आज पूरी दुनिया उस अजेय सनातन धर्म की विजय गाथा गा रही है, जिसे मिटाने के लिए दुनिया भर के क्रूर और वहशी इस्लामिक दरिंदों ने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया था। आज 11 मई 2026 को हमारे सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा के पूरे 75 साल पूरे हो गए हैं।
‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ का यह जश्न केवल एक मंदिर के खड़े होने का जश्न नहीं है मेरे दोस्त, ये हिंदू धर्म की उस महाविजय का शंखनाद है जिसने जेहादियों की खून से सनी तलवारों और आज़ाद भारत में पनपी उस दीमक जैसी सेक्युलर राजनीति, दोनों को ही उनकी औकात याद दिला दी।
ज़रा सोचिए उस दौर को! सदियों तक विदेशी इस्लामिक लुटेरे, जेहादी और खून के प्यासे मुसलमान इस पवित्र ज़मीन को अपने अत्याचारों से लहुलुहान करते रहे। उनकी नंगी तलवारें हमारे आराध्य का अपमान करती रहीं, हमारे हिन्दू पूर्वजों का खून पानी की तरह बहाती रहीं। उन्हें लगता था की मंदिर तोड़ देंगे तो हिंदू खत्म हो जाएगा।
लेकिन वो मूर्ख ये भूल गए थे की सोमनाथ केवल ईंट, पत्थर या सोने-चांदी का ढेर नहीं है। सोमनाथ तो करोड़ों हिंदुओं की आत्मा का वो धधकता हुआ केंद्र है जिसे कोई भी इस्लामी आक्रांता अपनी तलवार से काट नहीं सकता था।
आज जब हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में इस स्वाभिमान पर्व को मना रहे हैं, तो दरअसल हम उस 1000 साल के लंबे और खूनी संघर्ष को याद कर रहे हैं, जहाँ आखिर में जीत किसी इस्लामिक बर्बरता की नहीं, बल्कि सत्य और हमारे सनातन की हुई है।
सोमनाथ का वो हिन्दू वैभव जो इन जिहादी लुटेरों की आँखों में खटकता था
बात अगर सोमनाथ के इतिहास की करें, तो हमारी आध्यात्मिक चेतना में इसका स्थान अद्वितीय है। शिव पुराण उठा लीजिए या स्कंद पुराण, हर जगह इस बात का साफ ज़िक्र है की यह ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला है।
कहते हैं यहीं पर चंद्रदेव ने अपनी कठोर तपस्या से भगवान आशुतोष को प्रसन्न किया था और अपने श्राप से मुक्ति पाई थी। प्राचीन काल में यह कोई आम मंदिर नहीं था।
इतिहास की किताबें बताती हैं की इस मंदिर के खंभे ठोस सोने और चांदी से मढ़े हुए थे। गर्भगृह के अंदर ऐसे-ऐसे बहुमूल्य रत्न जड़े थे की रात के अंधेरे में भी वहां सूरज जैसी रोशनी जगमगाती रहती थी। देश के कोने-कोने से राजा-महाराजा, व्यापारी और आम शिवभक्त अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा महादेव के चरणों में आकर अर्पित करते थे।
रोज़ाना हज़ारों ब्राह्मण दिन-रात वेदमंत्रों का पाठ करते थे। लेकिन… हमारी यही अथाह संपदा, हमारी यह शांति और सनातन धर्म की सहिष्णुता मध्यकालीन युग के उन बर्बर, असभ्य और जंगली जिहादी लुटेरों की आँखों में बुरी तरह चुभने लगी।
उनकी पूरी की पूरी विचारधारा ही दूसरे धर्मों को नष्ट करने, लूटमार करने और रक्तपात पर टिकी थी। और यहीं से शुरू होता है हमारे सोमनाथ का वो काला अध्याय।
महमूद गजनवी का खूनी जिहाद और सोमनाथ में 50 हज़ार निर्दोष हिन्दुओं का वो दर्दनाक नरसंहार
वामपंथी इतिहासकार चाहे लाख कोशिश कर लें इस सच्चाई को छुपाने की, लेकिन सोमनाथ का इतिहास इस्लामी जेहाद के उस घिनोने चेहरे का सबसे बड़ा और जीता-जागता सबूत है। 11वीं सदी से लेकर 18वीं सदी तक इन इस्लामिक हमलावरों ने सोमनाथ पर एक-दो बार नहीं, बल्कि अनगिनत बार भीषण हमले किए।
और आपको क्या लगता है की ये हमले सिर्फ सोना-चांदी लूटने के लिए हुए थे? बिल्कुल नहीं! उनका असली मकसद तो मूर्तिपूजा को जड़ से खत्म करना और काफिरों (यानी हम हिंदुओं) के मनोबल को हमेशा के लिए कुचल देना था।
जनवरी 1026… भारतीय इतिहास का वो सबसे काला और मनहूस दिन, जिसे याद करके आज भी किसी भी सच्चे हिंदू का खून खौल उठता है।
एक दरिंदा, महमूद गजनवी, एक विशाल और खूंखार सेना लेकर थार के रेगिस्तान को पार करता हुआ सोमनाथ के दरवाज़े पर आ धमका।
उसकी नीयत में सिर्फ लूट नहीं थी, उसकी आंखों में हमारे धर्म को मिटाने की सनक थी। यह हमला इंसानियत के नाम पर एक ऐसा बदनुमा दाग था जिसे कोई मिटा नहीं सकता।
गजनवी के ही पाले हुए समकालीन इस्लामी इतिहासकारों ने अपनी किताबों में बड़ी बेशर्मी और गर्व के साथ लिखा है की कैसे इस रक्तपिपासु सुल्तान ने मंदिर की रक्षा कर रहे 50,000 से भी ज़्यादा निहत्थे हिंदू श्रद्धालुओं, ब्राह्मणों, पुजारियों और आसपास के निवासियों का गाजर-मूली की तरह कत्लेआम किया।
सोचिए ज़रा उस मंज़र को! मंदिर के पवित्र प्रांगण में शिवभक्तों के खून की नदियां बह निकली थीं। लाशों के अंबार लग गए थे।
लेकिन इस शैतान का वहशीपन यहीं नहीं रुका। खून से सने अपने हाथों से उसने भगवान सोमनाथ के पवित्र ज्योतिर्लिंग पर हथौड़े चलाए। उसे खंडित किया।
और उसकी नीचता तो देखिए, मूर्तियों के उन पवित्र टुकड़ों को वो अपने साथ गजनी ले गया ताकि उन्हें वहां की मस्जिदों की सीढ़ियों में चुनवा सके। क्यों? ताकि वहां के लोग हमारे भगवान को अपने पैरों तले रौंद कर चलें!
मंदिर की अथाह संपत्ति तो उसने लूटी ही, लेकिन साथ ही हज़ारों हिंदू महिलाओं, बहू-बेटियों और छोटे-छोटे बच्चों को जंजीरों में जकड़ कर गजनी के गुलाम बाज़ारों में ले जाकर मवेशियों की तरह बेच दिया। रोते-रोते सूख चुकी उन औरतों की चीखें आज भी इतिहास के पन्नों में दबी पड़ी हैं, जिन्हें हमारे आज के सेक्युलर नेता सुनना नहीं चाहते।
खिलजी से लेकर औरंगज़ेब तक हर इस्लामिक आक्रांता ने सोमनाथ में अपनी जिहादी भड़ास निकाली
गजनवी के जाने के बाद भी यह बर्बरता रुकी नहीं। 1299 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत का वो क्रूर और अय्याश शासक अलाउद्दीन खिलजी… उसके सेनापतियों-उलुग खान और नुसरत खान- ने गुजरात पर धावा बोल दिया और एक बार फिर उठ खड़े हुए सोमनाथ को मलबे में तब्दील कर दिया।
इसके बाद 1395 ईस्वी का वो साल जब गुजरात सल्तनत के मुजफ्फर शाह ने मंदिर को नष्ट किया और हिंदुओं को और ज़्यादा ज़लील करने के लिए, हमारे उसी पवित्र स्थान पर एक मस्जिद तान दी। 1451 में महमूद बेगड़ा नाम का एक और जिहादी आया, उसने भी धर्म के नाम पर इस मंदिर को अपवित्र करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
लेकिन क्रूरता की सारी हदें तो मुगल काल में पार हुईं, और वो भी उस औरंगजेब के राज में जिससे आज के कई बुद्धिजीवी बेइंतहा मोहब्बत करते हैं।
हिंदू धर्म से नफरत करने वाले इस धर्मांध औरंगजेब ने 1665 ईस्वी में एक बकायदा फरमान जारी किया। फरमान क्या था? की सोमनाथ मंदिर को इस तरह से ज़मीनदोज़ कर दिया जाए की इसकी एक ईंट भी दूसरी ईंट पर न बचे, ताकि इसे दोबारा कभी न बनाया जा सके।
जब इस जालिम को अपने जासूसों से पता चला की खंडहरों के बीच भी हिंदू छुप-छुप कर अपने महादेव की पूजा कर रहे हैं, तो उसने 1706 में फिर से अपनी मुग़ल सेना भेजकर बचे-खुचे मंदिर के अवशेषों को भी पूरी तरह से नेस्तनाबूद करने का आदेश दे दिया।
इन आक्रांताओं ने मंदिर तोड़े, तलवार की नोंक पर हिंदुओं का धर्मांतरण करवाया और हमारी संस्कृति को जड़ से उखाड़ फेंकने का हर नीच से नीच हथकंडा अपनाया।
हम भी हिंदू थे, गर्दन कटवा ली, लेकिन हर बार सोमनाथ मंदिर को वापस बनाया
वामपंथी और दरबारी इतिहासकार हमेशा से एक एजेंडा चलाते आए हैं। उनकी किताबें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हिंदू तो बस पिटने के लिए ही पैदा हुए थे। लेकिन सोमनाथ का असली इतिहास हिंदुओं की कायरता का नहीं, बल्कि उनके अदम्य साहस और उस सर्वोच्च बलिदान का धधकता हुआ अंगार है, जिसे कोई बुझा नहीं पाया।
जब-जब इन विदेशी जिहादी लुटेरों ने मंदिर पर हमला किया, तब-तब हमारे लोगों ने कायरों की तरह हथियार नहीं डाले। उन्होंने सीना तानकर मौत का सामना किया और अपनी आस्था को आंच नहीं आने दी।
गजनवी वाला हमला ही ले लीजिए। जनवरी 1026 में जब उसकी खूंखार सेना मंदिर के द्वार पर खड़ी थी, तो आपको क्या लगता है हमारे लोग वहां से भाग गए थे? जी नहीं! 6, 7, और 8 जनवरी- लगातार तीन दिनों तक वहां भीषण युद्ध चला।
स्थानीय राजपूत योद्धा, मंदिर के पुजारी और आसपास के गांव-गांव से आए निहत्थे शिव भक्तों ने मंदिर के दरवाज़े पर इंसानी दीवार खड़ी कर दी थी।
उनके पास गजनवी की तरह अरबी घोड़े और घातक हथियार नहीं थे, लेकिन उनके सीने में जो सनातन के लिए मर मिटने की आग थी ना, उसने आक्रांताओं के छक्के छुड़ा दिए थे। पचास हज़ार से ज़्यादा हिंदुओं ने हंसते-हंसते अपना शीश कटवा लिया, लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ा।
और सबसे बड़ी बात, जिससे इन जेहादियों की रूह भी कांपती होगी, वो ये है की मुस्लिम आक्रांताओं ने जितनी बार मंदिर को तोड़ा, हमारे राजाओं ने उतनी ही बार उसे और भी ज़्यादा भव्यता के साथ खड़ा कर दिया! गजनवी के हमले के तुरंत बाद ही मालवा के राजा भोज और गुजरात के राजा भीमदेव प्रथम ने इसे वापस बनवा दिया।
खिलजी के हमले के बाद चुडासमा राजा महिपाल ने इसे फिर से खड़ा कर दिया। यही तो है सनातन की असली ताकत! राख के ढेर से भी उठकर आसमान को छू लेने का ज़ज्बा।
वो ईंट-पत्थर तो तोड़ सकते थे, मूर्तियां खंडित कर सकते थे, लेकिन वो हमारे पूर्वजों की उस असीम आस्था को कैसे तोड़ते जो उनके खून के कण-कण में रची-बसी थी?
सरदार पटेल की हुंकार जिसने सोमनाथ से इस्लामिक जिहाद का कलंक हमेशा के लिए धो डाला
खैर, औरंगजेब के उस आखिरी और भयानक हमले के बाद लगभग ढाई सौ सालों तक सोमनाथ का वो पावन प्रांगण बिल्कुल वीरान और खंडहर अवस्था में पड़ा रहा। वो टूटे हुए पत्थर, वो बिखरी हुई मूर्तियां… वहां से गुज़रने वाले हर हिन्दू को हमारी गुलामी, हमारे अपमान और हमारी बेबसी का ताना मारती थीं।
1947 में जब देश आज़ाद हुआ, तब भी स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं थी। सोमनाथ का यह इलाका जूनागढ़ रियासत के अधीन आता था। और वहां का नवाब कौन था? एक मुस्लिम शासक, जो पाकिस्तान के साथ मिलने के ख्वाब देख रहा था। ज़रा सोचिए, हमारा सबसे पवित्र ज्योतिर्लिंग और उसे लेकर पाकिस्तान जाने की तैयारी!
लेकिन भारत के लौह पुरुष, सरदार वल्लभभाई पटेल के ज़िंदा रहते यह सब कैसे हो सकता था? सरदार पटेल ने बिना एक पल की देरी किए वहां सेना भेज दी। जूनागढ़ को रातों-रात मुक्त करा लिया और जिन्ना और नवाब के नापाक मंसूबों को मिट्टी में मिला दिया।
12 नवंबर 1947 का दिन! यह भारतीय इतिहास के उन चंद सबसे भावुक और गौरवशाली पलों में से एक है जिसे हर हिंदू को याद रखना चाहिए। उस दिन सरदार पटेल, एन.वी. गाडगिल और के.एम. मुंशी जी के साथ सोमनाथ के उन खंडहरों का जायज़ा लेने पहुंचे थे।
कहते हैं की उन टूटे हुए पत्थरों और खंडहरों की वो बदहाली देखकर लौह पुरुष सरदार पटेल का सीना भी दर्द से भर गया था। वे भावुक हो गए थे।
उसी पल, उन्होंने अरब सागर के तट पर जाकर अंजलि में समुद्र का खारा पानी भरा और एक ऐतिहासिक संकल्प लिया। उन्होंने हुंकार भरते हुए कहा की आज़ाद भारत में सोमनाथ का यह अपमान अब एक दिन भी और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हम यहीं, इसी ज़मीन पर, भगवान सोमनाथ का एक भव्य मंदिर बनाएंगे।
सरदार पटेल कोई साधारण राजनेता नहीं थे। वो बहुत अच्छी तरह समझते थे की यह कोई मामूली मंदिर निर्माण का प्रोजेक्ट नहीं है। यह तो हज़ारों सालों से कुचले गए हमारे ‘हिंदू स्वाभिमान’ की पुनर्स्थापना थी।
यह गुलामी के उस भद्दे कलंक को हमेशा-हमेशा के लिए धोने का महायज्ञ था, जो गजनवी से लेकर औरंगजेब तक ने भारत माता के माथे पर लगाया था।
पटेल का विज़न साफ था- जब तक सोमनाथ अपने पुराने वैभव को वापस नहीं पा लेता, तब तक इस देश की आज़ादी सांस्कृतिक रूप से बिल्कुल अधूरी है।
हिन्दू आस्था से नफरत करने वाले नेहरू ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए सोमनाथ का रास्ता रोका था
अब आप सोच रहे होंगे की सरदार पटेल के इस राष्ट्रवादी फैसले पर तो पूरे देश को खुशी मनानी चाहिए थी। मनाई भी, लेकिन हमारे अपने ही घर में एक शख्स ऐसा था जिसे यह सब बिल्कुल रास नहीं आ रहा था। जी हां, मैं बात कर रहा हूँ स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की।
विडंबना देखिए! यहीं से शुरू होता है आज़ाद भारत में ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ और हिंदू-विरोध का वो काला अध्याय, जिसकी भारी कीमत यह देश आज तक चुका रहा है।
नेहरू जी खुद को एक ‘एक्सीडेंटल हिंदू’ (दुर्घटना वश हिंदू) कहते थे। उन्हें भारत की मिट्टी, हमारी संस्कृति और हमारी परंपराओं से कोई खास लगाव नहीं था। ‘सेक्युलरिज्म’ का चश्मा उन्होंने ऐसा पहना हुआ था की उन्हें बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था से ही चिढ़ होने लगी थी।
उन्हें सोमनाथ का यह पुनर्निर्माण अपनी उस नकली और धर्मनिरपेक्ष छवि के लिए सबसे बड़ा खतरा लग रहा था। 1950 में जब सरदार पटेल का निधन हो गया, तो नेहरू जी को जैसे खुली छूट मिल गई। उन्होंने मंदिर निर्माण के इस पवित्र काम में रोड़े अटकाने शुरू कर दिए।
1951 की शुरुआत में कैबिनेट की एक मीटिंग हुई थी। उस मीटिंग का वाकया इतिहास के पन्नों में दर्ज है और उसे पढ़कर आज भी गुस्सा आता है।
मीटिंग में नेहरू जी ने कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) को बुलाया और उन पर बुरी तरह झल्लाते हुए कहा, “मुझे तुम्हारा सोमनाथ को पुनर्स्थापित करने का ये प्रयास बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा है। यह सीधे-सीधे हिंदू पुनरुत्थानवाद (Hindu Revivalism) है।”
अरे भाई ज़रा सोचिए इस बात को! जिस देश के टुकड़े-टुकड़े ही धर्म के आधार पर कर दिए गए हों, जहां मुसलमानों की मांग पर उन्हें एक अलग इस्लामिक मुल्क (पाकिस्तान) बकायदा तश्तरी में सजाकर दे दिया गया हो… उसी बचे हुए हिंदुस्तान में, बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने सबसे बड़े और सबसे पवित्र मंदिर को बनाने के लिए अपने ही देश के प्रधानमंत्री से ताने सुनने पड़ रहे थे?
‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का डर दिखाया जा रहा था? सच तो यह है की नेहरू की तुष्टिकरण की राजनीति उस वक्त चरम पर थी। वे नहीं चाहते थे की सोमनाथ बने, क्योंकि उन्हें डर था की इससे भारत के उन मुसलमानों की भावनाएं आहत हो जाएंगी जो पाकिस्तान न जाकर यहीं रुक गए थे। अब इसे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का सबसे नंगा और घिनौना रूप नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे?
और बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी। 22 अप्रैल 1951 को नेहरू ने सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को एक लंबा-चौड़ा खत लिख डाला। उसमें उन्होंने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह को “सरकारी स्तर पर किया जा रहा एक अनुचित कार्य” बता दिया।
उस समय मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए दुनिया भर के महासागरों और पवित्र नदियों से जल मंगवाने का काम चल रहा था, जिसमें विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास भी थोड़ी बहुत मदद कर रहे थे। नेहरू ने इसका भी कड़ा विरोध किया! उन्होंने इसे कूटनीतिक प्रोटोकॉल का उल्लंघन बता दिया।
नेहरू जी की मानसिकता बिल्कुल शीशे की तरह साफ थी। वो भारत को उसकी सनातन जड़ों से पूरी तरह काटकर, पश्चिमी सांचे में ढला एक ऐसा खोखला और आत्मा-विहीन देश बनाना चाहते थे, जहां बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था की दो कौड़ी की भी कीमत न हो।
मुंशी जी और राजेंद्र बाबू ने नेहरू के एजेंडे को लात मारकर दिखा दी सेकुलरों को उनकी औकात
लेकिन नेहरू जी एक बहुत बड़ी भूल कर बैठे थे। वो भूल गए थे की यह भारत भूमि है, यह हमेशा से धर्म रक्षकों और शूरवीरों की जन्मस्थली रही है। उनके इस भारी दबाव और हिंदू-विरोधी फरमानों के आगे हमारे राष्ट्रवादी नेताओं ने घुटने टेकने से साफ इंकार कर दिया।
के.एम. मुंशी, जो उस वक्त की सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री थे, उन्होंने नेहरू के उस ताने का जो मुंहतोड़ जवाब दिया, वो आज भी हम जैसे हर राष्ट्रवादी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
24 अप्रैल 1951 को मुंशी जी ने नेहरू को एक बेहद साहसिक, कड़क और ऐतिहासिक पत्र लिखा।
उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे शब्दों में लिख दिया, “कल कैबिनेट में आपने जिस तरह से मुझे टोका, उससे मैं बहुत आहत हूँ। मैं अपने अतीत से ही शक्ति लेता हूँ… यदि हम अपने देश की जड़ों और अपनी संस्कृति से ही कट गए, तो यह आज़ादी हमारे किसी काम की नहीं रहेगी।”
मुंशी जी ने आगे लिखा की “हिंदू समाज के एकीकरण और उसकी सदियों पुरानी आस्थाओं का सम्मान किए बिना भारत कभी भी एक मज़बूत राष्ट्र नहीं बन सकता।”
मुंशी जी ने नेहरू को आईना दिखाते हुए ये भी बता दिया की सोमनाथ कोई सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं है, यह भारत की सामूहिक चेतना का वो प्रकटीकरण है जिसे दबाया नहीं जा सकता।
जब मुंशी जी से दाल नहीं गली, तो नेहरू ने अपना रुख भारत के प्रथम राष्ट्रपति की तरफ कर लिया। महान स्वतंत्रता सेनानी और दिल से एक सच्चे सनातनी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद को जब सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा में मुख्य अतिथि के तौर पर न्यौता मिला, तो नेहरू जी अंदर ही अंदर घबरा गए।
उन्होंने तुरंत राष्ट्रपति महोदय को एक पत्र लिख मारा और साफ-साफ ‘निर्देश’ देने की कोशिश की कि वे इस ‘धार्मिक कृत्य’ में भूलकर भी शामिल न हों। नेहरू का तर्क था की एक ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र’ के प्रमुख को ऐसे आयोजनों से दूर रहना चाहिए।
लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद कोई कच्ची गोलियां खेलकर नहीं आए थे। वो एक दृढ़ निश्चयी और अपनी मिट्टी से जुड़े हुए नेता थे। उन्होंने नेहरू की उस खोखली और नकली धर्मनिरपेक्षता को किनारे करते हुए दो टूक जवाब दे दिया।
डॉ. प्रसाद ने कहा, “मुझे अपने धर्म पर उतना ही गर्व है जितना की किसी अन्य भारतीय को अपने धर्म पर होता है। मेरा सोमनाथ जाना कहीं से भी भारत की धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ नहीं है।” उन्होंने साफ कर दिया की वो तो जाएंगे ही।
11 मई 1951 का वो ऐतिहासिक दिन आ ही गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उसी शान और भव्यता के साथ सोमनाथ के नए मंदिर का उद्घाटन किया और शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की, जिसका सपना सरदार पटेल ने देखा था।
उस दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जो भाषण दिया था ना, उसने वामपंथियों और मुस्लिम तुष्टिकरण के पैरोकारों की नींदें उड़ा कर रख दी थीं। उन्होंने गर्जते हुए कहा था:
“सोमनाथ का यह मंदिर आज दुनिया को यह उद्घोष कर रहा है की असीम आस्था को दुनिया की कोई भी विनाशकारी शक्ति कभी नहीं मिटा सकती, चाहे उसके पास कितने ही आधुनिक हथियार या कितनी ही बड़ी सेना क्यों न हो। विनाश की शक्तियों से सृजन की शक्ति हमेशा बहुत बड़ी होती है!”
अब आप नेहरू सरकार की बौखलाहट और हिंदू-विरोध का स्तर देखिए। उस समय देश का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, जिसके तहत ऑल इंडिया रेडियो (AIR) आता था, उसने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के इस ऐतिहासिक भाषण को रेडियो पर प्रसारित होने से ही रोक दिया! जी हाँ, इसे ‘ब्लैकआउट’ कर दिया गया। सेंसरशिप लगा दी गई। क्यों?
ताकि देश की भोली-भाली जनता अपने ही राष्ट्रपति के मुख से सनातन धर्म की विजय की यह ओजस्वी गाथा न सुन सके। यही था उस नेहरूवादी लोकतंत्र का असली, घिनौना और हिन्दू-विरोधी चेहरा।
मोदी राज में सोमनाथ का भव्य अमृत महोत्सव तमाम इस्लामिक लुटेरों की कब्र पर करारा तमाचा है
खैर, वो एक दौर था और आज का एक दौर है। आज जब हम 11 मई 2026 को इस पुनर्निर्माण के 75 गौरवशाली साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं, ये नेहरू और तमाम मुस्लिम आक्रांताओं के मुँह पे करारा तमाचा है।
जो सपना, जो महायज्ञ लौह पुरुष सरदार पटेल ने 1947 में शुरू किया था और जिसे डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1951 में आकार दिया था… आज उसी ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ की मशाल को भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी पूरी ताकत से आगे बढ़ा रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी, जो खुद श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं, उनके ही नेतृत्व में सोमनाथ का जो आज भव्य और दिव्य कायाकल्प हुआ है, वो हज़ारों साल की उस मानसिक इस्लामिक गुलामी से हमारी मुक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है।
एक वक्त था जब महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब जैसे खूंखार इस्लामिक आक्रांताओं को ये भ्रम हो गया था की वे अपनी तलवारों की धार और जेहाद के दम पर इस पवित्र भारत भूमि से हिंदू धर्म का नामोनिशान मिटा देंगे।
आज देख लीजिए, क्या हुआ उनका? उनकी तलवारों में जंग लग गई, वे टूट गईं। उनके बनाए हुए विशाल साम्राज्य धूल में मिल गए। आज उनकी कब्रों पर कोई दो बूंद आंसू बहाने वाला या एक दीया जलाने वाला तक नहीं बचा है।
फिर वो समय भी आया जब आज़ाद भारत में अंग्रेज़ों ने सत्ता की चाबी संभाली। उन्होंने अपनी किताबों के ज़रिए, सनातन संस्कृति को नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास किया। लेकिन आज देख लीजिए, उनके वो किले भी ढह चुके हैं।
लेकिन इन सबके बीच, महाकाल का वो दिव्य और भव्य सोमनाथ मंदिर आज भी उसी अरब सागर के तट पर पूरी गरिमा और अजेय शक्ति के साथ सीना ताने खड़ा है।
मंदिर के ऊंचे शिखर पर लहराता हुआ वो भगवा ध्वज पूरी दुनिया को चीख-चीख कर यह प्रमाण देता है की जो कौम अपने इतिहास, अपने देवी-देवताओं और अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जानती है, उसे दुनिया की कोई भी जेहादी ताकत, कोई भी बर्बर इस्लामिक आक्रांता या तुष्टिकरण की कोई भी ओछी राजनीति कभी नहीं मिटा सकती।
सोमनाथ हमारे लिए सिर्फ एक तीर्थ नहीं है। ये हम हिंदुओं की सहनशीलता की परीक्षा का अंत है। यह हमारी उस विजय का शाश्वत है जिसने मौत को भी हरा दिया। ये हमें बार-बार याद दिलाता है की दुनिया में विनाश करने वालों से, निर्माण करने वाले हमेशा बहुत बड़े और श्रेष्ठ होते हैं।
जब तक इस भारत भूमि पर एक भी सच्चा सनातनी ज़िंदा है, तब तक सोमनाथ के प्रांगण में बजने वाली घंटियों की गूंज और ‘हर-हर महादेव’ का वो सिंहनाद पूरी दुनिया में गूंजता रहेगा.. दम है तो कोई रोक के दिखाए!
जय सोमनाथ! जय हिंद! वंदे मातरम!
