मुगल राक्षसों के पाप धोने वाला कांग्रेस का वो गद्दार ‘1991 Worship Act’, हिन्दू मंदिरों पर जेहादी कब्ज़े को देश के लिए बताता ‘सही’

अभी 15 मई 2026 को जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला को डंके की चोट पर मस्जिद की जगह सरस्वती माता का मंदिर घोषित किया, तो पूरे देश के सनातनियों की आंखों में खुशी के आंसू थे।

लेकिन उसी वक्त मेरे दिमाग में वो भयानक और खौफनाक सच भी हथौड़े की तरह बजने लगा जिसने दशकों से हमारी आस्था की छाती पर जेहादी घुटने टेक रखे हैं। वो सच है- 1991 का वो गद्दार और हिंदू-विरोधी ‘वर्शिप एक्ट’ (Worship Act)।

आजकल मानवाधिकार का चोला ओढ़े बैठे अर्बन नक्सल टीवी पर बैठकर छाती पीट रहे हैं की “हाय-हाय! अगर ज्ञानवापी और मथुरा में ASI सर्वे होगा तो देश का सेक्युलरिज्म खतरे में पड़ जाएगा! 1991 का कानून टूट जाएगा!” 

अरे भाई, ये 1991 का कानून कोई आसमान से उतरा हुआ वेद-पुराण है क्या? या भगवान का लिखा कोई ऐसा फरमान है जिसे बदला नहीं जा सकता? 

असलियत तो ये है की ये कानून आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा सेक्युलर फ्रॉड है। ये वो खंजर है जो 1991 में कांग्रेस ने सीधे करोड़ों हिंदुओं की पीठ में घोंपा था, ताकि औरंगजेब और बाबर जैसे जिहादी लुटेरों के काले कारनामों को एक कानूनी ढाल पहनाई जा सके।

ज़रा सोचिए, हमारे 40,000 से ज्यादा मंदिर तोड़े गए। उन मंदिरों के मलबे पर, हमारी मूर्तियों की छाती पर चढ़कर इन इस्लामिक आक्रांताओं ने अपनी मस्जिदें और ईदगाहें खड़ी कर लीं। 

और आज की ये सेक्युलर सरकारें हमें ही ज्ञान दे रही हैं की भाईचारे के लिए सब भूल जाओ और उन मंदिरों को भूल जाओ और उन्हें मस्जिद के रूप में ही स्वीकार करो? 

इस गद्दार कानून ने सीधा-सीधा ये कह दिया की मुगलों ने जो डकैती की थी, वो अब एकदम ‘लीगल’ है। मतलब, अगर किसी गुंडे ने 500 साल पहले तुम्हारे बाप-दादा का घर छीन लिया हो, तो पुलिस तुम्हें इंसाफ देने के बजाय ये कहे की “भाई, अब तो वो गुंडे का ही घर है, तुम बस बाहर खड़े होकर ताली बजाओ।” यही तो है इस 1991 वाले कानून की असली औकात!

कांग्रेस की 1991 की वो गद्दारी जब हिन्दू मंदिरों का सौदा कर रातों-रात थोपा गया देशद्रोही ‘Worship Act’

अब ज़रा इस काले कानून की टाइमिंग पर गौर कीजिए। ये कोई ऐसा कानून नहीं था जिसे बहुत सोच-समझकर, पूरे देश से चर्चा करके लाया गया हो। बात है साल 1991 की। उस वक्त पूरे देश में राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था।

अयोध्या की सड़कों पर रामभक्तों का हुजूम उमड़ रहा था। मुलायम सिंह यादव की पुलिस ने हमारे कारसेवकों की छातियों पर गोलियां चलाई थीं, लेकिन हिंदू पीछे हटने को तैयार नहीं था। विश्व हिंदू परिषद और संतों ने साफ कर दिया था की “अयोध्या तो बस झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है।”

उसी वक्त केंद्र में बैठी थी पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेसी सरकार। कांग्रेस और उस समय के सेक्युलर गैंग की हवा टाइट हो गई थी। उन्हें समझ आ गया था की अगर ये हिंदू ऐसे ही जागता रहा, तो आज बाबरी मस्जिद गिरेगी, कल ज्ञानवापी की दीवारें ढहेंगी और परसों मथुरा की शाही ईदगाह का नामोनिशान मिट जाएगा।

और अगर ऐसा हुआ, तो कांग्रेस का वो ‘मुस्लिम वोटबैंक’ उनके हाथ से हमेशा के लिए छिटक जाएगा जो उन्हें दशकों से सत्ता की मलाई चटा रहा था।

बस, इसी मुस्लिम वोटबैंक को पालने-पोसने और जेहादियों को खुश करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने संसद में रातों-रात ये ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ पास करवा दिया।

इसका सीधा सा मतलब ये था की अयोध्या का मामला तो कोर्ट में चल रहा है, उसे छोड़कर भारत के जितने भी जिहादियों द्वारा तोड़े गए मंदिर हैं, उन पर अब कोई हिंदू दावा नहीं कर सकता। 

मतलब, अयोध्या के शोर-शराबे में कांग्रेस ने बड़ी ही बेशर्मी और चालाकी से हमारे देवी-देवताओं को 1991 में जंजीरों में जकड़ कर एक सेक्युलर जेल में डाल दिया।

कांग्रेस के उस तत्कालीन गृह मंत्री एस.बी. चव्हाण ने संसद में बकवास की थी की “ये कानून सांप्रदायिक सौहार्द बनाने के लिए है।” अरे भाई, सांप्रदायिक सौहार्द का ठेका क्या सिर्फ हिंदुओं ने ले रखा है? हमारे मंदिर टूटें, हमारे भगवानों का रोज़ वज़ूखाने में अपमान हो और हम सौहार्द के नाम पर चुपचाप अपना मुंह सिल लें? 

कांग्रेस ने Worship Act की आड़ में हिन्दू मंदिरों पर मुगलों का जिहादी कब्ज़ा कर दिया पक्का

इस कानून का सबसे घटिया और सड़ा हुआ हिस्सा है इसका सेक्शन 4, जो कहता है की 15 अगस्त 1947 को जिस भी धार्मिक स्थल का जो ‘स्वरूप’ था, वो वैसा ही रहेगा।

यानी अगर 14 अगस्त 1947 तक किसी मुल्ले ने किसी भव्य हिंदू मंदिर पर कब्ज़ा करके वहां एक हरे रंग का झंडा गाड़ दिया हो, तो 15 अगस्त को वो आधिकारिक रूप से मस्जिद मान ली जाएगी! वाह रे सेक्युलरिज्म!

आखिर 15 अगस्त 1947 ही क्यों? ये डेट तो वो थी जब गोरे अंग्रेज हमारा देश छोड़कर भागे थे और हमें एक राजनीतिक आज़ादी मिली थी। लेकिन क्या 15 अगस्त 1947 को हमारी सांस्कृतिक आज़ादी भी मिल गई थी क्या?

क्या उस दिन उन इस्लामिक आक्रांताओं के पाप धुल गए थे जिन्होंने 800 सालों तक भारत की आत्मा को लहूलुहान किया? भारत का इतिहास 1947 से शुरू नहीं होता भाई! हमारा इतिहास सनातन है, हज़ारों-लाखों साल पुराना है।

इस कट-ऑफ डेट के नाम पर हमारे साथ सबसे बड़ा धोखा किया गया। अगर आज आपके पुश्तैनी खेत पर कोई कब्ज़ा कर ले, तो आप कोर्ट जा सकते हैं। लेकिन अगर आपके आराध्य देवता के घर पर किसी मुगलिया जल्लाद ने कब्ज़ा कर लिया हो, तो ये 1991 का कानून आपको कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ने से भी रोकता है।

ये सीधे-सीधे हमारे मौलिक अधिकारों का हनन है। संविधान का आर्टिकल 25 हमें अपने धर्म को मानने की आज़ादी देता है। तो फिर हम अपने भगवान को उन जेहादी ढांचों से आज़ाद क्यों नहीं करा सकते?

क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जो अपने ही देश को लूटने वालों, अपनी ही बहन-बेटियों के साथ दुष्कर्म करने वालों और अपनी ही संस्कृति को मिटाने वालों के बनाए ढांचों को ‘कानूनी प्रोटेक्शन’ देता हो? 

पोलैंड और रूस ने तो नाज़ियों के सारे निशान मिटा दिए। स्पेन ने इस्लामी कब्ज़े से  अपनी सारी चर्चों को वापस लिया। लेकिन एक हमारा ये महान और सोता हुआ सेक्युलर भारत है, जहाँ आज भी औरंगजेब की बनाई हुई मस्जिदों को पुलिस की सुरक्षा दी जाती है और हिंदुओं को वहां जाने पर लाठियां खानी पड़ती हैं।

मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि पर खड़ी वो बेशर्म ईदगाह और अदालतों का दोगलापन

अब ज़रा मथुरा की तरफ चलिए। हमारे कन्हैया की जन्मभूमि! सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं की जिस जगह पर साक्षात भगवान कृष्ण ने अवतार लिया, जिस मिट्टी के कण-कण में हमारी आस्था बसती है, वहां आज एक भद्दी सी शाही ईदगाह छाती तानकर खड़ी है। 

औरंगजेब का भेजा हुआ वो जल्लाद और उसका वो खौफनाक फरमान, जिसमें साफ लिखा था की केशव देव मंदिर को जड़ से उखाड़ फेंको और वहां इस्लाम का झंडा गाड़ दो।

इन जेहादियों ने हमारे भगवान का मंदिर तोड़ा और उसी मलबे से वो ईदगाह खड़ी कर दी ताकि हम हिंदू जब भी वहां जाएं, हमें अपनी गुलामी और अपनी बेबसी याद आती रहे।

और आज क्या हो रहा है? आज जब हमारे हिंदू भाई और हमारे वकील कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हैं, सबूत देते हैं, चीख-चीख कर कहते हैं की ज़मीन के नीचे हमारे कन्हैया का असली गर्भगृह है, तो ये ईदगाह कमेटी वाले मुल्ले और उनके सेक्युलर पैरोकार क्या करते हैं?

ये बेशर्मों की तरह अदालत में खड़े होकर वही 1991 के ‘वर्शिप एक्ट’ का कागज-वागज लहराने लगते हैं। 

इनकी दलील बस यही होती है कि “जनाब, 1947 में तो यहाँ ईदगाह थी, इसलिए 1991 के कानून के हिसाब से आप यहां कोई एएसआई (ASI) सर्वे नहीं करा सकते, आप हिंदुओं को पूजा का हक नहीं दे सकते।”

मतलब ज़रा इस मक्कारी को समझिए। चोरी भी हमारी, सीनाज़ोरी भी हमारी! ज़मीन हमारी, भगवान हमारे, मंदिर हमारा, पैसा हमारा, और राज ये जेहादी कर रहे हैं! सिर्फ एक उस कागज़ के टुकड़े की वजह से जिसे कांग्रेस ने अपने वोटबैंक के लालच में रातों-रात पास करवा दिया था। 

अरे भाई, जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम जन्मभूमि के लिए ऐतिहासिक फैसला दिया था, तब उन्होंने भी तो पुरातात्विक सबूतों (ASI Report) को ही आधार माना था ना?

तो फिर मथुरा और काशी के लिए ये दोगलापन क्यों? जब वहां साफ-साफ दिख रहा है की मंदिर को तोड़कर ढांचा बना है, तो फिर 1991 के इस हिंदू-विरोधी कानून को ढाल बनाकर सत्य को क्यों दबाया जा रहा है? ये कोई न्याय नहीं है, ये करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं का सरेआम चीरहरण है!

भोजशाला के ताज़ा फैसले ने तोड़ी कांग्रेस और जिहादियों की हेकड़ी, अब ज्ञानवापी और मथुरा की बारी

खैर, इन गद्दारों और सेक्युलर गैंग की उल्टी गिनती तो अब शुरू हो ही चुकी है। अभी मई 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला पर जो ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, उसने इस 1991 वाले कानून की चूलें हिला कर रख दी हैं। 2003 में इसी गद्दार एएसआई (ASI) और पिछली सरकारों ने हमारे मां सरस्वती के उस पवित्र मंदिर में इन शांति दूतों को जुमे की नमाज़ पढ़ने की छूट दे दी थी।

लेकिन हमारे हिंदू वकीलों और सनातनियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने डंके की चोट पर अदालतों में लड़ाई लड़ी। एएसआई का साइंटिफिक सर्वे हुआ और ज़मीन फाड़कर वो सच्चाई बाहर आ गई जिसे ये जेहादी छुपाना चाहते थे।

सर्वे में साफ हो गया की वो कोई कमाल मौला की मस्जिद-वस्जिद नहीं है, वो शुद्ध रूप से हिंदुओं का मंदिर है। हाई कोर्ट ने उसी रिपोर्ट के आधार पर उसे मां सरस्वती का मंदिर घोषित कर दिया।

अब सवाल ये उठता है की जब भोजशाला के लिए ये संभव है, तो फिर ज्ञानवापी और मथुरा के लिए क्यों नहीं? कानून के जानकारों का भी यही कहना है की 1991 का वर्शिप एक्ट उन प्राचीन स्मारकों पर लागू नहीं होता जो 100 साल से ज्यादा पुराने हैं और ‘एन्शिएंट मॉन्यूमेंट्स एक्ट’ के तहत आते हैं।

काशी और मथुरा दोनों ही इसी कैटेगरी में आते हैं। मतलब, कांग्रेस ने जो ये सेक्युलर जाल बिछाया था, उसमें अब छेद हो चुके हैं।

भोजशाला का फैसला सिर्फ एक कानूनी जीत नहीं है, ये पूरे देश के सोए हुए हिंदुओं के लिए एक शंखनाद है। ये इस बात का सबूत है की अगर हिंदू समाज एक हो जाए, अगर हम अदालतों से लेकर सड़कों तक अपना हक मांगना सीख लें, तो दुनिया का कोई भी जेहादी कानून हमें रोक नहीं सकता। 

ज्ञानवापी का वज़ूखाना तो सच उगल ही चुका है। एएसआई (ASI) ने ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार और ज़मीन के नीचे जो सबूत निकाले हैं, वो औरंगजेब की क्रूरता का साक्षात प्रमाण हैं। अब बस इस 1991 की कानूनी बेड़ियों को तोड़ना बाकी है।

अब 40 हज़ार हिन्दू मंदिरों पर से हर जिहादी कब्ज़े को उखाड़ फेंकने का शंखनाद

पानी अब सिर के ऊपर से बह रहा है। बहुत हो गया ये भाईचारा, बहुत हो गई ये सेक्युलरिज्म की नौटंकी। अयोध्या में रामलला टेंट से निकलकर अपने भव्य और दिव्य महल में विराजमान हो चुके हैं। उन्होंने हमें रास्ता दिखा दिया है की संघर्ष से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। अब बारी काशी के विश्वनाथ और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि की है।

मानसून सत्र आने वाला है। अब केंद्र सरकार को बिना किसी डर या ‘इंटरनेशनल इमेज’ की परवाह किए, इस 1991 वाले कूड़े को संसद से बाहर फेंकना होगा। हमें कोई ‘संशोधन’ नहीं चाहिए, हमें कोई बीच का रास्ता नहीं चाहिए।

हमें इस कानून की पूर्ण रूप से मौत चाहिए। सरकार को रातों-रात एक नया बिल लाना चाहिए जो साफ शब्दों में कहे की “इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए सभी हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्मस्थलों पर मूल निवासियों का ही पूर्ण अधिकार होगा।”

और बात सिर्फ इन तीन मंदिरों की नहीं है। वामपंथी गद्दार अक्सर ताना मारते हैं की “हिंदुओं को आखिर कितने मंदिर चाहिए?” हमारा जवाब एकदम साफ है-हमें हमारे वो पूरे 40,000 मंदिर वापस चाहिए जिन्हें मुगलों और जेहादियों ने अपनी नफरत की आग में जलाया था।

हम एक इंच ज़मीन भी नहीं छोड़ेंगे। अटाला मस्जिद से लेकर धार की भोजशाला तक, टीपू सुल्तान द्वारा तोड़े गए साउथ के मंदिरों से लेकर कश्मीर के मार्तंड सूर्य मंदिर तक- सब कुछ वापस लिया जाएगा।

ये 1991 का ‘वर्शिप एक्ट’ वो आखिरी सेक्युलर दीवार है जो मुगलों के पापों को बचा रही है। जिस दिन ये दीवार गिरेगी, उस दिन भारत सही मायनों में अपनी सांस्कृतिक गुलामी से आज़ाद होगा। हमें अपने पूर्वजों के उस खून का हिसाब चाहिए जो उन मंदिरों की चौखट पर बहाया गया था। हमें अपने महादेव और कन्हैया को उन जेहादी ढांचों से आज़ाद कराना है।

ये आर-पार की लड़ाई है और इस धर्मयुद्ध में जीत सिर्फ और सिर्फ सनातन की होगी!

जय श्री राम!

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