सच कहूं तो अपना खून खौलता है जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं की कैसे इन कुर्सी के लालची, सेक्युलरिज्म का झुनझुना बजाने वाले गद्दार नेताओं ने हमारे देश को इन कट्टरपंथी जिहादियों के आगे बेच खाया था। मई 2026 में बंगाल में जो इलेक्शन का रिजल्ट आया, वो इस देश के करोड़ों सताए हुए हिंदुओं की एक भयानक हुंकार थी।
दशकों से हमारे बॉर्डर खोलकर रखे गए थे ताकि बांग्लादेश से ये अवैध मुस्लिम घुसपैठिए और म्यांमार से लात खाकर भगाए गए रोहिंग्या सूअर हमारे देश में बेखौफ घुस सकें।
और ये सब क्यों हो रहा था? सिर्फ और सिर्फ उस सड़े हुए मुस्लिम वोटबैंक के लिए! इन देशद्रोही नेताओं ने भारत माता की छाती पर इन कट्टरपंथी दीमकों को लाकर बिठा दिया। लेकिन अब वो हराम का खेल हमेशा के लिए खत्म हो गया है।
बंगाल में शुभेंदु अधिकारी का प्रचंड बहुमत से सीएम बनना और असम में हिमंत बिस्वा सरमा का दोबारा लौटकर आना- ये इस बात का ऐलान है की अब इन गज़वा-ए-हिंद के पिल्लों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।
अब तक ये जिहादी कीड़े बॉर्डर पार करके आते थे, हमारे ही टैक्स के पैसों पर मुफ्त का राशन चबाते थे, और बदले में हमारे ही मंदिरों पर पत्थर मारते थे। इन्होंने बंगाल और असम के कई हिस्सों को ‘मिनी पाकिस्तान’ बना दिया था।
पर अब ये सेक्युलर नौटंकी नहीं चलने वाली। हिमंत दा और शुभेंदु दा ने साफ कर दिया है की भारत कोई धर्मशाला या इन जेहादियों के बाप की जागीर नहीं है जहाँ कोई भी मुल्ला दाढ़ी खुजलाते हुए घुस आए और हमारी ज़मीन पर कब्जा कर ले।
इन दोनों हिंदू शेरों ने घुसपैठियों के खिलाफ ऐसा खौफनाक डंडा चलाया है की आज इन घुसपैठियों की रातों की नींद और दिन का चैन सब उड़ चुका है।
ये कोई नॉर्मल क्लीन-अप नहीं है, ये देश के दुश्मनों को लात मारकर बाहर निकालने का एक महायज्ञ है और ये लेख उसी ‘जिहादी-सफाई’ की धधकती हुई ग्राउंड रिपोर्ट है।
घुसपैठियों द्वारा बनाया गया ‘मिनी पाकिस्तान’ मॉडल और हमारे मोहल्लों पर जिहादी भेड़ियों का कब्जा
अगर आज भी कोई लिबरल कीड़ा आपको ये समझाए की ये घुसपैठिए तो बस रोज़ी-रोटी की तलाश में आने वाले गरीब शरणार्थी हैं, तो उसके मुंह पर थूक दीजिएगा। ये कोई बेचारे रिफ्यूजी नहीं हैं; ये एक बहुत ही खौफनाक और वेल-प्लांड ‘डेमोग्राफिक जिहाद’ का हिस्सा हैं।
इनका एक ही मकसद है- हमारे हिंदू इलाकों में घुसो, सुअरों की तरह आबादी बढ़ाओ, लोकल हिंदुओं की जिंदगी हराम करो और फिर पूरे सिस्टम पर शरिया कानून थोप दो।
ज़मीन पर जाकर देखिए बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया और नॉर्थ 24 परगना का क्या हाल कर दिया है इन लोगों ने। जो जगहें कभी हमारे बंगाली कल्चर, रामकृष्ण परमहंस और दुर्गा पूजा की पहचान हुआ करती थीं, आज वहां जाकर देखिए।
पूरी की पूरी डेमोग्राफी का ऐसा चीरहरण हुआ है की दिमाग सुन्न पड़ जाता है। इन बॉर्डर वाले जिलों में अब दूर-दूर तक सिर्फ सफ़ेद जालीदार टोपियां और बुर्के नज़र आते हैं।
एकदम से इनकी आबादी का जो ये ‘ब्लास्ट’ हुआ है, ये कोई कुदरती करिश्मा नहीं है। ये बाकायदा सीमा पार से आए घुसपैठियों को हमारे सीने पर TMC द्वारा मूंग दलने के लिए बसाया गया है।
असम के धुबरी, करीमगंज और बारपेटा में भी तो यही नंगा नाच चला। वहां के जो बेचारे लोकल असमिया और बंगाली हिंदू थे, वो अपने ही गांव-मोहल्लों में डर-डर कर जीने पे मजबूर हो गए थे।
ये जिहादी भेड़िए जैसे ही किसी इलाके में बहुसंख्यक होते हैं, इनकी गुंडागर्दी और असल औकात बाहर आ जाती है।
सबसे पहले क्या होता है? हिंदुओं की ज़मीनों पर रातों-रात कब्जा। हमारी बहन-बेटियों को लव जिहाद के जाल में फंसाना और उन्हें अगवा करना। हमारे दुर्गा पूजा के पंडालों पर पत्थर फेंकना, सरस्वती माता की मूर्तियों को तोड़ना और शोभा यात्राओं पर छतों से पेट्रोल बम फेंकना।
ये सब अचानक नहीं होता भाई। ये वो जहर है जो ये घुसपैठिए अपने मजहब के नाम पर बॉर्डर पार से हमारे देश में लेकर आते हैं। पुरानी वामपंथी और तुष्टिकरण वाली TMC सरकार ने तो बेशर्मी की सारी हदें ही पार कर दी थीं। इन घुसपैठियों को वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया।
इनके फर्जी आधार कार्ड, पैन कार्ड, और वोटर आईडी रातों-रात बनाए गए ताकि ये लोग भारत के ‘पक्के नागरिक’ बन जाएं और हमारी छाती पर चढ़कर वोट डालें। आज इन इलाकों में ऐसे-ऐसे ‘मिनी पाकिस्तान’ बन चुके हैं जहाँ भारत का संविधान नहीं, बल्कि मुल्लों के फतवे चलते हैं।
पर अब इन हरामखोरों का इलाज शुरू हो गया है, और वो इलाज ऐसा है की इनकी आने वाली नस्लें भी याद रखेंगी।
हिमंत दा का डंडा और असम में मुस्लिम घुसपैठियों को लात मारकर खदेड़ने का ज़बरदस्त अभियान
अब बात करते हैं असम की जहाँ हालात सबसे ज्यादा खराब थे। असम सालों तक इस घुसपैठ की आग में झुलसता रहा। वहां के युवाओं ने अपनी छातियों पर गोलियां खाईं ताकि कोई तो इस जिहादी कचरे को साफ करे। और आखिरकार, हिमंत बिस्वा सरमा के रूप में असम को वो रक्षक मिल ही गया जिसने इन घुसपैठियों की खाल उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अपने दूसरे टर्म में हिमंत दा ने मानवाधिकारों और कोर्ट-कचहरी के चोचलों को उठाकर डस्टबिन में डाल दिया है। उन्होंने पुलिस को सीधा और कड़ा फरमान सुनाया है- ‘पुश-बैक’ पॉलिसी।
इसका सीधा मतलब है की अगर कोई भी अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या कीड़ा असम की ज़मीन पर रेंगता हुआ दिख जाए, तो उसे अरेस्ट करके जेल में फ्री की बिरयानी मत खिलाओ। सीधे उसकी कॉलर पकड़ो, उसे लाठियों से हांकते हुए बॉर्डर तक ले जाओ और लात मारकर वापस उसी जहन्नुम में खदेड़ दो जहाँ से वो आया था।
अभी हाल ही में असम पुलिस ने जो तांडव किया है, उसे सुनकर इन जिहादियों के पसीने छूट गए हैं। बॉर्डर पर ‘गेट 39’ वाले इलाके में रात के अंधेरे में एक ज़बरदस्त ऑपरेशन हुआ। वहां 10 रोहिंग्या और 6 बांग्लादेशी छुपकर भारत में घुसने की फिराक में थे। पुलिस ने उन्हें वहीं दबोच लिया।
कोई एफआईआर नहीं, कोई जेल नहीं। सीधे उन्हें उसी रात घसीटकर वापस बॉर्डर के उस पार फेंक दिया गया। ऐसे ही ‘श्रीभूमि सेक्टर’ में भी 37 अवैध मुल्लों को सीधा ‘पुश-बैक’ कर दिया गया।
हिमंत दा ने खुलेआम मंच से दहाड़ते हुए कहा है की अगर हम आज इन कट्टरपंथियों का गला नहीं घोंटेंगे, तो ये डेमोग्राफिक इनवेज़न कल हमारे असम को निगल जाएगा। और सिर्फ इतना ही नहीं, असम पुलिस अब उस पूरे ‘इकोसिस्टम’ को जड़ से उखाड़ रही है जो इन घुसपैठियों को पालता-पोसता है।
वो जो फर्जी कागज़ बनाने वाले गद्दार दलाल हैं, और जो मदरसों की आड़ में जेहादी स्लीपर सेल चला रहे हैं- उन सबको मार-मार कर उनकी हेकड़ी निकाली जा रही है। मदरसों पर सीधे बुलडोज़र चल रहे हैं।
अब असम में पैर रखने का मतलब है सीधा अपनी मौत को दावत देना। हिमंत दा ने असम को सही मायनों में एक ऐसा हिंदू अभेद्य किला बना दिया है जहाँ इन जिहादियों के लिए सिर्फ खौफ और मौत का मंज़र है।
शुभेंदु भईया का ‘बॉर्डर-प्लान’ और बंगाल से जिहादी दीमकों का बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी
असम के बाद अगर कहीं सबसे ज्यादा गंध मची थी तो वो था हमारा बंगाल। मई 2026 में जब बंगाल में सत्ता की कायापलट हुई, तो वो वामपंथियों और TMC के लिए किसी जलज़ले से कम नहीं था। ये बंगाल के करोड़ों राष्ट्रभक्त हिंदुओं का वो ज्वालामुखी था जो सालों से दबा पड़ा था और अब फट चुका था।
पुरानी सरकारों ने तो अपनी कुर्सी बचाने के लिए बंगाल को इन रोहिंग्या सूअरों के लिए एक पूरा का पूरा ‘लॉन्चपैड’ बना दिया था। यहाँ से बॉर्डर क्रॉस करो, थोड़े दिन बंगाल के मदरसों में छुपो, फर्जी वोटर आईडी बनवाओ और फिर देश भर में फैल जाओ- यही तो चल रहा था!
पर 12 मई को जब शुभेंदु अधिकारी गुवाहाटी में हिमंत दा की शपथ ग्रहण में गए, तभी उन्होंने वो ऐलान कर दिया जिसने सेक्युलर गैंग की नींदें उड़ा दीं। उन्होंने डंके की चोट पर कहा की बंगाल अब इन जिहादियों के बाप की जागीर नहीं है।
“असम मॉडल” को अब हम बंगाल में भी पूरे डंडे के ज़ोर पर लागू करेंगे। और शुभेंदु दा कोई खोखले नेता नहीं हैं, उन्होंने जो कहा वो ज़मीन पर करके भी दिखाया।
सीएम की कुर्सी पर बैठते ही, अपनी पहली ही कैबिनेट मीटिंग में शुभेंदु दा ने वो काम कर दिया जिसे रोकने के लिए सालों से देशद्रोही ताकतें अड़ंगे लगा रही थीं।
उन्होंने सीधा और खौफनाक फरमान सुनाया की बॉर्डर पर जो फेंसिंग का काम अटका पड़ा है, उसके लिए 45 दिन के अंदर ज़मीन क्लियर करो और बीएसएफ को सौंप दो।
पिछली सरकारें जानबूझकर बीएसएफ को ज़मीन नहीं देती थीं ताकि बॉर्डर एकदम खुला रहे और उनका ‘अवैध मुस्लिम वोटबैंक’ बिना किसी टेंशन के अंदर आता रहे। पर अब शुभेंदु राज में ये गद्दारी हमेशा के लिए बंद होने जा रही है।
अब मालदा, मुर्शिदाबाद और नॉर्थ 24 परगना जैसे अति-संवेदनशील इलाकों में पुलिस ने जो धर-पकड़ शुरू की है, उसे देखकर इन घुसपैठियों की रूह कांप रही है। गली-गली, गांव-गांव जाकर संदिग्ध लोगों को गर्दन से पकड़ा जा रहा है।
बीएसएफ और बंगाल पुलिस अब मिलकर इन जिहादियों का शिकार कर रही हैं। पहले जो वामपंथी और एनजीओ वाले मानवाधिकार का रोना रोकर पुलिस पर दबाव बनाते थे, अब पुलिस उन्हें भी धक्के मारकर बाहर निकाल रही है।
बंगाल जो कल तक रोहिंग्याओं का फेवरेट और सबसे सेफ रास्ता था, शुभेंदु दा ने उस रास्ते पर ऐसी बाड़ लगा दी है की अब वहां से कोई जिहादी कुत्ता भी पर नहीं मार सकता।
देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भस्मासुर बन चुके ये घुशपैठी और रोहिंग्याओं का असली सच
अब ज़रा इस पूरे ड्रामे के सबसे खौफनाक हिस्से पर आते हैं। भाई, अगर कोई ये सोच रहा है ना की ये घुसपैठियों वाला मसला सिर्फ चुनाव जीतने या वोटबैंक तक ही सीमित है, तो वो इंसान बहुत गहरी नींद में सो रहा है।
असल में ये हमारी नेशनल सिक्योरिटी के लिए ऐसा जानलेवा कैंसर बन चुका है, जिसका इलाज अगर अभी बेरहमी से नहीं किया गया, तो आगे चलकर ये इस देश को अंदर से पूरी तरह खोखला कर देगा।
टीवी पर दिन-रात मानवाधिकार (Human Rights) वाले एनजीओ और वामपंथी पत्रकारों का एक ही रोना रहता है- “अरे बेचारे रोहिंग्या! बेचारे गरीब रिफ्यूजी!” पर इन बेचारों का खौफनाक सच क्या है, ये कोई नहीं बताता।
ये कोई सताए हुए सीधे-सादे शरणार्थी नहीं हैं। ये तो उस कट्टरपंथी इस्लामी इकोसिस्टम के चलते-फिरते टाइम बम हैं, जिन्हें भारत में ‘गज़वा-ए-हिंद’ का वो पुराना और नापाक सपना पूरा करने के लिए जानबूझकर प्लांट किया गया है।
हमारी अपनी खुफिया एजेंसियां, आईबी (IB) और रॉ (RAW) गला फाड़-फाड़ कर थक गईं की इन रोहिंग्याओं और अवैध बांग्लादेशियों के तार सीधे तौर पर जेएमबी (JMB – जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश) और अल-कायदा जैसे खूंखार आतंकी संगठनों से जुड़े हुए हैं।
बंगाल का खगड़ागढ़ वाला बम धमाका कैसे भूल सकते हैं हम? वहां क्या हुआ था? TMC के राज में इन घुसपैठियों को इतनी खुली छूट मिल गई थी की इन्होंने घरों के अंदर बम-वम बनाने की फैक्टरियां तक खोल ली थीं। ये जेहादी पहले तो चुपचाप रात के अंधेरे में बॉर्डर पार करते हैं, फिर किसी मदरसे या कट्टरपंथी मोहल्ले के नेटवर्क के सहारे ‘स्लीपर सेल’ बन जाते हैं।
जब तक ऊपर से इनके आकाओं का ऑर्डर नहीं आता, तब तक ये आपको सड़कों पर रेहड़ी लगाते, फल बेचते, कबाड़ बीनते या ई-रिक्शा चलाते दिखेंगे। आपको लगेगा बेचारे कितने गरीब और सीधे हैं।
लेकिन जैसे ही कोई हिंदू त्योहार आता है या देश में कोई दंगा भड़काना होता है, यही सीधे दिखने वाले लोग सबसे पहले छतों से पत्थर और पेट्रोल बम लेकर सड़कों पर उतर आते हैं।
दिल्ली का जहांगीरपुरी वाला हिंदू-विरोधी दंगा याद है? या हरियाणा के मेवात में हमारी रामनवमी और ब्रजमंडल यात्रा पर जो अंधाधुंध गोलियां और पत्थर चले थे, वो भूल गए? पुलिस के रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए भाई।
इन सब दंगों में सबसे आगे यही रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए थे। इनको तो बस भाड़े के गुंडों की तरह इस्तेमाल किया जाता है।
और तो और, इन गद्दारों ने हमारी अर्थव्यवस्था का जो कबाड़ा किया है, उसकी तो बात ही मत पूछिए। आम भारतीय नागरिक सुबह से शाम तक गधे की तरह पसीना बहाए, ईमानदारी से टैक्स भरे, और हमारे उसी खून-पसीने के टैक्स से इन विदेशी घुसपैठियों को मुफ्त का राशन-वाशन बांटा जाए? ये कहां का इंसाफ है?
ये लोग हमारे सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज ले रहे हैं, रेलवे की जमीनों और वक्फ बोर्ड की जमीनों पर रातों-रात अपनी झुग्गियां और अवैध कॉलोनियां खड़ी कर रहे हैं। हमारे हकों पर डाका डाल रहे हैं।
अब शुभेंदु दा और हिमंत दा ने इसी कैंसर को जड़ से उखाड़ने की ठान ली है। अब इनकी सारी फंडिंग रोकी जा रही है और इनके पूरे के पूरे टेरर नेटवर्क को जूतों तले कुचला जा रहा है।
शुभेंदु और हिमंत की अचूक जुगलबंदी और पूरब में बन गया जिहादी घुसपैठियों का काल
2026 के इलेक्शन के बाद एक सबसे बढ़िया चीज़ जो हुई है, वो है असम और बंगाल सरकार का ये नया और धाकड़ गठजोड़। सीधे शब्दों में कहें तो हिमंत बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी की जोड़ी ने जो गदर मचाया है ना, उसने इन जिहादियों और उनको पालने वाले देशद्रोहियों की रातों की नींद हराम कर दी है।
पहले क्या होता था? एक अजीब सा चोर-पुलिस का खेल चलता था। असम में अगर पुलिस डंडा मारती थी या किसी घुसपैठिए को खदेड़ती थी, तो वो रातों-रात खिसक कर बंगाल के किसी गांव में घुस जाता था। क्यों? क्योंकि वहां पिछली सरकारें उन्हें बिरयानी खिलाने और छुपाने के लिए बैठी थीं।
हिमंत दा इस बात को बहुत अच्छे से समझते थे की जब तक बंगाल का बॉर्डर इन जेहादियों के लिए खुला रहेगा, तब तक अकेले असम को सील करने से कोई तीर नहीं मारा जा सकता।
पर अब सीन पूरा बदल चुका है। शुभेंदु अधिकारी के बंगाल की गद्दी पर बैठते ही दोनों राज्यों ने मिलकर एक ऐसा ज़बरदस्त और अभेद्य ‘सिक्योरिटी ग्रिड’ तैयार कर लिया है की अब इन घुसपैठियों के छुपने के सारे बिल हमेशा के लिए बंद हो गए हैं।
अब अगर असम पुलिस किसी को धक्का मारकर बाहर निकालती है, तो बंगाल में उसे पनाह नहीं मिलती। बंगाल पुलिस भी पूरे फुल फॉर्म में है, वो भी इनकी कॉलर पकड़कर सीधा बॉर्डर के उस पार फेंक रही है। दोनों राज्यों की पुलिस और खुफिया टीमें अब एकदम साथ मिलकर काम कर रही हैं। चुन-चुन कर इन हरामखोरों को उठाया जा रहा है।
और भाई, इस तगड़े एक्शन का जो कूटनीतिक असर हुआ है, वो तो देखने लायक है। इतने सालों से बांग्लादेश हमारी शराफत का नाजायज़ फायदा उठा रहा था। पर अब? अब ढाका में बैठे आकाओं की हवा टाइट हो रखी है।
जब से भारत ने ये आक्रामक ‘पुश-बैक’ शुरू किया है, वहां की बॉर्डर गार्ड्स (BGB) की नींद उड़ी हुई है। अब वो हाई अलर्ट पर आ गए हैं। बांग्लादेश के मंत्रियों को बाकायदा रोते हुए बयान जारी करने पड़ रहे हैं की “हम भारत से धकेले गए लोगों को रोकेंगे।”
ये हमारे राष्ट्रवाद की बहुत बड़ी जीत है। पहले हम हमेशा डरते रहते थे की हाय राम, दुनिया क्या कहेगी! मानवाधिकार वाले क्या कहेंगे! लेकिन अब हम फ्रंटफुट पर खेल रहे हैं। हमने साफ और कड़े शब्दों में कह दिया है की जो कचरा हमारी ज़मीन पर फेंका गया है, उसे हम वापस वहीं भेजेंगे जहाँ से वो आया है।
इसके साथ ही, वो जो कांग्रेस, TMC जैसी देशद्रोही पार्टियां इन अवैध मुस्लिम वोटों के दम पर अपनी रोटियां सेंकती थीं, उनका तो पूरा का पूरा तंबू ही उखड़ गया है। जब इन घुसपैठियों के फर्जी आधार और वोटर आईडी ही रद्द हो जाएंगे, तो इनके आकाओं को वोट कौन डालेगा?
सनातन भारत पर मंडराता खतरा और कश्मीरी पंडितों के दर्द से हमारी सीख
देखिए, अगर हम आज भी नहीं जागे ना, तो कल इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। 1990 के दशक में कश्मीर में जो हुआ था, क्या हम वो भूल गए? जब वहां धीरे-धीरे मस्जिदों की तादाद बढ़ रही थी, जब वहां डेमोग्राफी बदली जा रही थी, तब पूरा देश मूक दर्शक बना बैठा था। नतीजा क्या हुआ? रातों-रात लाखों कश्मीरी पंडितों को अपने ही घर-बार छोड़कर भागना पड़ा।
उनकी बहन-बेटियों के साथ जो दरिंदगी हुई, हमारे मंदिरों को जिस तरह तोड़ा गया, वो याद करके आज भी हर सच्चे हिंदू की रूह कांप जाती है।
आज हमारा बंगाल और असम बिल्कुल उसी खौफनाक रास्ते पर खड़े हैं। अगर हमने आज शुभेंदु और हिमंत की इस आक्रामक मुहिम को अपना फुल सपोर्ट नहीं किया, तो यकीन मानिए, कल बंगाल और असम को ‘दूसरा कश्मीर’ बनने से दुनिया की कोई भी ताकत नहीं रोक पाएगी।
आजकल कुछ लिबरल लोग बड़ा ज्ञान बांटते हैं की हमें सबको शरण देनी चाहिए, इंसानियत भी कोई चीज़ है। अरे भई, दुनिया भर में 50-55 इस्लामी देश हैं। ये कट्टरपंथी घुसपैठिए वहां क्यों नहीं जाते? सऊदी अरब या तुर्की जाकर शरण क्यों नहीं मांगते?
भारत कोई इंटरनेशनल अनाथालय थोड़ी है जहाँ दुनिया भर का कोई भी उठकर आ जाए और हम उसे अपने घर में घुसा लें!
हमें बिना किसी डर या झिझक के डंके की चोट पर कहना होगा की ये अवैध घुसपैठिए कोई शरणार्थी-वरनार्थी नहीं हैं; ये तो हमारी ज़मीन, हमारे हकों और हमारी संस्कृति पर कब्जा करने आए विदेशी आक्रमणकारी हैं।
हिंदू समाज को अब अपनी जातियों और फालतू के आपसी विवादों से उठकर एकजुट होना ही पड़ेगा। अगर हम एक नहीं हुए, तो ये ‘डेमोग्राफिक इनवेज़न’ हमारा वजूद ही मिटा कर रख देगा।
राष्ट्रवाद की आंधी और इन घुसपैठियों को उखाड़ फेंकने का हमारा आखिरी संकल्प
मई 2026 के बाद असम और बंगाल ने पूरे देश को एक ऐसा कड़क ‘रोल मॉडल’ दे दिया है, जिसे अब हर राज्य को बिना सोचे-समझे फॉलो करना चाहिए।
शुभेंदु अधिकारी और हिमंत बिस्वा सरमा ने ये साबित कर दिया है की अगर लीडर की रीढ़ की हड्डी मजबूत हो, सीने में राष्ट्रभक्ति की आग धधक रही हो और सनातन के लिए कुछ कर गुज़रने का ज़बरदस्त जज़्बा हो, तो दुनिया का कोई भी वामपंथी ‘इकोसिस्टम’ आपको रोक नहीं सकता।
उन्होंने उस डरपोक राजनीति को ज़मीन में बहुत गहरा गाड़ दिया है जहाँ ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर देश की सुरक्षा दांव पर लगा दी जाती थी।
अब वक्त आ गया है की सिर्फ असम और बंगाल ही क्यों, दिल्ली, महाराष्ट्र, हैदराबाद और साउथ के जितने भी राज्य हैं- जहाँ-जहाँ इन रोहिंग्याओं और जेहादियों ने अपनी अवैध बस्तियां और स्लीपर सेल बना रखे हैं, वहां भी बिल्कुल यही ‘असम-बंगाल मॉडल’ पूरी निर्दयता के साथ लागू होना चाहिए। वहां भी ऐसे ही बुलडोज़र चलने चाहिए और इन गद्दारों को कॉलर पकड़कर सीधा बॉर्डर पार धकेला जाना चाहिए।
ये वक्त भारत माता के खोए हुए गौरव को वापस लाने का है। अपनी सनातन सीमाओं को अभेद्य बनाने का है। जब तक आखिरी घुसपैठिए को इस पवित्र ज़मीन से बाहर नहीं फेंक दिया जाता, तब तक हमारा ये धर्मयुद्ध अधूरा है।
जय श्री राम!
