल-सी बच्ची, राजकुमारी रमानी गाभरू (जिसे बाद में इन दरिंदों ने रहमत बानो नाम दे दिया), को औरंगजेब के हरम के लिए सौंपना पड़ा।
ज़रा सोचिए उस पिता के दिल पर क्या गुज़री होगी? अपनी सगी बच्ची को उन क्रूर, अय्याश मुगलों के हाथों में सौंपने का जो मानसिक आघात राजा जयध्वज को लगा, वो उसे कभी बर्दाश्त नहीं कर पाए। इसी भारी शोक और मातृभूमि के अपमान की आग में तिल-तिल कर जलते हुए कुछ ही समय बाद उनका देहांत हो गया।
लेकिन मरते-मरते वो अपने उत्तराधिकारी से बस एक ही बात कह गए- “मेरे माथे से… मेरे देश के माथे से मुगलों की इस दासता और अपमान के कलंक को धो डालना!”
हिन्दू रक्षक लाचित बोरफुकन का वो रौद्र अवतार जिसने बदले की आग में मुगलों की लाशों के ढेर लगा दिए
जयध्वज सिंघा के बाद जैसे ही स्वर्गदेव चक्रध्वज सिंघा अहोम सिंहासन पर बैठे, पूरे साम्राज्य की हवा ही बदल गई। उनके सीने में मुगलों के खिलाफ बदले की वो भयंकर आग सुलग रही थी, जो किसी को भी भस्म कर सकती थी। चक्रध्वज सिंघा एक प्रतापी हिंदू राजा थे।
गद्दी पर बैठते ही उन्होंने जो पहली हुंकार भरी, वो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। उन्होंने भरी सभा में गरजते हुए कहा, “इन विदेशी, म्लेच्छ मुगलों के अधीन रहकर एक कायर की तरह घुट-घुट कर जीने से लाख गुना बेहतर है युद्ध के मैदान में अपनी मातृभूमि के लिए कट मरना!”
बस, उसी दिन से मुगलों को कर (Tax) देना बंद कर दिया गया। आर-पार की लड़ाई की तैयारियां शुरू हो गईं।
लेकिन राजा को अच्छी तरह पता था की मुगलों की उस विशाल और आधुनिक हथियारों से लैस शाही सेना का मुकाबला करने के लिए उन्हें कोई आम सेनापति नहीं चाहिए था। उन्हें तलाश थी एक ऐसे शेर की, जिसकी दहाड़ सुनकर मुगल तोपों के भी मुंह बंद हो जाएं।
एक ऐसा योद्धा जो सिर्फ रणकौशल में ही निपुण न हो, बल्कि जिसकी रगों में बहते खून का कतरा-कतरा अहोम राष्ट्र और सनातन धर्म के लिए उबल रहा हो। और राजा की ये तलाश जिस युवा और बलिष्ठ महायोद्धा पर जाकर रुकी, वो थे हमारे- लाचित।
लाचित कोई आम परिवार से नहीं थे। उनके पिता मोमाई तामुली बोरबरुआ राज्य के सबसे बड़े अधिकारी थे। लाचित को बचपन से ही कठोर सैन्य ट्रेनिंग, राजनीति, कूटनीति और हमारे पवित्र हिंदू शास्त्रों का गहरा ज्ञान दिया गया था।
लाचित के रग-रग में अपने देश के लिए अगाध प्रेम और मुगलों के लिए भयंकर नफरत भरी हुई थी। चक्रध्वज सिंघा ने लाचित की आंखों में उस सुलगती हुई आग को पहचान लिया और तुरंत उन्हें अहोम सेना का ‘बोरफुकन’ यानी सर्वोच्च प्रधान सेनापति घोषित कर दिया।
उस पवित्र राज्याभिषेक समारोह में राजा ने लाचित को अहोमों की पारम्परिक और पवित्र सोने की तलवार ‘हेंगडांग’ सौंपी। ये हेंगडांग धर्म की रक्षा और मुगलों के समूल विनाश की सौगंध थी।
कमान हाथ में आते ही लाचित ने अहोम सेना का पूरा कायाकल्प कर डाला। जो सैनिक उदास और हताश थे, लाचित ने उनके अंदर ऐसा युद्धोन्माद भरा की वे मरने-मारने पर उतारू हो गए। उन्होंने रातों-रात एक ऐसा तगड़ा सैन्य तंत्र खड़ा किया की मुगलों को भनक तक नहीं लगी।
और फिर आया 1667 का वो साल! लाचित बोरफुकन की सेना ने आंधी की तरह गुवाहाटी (जो मुगलों का सबसे मजबूत गढ़ बन चुका था) पर ऐसा अचूक धावा बोला की मुगलों के चारों खाने चित हो गए। अहोम वीरों के उस खौफनाक हमले के सामने मुगल सेना ताश के पत्तों की तरह बिखर गई।
लाचित की तलवार उस दिन ऐसी चली की मुगलों की लाशों के ढेर लग गए। इटाखुली किले को छीन लिया गया और गुवाहाटी को उन जिहादियों के अपवित्र पंजों से पूरी तरह आज़ाद करा लिया गया।
मुगल फौजदार सैयद फिरोज खान और सैयद साना को जानवरों की तरह घसीटकर बंदी बना लिया गया। मुगलों के मुंह पर ये ऐसा करारा तमाचा था, जिसकी गूंज सीधी दिल्ली तक गई। ‘घिलाझारीघाट की संधि’ का कलंक अब धीरे-धीरे धुल रहा था।
जब मातृभूमि और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए वीर लाचित ने अपने ही सगे मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया
इधर जब गुवाहाटी छिनने की खबर औरंगजेब के कानों में पड़ी, तो वो सुल्तान बौखलाहट में पागलों की तरह चीखने लगा। उसका गुरूर मिट्टी में मिल चुका था।
ये सिर्फ एक किला छिनने की बात नहीं थी; ये उस इस्लामी सर्वोच्चता के अहंकार पर एक सनातनी वीर का करारा प्रहार था। तिलमिलाए औरंगजेब ने तुरंत एक फरमान जारी किया की अहोमों को जड़ से मिटा दो! एक विशालकाय और विनाशकारी शाही सेना फिर से गुवाहाटी की तरफ कूच कर गई।
लाचित बोरफुकन जैसे चतुर रणनीतिकार को पहले से ही अंदाज़ा था की दिल्ली का वो सुल्तान चुप बैठने वालों में से तो है नहीं। मुगलों का पलटवार बहुत भयंकर होने वाला था।
लाचित एक बात बहुत अच्छे से जानते थे- अहोम सेना गिनती में मुगलों से बहुत छोटी है। मुगलों की सबसे बड़ी ताकत उनके घुड़सवार और आग उगलने वाली भारी तोपें थीं, जो खुले मैदानों में किसी को भी भून सकती थीं।
तो लाचित ने क्या किया? उन्होंने एक मास्टरप्लान बनाया। उन्होंने तय किया की वो मुगलों को कभी भी खुले मैदान में नहीं लड़ने देंगे। वो उन्हें खींचकर असम की उन दुर्गम पहाड़ियों, घने जंगलों और माँ ब्रह्मपुत्र नदी के उन रास्तों में लाएंगे जहाँ मुगलों की भारी-भरकम फौज खुद उनके लिए फांसी का फंदा बन जाएगी। इसी को तो असली ‘गुरिल्ला युद्ध’ कहते हैं!
मुगलों को नदी के रास्ते आगे बढ़ने से रोकने के लिए लाचित ने अमीनगाँव के पास रातों-रात मिट्टी और रेत का एक विशाल, अभेद्य सुरक्षा प्राचीर (मिट्टी का किला) बनाने का हुक्म दिया। ये कोई साधारण दीवार नहीं थी। मुगलों के जहाजों को रोकने के लिए इसका सुबह होने से पहले बनना हर हाल में ज़रूरी था।
लाचित ने इस बेहद नाजुक और अहम काम की ज़िम्मेदारी किसी और को नहीं, बल्कि खुद अपने सगे मामा को सौंप दी और साफ शब्दों में चेता दिया की सूरज की पहली किरण फूटने से पहले काम पूरा हो जाना चाहिए, वरना अंजाम बुरा होगा।
आधी रात हो चुकी थी। लाचित खुद काम का मुआयना करने वहां पहुंच गए। लेकिन वहां जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसे देखकर उनका खून खौल उठा। काम रेंग-रेंग कर हो रहा था।
मज़दूर थकावट का रोना रोते हुए आराम फरमा रहे थे और सबसे बड़ी बात- खुद उनका सगा मामा भी वहां खर्राटे मार रहा था! लाचित तुरंत भांप गए की इस लापरवाही का सीधा सा मतलब है… सुबह मुगलों का कब्ज़ा और पूरे अहोम राष्ट्र का विनाश।
एक तरफ अपना सगा मामा, अपनी ही माँ का भाई… और दूसरी तरफ अपनी जन्मभूमि, अपना राष्ट्र! किसी आम आदमी का दिल शायद पसीज जाता। लेकिन लाचित? वो तो मिट्टी के लिए बने थे।
क्रोध और राष्ट्रभक्ति के भयंकर आवेश में लाचित ने अपनी म्यान से वो पवित्र ‘हेंगडांग’ निकाली और बिना एक पल गँवाए, बिना कोई दूसरी सोच लाए… खचाक! एक ही झटके में अपने ही सगे मामा का सिर धड़ से अलग कर दिया! खून का फव्वारा छूट पड़ा।
खून से सनी उस तलवार को हवा में लहराते हुए लाचित ने मज़दूरों और सैनिकों के सामने जो सिंहनाद किया, वो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया- “देखोत कोइ मोमाई डांगोर नोहोय!” (“मेरे देश से बड़ा मेरा मामा नहीं हो सकता!”)
सन्नाटा छा गया! लाचित का वो रौद्र और खौफनाक रूप देखकर वहां मौजूद हर एक इंसान के भीतर मानो 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया। जो लोग थकावट का बहाना बना रहे थे, उनकी सारी थकान हवा हो गई। वे तुरंत फावड़े उठाकर ऐसे काम पर लगे की रातों-रात वो अभेद्य दीवार खड़ी हो गई।
अनुशासन और मातृभूमि पर खुद को मिटा देने की ये ऐसी भयंकर मिसाल थी, जो पूरी दुनिया के इतिहास में आपको कहीं और ढूँढने से भी नहीं मिलेगी। लाचित ने साफ संदेश दे दिया था-जब बात राष्ट्र रक्षा की हो, तो बीच में कोई बाप, कोई भाई, कोई मामा नहीं आ सकता। जो बीच में आएगा, वो सीधा काटा जाएगा!
औरंगजेब का खूनी जिहादी उन्माद और मुगलों का असम के अहोम साम्राज्य के खिलाफ महा-आक्रमण
औरंगजेब का इस्लामी पागलपन अब सिर चढ़कर बोल रहा था। उसने कसम खा ली थी की वो असम को इस्लाम के रंग में रंग कर ही मानेगा। इस बार उसने एक बहुत ही धूर्त चाल चली। उसने अपनी सबसे खूंखार सेना की कमान आमेर के हिंदू राजा राम सिंह प्रथम के हाथों में सौंप दी।
ये औरंगजेब की पुरानी और नीच नीति थी- हिंदू को हिंदू से लड़वाओ। राम सिंह जो फौज लेकर चला था, वो कोई मामूली फौज नहीं थी; वो साक्षात मौत की आंधी थी।
30,000 खूंखार पैदल सैनिक, 15,000 ऐसे तीरंदाज जिनका निशाना कभी नहीं चूकता था, 18,000 तुर्की और अरबी घुड़सवार, 1,000 से भी ज्यादा भारी तोपें, 5,000 बंदूकधारी और सैकड़ों युद्ध नौकाओं का वो बेड़ा… सच कहूं तो, जब ये फौज चलती थी तो आसमान धूल से भर जाता था और धरती कांप उठती थी।
जब राम सिंह इस विशाल जिहादी फौज को लेकर असम की दहलीज पर पहुंचा, तो सामने लाचित बोरफुकन की बिछाई हुई व्यूहरचना देखकर वो सन्न रह गया। राम सिंह कोई बेवकूफ नहीं था; वो समझ गया की लाचित के अहोम शेरों को आमने-सामने की लड़ाई में हराना लोहे के चने चबाने के बराबर है। तब राम सिंह ने अपनी कूटनीति का गंदा खेल शुरू किया।
उसने लाचित बोरफुकन को खरीदने की कोशिश की। उसने एक दूत के हाथ लाचित को एक लाख रुपये (जो उस ज़माने में एक बहुत बड़ी रियासत खरीदने के बराबर थे) की भारी रिश्वत और दिल्ली दरबार में एक बड़े पद का लालच भेजा।
पर उन मुगलों के गुलामों को क्या पता था की सनातनी शेर बिकते नहीं हैं! लाचित ने उस दूत को बीच सभा में जूतों की नोक पर रखा और ऐसा मुंहतोड़ जवाब दिया की राम सिंह के तंबू में आग लग गई।
लाचित ने दहाड़ते हुए कहा- “मैं अपने राजा, अपने सनातन धर्म और अपनी माटी के साथ गद्दारी करने से लाख गुना बेहतर इसी माटी में कटकर मिट जाना पसंद करूंगा।
मुगलों से कह दो, जब तक मेरी रगों में खून का एक भी कतरा बाकी है, पूर्वोत्तर की इस पवित्र धरती पर उनका नापाक कदम पड़ नहीं सकता!”
लाचित का ये जवाब सुनते ही राम सिंह बौखला गया। इसके बाद 1669 में जो हुआ, वो अहोम इतिहास का एक बहुत ही दर्दनाक पन्ना है- ‘अलाबोई का रण’ (Battle of Alaboi)।
मुगलों ने अपनी चालबाज़ी और धूर्तता दिखाते हुए अहोम सेना को किसी तरह उन दुर्गम पहाड़ियों से बाहर निकालकर मैदानी इलाके में युद्ध करने के लिए मजबूर कर दिया। मैदानी युद्ध तो मुगलों के बाएं हाथ का खेल था। उनके अरबी घुड़सवारों और आग उगलती तोपों ने अहोम सेना पर वो कहर बरपाया की धरती लाल हो गई।
अहोम वीर पीछे नहीं हटे, वो आखिरी सांस तक लड़े, लेकिन तजुर्बे और हथियारों की कमी के चलते उस एक ही मनहूस दिन में हमारे 10,000 अहोम हिंदू भाई रणभूमि में कटकर वीरगति को प्राप्त हो गए।
10,000 सैनिकों की लाशें! चारों तरफ रोते-बिलखते परिवार! राजा चक्रध्वज सिंघा और लाचित का दिल ये नज़ारा देखकर अंदर से पूरी तरह टूट गया था, खून के आंसू रो रहे थे वो। कोई और होता तो इस भयंकर नरसंहार को देखकर मुगलों के पैरों में गिर पड़ता, आत्मसमर्पण कर देता।
पर वो लाचित थे! शिव के अंश! अलाबोई के इस कत्लेआम ने लाचित को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें वज्र से भी ज्यादा कठोर बना दिया। उन्होंने उसी खून से सनी मिट्टी को मुट्ठी में लेकर कसम खाई- “चुन-चुन कर मारूंगा! मुगलों के इस जिहादी रक्तपात का वो इंतकाम लूंगा की दिल्ली के तख्त की नींव तक थर्रा उठेगी।”
सरायघाट का महायुद्ध जहाँ लाचित बोरफुकन ने माँ ब्रह्मपुत्र को बना दिया हजारों मुगलों की सबसे खौफनाक कब्रगाह
अलाबोई की उस भारी त्रासदी के बाद लाचित समझ गए की भावनाओं में बहकर युद्ध नहीं जीते जाते। उन्होंने पूरी की पूरी रणनीति ही बदल डाली। मुगलों की ताकत मैदानों में थी, तो उन्हें मैदान से खींचकर पानी में उतारना ही पड़ेगा।
लाचित ने पूरे असम का चप्पा-चप्पा छाना और एक ऐसी अचूक जगह चुनी जहाँ मुगलों की वो विशालकाय सेना किसी काम की न रहे। वो जगह थी- सरायघाट (आज के गुवाहाटी के पास)। ये माँ ब्रह्मपुत्र का वो हिस्सा है जहाँ नदी दोनों तरफ से ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरी हुई है और नदी का पाट अचानक से बेहद पतला (Narrow) हो जाता है।
लाचित का दिमाग देखिए! उन्हें पता था की मुगलों के बड़े-बड़े और भारी युद्ध पोत जब इस पतली जगह में घुसेंगे, तो वे न मुड़ पाएंगे और न ही तेज़ी से भाग पाएंगे। वो आपस में ही टकरा-टकरा कर टूटेंगे। बस, यही था वो मास्टरस्ट्रोक!
मार्च 1671 का वो निर्णायक महीना आ गया। मुगलों की विशाल नौसेना, जिसका मुखिया था वो क्रूर एडमिरल मुन्नवर खान, ब्रह्मपुत्र का सीना चीरते हुए आगे बढ़ रही थी।
तोपों की कान फोड़ देने वाली गर्जना और मुगलों के ‘अल्लाहु अकबर’ के उन्मादी नारों से पूरा वातावरण गूंज उठा था। मुगलों को पक्का यकीन था की आज वो असम को रौंद कर रख देंगे और सनातन का नामोनिशान मिटा देंगे।
पर तभी नियति ने एक बहुत बड़ा खेल कर दिया। युद्ध के ठीक उस सबसे अहम मौके पर अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन भयंकर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें इतने तेज़ बुखार ने जकड़ लिया की उनका शरीर भट्टी की तरह जलने लगा।
हालत इतनी खराब थी की वो अपने बिस्तर से उठ तक नहीं पा रहे थे। जब अहोम सैनिकों ने देखा की सामने से मुगलों की मौत की आंधी आ रही है और उनका सबसे बड़ा रक्षक मृत्यु शय्या पर पड़ा है, तो उनके हौसले पस्त होने लगे। दहशत फैल गई।
अहोम नौकाएं धीरे-धीरे पीछे हटने लगीं। लगने लगा की बस अब कुछ ही पलों में सब खत्म हो जाएगा, असम मुगलों का गुलाम हो जाएगा।
लेकिन भाई, पिक्चर अभी बाकी थी! लाचित बोरफुकन उस मिट्टी के बने ही नहीं थे जो बीमारी के आगे घुटने टेक दे। तेज़ बुखार से तपते हुए, शरीर से एकदम टूट चुके लाचित को जब ये अहसास हुआ की उनकी सेना मुगलों के खौफ से पीछे हट रही है, तो उनके भीतर का वो सोया हुआ महादेव जाग उठा।
बीमारी की उस जानलेवा पीड़ा को लात मारते हुए लाचित ने सैनिकों को सीधा आदेश दिया- “मुझे चारपाई समेत उठाओ और युद्ध नौका पर रख दो!”
सैनिक हक्के-बक्के रह गए, पर सेनापति का हुक्म था। लाचित को नाव पर रखा गया और उन्होंने नाविकों को चिल्लाकर हुक्म दिया- “सीधा मुगलों के बेड़े में घुसा दो मेरी नाव को!” और फिर अपनी भागती हुई सेना को जो ललकार लाचित ने दी, वो आज भी जब कोई सनातनी सुनता है तो उसकी रगों में उबाल आ जाता है।
उन्होंने अपनी पूरी बची-खुची ताकत समेट कर चिल्लाया-
“अरे कायरों! जब मेरी मातृभूमि पर इन म्लेच्छों का साया मंडरा रहा है, जब मेरा देश संकट में है, तो मैं अपनी इस छोटी सी बीमारी के लिए बिस्तर पर कैसे लेटा रहूँ? क्या मैं मुगलों का गुलाम बनने के लिए अपने देश को छोड़ दूँ? अगर तुम बुज़दिलों को भागना है तो भाग जाओ! मुगलों को मुझे यहाँ से पकड़ कर ले जाने दो! और जाकर अपने राजा से कहना की तुम तो पीठ दिखाकर भाग आए, पर तुम्हारा सेनापति अपनी आखिरी सांस तक इन मुगलों से लड़ता रहा!”
अपने बीमार सेनापति को मौत के मुंह में सीधा तोपों के सामने जाते देख, अहोम सैनिकों के भीतर का मरा हुआ ज़मीर ज़िंदा हो उठा। उनकी वो कायरता अचानक एक भयंकर और खूंखार युद्धोन्माद में बदल गई।
“जय माँ कामाख्या!” की गगनभेदी हुंकार के साथ, पीछे हटती हुई अहोम सेना एक भयंकर सुनामी का रूप लेकर वापस मुगलों पर टूट पड़ी। सच मानिए, ये कोई युद्ध नहीं रह गया था.. ये मुगलों के अहंकार का कत्लेआम था!
लाचित का वो ब्रह्मपुत्र नदी वाला दांव अब बिल्कुल सटीक बैठ रहा था। मुगलों के जहाज़ इतने भारी-भरकम थे की वो उस पतली जगह में फंस गए, वो चाहकर भी अपनी नावें घुमा नहीं पा रहे थे। और दूसरी तरफ अहोमों की ‘बछारी’ नावें थीं- छोटी, बेहद तेज़ और पानी में मछली की तरह फुर्तीली।
अहोम सैनिकों ने चारों तरफ से मुगलों के उन बड़े जहाजों को ऐसे घेर लिया जैसे मधुमक्खियां अपने छत्ते पर चिपक जाती हैं। अहोम वीर रस्सियों से मुगलों के जहाजों पर चढ़ गए और अपने हेंगडांग (तलवारों) से उन जिहादी मुगलों को मूली-गाजर की तरह काटना शुरू कर दिया। खून की नदियां बहने लगीं।
तभी बीच युद्ध में अहोम तोपचियों ने सीधे मुगलों के जहाज़ों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। जहाज़ डूबने लगे, मुगलों में हाहाकार मच गया।
और फिर हुआ वो असली चमत्कार- एक अहोम सैनिक की बंदूक से निकली अचूक गोली सीधे उस मगरूर मुगल एडमिरल मुन्नवर खान के सीने के पार हो गई। मुन्नवर खान वहीं ढेर! अपने सबसे बड़े कमांडर को मरा देख मुगलों की रही-सही हिम्मत भी जवाब दे गई। वहां भयंकर भगदड़ मच गई।
सरायघाट के उस महायुद्ध में तीन-तीन बड़े मुगल जनरल कुत्ते की मौत मारे गए। मुगलों की नौसेना पूरी तरह से तहस-नहस हो गई। हजारों मुगलों की लाशें पानी में उतराने लगीं।
माँ ब्रह्मपुत्र का वो पवित्र और निर्मल जल मुगलों के अशुद्ध खून से बिल्कुल लाल हो गया था। ब्रह्मपुत्र सचमुच उन जिहादी आक्रांताओं के लिए एक ऐसी कब्रगाह बन गई जिसे वो कभी भूल नहीं पाए।
राम सिंह की हालत इतनी खराब हो गई की वो अपनी बची-खुची फौज को लेकर वहां से दुम दबाकर भागा। अहोम शेरों ने उन्हें मानस नदी के पार तक खदेड़-खदेड़ कर मारा।
औरंगजेब का वो इस्लाम का झंडा फहराने वाला खूनी सपना, सरायघाट के उसी लाल पानी में हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो गया। जीत तो हमारी ही होनी थी, और क्या शानदार जीत थी वो!
इतिहास का पन्ना नहीं बल्कि हर सच्चे हिन्दू और सनातनी के सीने की सुलगती आग हैं वीर लचित बोरफुकन
लाचित बोरफुकन की ज़िंदगी आज के हर युवा, हर सच्चे सनातनी और राष्ट्रभक्त के लिए सिर्फ इतिहास का एक पन्ना नहीं, बल्कि वो सुलगती हुई आग है जो हमारे सीनों में जलनी चाहिए। उन्होंने हमें सिखाया है की युद्ध हथियारों की गिनती से नहीं जीते जाते। युद्ध तो जीते जाते हैं जज़्बे से, उस राष्ट्रप्रेम की ज्वाला से जो मौत के डर को भी राख कर देती है।
आज जब भी देश के स्वाभिमान, हमारी माटी या हमारे सनातन धर्म पर कोई भी दुश्मन आंख उठाकर देखने की कोशिश करे, तो हमें वीर लाचित को याद कर लेना चाहिए।
जब भी ऐसा संकट आए, तो भारत की माटी से कोई न कोई लाचित उठेगा, अपनी वो ‘हेंगडांग’ निकालेगा और इस्लामिक आक्रांताओं को उनकी औकात याद दिलाते हुए दहाड़ेगा- “देखोत कोइ मोमाई डांगोर नोहोय!” (देश से बड़ा कोई नहीं है)।
लाचित का वो अमर सिंहनाद आज भी माँ ब्रह्मपुत्र की लहरों में, असम की हवाओं में और हर सच्चे भारतीय की धड़कन में जिंदा है। और जब तक इस माटी में एक भी सनातनी जिंदा है, लाचित की वो हुंकार ऐसे ही गूंजती रहेगी।
वन्दे मातरम्! जय हिंद! जय माँ कामाख्या!
