सच कहूं तो भारतीय राजनीति के इतिहास में हमने सत्ता के दलालों को रोज़ अपना ईमान बेचते देखा है। हमने भ्रष्टाचार देखा है, घोटाले देखे हैं, कुर्सी के लिए नेताओं को गिरगिट की तरह रंग बदलते देखा है। लेकिन 12 मई को तमिलनाडु की विधानसभा में जो कुछ भी हुआ, उसने देश के करोड़ों सनातनियों के रोम-रोम में आग लगा दी है।
अब ज़रा सोचिए, नई-नई विधानसभा चुनी गई है। जनता ने वोट देकर, लंबी-लंबी लाइनों में लगकर एक नई सरकार को चुना है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं तमिल सिनेमा के ‘थलपति’, यानी अभिनेता ‘जोसेफ विजय’, जिनकी नई पार्टी ‘TVK’ ने अभी-अभी सत्ता का स्वाद चखा है। और ठीक सामने विपक्ष के नेता की कुर्सी पर विराजमान है हिन्दू-घृणा का सबसे बड़ा प्रतीक, DMK का उदयनिधि स्टालिन।
होना तो ये चाहिए था की राज्य की तरक्की, पानी, बिजली, या रोज़गार पर बात होती। लेकिन नहीं! उदयनिधि स्टालिन अपने उसी सड़े हुए और ज़हरीले हिन्दू-विरोधी अहंकार के साथ अपने पैरों पर खड़ा होता है और बिना किसी खौफ के, पूरी ढिठाई से उसी विधानसभा में सनातन हिन्दू धर्म को जड़ से उखाड़ फेंकने का फरमान सुना देता है।
उसने बिल्कुल साफ-साफ तमिल में ज़हर उगला- “मक्कलै पिरिक्कुम सनातनम निच्छयम ओझिक्क वेंडुम” (यानी: लोगों को बांटने वाले इस सनातन धर्म को तो पक्का खत्म ही कर देना चाहिए)।
और ये कोई पहली बार तो है नहीं! 2023 में भी इसी नीच आदमी ने सनातन की तुलना ‘डेंगू, मलेरिया और कोरोना’ से की थी। तब भी पूरा देश उबला था, लेकिन इन हिन्दू-द्रोहियों की चमड़ी इतनी मोटी हो चुकी है की इन्हें हमारे सब्र और हमारी शराफत से रत्ती भर भी खौफ नहीं आता।
खैर, स्टालिन परिवार से तो हिंदुओं को वैसे भी कोई उम्मीद नहीं है। उनकी तो पूरी पॉलिटिक्स ही इसी हिंदू-विरोध की भट्टी में पकती है। लेकिन इस पूरी घटना में सबसे ज़्यादा खून खौलाने वाला सीन तो कुछ और ही था।
जब उदयनिधि स्टालिन ये ज़हर उगल रहा था, तब राज्य के नए-नवेले मुख्यमंत्री जोसेफ विजय वहां क्या कर रहे थे? वो मुस्कुरा कर स्टालिन के दिए हुए भाषण पर हाथ जोड़ के स्टालिन का अभिनंदन कर रहे थे!
हैरानी होती है ये देखकर की एक मुख्यमंत्री, जिसने अभी-अभी संविधान की शपथ ली है, उसके सामने होते हुए हिन्दू धर्म के अपमान पे वो हाथ जोड़ रहा है!
विजय का वो हाथ जोड़ना, वो खामोशी, कोई शिष्टाचार नहीं था। वो सीधा-सीधा बहुसंख्यक हिन्दू समाज की पीठ में छुरा घोंपना था।
अपनी फिल्मों में हीरो बनकर गुंडों को पीटने वाला ये दो कौड़ी का ‘थलपति’, असल ज़िंदगी में वामपंथी और द्रविड़ियन नैरेटिव के सामने घुटनों के बल रेंगने वाला कीड़ा है।
विजय का वो मौन इस बात का सबूत है की सत्ता के लालच में ये नेता हिंदू धर्म को लात मारना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ बैठे हैं।
‘द्रविड़ मॉडल’ का पर्दाफाश- पेरियार से लेकर स्टालिन और अब विजय, सिर्फ हिन्दू नफरत पर टिकी इनकी सियासत
आखिर तमिलनाडु में ये ज़हरीली पॉलिटिक्स शुरू कहां से हुई? ये समझना बहुत ज़रूरी है। ये कोई आज या कल की बात नहीं है। उदयनिधि स्टालिन जो कुछ भी कह रहे हैं, वो उसी ‘द्रविड़ आंदोलन’ का अपडेटेड वर्ज़न है जिसकी पूरी की पूरी बुनियाद ही नफरत, हिंदू-विरोध और ब्राह्मण-विरोध पर रखी गई थी।
ये सारी बीमारी ई.वी. रामासामी से शुरू हुई थी, जिसे आज ये पार्टियां ‘पेरियार’ कहकर पूजती हैं। ये वही पेरियार था जिसने सरेआम चौराहे पर भगवान श्री राम की मूर्तियों को जूतों की माला पहनाई थी। जिसने गणेश जी की मूर्तियां तोड़ी थीं।
हिंदू देवी-देवताओं के लिए पेरियार ने ऐसी-ऐसी भद्दी और अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया था की कोई आम सच्चा सुन भी ले तो उसी समय पेरियार के दो टुकड़े कर दे। लेकिन आज स्टालिन और विजय उसी पेरियार की गंदी विरासत को अपने कंधों पर ढो रहे हैं।
इस पूरे ‘द्रविड़ मॉडल’ का सबसे बड़ा फ्रॉड है ‘आर्यन-द्रविड़ थ्योरी’। 19वीं सदी में रॉबर्ट काल्डवेल (Robert Caldwell) नाम का एक चालाक ब्रिटिश ईसाई मिशनरी भारत आया। उसने देखा की हिंदुओं को आपस में लड़ाए बिना यहां ईसाईयत फैलाना नामुमकिन है।
तो उसने ये झूठी थ्योरी गढ़ दी की उत्तर भारतीय आर्य हैं (जो बाहर से आए) और दक्षिण भारतीय द्रविड़ हैं (जो मूल निवासी हैं)। बस! अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की इसी थ्योरी को जस्टिस पार्टी से लेकर DMK तक ने लपक लिया और अब जोसेफ विजय की TVK भी इसी राह पर चल पड़ी है।
इनकी पूरी की पूरी राजनीति बस इसी बात पर टिकी है- हिंदू समाज को छोटी-छोटी जातियों में बांटो, उन्हें आपस में लड़ाओ, उनके मन में ब्राह्मणों और उत्तर भारतीयों के खिलाफ ज़हर भरो, और दूसरी तरफ मुसलमानों और ईसाइयों का एकमुश्त वोट लेकर मलाई खाओ।
यही है इनका असली ‘द्रविड़ मॉडल’। खुद को ये ‘सामाजिक न्याय’ का मसीहा बताते हैं, लेकिन सच कहूं तो इनसे बड़ा परिवारवादी, करप्ट और कुर्सी का लालची कोई नहीं है। स्टालिन का परिवार पीढ़ियों से तमिलनाडु की सत्ता पर कुंडली मारे बैठा है। और अब फिल्मों में हीरो की एक्टिंग करने वाले विजय भी इसी गंदी नाली में उतर आए हैं।
सनातन को सॉफ्ट टारगेट बनाकर गालियां देना इन स्टालिन जैसे वामपंथियों का गंदा धंधा बन चुका है
ये सब देखकर अक्सर मन में एक सवाल उठता है की आखिर ये लोग इतनी आसानी से हिंदू धर्म को गालियां कैसे दे जाते हैं? इसका सीधा सा जवाब है- इन्होंने सनातन को एक ‘सॉफ्ट टारगेट’ बना लिया है।
आज के इस ढोंगी सेक्युलर भारत में, अगर आपको रातों-रात ‘इंटेलेक्चुअल’ या ‘प्रोग्रेसिव’ बनना है, तो बस एक काम कर लो- सनातन को गालियां देना शुरू कर दो।
वामपंथियों ने बरसों की मेहनत से एक ऐसा ज़हरीला इकोसिस्टम तैयार कर लिया है, जहां हिंदू धर्म पर कीचड़ उछालना ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ (अभिव्यक्ति की आज़ादी) का बैज बन गया है।
आप दिल्ली की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज से लेकर साउथ के द्रविड़ियन थिंक-टैंक तक नज़र दौड़ा लीजिए। ये दिन-रात एक ही नैरेटिव गढ़ने में लगे रहते हैं की हिंदू धर्म तो बस जातियों में बांटता है, इसमें तो बस छुआछूत है, ये तो पिछड़ेपन की निशानी है।
लेकिन ये लोग कभी भूलकर भी उस सनातन की बात नहीं करेंगे जो सदियों से चींटियों को आटा खिलाने से लेकर पेड़ों में भी भगवान देखने की बात करता है। “वसुधैव कुटुंबकम” का जो मंत्र दुनिया भर को हमने दिया, वो इन्हें दिखाई नहीं देता।
ये वामपंथी दीमक हमारे ही देश के संसाधनों पर पलते हैं और हमारी ही जड़ों को खोखला करते हैं। और सबसे बड़ा मज़ाक तो इस देश के सेक्युलरिज्म ने बना रखा है। संविधान की जिस मूल कॉपी में भगवान राम, कृष्ण और हनुमान जी की तस्वीरें छपी हैं, उसी संविधान की आड़ में ये नेता रोज़ सनातन को मिटाने का एजेंडा चलाते हैं।
जब उदयनिधि सनातन को कैंसर बताते हैं, तो दिल्ली में बैठा लिबरल मीडिया, जो बात-बात पर मोमबत्तियां लेकर इंडिया गेट पहुंच जाता है, अचानक से गूंगा-बहरा हो जाता है।
बल्कि, सच कहूं तो ये लिबरल गैंग उलटा उदयनिधि को ही डिफेंड करने उतर आता है। बड़े-बड़े आर्टिकल छापे जाते हैं की ‘देखिए, स्टालिन तो बस सामाजिक न्याय (Social Justice) की बात कर रहे हैं।’
अरे भई, ये कैसा सामाजिक न्याय है जो 100 करोड़ लोगों की आस्था पर तलवार चलाकर आता है? एक झूठ को बार-बार बोलो ताकि वो सच लगने लगे- ये गोएबल्स वाली थ्योरी भारत का वामपंथी और द्रविड़ इकोसिस्टम बहुत ही सफाई से चला रहा है। और दुर्भाग्य देखिए, हमारी ही पीढ़ियां धीरे-धीरे इस प्रोपेगेंडा का शिकार होकर अपने ही धर्म से कटती जा रही हैं।
क्या इस्लाम या ईसाईयत पर भी ज़हर उगलने की हिम्मत दिखाएंगे विजय और स्टालिन?
अब आते हैं उस कड़वे सच पर, जिसे सुनकर इन तथाकथित सेक्युलर नेताओं को मिर्ची लग जाती है। अब ज़रा एक पल के लिए सोचिए।
मान लीजिए, उसी विधानसभा में, किसी हिंदूवादी नेता ने खड़े होकर ये कह दिया होता की “इस देश से ईसाईयत को तो जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए” या फिर ये कह दिया होता की “दुनिया भर में खून-खराबा और आतंकवाद फैलाने वाले कट्टरपंथी इस्लामिक जिहाद का तो पूरी तरह से खात्मा होना चाहिए।”
फिर क्या होता? अरे भाई, पूरे देश में आग लग जाती! ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगने शुरू हो जाते। पत्थरबाज़ी शुरू हो जाती।
जेएनयू से लेकर जंतर-मंतर तक धरने-प्रदर्शन होने लगते। बीबीसी (BBC), अल जज़ीरा और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे विदेशी मीडिया आउटलेट छाती पीटने लगते की ‘भारत में अल्पसंख्यक खतरे में हैं!’
और वो जो मुख्यमंत्री जोसेफ विजय वहां हाथ जोड़कर मुस्कुरा रहे थे ना? अगर इस्लाम या ईसाई धर्म पर एक हल्का सा भी कटाक्ष हो जाता, तो वही विजय विधानसभा में माइक तोड़ रहे होते। ‘लोकतंत्र की हत्या’ का रोना रो रहे होते। यही तो इनका सबसे घिनौना दोगलापन है।
जिस सनातन ने कभी किसी पर तलवार के ज़ोर पर अपना धर्म नहीं थोपा, जिसने पारसियों से लेकर यहूदियों तक को अपने यहां पनाह दी, उसे तो ये हिंसक और अत्याचारी बताते हैं।
लेकिन जिन मज़हबों का पूरा इतिहास ही खून-खराबे, जिहाद, क्रूसेड, और जबरन धर्मांतरण से रंगा पड़ा है, उनके सामने ये दोनों (स्टालिन और विजय) दुम हिलाते हुए घुटने टेक देते हैं।
मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का ईसाई होना यहां बहुत बड़ा रोल प्ले करता है। क्या सनातन को मिटाने की इस शपथ का समर्थन किसी गहरे वेटिकन या मिशनरी एजेंडे का हिस्सा है? दक्षिण भारत में लंबे समय से ईसाई मिशनरियां भोले-भाले हिंदुओं का धर्मांतरण कराने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र चला रही हैं।
इन मिशनरियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। जब राज्य का मुख्यमंत्री (जो खुद एक ईसाई है) और मुख्य विपक्षी दल का नेता (जो अल्पसंख्यक वोटबैंक का भूखा है) मिलकर सनातन धर्म को मिटाने पर सहमति जताते हैं, तो यह सीधे तौर पर उन अंतरराष्ट्रीय ताकतों को मजबूत करता है जो भारत को एक ‘हिंदू-विहीन’ राष्ट्र बनाना चाहती हैं।
इन नेताओं की पूरी की पूरी सियासत और वोटबैंक का गणित ही मुस्लिम और ईसाई वोटों के ध्रुवीकरण पर टिका है। इन्हें अच्छे से पता है की जिहादियों के खिलाफ एक लफ्ज़ भी बोला तो रातों-रात कुर्सी छिन जाएगी।
ये बहुत बड़े डरपोक हैं। अपनी इसी कायरता को छिपाने के लिए ये उस सनातन को टारगेट करते हैं, जो पलटकर बम नहीं फोड़ता, जो फतवे जारी नहीं करता।
महान दक्षिण भारतीय हिन्दू इतिहास पर कालिख पोतने चले हैं उधार की सियासत वाले ये सनातन-द्रोही नेता
उदयनिधि स्टालिन और जोसेफ विजय जैसे लोग जब सनातन को ‘तमिल संस्कृति’ के खिलाफ बताते हैं, तो वे न केवल झूठ बोलते हैं बल्कि तमिलनाडु के महान और गौरवशाली इतिहास के मुंह पर कालिख पोतने का काम करते हैं।
सच्चाई ये है की तमिलनाडु और दक्षिण भारत हमेशा से सनातन धर्म का सबसे मजबूत गढ़ और हृदय स्थल रहा है। जब उत्तर भारत में क्रूर इस्लामिक आक्रांताओं ने मंदिरों को तोड़ा और विश्वविद्यालयों को जलाया, तब दक्षिण भारत के महान राजवंशों ने सनातन धर्म, उसकी संस्कृति, कला और वेदों की रक्षा की।
तमिलनाडु का असली इतिहास तो चोल, चेर, पल्लव और पांड्य राजाओं का इतिहास है। जब राजराजा चोल ने तंजावुर में उस भव्य बृहदेश्वर मंदिर की नींव रखी थी, जो आज भी दुनिया भर के आर्किटेक्ट्स के लिए एक अजूबा है, तो क्या वो किसी ‘द्रविड़ियन मॉडल’ के तहत बनाया गया था? बिल्कुल नहीं!
वो शुद्ध रूप से सनातन धर्म के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक था। मदुरै की मीनाक्षी अम्मन, श्रीरंगम के भगवान रंगनाथ, रामेश्वरम के ज्योतिर्लिंग और कांचीपुरम के मठ- ये सब क्या हैं? ये सनातन धर्म का धड़कता हुआ दिल हैं।
ये लोग सनातन को ब्राह्मणवाद और जातिवाद का नाम देकर गरियाते हैं। लेकिन क्या इन्होंने कभी तमिलनाडु के उन महान संतों का इतिहास पढ़ा है?
तमिलनाडु की धरती ने सनातन धर्म को 12 महान अलवार (वैष्णव) और 63 नयनार (शैव) संत दिए हैं। और सबसे गज़ब की बात तो ये है की इन संतों में समाज के हर तबके के लोग थे।
कन्नप्पा नयनार एक आदिवासी शिकारी थे, तिरुप्पन अलवार एक तथाकथित निचली जाति से आते थे। लेकिन पूरे हिंदू समाज ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया। उन संतों ने ही अपनी तमिल कविताओं और भजनों से पूरे देश में भक्ति आंदोलन की ऐसी आंधी चलाई की सनातन धर्म एक बार फिर से ज़िंदा हो उठा।
सच बात तो ये है की तमिल भाषा और सनातन धर्म को अलग-अलग करके देखना एकदम उल्टा-सीधा लॉजिक है। महर्षि अगस्त्य को तमिल व्याकरण का जनक माना जाता है।
तो फिर तमिल और सनातन अलग कैसे हुए? ये ‘द्रविड़ बनाम आर्य’ का जो कीड़ा है, ये अंग्रेजों और मिशनरियों ने हमारे दिमाग में डाला था ताकि उत्तर भारत को दक्षिण से काटा जा सके।
आज के इन दो-कौड़ी के नेताओं की औकात नहीं है की वो उस सनातन पर उंगली उठा सकें, जिसे महान चोल सम्राटों और नयनार संतों ने अपने खून-पसीने से सींचा है।
हम हिन्दुओं की शराफत को कायरता समझने की भूल कर रहे हैं स्टालिन और विजय जैसे सत्ता के भूखे गिद्ध
अब सवाल ये उठता है की ये राजनेता इतने बेलगाम कैसे हो गए? क्यों एक मुख्यमंत्री खुलेआम सनातन के अपमान पर ताली बजाता है? सच्चाई कड़वी है, लेकिन सच यही है की इसके लिए हम हिंदू खुद ज़िम्मेदार हैं। हमारी ज़रूरत से ज़्यादा सहिष्णु को इन नेताओं ने हमारी कायरता मान लिया है।
हिंदू धर्म हमेशा से ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘अहिंसा’ की बात करता आया है। लेकिन हमारी इसी शराफत को इन्होंने हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी समझ लिया।
इन्हें अच्छे से पता है की ये चाहे भगवान को गालियां दें, गीता-रामायण का मज़ाक उड़ाएं, हमारे धर्म को मिटाने की कसमें खाएं… हिंदू समाज सड़कों पर उतरकर गाड़ियां नहीं फूंकेगा।
हिंदू कोई फतवा जारी नहीं करेगा। हिंदू तो बस अगले दिन सुबह उठकर अपने ऑफिस चला जाएगा। हमारी इसी चुप्पी ने इनकी हिम्मत बढ़ाई है।
सबसे ज़्यादा खून तो तब खौलता है जब हम अपने सिस्टम का दोगलापन देखते हैं। हमारा सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग छोटी-छोटी बातों पर ‘स्वतः संज्ञान’ ले लेता है। कोई नेता किसी पर हल्की सी टिप्पणी कर दे, तो पुलिस रात-रात भर जागकर एफआईआर लिखती है।
लेकिन एक विधानसभा के अंदर, संवैधानिक पद पर बैठे दो लोग 100 करोड़ हिंदुओं के धर्म को ‘मिटाने’ की बात करते हैं, और सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगती? क्या ये ‘हेट स्पीच’ नहीं है? क्या ये देश के कानून और संविधान की धज्जियां उड़ाना नहीं है?
लेकिन नहीं भाई, जब बात हिंदुओं के अपमान की आती है, तो सारे मानवाधिकार संगठन, सारे कोर्ट और पुलिस अचानक से अंधे और बहरे हो जाते हैं।
ये सिस्टम के डबल स्टैंडर्ड हैं। अगर एक सनातनी अपने माथे पर तिलक लगाकर, अपने धर्म की रक्षा की बात करे, तो ये पूरा वामपंथी इकोसिस्टम उसे रातों-रात ‘कट्टरपंथी’, ‘फासीवादी’ और ‘आतंकवादी’ घोषित कर देता है।
लेकिन जो लोग खुलेआम बहुसंख्यक हिन्दू समाज के सफाए की बात करते हैं, उन्हें ये लोग ‘सेक्युलर’ और ‘प्रोग्रेसिव’ का तमगा पहना देते हैं। इन्होंने हम पर एक मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ रखा है। ये चाहते हैं की हम अपने ही हिंदू होने पर शर्मिंदगी महसूस करें। लेकिन अब बहुत हो गया!
अब टाइम आ गया है की हिंदू समाज भी इन्हें ‘वोट की चोट’ देना सीखे। लोकतंत्र में इससे बड़ा कोई हथियार नहीं है। जो नेता हमारे धर्म को मिटाने की कसमें खाते हैं, उन्हें सत्ता के गलियारों से बाहर फेंकने का काम हमें ही करना होगा।
एक बहुत बड़ा आर्थिक बहिष्कार भी ज़रूरी है। ज़रा सोचिए, जोसेफ विजय (थलपति विजय) जैसे लोग आखिर इतने बड़े सुपरस्टार कैसे बने? बहुसंख्यक हिंदुओं ने ही तो उनकी फिल्मों के टिकट खरीद-खरीद कर उन्हें करोड़ों का मालिक बनाया है।
हमारी ही तालियों और हमारे ही पैसों से ये लोग हीरो बने, और आज सत्ता मिलते ही ये हमारी ही आस्था पर थूक रहे हैं? ऐसे नमकहराम अभिनेताओं और नेताओं की फिल्मों, उनके विज्ञापनों और उनके पूरे इकोसिस्टम का ऐसा बहिष्कार होना चाहिए की इनकी अक्ल ठिकाने आ जाए।
मुगलों और अंग्रेजों की तरह स्टालिन और विजय का घमंड भी खाक में मिल जाएगा लेकिन सनातन हिन्दू धर्म हमेशा अमर रहेगा
उदयनिधि स्टालिन और जोसेफ विजय जैसे लोग शायद सत्ता के घमंड में ये भूल गए हैं की वो आखिर किस धर्म से पंगा ले रहे हैं।
सनातन धर्म कोई राजनैतिक पार्टी या दो-चार सौ साल पुराना कोई मज़हब नहीं है जिसे तुम विधानसभा में एक प्रस्ताव पास करके या किसी ज़हरीले भाषण से मिटा दोगे।
ये वो धर्म है जो अनादि है, जो अनंत है। ये तो वो आग है जिसे जितना दबाने की कोशिश करोगे, वो उतनी ही भयंकर रूप से भड़केगी।
इतिहास उठाकर देख लो! पिछले एक हज़ार सालों में न जाने कितने विदेशी आक्रांताओं ने इस सनातन को मिटाने की कोशिश की। क्रूर और खून-खराबा करने वाले इस्लामिक जिहादियों- महमूद गज़नवी से लेकर बाबर, खिलजी और औरंगज़ेब तक- सबने अपनी पूरी ताकत लगा दी।
उन्होंने हमारे हज़ारों भव्य मंदिरों को मिट्टी में मिला दिया, नालंदा और तक्षशिला जैसी हमारी यूनिवर्सिटियों को जलाकर राख कर दिया, हमारी छाती पर तलवारें रखकर धर्मांतरण कराया। फिर अंग्रेजों ने भी हमें मानसिक गुलाम बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी।
लेकिन आख़िरकार क्या हुआ? वो सारे जिहादी, वो खूंखार सुल्तान, वो ब्रिटिश साम्राज्य… सब के सब आज इतिहास के कूड़ेदान में पड़े हैं। उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। लेकिन हमारा सनातन धर्म? वो कल भी पूरी शान से खड़ा था, आज भी खड़ा है और कल भी दुनिया का मार्गदर्शन करता रहेगा।
तो फिर अगर मुगल और अंग्रेज़ मिलकर भी इस सनातन को नहीं मिटा पाए, तो आज के ये दो-कौड़ी के राजनेता किस खेत की मूली हैं? स्टालिन, पेरियार या विजय जैसे लोग तो बस समय के एक छोटे से कालखंड में पैदा हुए कीड़े-मकोड़े हैं, जो कल धूल में मिल जाएंगे।
ये बात ये लोग अच्छे से कान खोलकर सुन लें की सनातन को मिटाने का सपना देखने वालों का खुद का राजनीतिक अंत एकदम तय है।
सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। सनातन के वजूद से टकराने वालों को ये हिन्दू समाज ऐसा सबक सिखाएगा की उनकी आने वाली पीढ़ियां भी हिंदू धर्म के खिलाफ एक लफ्ज़ बोलने से पहले सौ बार सोचेंगी।
वंदे मातरम! जय श्री राम! जय सनातन धर्म!
