आज जब हम वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती मना रहे हैं, तो सच पूछिए तो ये दिन सिर्फ एक राजा को याद करने का दिन नहीं है। ये दिन है उस धधकती हुई आग को महसूस करने का, जिसने कभी पूरे राजपूताने को मुगलों की गुलामी में भस्म होने से बचा लिया था। आज का ये अवसर हमारे और आपके लिए एक मौका है अपने भीतर के सोए हुए हिंदू शेर को जगाने का।
हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना ही यही रही है की आज़ादी के बाद से ही वामपंथी इतिहासकारों ने एक सोची-समझी साजिश के तहत हमारे सच्चे इतिहास के पन्नों पर धूल डालने का काम किया।
स्कूलों की किताबों में हमें ये तो रटाया गया की विदेशी इस्लामिक आक्रांता अकबर ‘महान’ था, लेकिन जिसने उस तथाकथित महान अकबर की रातों की नींद हराम कर दी थी, उस महाराणा प्रताप को महज एक क्षेत्रीय बागी राजा बताकर किनारे कर दिया गया।
पर सच को आप आखिर कितने दिन तक दबा सकते हैं? आज महाराणा प्रताप जयंती के इस शुभ अवसर पर हमें उस झूठे नैरेटिव को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। असलियत तो ये है की मुगलों का इस पवित्र भारत भूमि पर आना कोई साधारण राज करने के लिए किया गया हमला नहीं था। ये एक क्रूर, बर्बर और खूनी इस्लामी जिहाद था।
इनका एक ही मकसद था- भारत की सनातन संस्कृति को कुचलना, यहाँ के भव्य मंदिरों को तोड़ना, और यहाँ के मूल हिन्दू निवासियों को अपनी तलवार की नोक पर इस्लाम कबूल करवाना या फिर उनका सिर धड़ से अलग कर देना।
चारो तरफ मुग़लिया खौफ का सन्नाटा पसरा था। लेकिन उसी घनघोर अंधेरे के बीच मेवाड़ की पावन धरती से एक ऐसा सूरज निकला जिसकी तपिश ने मुग़लिया सल्तनत की जड़ें जलाकर राख कर दीं।वो सूरज थे हमारे महाराणा प्रताप।
उन्होंने साफ कर दिया की मेवाड़ कोई बिकाऊ जागीर नहीं है। प्रताप का संघर्ष सिर्फ एक रियासत का संघर्ष नहीं था, बल्कि वो सनातन धर्म, हिंदू सम्मान और भारत माता की कोख को इस्लामिक जिहादियों से बचाने का एक महासंग्राम था।
अकबर का वो क्रूर इस्लामिक नरसंहार जिसने महाराणा प्रताप के सीने में मुगलों के सर्वनाश की ज्वाला धधका दी
महाराणा प्रताप के सीने में मुगलों के खिलाफ जो नफरत और प्रतिशोध की ज्वाला भड़क रही थी, उसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। बात 1567-68 के आस-पास की है। प्रताप के पिता राणा उदय सिंह द्वितीय उस वक्त मेवाड़ की गद्दी पर थे।
जिहादी मानसिकता से भरे अकबर को ये बात बुरी तरह खटक रही थी की पूरे उत्तर भारत पर उसका कब्जा है, लेकिन मेवाड़ अभी भी स्वतंत्र खड़ा है। अकबर जानता था की जब तक मेवाड़ का भगवा ध्वज लहरा रहा है, तब तक पूरे हिंदुस्तान को दारुल-इस्लाम बनाने का उसका सपना कभी पूरा नहीं हो सकता।
बस फिर क्या था! अपनी एक विशाल, क्रूर और हथियारों से लैस मुग़ल सेना लेकर अकबर ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी।
जब मुग़ल सेना किले के अंदर घुसी, तो मेवाड़ की वीरांगनाओं ने अपनी पवित्रता, अपने सतीत्व और हिंदू सम्मान को उन दरिंदों से बचाने के लिए ‘जौहर’ की धधकती आग में छलांग लगा दी।
देखते ही देखते हजारों क्षत्राणियां आग में भस्म हो गईं, लेकिन उन्होंने किसी तुर्क या मुग़ल का हाथ अपने शरीर पर नहीं पड़ने दिया। ये बलिदान सनातन धर्म की उस सर्वोच्च परंपरा का हिस्सा था जहाँ मुसलमानों की दासी बनने से हजार गुना बेहतर मौत को गले लगाना माना जाता है।
किले पर कब्जा करने के बाद अकबर ने अपने लगभग 30,000 निहत्थे हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार का फरमान सुना दिया। चित्तौड़ की धरती खून से लाल हो गई। 30,000 कटे हुए सिरों की मीनारें खड़ी की गईं ताकि पूरे राजपूताने में दहशत फैलाई जा सके।
महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक और मुगलों की गुलामी पर थूककर अकबर के अहंकार को पैरों तले रौंदना
चित्तौड़ छिन जाने के बाद मेवाड़ के हालात बेहद नाजुक हो चुके थे। 1572 में गोगुंदा की पहाड़ियों में जब महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ, तो उनके कंधों पर कांटों भरा ताज था।
चारों तरफ से मुगलों की घेराबंदी थी और राजपूताने के उनके अपने ही भाई-बंधु मुगलों के दरबार में सूबेदार बनकर बैठे थे। प्रताप के सामने सीधा सा रास्ता था- चाहते तो वो भी बाकी राजाओं की तरह दिल्ली जाकर अकबर के सामने माथा टेक देते, मोटी जागीरें लेते और राजमहल के मखमली गद्दों पर ऐश की जिंदगी गुजारते।
लेकिन प्रताप तो प्रताप थे! एक सूर्यवंशी हिंदू राजा किसी विदेशी इस्लामिकआक्रांता के आगे कैसे झुक सकता था? अकबर को लगा की शायद नया और युवा राणा है, डर कर समझौते के लिए मान जाएगा।
उसने एक-एक करके अपने चार बड़े दूत भेजे- सबसे पहले जलाल खान कोरची, फिर राजा मान सिंह, उसके बाद भगवान दास और आखिर में टोडरमल। इन सबने प्रताप को हर तरह का लालच दिया। डराया, धमकाया। समझाया की अकबर की फौज के आगे मेवाड़ चींटी के समान है, क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रहे हो।
पर महाराणा प्रताप ने इन चारों प्रस्तावों को जिस तरह से ठोकर मारी, उसने अकबर के अहंकार की धज्जियां उड़ा दीं। प्रताप ने साफ कर दिया की वो घास की रोटी खा लेंगे, जमीन पर सो लेंगे, लेकिन मुगलों के आगे कभी अपना मस्तक नहीं झुकाएंगे। प्रताप के इस अखंड स्वाभिमान ने अकबर को अंदर तक झकझोर दिया और फिर तय हो गया की अब रणभूमि में ही तलवारें फैसला करेंगी।
हल्दीघाटी का महासंग्राम जहाँ महाराणा प्रताप का भगवा देखकर थर-थर कांपने लगी थी अकबर की मुग़ल फौज
18 जून 1576… ये वो तारीख है जिसे भारतीय इतिहास में कभी मिटाया नहीं जा सकता। अरावली की पहाड़ियों के बीच एक तंग दर्रा है जिसे हल्दीघाटी कहते हैं। इसी हल्दीघाटी में भारतवर्ष का सबसे खूंखार और ऐतिहासिक महासंग्राम लड़ा गया। ये कोई दो राज्यों के बीच का आम युद्ध नहीं था। ये आज़ादी और गुलामी के बीच की जंग थी। ये हिन्दू धर्म और इस्लामिक अधर्म की लड़ाई थी।
एक तरफ थी अकबर की वो विशाल मुग़लिया फौज, जिसकी कमान उसी मान सिंह और आसफ खान के हाथों में थी। मुग़ल सेना में लगभग 10,000, जो तोपों, बंदूकों और आधुनिक हथियारों से पूरी तरह लैस थे।
और दूसरी तरफ थी हमारे महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना, जिसमें बमुश्किल 3,000 राजपूत वीर और अरावली के कुछ वनवासी भील योद्धा शामिल थे। सेना का ये असंतुलन देखकर किसी भी आम इंसान के पसीने छूट जाते।
लेकिन मेवाड़ के उन वीरों की रगों में पानी नहीं, शुद्ध राजपूती खून दौड़ रहा था। जैसे ही युद्ध का नगाड़ा बजा और महाराणा ने अपनी तलवार हवा में लहराई, ‘हर हर महादेव’ और ‘जय भवानी’ के गगनभेदी नारों से पूरी घाटी थर्रा उठी। राजपूतों और भीलों ने मुगलों पर ऐसा अचूक, खौफनाक और आत्मघाती प्रहार किया की मुग़ल सेना के परखच्चे उड़ गए।
अकबर का अपना दरबारी इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी, जो खुद उस जंग में मौजूद था, उसने अपनी किताब में लिखा है की राजपूतों का हमला इतना भयंकर था की मुग़ल सैनिकों की जान सूख गई। जिहादी फौज रणभूमि छोड़कर कई कोस दूर तक भाग गई थी और बदायूंनी को खुद अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा था।
जब महाराणा प्रताप ने मुग़ल सेनापति बहलोल खान और उसके घोड़े को एक ही प्रहार में काट डाला
महाराणा प्रताप का जिक्र हो और उनके उस ऐतिहासिक प्रहार की बात न हो जिसने पूरी मुग़लिया सल्तनत की रूह कंपा दी थी, ऐसा कैसे हो सकता है! हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान प्रताप का सामना अकबर के सबसे चहेते और खूंखार सेनापति बहलोल खान से हुआ था।
ये बहलोल खान कोई आम इंसान नहीं था। वो लगभग 9 फुट लंबा एक चलता-फिरता पहाड़ था। इतना क्रूर और ताकतवर कि लोग कहते थे की वो अपनी ताकत के नशे में दो हाथियों को आपस में भिड़ा देता था।
अकबर ने इस नरपिशाच बहलोल खान को खास तौर पर महाराणा प्रताप का सिर धड़ से अलग करने के लिए मेवाड़ भेजा था। बहलोल खान ने भी दिल्ली से चलते वक्त बड़े घमंड से कहा था की वो मेवाड़ के राजपूतों को चींटियों की तरह मसल देगा।
मैदान-ए-जंग में बहलोल खान सिर से पैर तक मजबूत लोहे के बख्तर (आर्मर) से ढका हुआ था। वो एक बहुत ऊंचे और तगड़े घोड़े पर सवार होकर प्रताप की तरफ झपटा। पर उसे क्या पता था की उसका पाला किसी इंसान से नहीं, साक्षात महाकाल से पड़ा है।
महाराणा प्रताप ने अपनी 72 किलो की चौड़ी छाती पर बख्तर पहन रखा था। उनके हाथों में वो मशहूर ‘खांडा’ (राजपूती तलवार) था जिसे उठाने भर में आम सैनिकों के पसीने छूट जाते थे।
प्रताप ने बहलोल खान को अपनी तरफ आते देखा, तो उन्होंने अपने घोड़े को उसकी तरफ मोड़ा। जैसे ही दोनों आमने-सामने आए, प्रताप ने ‘हर हर महादेव’ का सिंहनाद करते हुए हवा में उछलकर अपने खांडे से बहलोल खान के सिर पर एक ऐसा विध्वंसक और भयानक प्रहार किया की इतिहास हमेशा के लिए वहीं ठहर गया।
प्रताप की तलवार बहलोल खान के लोहे के मजबूत टोप (हेलमेट) को चीरती हुई, उसके खोपड़ी को फाड़ती हुई, उसके बख्तरबंद शरीर को दो हिस्सों में बांटती हुई सीधे उसके घोड़े के शरीर तक उतर गई।
एक ही झटके में, जी हां, सिर्फ एक प्रहार में प्रताप ने उस 9 फुट के दानव और उसके घोड़े को बीच से चीरकर दो हिस्सों में फाड़ दिया! खून का फव्वारा आसमान तक उछल पड़ा। बहलोल खान का आधा शरीर घोड़े की दाईं तरफ गिरा और आधा बाईं तरफ।
दिवेर का ऐतिहासिक युद्ध (1582)- महाराणा प्रताप का वो वार जिसने मुगलों की सामूहिक कब्र खोद दी
हल्दीघाटी अगर मुगलों के खिलाफ बिगुल था, तो दिवेर का युद्ध उनके लिए कयामत का दिन साबित हुआ। बात 1582 ई. की है। दशहरे का वो पवित्र दिन था। मेवाड़ के दिवेर में मुगलों का एक बहुत बड़ा और मजबूत सैन्य ठिकाना था, जिसे सीधे अकबर का चाचा सुल्तान खान संभाल रहा था।
दशहरे के उस दिन महाराणा प्रताप और उनके पुत्र कुंवर अमर सिंह ने अपनी फौज के साथ दिवेर की मुग़ल चौकी पर ऐसा तूफानी और प्रलयंकारी हमला किया की मुगलों को संभलने का एक मौका तक नहीं मिला। राजपूतों की तलवारें बिजली की तरह मुगलों के सिर काट रही थीं।
इसी युद्ध में कुंवर अमर सिंह ने अपने पिता के शौर्य की परछाई बनते हुए मुग़ल सेनापति सुल्तान खान पर अपने भाले से ऐसा खौफनाक वार किया की वो भाला सुल्तान खान के लोहे के बख्तर को चीरता हुआ, उसकी छाती के पार होता हुआ, उसके घोड़े के शरीर को बेधता हुआ सीधे जमीन में जाकर धंस गया।
सुल्तान खान वहीं घोड़े सहित जमीन में गड़ गया। ठीक उसी वक्त महाराणा प्रताप ने अपनी तलवार के एक ही झटके में एक और बड़े मुग़ल कमांडर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
दिवेर के मैदान में राजपूतों का ये विकराल और खून से नहाया हुआ रूप देखकर बची-खुची मुग़ल सेना के होश उड़ गए। वहां मौजूद 36,000 से ज्यादा मुग़ल सैनिकों की घिग्घी बंध गई। डर के मारे उन्होंने अपने हथियार फेंक दिए और गिड़गिड़ाते हुए महाराणा प्रताप की सेना के सामने घुटने टेक दिए।
ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध के भयंकर परिणाम को देखते हुए ही इसे “मेवाड़ का मैराथन” (Marathon of Mewar) कहा था। दिवेर की इस शर्मनाक और करारी हार ने मुग़लिया सल्तनत की नींव हिला दी। अकबर इतना हताश और खौफजदा हो गया की उसने इसके बाद मेवाड़ की तरफ आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं की।
यहाँ तक की वो अपना दरबार आगरा से उठाकर लाहौर भाग गया। महाराणा प्रताप ने साबित कर दिया था की राष्ट्रभक्ति की ताकत के आगे दुनिया के किसी भी क्रूर तानाशाह का घमंड चूर-चूर हो सकता है।
हिन्दू साम्राज्य की अखंड विजय और महाराणा प्रताप की अमर गाथा
अकबर ने अपनी पूरी जिंदगी में साम-दाम-दंड-भेद सब अपना लिया। बेहिसाब दौलत बांटी, छल-कपट किया, लाखों की फौज झोंक दी, पर वो महाराणा प्रताप के स्वाभिमान को एक इंच भी नहीं डिगा सका। प्रताप ने अपनी पूरी जिंदगी एक स्वतंत्र, अजेय और स्वाभिमानी हिंदू सम्राट के रूप में जी।
19 जनवरी 1597 को एक जंगली सूअर के शिकार के दौरान प्रताप के पेट में धनुष की प्रत्यंचा से गहरी चोट लग गई और 56 वर्ष की आयु में इस महान शूरवीर ने अपनी भौतिक देह त्याग दी। कहते हैं की जब आगरा के दरबार में अकबर को महाराणा प्रताप के देहांत की खबर मिली, तो उस क्रूर मुग़ल बादशाह की आंखों से भी आंसू छलक पड़े थे।
उसने भरे दरबार में अपनी पगड़ी उतारकर यह बात मानी थी की, “इस पूरी दुनिया में प्रताप ही इकलौता ऐसा राजा था जिसने मेरे आगे अपना सिर नहीं झुकाया। वो जीत गया और मैं हार गया।”
अब सोचिए जरा, जिसकी मौत पर उसका सबसे बड़ा और कट्टर दुश्मन भी फूट-फूट कर रोया हो, वो योद्धा किस मिट्टी का बना होगा!
जयंती के इस मौके पर हमें विदेशी और क्रूर इस्लामिक आक्रांताओं की झूठी महानता के चंगुल से बाहर निकलकर अपने असली नायकों को पूजना होगा। आज महाराणा प्रताप जयंती पर हमारा सबसे बड़ा सम्मान और सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी की हम अपनी मातृभूमि और अपने धर्म की रक्षा के लिए उसी धधकते हुए संकल्प को अपने हृदय में उतारें, जो प्रताप ने हल्दीघाटी की लाल मिट्टी पर लिया था।
